Kejriwal 2020 में Teesri Baar कैसे जीते दिल्ली में।2025 का उलटफेर भाजपा कैसे जीती

क्यों जीती तीसरी बार आम आदमी पार्टी??



            दिल्ली की दो करोङ जनता ने आम आदमी को तीसरी  बार सत्ता की चाभी सौंप दी । सारी दिल्ली बोले -लगे रहो केजरीवाल, अच्छे बीते पांच साल !! केजरीवाल का जादू सर चढ़कर बोले केजरीवाल का जलवा सर चढ़कर बोले।
          दिल्ली की जनता ने केजरीवाल पर फिर भरोसा किया , क्योंकि दिल्ली की जनता ने केजरीवाल की लोक लुभावन नीतियों से सीधे प्रभावित हुई ,केजरी ने नगर निगम प्रशासन की तरह काम किया ,  उसने।  हर  जगह CCTV कैमरा लगवाये जिससे अपराधी आसानी से पकड़ आ जाए ,उसने मोहल्ला क्लीनिक खोला ,जिस कुछ कुछ दूरी में बेसिक इलाज के लिए फ्री मोहल्ला क्लीनिक  ने जनता को प्रभावित किया , दिल्ली ट्रांसपोर्ट की बसों  यानि डी. टी. सी की बसों में महिलाओं के लिए फ्री यात्रा की शुरुआत की ,ए सी. और नॉन ए सी बसों के सफ़र के लिए सिंगल जर्नी ट्रैवल पास जारी किया,  बसों में मार्शल व्यवस्था शुरू की जिससे महिलाओं को सुरक्षा मिले यात्रा के समय।     इन सेवा   से महिला वोटर में पकड़ बना लिया ,जुग्गी झोपडी के वोटर जिनमे बाल्मीकि वोटर और पूर्वांचली वोट है उसने केजरीवाल पर इसलिए भरोसा किया क्योंकि फ्री बिजली पानी के मुद्दे ने इनको प्रभावित किया क्योंकि   आम  आदमी पार्टी शुरू से   जानती  थी, कि दिल्ली वासियों को फ्री बिजली पानी के मुद्दे प्रभावित करते हैं, क्योंकि इन जगह में ज्यादातर लोग 200 यूनिट बिजली  ही प्रयोग करते है ,जो फ्री थी ,लोंगों ने तीन महीने से फ्री बजली और पानी का लाभ उठाया।
साउथ डेल्ही जो पास एरिया है वहां की जनता ने केजरीवाल पर भरोसा किया क्योंकि बिजली का बिल कम होने से पास एरिया के लोंगों ने भी केजरी वाल का विरोध नही किया ,20 करोङ के घर से निकलने वाली महिला भी केजरीवाल के लिए दिल से दुआ करती है, क्योंकि हर आदमी सब्जी के साथ फ्री धनिया की इच्छा रखती है।
केजरीवाल ने शिक्षा में बेहतरीन कार्य किया ,शिक्षा का बजट 5 साल में बढ़ा दिया।,शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी विद्यालयों को पब्लिक स्कूल की तर्ज पर सुविधाएँ उपलब्ध करवाई, जिससे ये जनता के बीच सन्देश पहुंचा की केजरीवाल गरीब बच्चों के शिक्षा और उनके भविष्य के लिए चिंतित है।
  केजरीवाल ने बुजुर्ग वोटर्स को लुभाने के लिए फ्री तीर्थ यात्रा की सुविधा दी।
   दिल्ली की जनता ये  भी सोंच रही थी कि यदि भाजपा सरकार बन गई तो ये फ्री सेवा खत्म कर देगी ,जबकि  यदि केजरीवाल फिर आयें तो फ्री सेवा जारी रहेगी।

        नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला नहीं---

पिछले लोकसभा चुनाव में आप को मिली हार का कारण यही था कि केजरीवाल सीधे नरेंद्र मोदी  की आलोचना करते रहे ,वो मोदी विरोधी ख़ेमे में साथ दे रहे थे , जबकि उस समय नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी ,जनता मोदी के विरोधी का अपना विरोध समझती थी ,पिछले लोकसभा चुनाव के हार से शिक्षा लेते हुए केजरीवाल इस बार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की कोई आलोचना नही की , बल्कि दिल्ली का चुनाव में अपना विरोध  अमित शाह  और मनोज तिवारी का किया ।

    शाहीन बाग़ मुद्दे से बचे रहे केजरीवाल---

केजरीवाल ने इस बार सधे हुए कदम से प्रचार किया हर विवादस्पद मुद्दे पर टीका टिप्पणी से बचे चाहे वो CAA का मुद्दा हो या NRC या फिर शाहीन बाग़ का आंदोलन ,क्योंकि केजरीवाल जानते थे उनके और उनके किसी मंत्री के एक भी गलत टिप्पड़ी से हवा का रुख भाजपा की तरफ़ जा सकता है , शाहीन मुद्दे के सीधे समर्थन के लिए कोई नेता वहां पर नही गया । केजरीवाल अपने कंपेन में सिर्फ अपने पांच  साल में किये गए विकास की बात करते रहे । मनीष सिसोदिया शुरुआत में जरूर खुलकर शाहीन बाग़ का समर्थन किया परंतु इससे आम आदमी पार्टी की  आलोचना हुई ,जिससे केजरीवाल ने इससे पीछे हट गए बाद में उन्होंने इस सड़क जाम से दुकानदारों व्यापार के नुक्सान और मरीज़ों के एम्बुलेन्स फंसने के कारण  आंदोलन को गलत बताया। परंतु twitter और facebook से वो शाहीन बाग़ का समर्थन भी करते रहे जिससे मुस्लिम्स का वोट अचानक कांग्रेस की तरफ़ नाराज़ होकर न चला जाए। यानि हिन्दू मुस्लिम के हवा के समय हिन्दू का भी वोट लेना है और  मुस्लिम का वोट नही छोड़ना।

     भाजपा नेताओं की ग़लत बयानबाजी  और देरसे प्रचार  --

 भाजपा नेताओं ने प्रचार के दरमियान हिन्दू मुस्लिम मुद्दे ,शाहीन बाग़ को मुद्दा बनाने के चक्कर में केजरीवाल को आतंकी कह दिया आम आदमी की जीत होने पर पाकिस्तान की जीत बता दिया ,पर जनता उनके इस रुख़ से नही बदली क्योंकि जनता को शाहीन बाग़ से बड़ी बात दिल्ली के विकास के कदम दिखे। भाजपा के नेता CCTV कैमरे आदि के संख्या में कम होने कारण कोसते रहे परंतु जनता को केजरीवाल के काम अच्छे  लगते रहे। भाजपा के दिल्ली संगठन ने चुनाव से एक महीने पहले ही प्रचार शुरू किया ,इसके पहले भाजपा के कार्यकर्ता निराश थे , वो भ्रमित थे कि विकास कार्यों का विरोध कैसे करें , बाद में प्रचार करने से आम आदमी पार्टी आगे निकल चुकी थी ,वैसे पहले की विधान सभा में भाजपा की सिर्फ तीन सीट थी ,इसलिए वो ज्यादा बढ़ने की उम्मीद भी नही रखते थे शाहीन बाग़ के मुद्दे से कार्यकर्ता में जोश भरा, लगा की वो भी सत्ता में केजरी वाल को पटखनी देकर दिल्ली की गद्दी में काबिज हो सकते हैं।

    भाजपा के नेताओं का जम घट--

दिल्ली चुनाव कॉम्पैन में भाजपा के 10 कैबिनेट मंत्री और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री को भेजा गया ,   योगी आदित्यनाथ ने कई सभाएं की ,  नितिन गडकरी आये ,  स्मृति इरानी  आईं ,बिहार से नितीश भी प्रचार के लिए आये।इससे हवा का रुख़ थोडा बदलता नजऱ आया   , इसमें भी बहार से आये बीजेपी के नेताओं ने गलियो के चक्कर लगाए ,परंतु लोकल दिल्ली के   नेता विजय गोयल ने कोई  मेहनत नहीं की।

 दिल्ली की जनता ने ये पहले से खुद को तैयार कर लिया था यदि केंद्र में मोदी फिट है तो राज्य में केजरीवाल फिट , भाजपा ने अपना कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नही पेश किया इस कारण भी कोई मजबूत नेतृत्व नही मिल सका ,और जनता ने विश्वास नही किया की भाजपा में केजरीवाल के टक्कर के कोई मुख्यमंत्री का  दावेदार है।
 भाजपा  के कार्यकर्त्ता शुरुआत में निराश थे उनको समझ में नहीं आ रहा था कि वो केजरीवाल के बिजली पानी आदि सुविधाओं का बिरोध कैसे करें ,वो केजरीवाल के गलियों में घूमते हुए देखते थे पर कोई विरोध का फार्मूला नहीं था ,जब शाहीन बाग़ मुद्दे को अमित शाह ने लपका और हर कार्यकर्त्ता को शाहीन बाग़ को केजरीवाल के ख़िलाफ़ इशू बनाने को कहा।परंतु केजरीवाल ने उल्टा अमितशाह को गृहमंत्री होने के नाते इस इशू को सॉल्व नही कर पाने में असफल बताया ,केजरीवाल बीजेपी के ट्रैप में नही फंस पाये ,जबकि BJP उनको इस मुद्दे में किसी बयान के लिए उकसा रही थी।

केजरीवाल का दमदार कंपैन--

 आम आदमी पार्टी ने 70 विधान सभा में एक एक विधानसभा को टारगेट करके कंपेन किया, आम आदमी के कार्यकर्त्ता 35 लाख घरों में एक व्यक्ति से मिले और अपने पांच साल के विकास परक कामों को गिनाया जो केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के लिए किया। केजरीवाल स्वयं हाई डाई बेटीक पेशेंट होने के बाद भी हर दिन प्रचार किया,  रोजाना एक बजे तक जगना सुबह पांच बजे उठकर फिर से कैम्पेन में लग जाना उनके मेहनत से 62 सीटों में जीत दर्ज की ,पार्टी ने अपना प्रचार छै माह पूर्व से ही शुरू कर दिया था, हर कार्यकर्त्ता के पास स्पष्ट विज़न था ,अपने मुख्य नेता को आगे रखकर उनके पाँच साल के काम को जनता के सामने रखना। केजरीवाल ने हिन्दू वोट लेने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ , हिन्दुवों को लुभाने के लिए  केजरीवाल किसी मुस्लिम बस्ती में प्रचार के लिए नहीं गए, साथ में सिर्फ चार विधानसभा सीट ही मुस्लिम को दी गईं ।

कांग्रेस का निष्क्रिय होना-----

कांग्रेस पार्टी ने अपनी हार शुरुआत से ही मान ली थी उनके पास राज्य स्तर का कोई संगठन नही बचा दिल्ली में ,उनका थोडा बहुत प्रचार दिल्ली में 15 साल शीला दीक्षित के किये गए विकास कार्यो के आधार पर था ,राहुल गांधी और प्रियंका ने भी सिर्फ एक दो जनसभा की ,यदि कांग्रेस भरपूर ऊर्जा के साथ लड़ती तो हो सकता था आम आदमी का मुस्लिम वोटर  दिकभ्रमित होता और कांग्रेस को वोट करता ,परंतु कांग्रेस का कोर वोट पूरा का पूरा आम आदमी पार्टी को चला गया ,कांग्रेस को सिर्फ 4% वोट ही मिले 67 सीट में जमानत ज़ब्त हो गई , कांग्रेस ने हथियार  लड़ाई से पहले डाल दिए थे और बाइपोलर लड़ाई ही मानकार चुप बैठ गए ,जिससे केजरीवाल के वोट प्रतिशत में  ज़्यादा इजाफ़ा हुआ।

नया अध्याय: 2024-25 का सियासी घमासान और 'अग्निपरीक्षा'

​दिल्ली की राजनीति ने 2020 की जीत के बाद एक बहुत ही नाटकीय मोड़ लिया है। जहाँ पिछला चुनाव सिर्फ 'विकास' पर था, वहीं अब मुकाबला 'साख' और 'कानूनी लड़ाई' पर आ टिका है।

1. नेतृत्व में बड़ा बदलाव: केजरीवाल का इस्तीफा और आतिशी का उदय

शराब नीति मामले में जेल से बाहर आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने एक बड़ा दांव खेला। उन्होंने 'नैतिकता' का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और घोषणा की कि अब वह जनता की अदालत में "ईमानदारी का सर्टिफिकेट" लेने जाएंगे। उनकी जगह आतिशी को दिल्ली की कमान सौंपी गई, जो शिक्षा और बिजली जैसे विभागों में अपने काम के लिए जानी जाती हैं। यह दिल्ली के इतिहास में एक बड़ा बदलाव है।

2. भ्रष्टाचार के आरोप बनाम 'विक्टिम कार्ड'

पिछले दो सालों में भाजपा ने आम आदमी पार्टी को भ्रष्टाचार के मुद्दों (जैसे शराब नीति और शीशमहल विवाद) पर जमकर घेरा है। जहाँ भाजपा इसे 'लूट की सरकार' बता रही है, वहीं केजरीवाल ने इसे केंद्र सरकार की साजिश और 'जेल का जवाब वोट से' देने का नारा बुलंद किया है। अब जनता को तय करना है कि वे इन आरोपों को सच मानते हैं या इसे काम रोकने की साजिश।

3. 'मुफ्त सुविधाओं' पर छिड़ी नई बहस

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा "रेवड़ी कल्चर" (मुफ्त की राजनीति) पर किए गए हमले के बाद दिल्ली की राजनीति फिर गरमा गई है। केजरीवाल आज भी डटे हुए हैं कि दिल्ली का बजट मुनाफे में है और वे जनता को उनका हक दे रहे हैं। 2025 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिजली-पानी की ये सुविधाएं अभी भी वोट दिलाने में उतनी ही सक्षम हैं जितनी 2020 में थीं।

4. भाजपा की नई घेराबंदी और कांग्रेस की स्थिति

भाजपा इस बार 2020 की तरह 'देर' नहीं कर रही है। उसने आतिशी सरकार के खिलाफ कूड़े के पहाड़ों, यमुना की सफाई और प्रदूषण को बड़ा मुद्दा बनाया है। वहीं कांग्रेस, जो पिछले चुनाव में निष्क्रिय थी, अब गठबंधन और ज़मीनी रैलियों के ज़रिए अपनी खोई हुई ज़मीन तलाशने की कोशिश कर रही है।

5. 2025 की चुनौती: क्या फिर चलेगा जादू?

अब सवाल यह है कि क्या केजरीवाल बिना मुख्यमंत्री पद पर रहे, सिर्फ एक 'जननायक' के तौर पर 2025 में 2020 जैसी जीत दोहरा पाएंगे? दिल्ली की जनता अब विकास के साथ-साथ 'स्थिरता' और 'दाग-मुक्त शासन' को तौल रही है।

2025 का उलटफेर: क्यों ढहा केजरीवाल का किला?

​2020 में जिस जनता ने केजरीवाल को सिर-आंखों पर बिठाया था, उसी दिल्ली ने 2025 के विधानसभा चुनावों में 'बदलाव' का रास्ता चुना। 8 फरवरी 2025 को आए नतीजों ने सबको चौंका दिया, जहाँ भाजपा ने 70 में से 48 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि आम आदमी पार्टी महज 22 सीटों पर सिमट गई।

​केजरीवाल की इस हार के पीछे वे प्रमुख कारण रहे, जिन्हें पार्टी समय रहते भांप नहीं पाई:

1. भ्रष्टाचार के आरोप और साख का संकट

​2020 के चुनाव में केजरीवाल की छवि 'कट्टर ईमानदार' नेता की थी, लेकिन 2025 तक आते-आते शराब नीति घोटाला, जल बोर्ड घोटाला और 'शीशमहल' (मुख्यमंत्री आवास) विवाद जैसे गंभीर आरोपों ने उस छवि को गहरा धक्का पहुँचाया। अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे शीर्ष नेताओं की जेल यात्रा ने मध्यम वर्ग के वोटरों के मन में संदेह पैदा कर दिया।

2. बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी: हवा और पानी का मुद्दा

​2020 में मुफ्त बिजली-पानी जीत का फॉर्मूला था, लेकिन 2025 में जनता ने 'गुणवत्ता' पर सवाल उठाए।

  • यमुना की सफाई: सालों से यमुना साफ करने के वादों के बावजूद छठ पूजा के समय जहरीले झाग की तस्वीरों ने सरकार के दावों की पोल खोल दी।
  • प्रदूषण: हर साल सर्दियों में दिल्ली का 'गैस चैंबर' बनना और उसका कोई ठोस समाधान न निकलना जनता की नाराजगी का बड़ा कारण बना।
  • सड़कें और ड्रेनेज: बारिश के समय जलभराव और जर्जर सड़कों ने मोहल्ला क्लीनिक और स्कूलों की चमक को फीका कर दिया।

3. 'एंटी-इंकंबेंसी' और नेतृत्व का अभाव

​10 साल तक सत्ता में रहने के कारण विधायकों के खिलाफ गहरा असंतोष (Anti-incumbency) था। केजरीवाल का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना और आतिशी को कमान सौंपना जनता को रास नहीं आया। लोगों को लगा कि केजरीवाल जवाबदेही से बच रहे हैं। वहीं, भाजपा ने इस बार परवेश वर्मा जैसे स्थानीय नेताओं को आगे कर 'जायंट किलर' की भूमिका निभाई, जिन्होंने खुद अरविंद केजरीवाल को नई दिल्ली सीट से 4,000 से अधिक वोटों से हरा दिया।

4. भाजपा की बदली हुई रणनीति: 'डबल इंजन' का नारा

​2020 में भाजपा के पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं थी, लेकिन 2025 में भाजपा ने 'काम बनाम काम' की लड़ाई लड़ी।

  • ​भाजपा ने केंद्र सरकार की योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत, पीएम आवास) को दिल्ली में लागू न होने देने के लिए केजरीवाल सरकार को घेरा।
  • ​मध्यम वर्ग को लुभाने के लिए बजट में टैक्स रियायतें और दिल्ली के विकास के लिए 'डबल इंजन सरकार' का वादा किया।
  • ​भाजपा के कार्यकर्ताओं ने बूथ स्तर पर जाकर केजरीवाल की 'मुफ्त' योजनाओं के पीछे की कमियों को उजागर किया।

5. कांग्रेस का वोट बैंक में सेंध और त्रिकोणीय मुकाबला

​2020 में कांग्रेस का वोट पूरी तरह 'आप' को चला गया था, लेकिन 2025 में कांग्रेस ने (भले ही सीटें न जीती हों) अपना वोट प्रतिशत बढ़ाया। संदीप दीक्षित जैसे उम्मीदवारों ने नई दिल्ली जैसी सीटों पर केजरीवाल के हिस्से के वोट काटे, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला। मुस्लिम इलाकों में भी 'आप' के वोट शेयर में करीब 10% की गिरावट देखी गई, जो केजरीवाल की रणनीतिक हार साबित हुई।

6. हनुमान चालीसा बनाम सॉफ्ट हिंदुत्व की विफलता

​केजरीवाल ने 2020 में जिस हनुमान चालीसा के दम पर हिंदू वोटरों को जोड़ा था, वह कार्ड 2025 में काम नहीं आया। स्वाति मालिवाल विवाद और राम मंदिर के मुद्दे पर 'आप' के अस्पष्ट रुख ने हिंदू वोटरों के एक बड़े हिस्से को वापस भाजपा की ओर मोड़ दिया।

निष्कर्ष:

दिल्ली की जनता ने यह संदेश दिया कि केवल 'मुफ्त' सुविधाएं ही सत्ता की गारंटी नहीं हैं; प्रशासनिक ईमानदारी और बुनियादी ढांचा (Infrastructure) भी उतना ही जरूरी है। 2025 की जीत के साथ भाजपा की रेखा गुप्ता ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और दिल्ली में एक नए युग की

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