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Showing posts from November 8, 2019

Review of fact history four बुक|किरण प्रकाशन|आर्य कॉप्टिशन| ज्ञान पुस्तक|महेश बरनवाल

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  Review of fact history four बुक: ज्ञान पुस्तक,महेश बरनवाल किरण प्रकाशन,आर्य कॉप्टिशन विषय प्रवेश--  यदि कोई छात्र इंटरमीडिट के एग्जाम पास करने के बाद कॉम्पटीशन लाइन में प्रवेश करता है तो उसे पुस्तको के चयन में बहुत कंफ्यूज़न होता है। इस review से इतिहास की सही बुक लेने में मदद मिलेगी। Review of four books  आज हम बाज़ार में उपलब्ध चार फैक्ट आधारित बुक्स का रिव्यु करता हूँ ।  क्योंकि ज़्यादातर वनडे एग्जाम रेलवे,एस एस सी, लेखपाल या पटवारी का एग्जाम ग्राम विकास अधिकारी ,कांस्टेबल का एग्जाम,SI का एग्जाम,असिस्टेन्स टीचर्स,DSSB आदि के एग्जाम में इतिहास के फैक्चुअल प्रश्न पूंछे जाते हैं हालांकि वो GS पर आधारित हैं पर उन प्रश्नों हल करने के लिए भी कुछ डीप स्टडी जरूरी है। इसके लिए आप या तो आप ख़ुद नोट्स तैयार करें या फ़िर इन बुक्स की मदद लेकर विभिन्न वनडे एग्जाम में हिस्ट्री के प्रश्नों को आसानी से सही कर पाने में सक्षम हो पाते हैं।  पहली पुस्तक की बात करते है जो इतिहास के फैक्ट पर आधारित है। ज्ञान इतिहास की । इस पुस्तक का संंपादन ज्ञान चंद यादव ने किया है।    इस बुक में इतिहास के बिन्दुओं को क्रमब

Sindhu ghati sabhyata utpatti aur vistaar,सिंधु घाटी सभ्यता :उत्पत्ति और विस्तार

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:सिन्धु घाटी से प्राप्त मुहर:    सिन्धु घाटी सभ्यता :उत्पत्ति और विस्तार विश्व की प्राचीन सभ्यताएं नदी घाटियों में विकसित हुईं, मिस्र की सभ्यता  जो नील नदी के किनारे थी ,मेसोपोटामिया की सभ्यता जो दजला फ़रात नदियों के संगम में थी,भारत मे विकसित नदी घाटी सभ्यता जो क़रीब ईशा पूर्व 3 हजार साल पहले पूर्णतया विकसित हुई थी , हालांकि   विद्वानों में  इसके समय काल के लेकर अलग अलग राय है  और रेडियो कार्बन  विधि द्वारा  इसकी  समय सीमा 2300-1750 ईसा पूर्व निर्धारित की गई है ,ये सभ्यता सिन्धु नदी के किनारे पल्लवित हुई सभ्यता पूर्णतयः मिट्टी में दबी थी , आम लोगों के प्रकाश में तब आई जब चार्ल्स मेस्सन ने 1826 इस ऊंचे टीले को का उल्लेख किया, इसी प्रकार रेल पथ निर्माण के समय जब इस जगह से कुछ प्राचीन सामाग्रियां मिलीं  , तब अलेक्जेंडर  कनिंघम जो पुरातत्व वेत्ता थे ,उनको 1875  में एक  लिपिबद्ध मुहर भी प्राप्त हुई  , इसके बाद भी ये क्षेत्र कई साल उपेक्षित रहा। 1921 में सर जान मार्शल जब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक थे , राय बहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थल का पुनः 1923-24 और 1924-25 के दौरान उत्खनन