ज़मीन या प्लाट की रजिस्ट्री कैसे कराएं? क्या रखें सावधानियां!
Jamin Ya Ghar Ki Registry Kaise Karayen?
स्टाम्प ड्यूटी लेने की प्रक्रिया -
इसी तरह किसी ऐसे मकान जो RCC से बना है उसमे आबनूस,सागौन जैसे इमारती लकड़ियों के दरवाजे खिड़कियां लगी है उसमे घर में इटैलियन टाइल्स ,पत्थर,आदि है तो इसकी मालियत 50%ज्यादा होती है इसका स्टाम्प अतिरिक्त लगता है सामान्य के मुकाबले! ध्यान रहे की कभी कभी शक होने या बड़ी व्यावसायिक ज़मीन के जानकारी के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस भौतिक सत्यापन भी करवा लेता है।
एक हेक्टेयर में 10000(दस हज़ार) वर्ग मीटर होते हैं।उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि में एक हेक्टयर में लगभग पांच बीघे या 4 बीघा 7 बिश्वा 11 विश्वानसी 4 कचवांसी होते है , एक हेक्टेयर में 4.878 बीघा होता है या .205 हेक्टयर का एक बीघा होता है। और .01025 हेक्टेयर का एक बिस्वा होता है।
ज़मीन खरीदने से पहले खोजबीन---
जमींन की रजिस्ट्री कराने के पूर्व उस जमीन के बारे में सही से पता कर लेना चाहिए जमींन की लोकेशन क्या है वहां जाकर देख लेना चाहिए ,विक्रेता जमीन का मुख्य मालिक है या पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी है।कृषि भूमि खरीदते समय ये देख लेना चाहिए की उस जमीन का विवरण खतौनी में दर्ज है की नहीं ,उसी ज़मीन में यदि किसान ने जमीन को बंधक बनाकर बैंक से किसी प्रकार का ऋण लिया होगा तो उसकी भी सूचना उसी खतौनी में दर्ज होती है ,यदि ऋण पूरी तरह नही लौटाया गया है तो ऐसी जमीन को नहीं खरीदना चाहिए ,यदि ज़मीन में ऋण की अदायगी पूरी तरह हो चुकी है पर बंधक मुक्ति बैंक से नही कराया गया तब भी खतौनी में बंधक दिखेगा,इसके लिए बंधक मुक्ति का विवरण जिस खतौनी में दर्ज हो वही फ्री ज़मीन है , यदि बंधक वाली ज़मीन को ख़रीदा गया तो बैंक ; ऋण की वसूली ज़मीन के नए मालिक से करेगा ,कृषि भूमि के पुराने मालिक भी पता करना चाहिए ,इन सब बातों का पता लगाने के लिए बारह साला मुआयना (Search) करवाना चाहिए ,ये मुआयना (Search) रजिस्ट्रार ऑफिस से ही होता है । इस मुआयने में उस ज़मीन के खाता संख्या और गाटा संख्या के माध्यम से ये पता किया जाता है कि 12 साल पहले ज़मीन किसकी थी और अब 12 साल में कौन कौन मालिक हुए और क्रम से उसे किसी और को बेचा यानि कितने बार विक्रेता क्रेता हुए इन सबके रजिस्ट्री का विवरण और रजिस्ट्री की डुप्लीकेट प्रति रजिस्ट्रार ऑफिस में संभाल कर रखा जाता है। साथ में कई बार जमीन मालिक एक साथ ज़मीन का सौदा दो लोंगों से कर लेता है ऐसी स्थिति में मुआयना (Search) से ये पता लग जाता है कि कहीं उसी ज़मीन को दो लोगों को तो नही बेंच दिया गया क्योंकि ऐसा होने पर उस व्यक्ति का बैनामा (रजिस्ट्री) वैध मानी जायेगी जिसके नाम सबसे पहले रजिस्ट्री हुई है, बाद वाले की रजिस्ट्री शून्य हो जाती है ।
जमीन का मुआयना---
ज़मीन का मुआयना(Search) कराने के बाद जब जमीन के सही मालिक और विवाद रहित होने की जानकारी मिल जाय तब भी भूमि मालिक के आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज से ये पता करना चाहिए की ये ही उसी जमीन का मालिक काबिज़ है , यदि उसने कई लोंगों को प्लाट काट कर ज़मीन बेचाहै तो उन लोंगों से जिनको जिनको अभी तक वो प्रॉपर्टी डीलर प्लाट बेंच चुका है ,उसकी वास्तविकता जानने के लिए उन व्यक्तियों से मिल लेना चाहिए। यदि किसी कृषि भूमि के आवासीय में बदलकर भूमि की प्लाटिंग की जाती है तो उस खाता नंबर की भूमि में प्रत्येक दूसरे खरीददार का विवरण भी दर्ज होगा दाखिल ख़ारिज (Mutation) होने के बाद।
ज़मीन के खरीदने से पूर्व दो गवाहों को तलाश कर लेना चाहिए,अब विक्रेता की ,क्रेता की व दो गवाहों की दो दो फ़ोटो वर्तमान समय की होनी चाहिए ,इसके अलावा विक्रेता क्रेता के आधार कार्ड व पैन कार्ड की ज़ेरोक्स फ़ोटो कॉपी तैयार कर लेनी चाहिए ,विक्रेता और क्रेता के मोबाइल नम्बर की जरुरत पड़ती है।
जमीन खरीदने से पूर्व क्रेता को ख़ुद उस जगह जाकर निरीक्षण करना चाहिए कि वो जमीन है कि नहीं कोई कब्जा तो नहीं है ,फिर विक्रेता द्वारा उस जमीन के आसपास के खेत या प्लॉट की जानकारी नोट कर लेना चाहिए उत्तर में किसका प्लाट है दक्षिण में किसका प्लाट है पूरब में किसका प्लाट है पश्चिम में किसका प्लाट है,इसे चौहद्दी या सीमांकन कहते हैं ,चौहद्दी से ज़मीन की सही स्थिति (Location) का निर्धारण हो जाता है।
रजिस्ट्री पेपर तैयार करने की प्रक्रिया--
रजिस्ट्री कराने से पूर्व जमीन की सरकारी मालियत के हिसाब से जमीन के क्षेत्रफल के अनुसार अलग अलग राज्य में अलग अलग 4% या 5%, या 6%या ,7%,या 8% तक स्टाम्प लगते हैं ,स्टाम्प पेपर को स्टाम्प वेंडर से खरीदा जा सकता है या ऑनलाइन भी ख़रीदा जा सकता है। जिस स्टाम्प वेंडर से ख़रीदा जाता है वो स्टाम्प वेंडर सरकार द्वारा रजिस्टर्ड होते है वो हर स्टाम्प के का नंबर स्टाम्प पेपर में दर्ज करते है और अपने रजिस्टर में दर्ज करते हैं।स्टाम्प पेपर में ज़मीन के सरकारी कीमत या सर्किल रेट के हिसाब से ही ख़रीदे जाते हैं ।
स्टाम्प खरीदने से पूर्व ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन होता है ,जो रजिस्ट्रार ऑफिस में होता है या फिर बाहर भी होता जिसकी कुछ फ़ीस लगती है ।
स्टाम्प पेपर खरीदने के बाद एक लेख पत्र तैयार करते हैं जिसमे विक्रेता और क्रेता का नाम,पता, उनके आधार नंबर उनके पैन नंबर और उनके मोबाइल नंबर को लिखा जाता है । उसके बाद जमीन के सरकारी मालियत ,ज़मीन का प्रतिफल,जमीन के राजस्व ग्राम में लोकेशन,रजिस्ट्री का प्रकार ,रजिस्ट्री का प्रयोजन क्या है, रजिस्ट्री जिस ऑफिस में हो रही है,रजिस्ट्री की निष्पादन तिथि क्या है ,उसका नाम आदि। जमीन SC/ST की तो नहीं है इसका भी ब्यौरा देेना
इस की दो फ़ोटो प्रतियां तैयार होती है परंतु यदि प्लाट की रजिस्ट्री होती है तो सिर्फ एक फ़ोटो प्रति लगानी पड़ती है ,क्योंकि प्लाट की एक प्रति तहसीलदार के पास नहीं जाती। इन फोटो प्रतियों में एक रजिस्ट्रार ऑफिस में जमा रहती है दूसरी तहसील दार के कार्यालय में जाती है मूल प्रति खरीददार को दो या तीन दिन बाद वापस मिल जाती है। इन सभी दस्तावेजों को जमा करने के बाद रजिस्ट्रार ऑफिस में रजिस्ट्रार बेचने वाले से पूंछता है कितनी जमीन बेच रहे हो क्या कोई दबाव तो नही है जमीन बेचने में ज़मीन का पूरा रुपया मिल गया की नही ,रजिस्ट्रार ऑफिस में जब रजिस्ट्रार ज़मीन कितने में बेंच रहे हो प्रश्न पूंछे तो ज़मीन का जो सर्किल रेट हो वही बताना चाहिए न वास्तविक मूल्य जिसमें लेन देन हुआ है। इसके बाद रजिस्ट्रार कार्यालय में विक्रेता और क्रेता तथा दोनों गवाहों की फोटो ली जाती है उनके आइरिस की स्कैन किया जाता है व बाएं हाँथ के अंगूठे को को स्कैन किया जाता है। जिससे कोई फर्जी व्यक्ति बैनामा न कर सके।
रजिस्ट्री होने के तुरंत बाद दाख़िल ख़ारिज या म्युटेशन या नामांतरण की प्रक्रिया जो तहसील से होती है,के द्वारा ज़मीन को विक्रेता के नाम से अपने नाम में बदलवा लेना चाहिए , इस प्रक्रिया में खतौनी में उस खाते में दर्ज़ ज़मीन के ख़रीदे गए भाग को आपके नाम ट्रांसफर करना बताया जायेगा।
इस प्रकार हम जमीन की रजिस्ट्री की प्रक्रिया जान लेने के बाद जब जमीन की खरीद करतें हैं तो खुद को फ्रॉड से बचा सकेंगे।
इंडियन स्टाम्प रजिस्ट्रेशन एक्ट में 2026 में क्या संशोधन हुआ क्या लाभ होंगे क्या हानि होगी अब:
भारतीय स्टाम्प और पंजीकरण अधिनियम 2026 में हुए मुख्य बदलाव और उनके प्रभाव निम्नलिखित हैं:
प्रमुख संशोधन (Amendments)
- डिजिटल पंजीकरण: अब जमीन की रजिस्ट्री के लिए दफ्तर जाने की जरूरत नहीं होगी; पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और पेपरलेस कर दी गई है।
- आधार प्रमाणीकरण: धोखाधड़ी रोकने के लिए खरीदार और विक्रेता का आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य है।
- स्वतः नामांतरण (Auto-Mutation): रजिस्ट्री होते ही राजस्व रिकॉर्ड में नए मालिक का नाम अपने आप अपडेट हो जाएगा।
- पारिवारिक छूट: उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में परिवार के बीच व्यावसायिक (Commercial) और औद्योगिक संपत्ति के दान (Gift Deed) पर स्टाम्प शुल्क मात्र ₹5,000 कर दिया गया है।
खरीद-फरोख्त में अंतर
- पारदर्शिता: बिचौलियों का हस्तक्षेप खत्म होगा और फर्जी रजिस्ट्री पर लगाम लगेगी।
- महिला स्वामित्व: पत्नी या महिला सदस्य के नाम पर संपत्ति लेने पर अब उनकी वास्तविक आर्थिक भागीदारी का सत्यापन डिजिटल रूप से होगा।
सहूलियतें और लाभ
- समय की बचत: घंटों लाइन में लगने के बजाय घर बैठे अपॉइंटमेंट और भुगतान संभव है।
- विवादों में कमी: रजिस्ट्री और नामांतरण के एकीकृत होने से मालिकाना हक के झगड़े कम होंगे।
- वित्तीय राहत: पारिवारिक संपत्तियों के हस्तांतरण में लाखों के स्टाम्प शुल्क की बचत होगी।
संभावित समस्याएँ
- तकनीकी बाधा: ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की कमी से दिक्कत आ सकती है।
- सत्यापन की सख्ती: महिला के नाम पर संपत्ति लेते समय फंड का स्रोत साबित करना एक नई कानूनी चुनौती हो सकती है।
नया अपडेट: 15 जुलाई से जमीन रजिस्ट्री के नियमों में बड़ा बदलाव, अब भूलेख पोर्टल पर वास्तविक रकबा दर्ज करना हुआ अनिवार्य
उत्तर प्रदेश (बलरामपुर/साधनों के अनुसार) में जमीन की खरीद-फरोख्त और रजिस्ट्री प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाने और धोखाधड़ी पर लगाम लगाने के लिए सरकार 15 जुलाई से एक नई व्यवस्था लागू करने जा रही है। इस नए नियम के तहत अब किसी भी भूमि का बैनामा (रजिस्ट्री) कराने से पहले भूलेख पोर्टल पर उसका वास्तविक रकबा (क्षेत्रफल) दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस डिजिटल व्यवस्था के आने से जमीन रजिस्ट्री के पुराने ढर्रे में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा, जिससे आम जनता की गाढ़ी कमाई सुरक्षित होगी और भू-माफियाओं पर प्रभावी लगाम लगेगी।
क्यों पड़ी इस नए नियम की जरूरत?
अब तक रजिस्ट्री व्यवस्था में सबसे बड़ी खामी यह थी कि बैनामे के समय जमीन का 'रियल टाइम रकबा' और उसके 'भूमि उपयोग' (Land Use) की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाती थी। पहले खतौनी में दर्ज रकबा और मौके (जमीन की वास्तविक स्थिति) का रकबा अलग-अलग होने के बावजूद भी रजिस्ट्री आसानी से हो जाती थी। इसका फायदा उठाकर कई जालसाज विक्रेता एक ही जमीन को कई अलग-अलग खरीदारों को बेच देते थे (मल्टीपल रजिस्ट्री), जिससे खरीदार बैनामा कराने के बाद भी जमीन पर कब्जा नहीं पाते थे और सालों-साल कचहरी के चक्कर काटने को मजबूर होते थे। बाद में जानकारी होने पर होने वाले इन गंभीर विवादों और मुकदमों को जड़ से खत्म करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
नए नियम के तहत क्या-क्या जानकारियां होंगी दर्ज?
15 जुलाई से लागू हो रही इस नई व्यवस्था के अंतर्गत अब रजिस्ट्री दस्तावेज में केवल बुनियादी जानकारी देना ही काफी नहीं होगा। अब भूलेख पोर्टल के माध्यम से गाटा संख्या, ग्राम, तहसील और जिला के साथ-साथ निम्नलिखित महत्वपूर्ण विवरणों को भी अंकित करना होगा:
- वास्तविक रकबा और स्थिति: जमीन का वास्तविक क्षेत्रफल कितना है, इसकी सटीक डिजिटल एंट्री पहले की जाएगी।
- विनियमित या विकास क्षेत्र की स्थिति: यह स्पष्ट रूप से दर्ज करना होगा कि वह भूमि किस विकास क्षेत्र या विनियमित क्षेत्र (Regulated Area) के अंतर्गत स्थित है या नहीं।
- महायोजना (Master Plan) के तहत आरक्षण: यदि संबंधित भूमि सरकारी महायोजना में किसी विशेष कार्य जैसे—पार्क, हरित पट्टी (Green Belt), खुले स्थल, क्रीड़ा स्थल (Playground) या किसी प्रस्तावित मार्ग (Proposed Road) के रूप में आरक्षित है, तो इसका स्पष्ट उल्लेख अभिलेखों में करना अनिवार्य होगा।
इस बदलाव से खरीदारों और सिस्टम को क्या फायदे होंगे?
वरिष्ठ अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों (अधिवक्ताओं) के अनुसार, इस नई डिजिटल व्यवस्था के लागू होने से जमीन से जुड़े मामलों में क्रांतिकारी बदलाव आएंगे:
- भविष्य के अधिग्रहण से बचाव: खरीदार को जमीन लेने से पहले ही यह पता चल जाएगा कि वह जो जमीन खरीद रहा है, उसका भविष्य में किसी सरकारी योजना के लिए अधिग्रहण तो नहीं होने वाला है।
- फर्जीवाड़े और मुकदमों पर रोक: रजिस्ट्री से ठीक पहले भूलेख पोर्टल पर वास्तविक रकबा दर्ज होने से एक ही जमीन की बार-बार रजिस्ट्री होना नामुमकिन हो जाएगा। इससे क्रेता और विक्रेता दोनों को भूमि की वास्तविक और कानूनी स्थिति का पता रहेगा। जानकारों का मानना है कि इस व्यवस्था से जमीन संबंधी लगभग 70 प्रतिशत मुकदमे कम हो जाएंगे।
- शत-प्रतिशत पारदर्शिता: यह पूरी व्यवस्था रजिस्ट्री प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लक्ष्य से प्रेरित है। डिजिटल मैपिंग और रियल-टाइम डेटा के मिलान के कारण उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में (जैसे फरवरी से जून 2026 के बीच हुए हजारों बैनामों की तरह) आगामी समय में धोखाधड़ी की गुंजाइश शून्य हो जाएगी।


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