राम कुमार का जन्म 23 सितंबर 1924 को शिमला में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।रामकुमार के पिता पंजाब के शहर पटियाला में ब्रिटिश सरकार में एक सरकारी प्रशासनिक पद में कार्यरत थे,रामकुमार के सात भाई और बहनें थीं।
रामकुमार ने दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज से अर्थशास्त्र विषय मे M. A. किया ।
उनका कला के प्रति रुझान तब प्रारम्भ हुआ जब एक बार वह अपने मित्र के साथ अपने कॉलेज सेंट स्टीफ़न से घर लौट रहे थे,उस समय उन्होंने रास्ते मे कनॉट प्लेस पर लगी एक कला प्रदर्शनी में घूमने का अवसर मिला।वह उस कला प्रदर्शनी से अत्यधिक आकृष्ट हुए और अपने अंदर छिपी कला प्रतिभा को भी निखारने का निर्णय लिया।
| [रामकुमार आर्टिस्ट] |
उन्होंने शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट दिल्ली में कला शिक्षा प्राप्ति के लिए एडमिशन लिया,यहाँ पर कला शिक्षा शैलोज मुखर्जी के निर्देशन में ग्रहण की और कला को बारीकी से जाना।
इस दौरान उन्होंने कला की पूर्ण दक्षता प्राप्ति में बाधक अपने बैंक की नौकरी से स्तीफा दे दिया।
कला के उच्च पिपासा को शांत करने के लिए उन्होंने पेरिस जाने का निर्णय लिया और इसके लिए उन्होंने अपने पिता को रजामंद किया।
उन्होंने 1950 से1952 तक कला अध्ययन हेतु पेरिस में रहे ,यहाँ पर आंद्रे लाहोत फर्नांड लेजर के निर्देशन में भी काम सीखा सन 1970 और 1972 में जे. आर. डी. टाटा फैलोशिप और रॉकफेलर फेलोशिप मिलने पर वह अमेरिका की यात्रा की
पेरिस में ही रामकुमार की मुलाक़ात एस एच रजा और एम एफ हुसैन जैसे दिग्गज़ आर्टिस्टों से हुई।
रामकुमार ने अपनी चित्रण शैली में अमूर्तता की शुरुआत की ,उन्होंने अपनी अमूर्त चित्रण शैली में भी मूर्त रूप (figurative)में कार्य किया।
रामकुमार के प्रारंभिक चित्रों में जनमानस और युवाओं के निराशा,उदासी,हताशा दिखाई देती है।
रामकुमार में वातावरण की उदासीनता और वातावरण के उल्लास और प्रसन्नता के भावों को ब्रश से अपने पोट्रेट में उतारने की अदभुत क्षमता थी।
बेरोजगार,स्नातक,पीड़ा,विस्मय,कौतूहल,निराश्रित आदि शीर्षकों में रामकुमार ने चित्र बनाये,इन चित्रों में उन्होंने व्यक्तियों के चेहरे में परेशानी के भाव ,और दुःख ,त्रासदी को सामाजिक परिवेश में दिखाया है।आपके चित्रों में मानवीय संवेदना भलीभांति दिखाई देती है।
चित्रकार रामकुमार ने अपने चित्रों की रचना से एक अलग दुनिया की रचना की है इसलिए उन्हें 'मनुष्य की सभ्यता 'का चित्रकार भी कहा जाता है।
1960 और 1970 के बीच के समय रामकुमार ने अमूर्त चित्रण कला शुरुआत की,उन्होंने बनारस के आसपास के दृष्यचित्र बनाये जिसमें पूरी तरह अमूर्त चित्रकारी थी। उन्होंने बनारस के घाटों के अमूर्त चित्र,बनारस के गंगा नदी के किनारे बालू के टीलों के अमूर्त चित्र,गंगा की लहरों के अमूर्त चित्र,बनारस के मकानों की अमूर्त दृष्यचित्र बनाये। बनारस चित्र श्रृंखला में उन्होंने जापानी इंक और वैक्स पद्धति का प्रयोग किया था।
खंडहर,बनारस के घाट,धूप छाव के बीच,परिजन,स्वप्न,दो बहने, शहर,नदी जैसे कई चित्र बनाये।
1970 के दशक में रामकुमार ने ग्रीक की यात्रा की यहाँ पर उन्होंने प्राचीन,अर्वाचीन और ग्रीक कला शैली को देखा।रामकुमार अपने गुरु फर्नानन्द लीजेंड के क्यूबिस्ट शैली के आधार पर नालीवादी(Cubist) चित्र रचनाएं की।
कुछ प्रसिद्ध चित्र रचनाएं--
1954 में परिवार
1957 में दो बहनें(लिथोग्राफ)
1958 सपना(तैल माध्यम)
1965 श्रद्धांजलि(तैल)
1965 नगर दृश्य
1982 उड़ान(तैल)
1966बसंत(तैल)
बैगाबॉण्ड
रामकुमार एक चित्रकार के साथ एक साहित्यकार भी थे ,उन्होंने आठ पुस्तकें लिखीं जिसमे दो उपन्यास थे तथा कुछ यात्रा संस्मरण थे।
रामकुमार को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उत्तरप्रदेश सरकार ने सन1975 में सर्वश्रेठ हिंदी कहानीकार के रूप में सम्मानित किया ।
रामकुमार के बड़े भाई प्रसिद्ध साहित्यकार थे उनका नाम निर्मल वर्मा था। इन्ही भाई से प्रभावित होकर उन्होंने साहित्य में भी रचनाएं की थी ,पर वस्तुतः वह एक चित्रकार ही थे।
प्रदर्शनियां--
रामकुमार ने अपने चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी शिमला में 1948 में लगाई।
1980 में कलकत्ता में एकल प्रदर्शनी
1984 में दिल्ली में एकल प्रदर्शनी
1986 में मुम्बई में एकल प्रदर्शनी।
विदेश की प्रदर्शनियां--
1950 पेरिस में
1955 प्राग में
1957 कोलंबो में
1958 पोलैंड
1959 अमेरिका में
1966 लंदन में
पुरुस्कार---
आपको अपनी श्रेष्ठ रचनाओं के कारण 1956 और 1958 में ललित कला अकादमी पुरस्कार मिला।
1958 में एकेडमी ऑफ फाइन आर्ट से सम्मानित किया गया।
1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
1986 में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कालिदास सम्मान से सम्मानित किया गया।
2010 में पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया गया।
नोट-रामकुमार की एक पेंटिंग द बैगाबॉण्ड क्रिस्टी आर्ट गैलरी में 11 लाख मूल्य में बिकी।
रामकुमार: जीवनी में कुछ नए और महत्वपूर्ण तथ्य
- प्रगतिशील कलाकार समूह (PAG) से जुड़ाव: रामकुमार बॉम्बे के प्रसिद्ध 'प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप' (Progressive Artists' Group) से जुड़े थे। उन्होंने एम.एफ. हुसैन, एस.एच. रज़ा और एफ.एन. सूज़ा जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर भारतीय आधुनिक कला को एक नई दिशा दी।
- ललित कला अकादमी पुरस्कार: उन्हें 1956 और 1958 में ललित कला अकादमी का 'नेशनल अवार्ड' मिला था। 1956 में उनकी कृति "सैड टाउन" (Sad Town) के लिए उन्हें यह सम्मान मिला।
- पद्म पुरस्कार: भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2010 में पद्म भूषण (भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान) से सम्मानित किया।
- नीली और ग्रे अवधि (Grey Period): बनारस श्रृंखला के दौरान उन्होंने अधिकतर 'ग्रे' और 'मडी ब्राउन' रंगों का उपयोग किया, जो वहां के श्मशान घाटों के धुएं और उदासी को दर्शाता था। बाद के वर्षों में (खासकर 1990 के दशक में), उनके चित्रों में नीले आकाश और साफ पानी के रंगों का प्रवेश हुआ।
- वैश्विक रिकॉर्ड: रामकुमार के चित्रों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत मांग है। उनकी पेंटिंग 'द वैगाबॉन्ड' (The Vagabond) क्रिस्टी की नीलामी में लगभग 1.1 मिलियन डॉलर में बिकी थी।
- विदेशी सम्मान: उन्हें फ्रांस सरकार द्वारा 'ऑफिसर आर्ट्स एट लेटर्स' (2003) से भी नवाजा गया था।
- अंतिम समय: रामकुमार का निधन 14 अप्रैल 2018 को दिल्ली में 93 वर्ष की आयु में हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: रामकुमार को 'अमूर्त कला' (Abstract Art) का अग्रदूत क्यों माना जाता है?
उत्तर: रामकुमार उन शुरुआती भारतीय कलाकारों में से थे जिन्होंने 1960 के दशक में आकृतियों (Human figures) को पूरी तरह त्याग कर अमूर्त चित्रण अपना लिया था। उन्होंने बनारस के घाटों को इंसानी चेहरों के बिना केवल वास्तुकला और रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
प्रश्न 2: उनके साहित्यिक योगदान में मुख्य पुस्तकें कौन सी हैं?
उत्तर: उन्होंने 8 कहानी संग्रह और 2 उपन्यास लिखे। उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रहों में 'मेरी प्रिय कहानियां' और 'एक चेहरा' शामिल हैं। उनके कथा साहित्य में भी वही अकेलापन और उदासी दिखती है जो उनके शुरुआती चित्रों में थी।
प्रश्न 3: रामकुमार के चित्रों में 'बनारस' का क्या महत्व है?
उत्तर: 1960 में रज़ा के साथ बनारस की यात्रा उनके जीवन का 'टर्निंग पॉइंट' थी। बनारस ने उन्हें मानवीय पीड़ा से मुक्त होकर आध्यात्मिकता और ब्रह्मांडीय शून्यता की ओर मुड़ने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनकी शैली 'अमूर्त' हो गई।
प्रश्न 4: रामकुमार और उनके भाई निर्मल वर्मा के काम में क्या समानता थी?
उत्तर: दोनों भाइयों के काम में 'अस्तित्ववाद' (Existentialism), अकेलापन और मध्यमवर्गीय जीवन की विडंबनाएं प्रमुखता से दिखती हैं। जहाँ निर्मल वर्मा ने इसे शब्दों में पिरोया, वहीं रामकुमार ने इसे रंगों और रेखाओं के माध्यम से कैनवास पर उतारा।
प्रश्न 5: उन्होंने कला की शिक्षा कहाँ-कहाँ से प्राप्त की?
उत्तर: उन्होंने दिल्ली में शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट (शैलोज मुखर्जी के संरक्षण में) और पेरिस में आंद्रे लाहोत (André Lhote) व फर्नांड लेजर (Fernand Léger) के स्टूडियो में शिक्षा ली।
विशेष टिप: यदि आप उनके चित्रों का अध्ययन कर रहे हैं, तो उनकी 'लद्दाख श्रृंखला' (1976) और 'जैसलमेर श्रृंखला' (1977) को भी देखें, जहाँ उन्होंने पहाड़ों और रेत के टीलों के माध्यम से प्रकृति की विशालता को चित्रित किया है।
मृत्यु -
रामकुमार की मृत्यु 93 साल की उम्र में 14 अप्रैल 2018 को हुई।
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