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| जम्मू कश्मीर नया मानचित्र |
जम्मू कश्मीर में लगातार अर्धसैनिक बलों का भेजा जाना , अमरनाथ यात्रियों का वापस बुलाना,सारे कश्मीर में धारा 144 लागू करना,सारे नेता महबूबा मुफ़्ती,अमर अब्दुल्ला आदि को नजरबंद करना, फ़ोन बन्द, इंटरनेट के सेवाएं बन्द करने के बाद पूरे देश में ये अफवाह उड़ रही थी कि देश में कुछ बड़ा होने वाला है,सारे कश्मीरी नेता हाहाकार मचाये थे की धारा 370 हटेगी तो कश्मीर में स्थिति गम्भीर हो जायेगी,कश्मीर भारत के हाँथ से निकल जायेगा।
इसका पटाक्षेप राज्यसभा में आज सुबह 11 बजे गृहमंत्री अमितशाह की इस उद्घघोषणा के साथ हो गया जब अमित शाह में अनुच्छेद 370 को पूर्णतयः समाप्त करने की घोंषणा कि ,इसके साथ ही उसके साथ बाद में जोड़ी गई धारा 35-A भी ख़त्म हो गया । चूँकि ये धाराएं 1949 और 1954 में सिर्फ कैबिनेट की मीटिंग से निर्णय और राष्ट्रपति के मोहर के बाद बनी थी,इसलिए इस नियम को सामान्य राष्ट्रपति के द्वारा ही हटाया जा सकता है।
जम्मू कश्मीर में 370 व 35 (A) के हटने के बाद बदलाव :--
अब वहां राज्यपाल के बजाए उपराज्यपाल होगा ,वहां विधानसभा का कार्यकाल सिर्फ 5 साल का होगा जबकि अभी तक यहां विधानसभा का कार्यकाल 6 साल का होता था। अब वहां भारत का झंडा ही लहराएगा,अभी तक उस State में कश्मीर का झंडा अलग फहराया जाता था और देश का झंडा अलग फहराया जाता था । अभी तक जम्मू -कश्मीर का संविधान भारत के संविधान अलग था ,भारत सरकार के कानून केंद्र में बनने के बाद तभी लागू होते थे कश्मीर में जब वहां की सरकार उसका विधानसभा में अनुमोदन कर देती थी, जैसे कई कानून कश्मीर में लागू नही थे जैसे RTE (शिक्षा का अधिकार),मनी लॉन्डरिंग कानून , कला धन का कानून , 73 वां संवैधानिक संशोधन का प्रावधान लागू नही था ,कोई भी व्यक्ति वहां बस सकता है , कोई भी व्यक्ति अब वहां पर जमीन खरीदकर व्यापार कर सकता है, अब जम्मू कश्मीर में लागू रणवीर पैनल कोड लागू नही होगा बल्कि, अब" आई. पी. सी. 'और "सी. आर. पी. सी. "लागू होंगे ,पंचायतों व स्थानीय निकायों को अधिकार देने वाला संविधान 73 वां वा 74 वां संसोधन अभी तक जम्मू कश्मीर में लागू नही है अब ये लागू हो जायेंगे, जम्मू कश्मीर के कैडर वाले आई. ए. एस. और आई. पी. एस. केंद्र शासित प्रदेश के कैडर अधिकारी बन जायेंगे।साथ में जम्मू कश्मीर राज्य में में वही कानून लागू होंगे जो पूरे भारत में लागू होते है।
जम्मू कश्मीर का इतिहास आजादी से पूर्व--
जम्मू कश्मीर का लिखित इतिहास राजतरंगणी नामक ग्रन्थ से होती है,राजतरंगणी नामक पुस्तक को कल्हण ने लिखा , बाद में 1150 में जोनराज ने इस इतिहास के आगे के भाग को लिखा,श्रीवर ने इसे और आगे बढ़ाया।
कश्मीर में वैसे तो इस समय सभी पूजा पंथ के लोग रहते हैं, संपूर्ण कश्मीर में कश्मीरियत दिखती है हर जगह अलग अलग बोली भाषा के लोग घुले मिले रहते हैं,जिसे लोग संजो कर रखना चाहते हैं।
कश्मीर के राजतरंगणी से मालूम होता है कि यहां ईशा से तीसरी पूर्व मौर्य सम्राट अशोक का शासन रहा,साथ में किशन सम्राट कनिष्क ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया और कश्मीर बौद्ध संस्कृति और ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था। कश्मीर में एक महिला शासिका महारानी दिद्दा का भी शासन रहा ,जिसने अपनी सूझ बुझ और चतुराई से जम्मू कश्मीर के आधारशिला को मजबूत किया।
जब मध्ययुग में ललितादित्य मुक्तापीड़ ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया तब यह कश्मीर संस्कृति एवं विद्या का विशाल केंद्र था।
मध्ययुग में एक मुस्लिम कट्टरपंथी शासक सिकंदर बुतशिकन हुआ जिसने सत्ता में बैठते है सैकड़ों मन्दिर गिरा दिए हिन्दुओं को या तो कश्मीर से खदेड़ दिया या फिर उन पर जुल्म सितम ढा कर इनको हिन्दू से मुसलमान बना दिया। परंतु कश्मीर के इतिहास में एक अति उदार शासक सिकंदर के बाद हुआ इस राजा की दयालुता,न्याय प्रियता ,सहिष्णुता के कारण इसे हातिमताई की उपाधि दी गई कश्मीर का अकबर भी कहा जाता है। इसका नाम था जैन उल अबादीन। ---------
कश्मीर में सोलहवीं सदी में मुग़लों का अधिपत्य हो गया।
मुग़लों के बाद हिन्दू राजा ग़ुलाब सिंह डोगरा ने ब्रिटिश लोंगों से संधि करके अपने राज्य को जम्मू से बढ़ाकर कश्मीर तक विस्तृत कर लिया,डोगरा वंश आजादी तक कायम रहा उस समय कश्मीर घाटी में 20 प्रतिशत हिन्दू आबादी थी। कश्मीर घाटी जम्मू से अलग है ।
देश की आज़ादी के समय 1947 में पाकिस्तान ने कबाइलियों को कश्मीर भेजकर गिलगित -बाल्टिस्तान का हिस्सा छीन लिया। इस हिस्से को POK यानि Pak Occupied Kashmir कहते हैं।
जम्मू कश्मीर का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमीटर है जिसमे पाक अधिकृत क्षेत्र का 78,114 वर्ग किलोमीटर है। इसमें पाकिस्तान ने 5130 किलोमीटर क्षेत्रफल चीन को भेंट स्वरूप दे दिया।
वहीं अक्साई चिन हिस्सा का क्षेत्रफल 42,685 किलोमीटर है इस क्षेत्र पर चीन ने 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद बलपूर्वक कब्ज़ा जमा रखा है|
जम्मू और पूरा कश्मीर (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर मिलाकर) पूरा कश्मीर का अस्तित्व 16 मार्च 1846 के अमृतसर की संधि से राज्य और राज्य संरचना के रूप में आया था ,यह संधि महाराजा ग़ुलाब सिंह और ब्रिटिश सरकार द्वारा हस्ताक्षर किये गए थे,सिंधु नदी के उत्तरी क्षेत्र महाराजा रणवीर सिंह के समय विलय हुआ और ब्रिटिश सरकार द्वारा इसका अनुमोदन भी हुआ।
इधर पाक अधिकृत कश्मीर कराची समझौता के बाद पाकिस्तान के सीधे नियंत्रण में आ गया और 24 अक्टूबर 1947 में POK में एक युद्ध परिषद् स्थापित हुई,पाकिस्तान ने आजाद जम्मू कश्मीर राज्य से नामित इस जगह पर AJK सरकार को नाममात्र की शक्तियां दी हैं वास्तविक शक्ति तो पाकिस्तान के पास ही है। A J K की सरकार 1953 से 1974 तक बर्खास्त ही रहीं।
जम्मू कश्मीर का इतिहास
:आजादी के समय:
1947 में भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों ने आज़ादी दी,भारतीय स्वतंत्रता एक्ट 1947 के अनुसार तमाम रियासतों को ये चयन करने की सुविधा दी गई कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ जुड़ना चाहते हैं उस समय जम्मू-कश्मीर देश की सबसे बड़ी रियासत हुआ करती थी यहां महाराजा हरिसिंह शासन करते थे ,वहां की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के हिसाब से पाकिस्तान को लगा कि ये रियासत उसके साथ जाएगी ,परंतु राजा हरिसिंह कश्मीर को न भारत मे मिलानेके इच्छुक थे न ही पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे बल्कि उन्होंने कश्मीर को स्वतंत्र रखने का फैसला किया।
उधर इस गंम्भीर हालात में भी माउंटबेटेन कश्मीर में भारत की सेना भेजने को तैयार नही था ,जबकि नेहरू और पटेल भारत की सेना भेजने को दबाव बना रहे थे, माउंटबेटेन बिना विलय पत्र में Singnature किये कश्मीर में सेना भेजना अंतर्राष्ट्रीय नियम के ख़िलाफ़ बता रहे थे , उन्होंने नेहरू और पटेल से इस बारे में विवशता प्रकट की ।
जब कश्मीर में 22 अक्टूबर 1947 को जम्मू तक कबाइली घुस आये और 24 अक्टूबर तक ये पाकिस्तानी कबाइली बारामूला तक घुस आये ,इन कबाइलियों को रोकने के लिए हरि सिंह के सेनापति राजेंदर सिंह ने रास्ते के सारे पुल तुड़वा दिए ,ताकि कबाइलियों को रसद की व्यवस्था को रोका जा सके, वो लगातार कबाइलियों से मोर्चा लिए रहे पर वो उनसे युद्ध करते करते शहीद हो गए ,जब सिर में पाकिस्तानी कबाइलियों का ख़ौफ़ राजा साहब को आया , तब राजा हरिसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 भारत में विलय करने की इच्छा भारत सरकार को चिट्ठी लिखकर प्रकट की, साथ में विलयपत्र भी संलग्न दिया, जिसको राजा हरिसिंह के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन लेकर दिल्ली पहुंचे ,इस आधार पर भारत के तब के गृह सचिव VP Menon ने जम्मू में राजा हरिसिंह को 26 अक्टूबर 1947 को विलयपत्र (इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सशन ) में हस्ताक्षर करवाया ,27 अक्टूबर को गवर्नर जनरल माउंटबेटेन ने इसे स्वीकार कर लिया ,माउंटबेटेन ने कहा कि " जैसे ही कश्मीर से घुसपैठिये राज्य से खदेड़ दिए जायेंगे ,कानून व्यवस्था दुरुस्त कर ली जायेगी वैसे ही वहां की अवाम की भावना के अनुसार राज्य का विलय किया जायेगा ," वैसे आपको बतातें चले कि इसी इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन में राजा ने प्रावधान किया की भारत सरकार को सिर्फ संचार ,रक्षा,विदेश मामले में अधिकार होगा अन्य विषय पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्य को होगा इसके क्लाज पांच में कहा कि मेरे विलय के दस्तावेज में किसी भी भारत के कानून द्वारा संशोधन नही कर सकती जब तक उनकी यानि राजा जी की इच्छा न हो ,,,1948 में प्रस्तुत श्वेत पत्र में भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर के विलय को अस्थाई और तत्कालिक बताया था।
UNO में प्रस्ताव पहुँचते ही मामला अन्तराष्ट्रीय हो गया। UNO तक पहुँचते ही इस मामले में UNO ने लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल घोषित कर दी दोनों के अधिगृहीत भूभाग उनके अधिकार में रह गए , दोनों देशों की सेनाएं हटाये जाने के बाद UNO की सेना की उपस्थिति में जनमत संग्रह कराने की बात पूरे जम्मू कश्मीर (पाक अधिकृत भी) में कराने की बात हुई। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद द्वारा युद्धविराम संधि की अलग अलग व्याख्या के कारण भारत और पाक संतुष्ट नहीं थे,बहरहाल नवंबर 1948 में दोनों देश जनमत संग्रह को राजी हुए, परंतु भारत ने पहले पाक अधिकृत कश्मीर से सेना हटाने के बाद ही इस शर्त को मानने की बात की , इस शर्त को पाक ने भी नही माना पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर से पाकिस्तान ने कभी भी सेना नही हटाई।
पाकिस्तान द्वारा काश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद:
लगातार भारत के हिस्से में आतंकी कार्यवाहियों को जन्म देता रहा है, और कश्मीर की स्थिति 1990 से अधिक नाज़ुक हो गई जब पाक ने इसके लिए लक्ष्य बनाकर आतंकी घुसपैठिये भेजने को अंजाम देता रहा।इसी समय कश्मीरी पंडितों के लिए नर्क हो गया कश्मीर में रहना ,मस्जिदों से लगातार चिल्ला चिल्ला कर बोला जाता था की कश्मीरी पण्डित कश्मीर को एक सप्ताह में छोड़ दे ,रात को उनके घरों के गेट में इस्तिहार चस्पा कर दिया जाता था कि कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़कर चलें जाये और अपनी बहु बेटियों को उनके लिए छोड़ जाये, जो कश्मीरी पंडित तिलक लगाकर घूमता था उसके माथे में कील तक ठोक दी गई ,हजारों पंडितों ने दहशत में रातों रात काश्मीर घाटी छोड़ दी और दिल्ली ,पंजाब ,और अन्य शहरों में जा बसे। इस दौरान 1990 से 2019 तक करीब 41 हजार जम्मू और कश्मीर घाटी के नौजवान मारे गए आतंकियों के शैतानी हांथों से, पाकिस्तान जब प्रत्यक्ष रूप से युद्ध करके भारत को हरा नही पाया तो उसने मिलिटैन्ट का सहारा लिया ,उसके द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में बाकायदा मिलिटैन्ट ट्रेनिंग दी जाती है, जिनका काम भारत की बॉर्डर को पार करके आतंकी कार्यवाहियों को अंजाम देना , ये आतंकी भीड़भाड़ वाली जगहों में विस्फ़ोट करते है या फिर सेना के बेस कैम्प में आत्मघाती हमला करते है ,जैसा उरी और पुलवामा के हमले को भुलाया नही जा सकता ,दो चार आतंकी सेना द्वारा मुठभेड़ में मारे जाते है ,ये आतंकी किसी भी घर में घुसकर धमकाकर वहां से गतिविधियों को भी अंजाम देते है। घुसपैठिये भी 99%मारे ही जाते है ,वो भी 6 महीने या साल भर के अंदर , कभी कभी इंटेलिजेंस फेल होने पर आतंकी हमला करने में सफ़ल भी हो जातें है ,पाकिस्तान काश्मीर के भटके हुए नौजवानों के लिए पहले तो पत्थर बाज बनाता है फिर उन्ही में से किसी को उकसा कर आतंकी बनाता है और टेरर कैम्प में प्रशिक्षण भी दिलाता है । कुछ अलगाव वादी नेताओं की पाकिस्तान परस्त कार्यवाहियों से भी आतंकवाद पनपा।
धारा 370 जब से लगी तभी से कश्मीर के लोग ख़ुद को मानसिक तौर पर भारत से उस तरह नही जोड़ पाये जैसे अन्य प्रदेश के लोग भारत के संविधान से अटूट रिश्ता रखते हैं। वहीं अलगाव वादी नेता कश्मीर में तेजी से सक्रिय हुए , और कश्मीर ये अलगाववादी पकिस्तान के पैसों से काश्मीर के नौजवानों को भटकाकर पत्थर बाज बनाने लगे।
अनुच्छेद 370 और 35(A) - संविधान में कैसे जुड़े?
अब ये 370 और 35 A कहाँ से आ गए तो आप ये समझिये की जम्मू कश्मीर के ख़राब हालात को जवाहरलाल नेहरू ने गृहमंत्रालय से ख़ुद अपने अधिकार में रखा ,यानी कश्मीर की गृह मंत्रालय की सभी कार्यवाहियां सीधे PMO से डील होतीं थीं।इस बीच शेख अब्दुल्ला ने आंदोलन छेड़ दिया जिसने नवजवानों को भारत में मिलने के लिए तैयार किया, शेख अब्दुल्ला ने कबाइलियों को भारत से खदेड़ने में भारतीय सेना का साथ भी दिया था ,शेख अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस का गठन करके जम्मू कश्मीर की जनता को भारत के पक्ष में मोड़ा , परंतु कभी कभी उनका रुख पाकिस्तान में मिलने का हो जाता था बाद में तो नेहरू ने 1962 में दस साल के लिए जेल भेज दिया क्योंकि वह क्योंकि वह अमेरिका को उकसा रहे थे कश्मीर को आज़ाद कराने के लिये। इस कारण उनको कई बार नजर बन्द किया गया आप ये समझो कि ये नेता शुरू से ही कश्मीरी जनता को भ्रमित करते रहे ,वो जवाहर लाल नेहरू के खास मित्रों में थे इसलिए जब वो नेहरू से मिल लेते थे वो भारत के पक्ष में पूर्णतयः खड़े हो जाते थे ,कभी किसी मुद्दे पर पाकिस्तानी सपोर्ट की बात बीच बीच करते रहते थे ,क्योंकि कुछ अलगाववादी नेता भी थे ,ये सब उनके सुरों में सुर मिलाने के कारण होता था।
26 अक्टूबर 1947 को जब राजा हरि सिंह ने भारत में मिलने का कश्मीर के भारत में विलय की संधि कि तभी राजा ने कश्मीर के निवासियों को राजा द्वारा दिए गए 1927 और 1932 के विशेषाधिकार को बताया जिसमे जम्मू कश्मीर के वो नागरिक माने जाते थे जो 1911 से पहले कश्मीर में रहे हैं और वहां पर सम्पत्ति खरीदी हो ,, 1952 में भारत के संविधान के प्रथम अनुसूची के "भाग ख" राज्य में जम्मू कश्मीर को जोड़ा गया।
370 अनुच्छेद से हुई केंद्र की ढीली पकड़: बढ़ा अलगाववाद:
अनुच्छेद 370 ,के लागू होने के बाद जम्मू कश्मीर में केंद्र की सारी शक्तियां सिर्फ तीन विषय संचार ,रक्षा,और विदेश मामलों तक सीमित हो गई। अन्य सभी मामले पर राज्य सरकार को ही कानून बनाने का अधिकार था ,यहां तक किसी भी केंद्रीय विषय पर किसी क़ानून को कश्मीर में लागू करने के लिए राज्य के विधानसभा की जरूरत पड़ती है ,समवर्ती सूची के विषय में क़ानून बनाने का अधिकार भी विधान सभा को थी वहीं अवशिष्ट अधिकार भी राज्य तक ही सीमित हो गये और इसमें जम्मू कश्मीर के लिए अपना सद्र-ए-रियासत का प्रावधान भी था ,जो 1963तक रहा।धारा 370(१) ये उस सन्धि की बात करता है जिसमे कश्मीर को भारत में कुछ शर्त के साथ सुविधाओं की बात की है।
धारा 370(२) और धारा 370(३) में कुछ विशेष रियायतें अलग विधान सभा ,अलग संविधान ,अलग झंडे, जम्मू कश्मीर के नागरिक पहचान की बात की गई है । वहीं 35(A) जो 1954 में अनुच्छेद 370 के साथ जोड़ा गया ये वहां के नागरिकों के नागरिकता के पहचान से सम्बंधित है अनुच्छेद 35 A जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच 1952 के दिल्ली समझौते से जोड़ा गया, जिसमे ये भी जोड़ा गया कि जम्मू कश्मीर में भारत का तिरंगा और कश्मीर का झंडा अगल बगल फहराया जायेगा, कश्मीर में आंतरिक गड़बड़ी होने पर बिना राज्य सरकार की अनुमति के भारत सेना नही भेज सकता है, साथ में अविशिष्ट शक्तियां कश्मीर के पास ही रहेंगी और कश्मीर से बहार का कोई व्यक्ति वहां कोई सम्पत्ति नही ख़रीद सकता है, जो 35-A का प्रावधान जोड़ा गया वो भी धारा 370 के भाग 3 से ही जोड़ा गया जो सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश से जोड़ा गया कभी भी देश की संसद में इसके लिए बिल लाकर नही जोड़ा गया यानी इस अनुच्छेद की उम्र सिर्फ 6 महीने ही होना चाहिए थी जैसे राष्ट्रपति का आदेश सिर्फ 6 महीने तक ही अधिकार में रहता है।
अनुच्छेद 35-A का कश्मीरी जनता, शरणार्थियों में प्रभाव:
अनुच्छेद 35-A जिसमे काश्मीर के नागरिको के नागरिकता वहां निवास करने वहां सम्पति अर्जित करने का प्रवधान करती है। अनुच्छेद 35-A राज्य की विधानसभा को अधिकार देती है कि वह कश्मीर के नागरिकों की पहचान करे ,इस अनुच्छेद के कारण कई दशक से पश्चिमी से आये पांच हजार शरणार्थी परिवारो को वहां की स्थाई नागरिकता नही मिली, कैबिनेट के प्रस्ताव से 1957 में पंजाब से बाल्मीकि समुदाय के लोगों को कश्मीर में सफाई के काम के लिए भेजा गया था, परंतु उनके बच्चे आज भी सिर्फ सफ़ाई के काम का ही अधिकार है अन्य किसी नौकरी या रोज़गार नही कर सकते । आज इन सब शरणार्थी के बच्चे किसी स्कूल में शिक्षा नही ले सकते , ये शरणार्थी यहां के विधानसभा और पंचायत में अपना वोट नही डाल सकते। इस अनुच्छेद से जम्मू कश्मीर से बहार के लोग यहां पर कोई संम्पत्ति नही खरीद सकते ,कोई लड़की यदि वो कश्मीर की है और उसकी अपनी निजी सम्पत्ति भी है और उस लड़की ने भारत के अन्य प्रदेश के लड़के से शादी कर ली तो उसकी सम्पत्ति उसके हाँथ से निकल जायेगी।जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में सरकार द्वारा गुड गवर्नेंस के उपाय और विकास:
जम्मू कश्मीर चूँकि लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के पास का एक सेंसिटिव एरिया में अवस्थित है इसलिए इसकी यूनियन टेरिटरी की स्थिति को बनाया गया है नए पुनर्गठन कानून में ,आप देखते भी है बॉर्डर में झड़पों को ,कारगिल वॉर के बटालिक, द्रास सेक्टर सभी लद्दाख के ही हिस्से हैं , ये अति पिछड़ा एरिया है , यहाँ पर बौद्ध और मुस्लिम धर्मावलंबी और गुर्जर ,बकरवाल भी रहते है ,बौद्ध 40% है मुस्लिम 30% शेष बकरवाल ,गुर्जर और अन्य समुदाय के हैं,जाड़े में ये भूभाग जम्मू कश्मीर से पूरी तरह कट जाता है , अत्यधिक शीत पड़ने के कारण बर्फ जम जाती है ,आपने Three इडियट्स फ़िल्म में आमिर खान के रोल वाले वान्शुक का नाम सुना ,वो इसी लद्दाख के है जिन्होंने कई खोज की है के लिए जैसे बर्फ को एकत्र करके शुद्ध जल की आपूर्ति आदि ,इनको रमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिल चुका है , इस क्षेत्र में भरपूर पर्यटन , औषधि , योगा , आदि की सम्भावनाएं हैं ,जो इसके अलग UT बनाये जाने से पूरी हो सकतीं है , परंतु गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि समय के साथ इसको पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जायेगा।ये दुर्भाग्य पूर्ण है कि 70 साल पुरानी भूल को यदि सुधार दिया गया है तो कांग्रेस और अन्य पार्टियां जो इस संशोधन का विरोध कर रही है उनको जनता की नब्ज पकड़ना नही आता क्योंकि देश की जनता कश्मीर के आतंकवाद के कारण बहुत ज़्यादा मानसिक रूप से परेशान रहती थी ,उसे अब निज़ात मिलेगी।
31 अक्टूबर 2019 को जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चन्द्र मुर्मू और लद्दाख राधाकृष्ण माथुर पहले उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली, अब केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी,मुख्यमंत्री के अधिकार भी सीमित होंगे, विधान सभा की सीटों की संख्या 107 होगी, जिसे परिसीमन के बाद 114 तक बढ़ाये जाने का प्रस्ताव होगा ,राज्य के संवैधानिक मुखिया जम्मू कश्मीर में नहीं होंगे बल्कि उसकी जगह अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तरह जम्मू कश्मीर में विधान परिषद नहीं होगी ,जम्मू कश्मीर को विधान परिषद को 17 अक्टूबर को ही राज्य सरकार ने जम्मू कश्मीर की पुनर्गठन अधिनियम की धारा 57 के तहत समाप्त कर दिया था।
एकीकृत जम्मू कश्मीर जिसका लद्दाख भी हिस्सा रहा है,में विधानसभा की 111 सीटें थीं,इनमे चार सीटें लद्दाख प्रान्त की हैं ,इन्हें हटाये जाने के बाद केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में 107 सीटें रह गईं हैं, लद्दाख में अलग केंद्रशासित क्षेत्र बन जाने से उनकी चारों विधानसभा सीटों का अस्तित्व समाप्त हो गया, मौजूदा समय में यदि जम्मू कश्मीर में चुनाव होगा तो 83 सीटों पर ही चुनाव होगा,इसके अतिरिक्त दो सदस्यों को नामांकित किया जायेगा, जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित 24 सीटों पर पहले की तरह कोई चुनाब नही होगा,केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटों को 107 से बढ़ाकर 114 किये जाने का प्रस्ताव है ,इस सन्दर्भ में 2011 कई जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाएगा।
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति पूरी तरह दिल्ली और केंद्रशासित प्रदेश पांडुचेरी के मुंख्यमंत्री के समान होगी , मुख्यमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ विधायकों को ही मंत्री बना सकेंगे, इसके अलावा राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को या प्रस्ताव को उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद ही लागू किया जाएगा, उपराज्यपाल चाहें तो किसी भी बिल या प्रस्ताव को नकार नही सकते ,उनके लिए मुख्यमंत्री या राज्यविधान सभा के प्रस्ताव को मंजूरी देना बाध्यकारी नहीं होगा,राज्य विधानसभा का कार्यकाल भी पांच साल रहेगा,जबकि एकीकृत जम्मू कश्मीर में कार्यकाल छः साल का होता था।
31 अक्टूबर 2019 से से उपराज्यपाल के शपथ ग्रहण के साथ जम्मू कश्मीर में व लद्दाख में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अधिनियम समेत 106 केंद्रीय क़ानून लागू होंगे,प्रदेश में पहले चल रहे 153 कानून और राज्य अधिनियम के जरिये बने 11 कानून पूर्णतया समाप्त हो जाएंगे,वैसे अधिकांश केंद्रीय क़ानून पहले से लागू थे,परंतु केंद्रीय सूचना अधिनियम,शत्रु संपत्ति अधिनियम , राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम क़ानून अब लागू होंगे।
शिक्षा, सड़क,स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं का अधिकार राज्यों के पास होगा, राजस्व विभाग पूरी तरह राज्य सरकार के अधीन होगा,कृषि भूमि,कृषि ऋण,कृषि भूमि के हस्तांतरण के अधिकार पूरी तरह राज्य सरकार के अंतर्गत होंगे।
35-Aपूरी तरह निष्प्रभावी---
35-A पूरी तरह निष्प्रभावी हो गया है,अब जम्मू कश्मीर में संचालित प्रॉफेशनल कॉलेजों में कोई भी देश का नागरिक दाखिला ले सकता है और जम्मू कश्मीर में स्थाई तौर पर रह सकता है, वहाँ जमीन भी खरीद सकता है ।अब केंद्र शासित राज्य जम्मू कश्मीर में संम्पति स्थांतरण अधिनियम,जम्मू कश्मीर एलाइनेशन ऑफ लैण्ड एक्ट,जम्मू कश्मीर कृषि और कृषक सुधार अधिनियम में नई व्यवस्था के अनुसार आवश्यक संशोधन किया जाएगा।
35-A हटने के बाद पहले जम्मू कश्मीर से बाहर ब्याही गई बेटियां व उनके बच्चों के सारे अधिकार खत्म हो जाते थे, वह अपने पिता की संपत्ति से वंचित हो जातीं थीं,लेकिन अब जम्मू कश्मीर की बेटी के अन्य प्रदेशों में विवाह होने पर पूरे अधिकार मिलेंगे।
15 देशों के राजनयिकों ने देखा नया कश्मीर-------
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू कश्मीर के हालात का जायजा लेने के लिए 15 देशों के राजनयिकों ने दो दिवसीय (9 जनवरी 2020 से 10 जनवरी 2020 ) जम्मू कश्मीर की यात्रा की , इन विदेशी मेहमानों में से किसी ने भी अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध नहीं किया ,इन्होंने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के मुद्दे का हल करने पर जोर दिया साथ में जम्मू कश्मीर में मौलिक संरचना विकास और रोजगार से जुड़े मुद्दों को हल करने पर जोर दिया।
15 देशों में अमेरिकी राजदूत केनेथ आई जस्टर थी इसके अलावा प्रतिनिधि मण्डल में बांग्लादेश,वियतनाम,नार्वे, मालद्वीप,दक्षिण कोरिया,मोरक्को,नाईजीरिया,पेरू,आदि देशों के राजनयिक सम्मिलित थे ।
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बहाल करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव परिसीमन आयोग की रिपोर्ट रही, जिसे 5 मई 2022 को अंतिम रूप दिया गया। न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले इस आयोग ने जम्मू संभाग में 6 और कश्मीर घाटी में 1 सीट बढ़ाकर विधानसभा सीटों की कुल संख्या 83 से बढ़ाकर 90 कर दी (पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर की 24 सीटों को छोड़कर)। इस नई व्यवस्था में पहली बार अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए 9 सीटें आरक्षित की गई हैं, जो सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है। इसके अतिरिक्त, उपराज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वे कश्मीरी प्रवासियों (Kashmiri Migrants) में से दो सदस्यों और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) से आए विस्थापितों में से एक सदस्य को विधानसभा में मनोनीत कर सकें। इस परिसीमन के बाद जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक संरचना में क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है, जिससे अब विधानसभा का स्वरूप और अधिक समावेशी हो गया है।
प्रशासनिक स्तर पर देखें तो, केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद जम्मू-कश्मीर में 'वन नेशन, वन राशन कार्ड' और 'आयुष्मान भारत' जैसी केंद्रीय योजनाओं का शत-प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित किया गया है, जो पहले संवैधानिक अड़चनों के कारण सुस्त था। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने से सत्ता का विकेंद्रीकरण जमीनी स्तर तक पहुँचा है, जहाँ जिला विकास परिषद (DDC) के चुनावों ने स्थानीय नेतृत्व को नई पहचान दी है। सुरक्षा के मोर्चे पर, आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई गई है, जिससे पथराव की घटनाओं में भारी कमी आई है और अलगाववादी गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगा है। प्रधानमंत्री विकास पैकेज (PMDP) के तहत हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, एम्स (AIIMS) और आईआईटी जैसे संस्थानों के निर्माण ने राज्य की बुनियादी संरचना को नया आयाम दिया है, जिससे युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर में लगभग एक दशक के अंतराल के बाद वर्ष 2024 में हुए विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक घटना साबित हुए, जिसमें मतदाताओं की भारी भागीदारी ने दुनिया को यह संदेश दिया कि यहाँ की जनता लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूर्ण विश्वास रखती है। चुनाव के बाद नई सरकार का गठन हुआ और मुख्यमंत्री ने कार्यभार संभाला, हालांकि केंद्र शासित प्रदेश की मर्यादाओं के तहत पुलिस और कानून-व्यवस्था अभी भी केंद्र सरकार यानी उपराज्यपाल के अधीन है। लद्दाख की बात करें तो, वहाँ भी छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य के दर्जे की मांगों के बीच केंद्र सरकार ने लेह और कारगिल की स्वायत्त जिला परिषदों को और अधिक सशक्त बनाने पर जोर दिया है। इस प्रकार, 2019 से शुरू हुआ यह सफर अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ पुराने कानूनों के अवशेष पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं और जम्मू-कश्मीर विकास की एक नई इबारत लिख रहा है, जिसमें निवेश, पर्यटन और औद्योगिक विकास को प्राथमिकता दी जा रही
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1 Comments
Nice post
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