जीका वायरस रोग के लक्षण और बचाव

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 जीका वायरस रोग के लक्षण और बचाव--     एक साल पूर्व जीका वायरस का प्रकोप केरल और कुछ दक्षिणी भारत के राज्यों तक सुनने को मिल रहा था,आज 2021 में जीका वायरस के मरीज उत्तर भारत तक पैर पसार चुका है ,मध्यप्रदेश,गुजरात,राजस्थान  में कई जिलों में पैर पसार रहा है जीका वायरस  छोटे शहरों कस्बों तक भी फैल रहा है ,इस रोग के लक्षण वाले मरीज़ उत्तर प्रदेश के,इटावा ,कन्नौज,जालौन ,फतेहपुर में मिले हैं। उत्तर भारत और मध्य भारत तक इसके मरीज  बहुतायत में मिले हैं। कैसे फैलता है जीका वायरस-- जीका वायरस का संक्रमण मच्छरों के द्वारा होता है,वही मच्छर जिनसे डेंगू और चिकुनगुनिया होता है, यानी मच्छर काटने के बाद ही जीका वायरस फैलता है। थोड़ा सा अंतर भी है डेंगू वायरस और जीका वायरस में ,जीका वायरस  से यदि एक बार कोई संक्रमित हो जाता है ,और वह अपने साथी से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे भी संक्रमित कर सकता है,साथ मे संक्रमित माता के पेट मे पल रहे गर्भस्थ शिशु भी संक्रमित हो सकता है, साथ मे  जीका वायरस से संक्रमित व्यक्ति यदि कहीं ब्लड डोनेट करता है ,तो उस  ब्लड में भी जीका वायरस होता है। इस प्रकार ये खून जिसके श

शंखों चौधरी मूर्तिकार की जीवनी|shankho chaudhari sculpture biography

 शंखों चौधरी मूर्तिकार की जीवनी|

शंखो चौधरी मूर्तिकार की जीवनी  (25 फरवरी 1916 - 28 अगस्त 2006)

जन्म--शंखों चौधरी का जन्म 25 फरवरी 1916 को संथाल परगना  बिहार में हुआ था।

मृत्यु--28 अगस्त 2006 को नई दिल्ली में

शंखों चौधरी मूर्तिकार की जीवनी |shankho chaudhar
(शंखों चौधरी)

   शंखों चौधरी   एक भारतीय मूर्तिकार थे, जो भारत के कला परिदृश्य में एक प्रसिद्ध व्यक्ति थे।  (यद्यपि  उनका वास्तविक में उनका नाम नर नारायण रखा गया था, वे अपने घरेलू-नाम शंखो से अधिक व्यापक रूप से जाने जाते थे।

   आपने  प्रसिद्ध मूर्तिकार राम किंकर बैज से  शिक्षा ग्रहण की ।  जिससे वह पेरिस में मिला था। 

   शंखों चौधरी के मूर्तिशिल्प के विषयों में महिला आकृति और वन्य जीवन शामिल हैं।

     उन्होंने मीडिया की एक विस्तृत श्रृंखला में काम किया था और बड़े पैमाने पर राहत और मोबाइल दोनों का निर्माण किया है।

    आपने लकड़ी,धातु ,टेराकोटा ,प्रस्तर (काला और सफेद संगमरमर)।का प्रयोग किया है ,आपकी मूर्तिशिल्प में वक्राकार रूप प्रदान कर उनको जीवंत बनाने की। कोशिश हुई है।

    आपने पिजन ,पिकॉक,बर्ड,हैंड ऑफ द गर्ल,राय लिट्,खड़ी आकृतियां ,कर्व आकृतियां,शीर्षक हीन आकृतियां बनाई।

टॉयलेट मूर्तिशिल्प-- यह मूर्तिशिल्प 36×30×66.5 सेंटीमीटर पत्थर का बना हुआ है।इस मूर्तिशिल्प में  नारी आकृतियों को बैठी हुई मुद्रा में सरलीकृत रूप में प्रस्तुत किया गया है,दो हाँथ सिर के पीछे रखे गए हैं, इसमें रिक्त स्थान के माध्यम से रिक्तता को प्रदर्शित किया गया है ।इस मूर्तिशिल्प में त्रिआयामी प्रभाव के साथ साथ ज्यामितीय प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है ,मूर्तिशिल्प को नारी आकृति के रूप में बनाया गया है पर आंख नाक कान नहीं अंकित हैं।

   पक्षी  मूर्तिशिल्प --इस मूर्तिशिप को स्टेनलेस स्टील से बनाया गया है 62.2×25.4×20.3 सेंटीमीटर आकार का लकड़ी के आघार पर लगाया गया है ,यह मूर्तिशिल्प स्टील धातु का बना हुआ है। छाया प्रकाश का प्रभाव अत्यंत आकर्षक है।

     चौधरी ने कला भवन, शांतिनिकेतन से 1939 में कला में स्नातक और ललित कला में डिप्लोमा पूरा किया। 

      1943 में नेपाली पद्धति से धातु ढलाई का कार्य सीखा

    1945 में, उन्होंने कला भवन, शांतिनिकेतन से मूर्तिकला में विशिष्ट के साथ ललित कला में डिप्लोमा प्राप्त किया।

1949-1970 तक बड़ौदा विश्वविद्यालय के अध्यक्ष भी रहे

     उन्होंने दार-ए-सलाम तंजानिया विश्वविद्यालय में ललित कला के प्रोफेसर   रहे   ।

    यूनेस्को,पेरिस और वेनिस में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। 

 वह 1971 में पद्म श्री  पुरस्कार मिला था राष्ट्रीय पुरस्कार और ललित कला अकादमी के फेलो रहे।

     नई दिल्ली, 1956 और ; डी.लिट. (ऑनोरिस कौसा) सेंट्रो एस्कोलर यूनिवर्सिटी,फिलीपींस द्वारा,1974; विश्व भारती विश्वविद्यालय,1981 द्वारा अबन- गबन पुरस्कार।

     वह भारतीय मूर्तिकार संघ, मुंबई के प्रथम मानद संयुक्त सचिव थे। वह 1980 के दशक के अंत में ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के अध्यक्ष थे। 

 1997 में एन .जी. एम. ए. में उनके कार्यों का पूर्वव्यापी आयोजन किया गया था।

नामांकन और नियुक्तियां :

1949-57:  यहीं पर अध्य्यन रत रहे और  बाद में अध्यापन किया, मूर्तिकला विभाग, एमएस यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा।

1952: प्रथम माननीय  संयुक्त सचिव – भारतीय मूर्तिकार संघ, बॉम्बे।

1956: सदस्य, ललित कला अकादमी।

 1957-70: प्रोफेसर और प्रमुख, मूर्तिकला विभाग, एमएस यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा।

 1966-68: डीन, ललित कला संकाय, एम.एस.  विश्वविद्यालय, बड़ौदा।

1974: मानद सचिव, ललित कला अकादमी।

 1976: विजिटिंग प्रोफेसर, बी.एच.यू.

1977-78: विजिटिंग फेलो, विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन।

1980: ललित कला के प्रोफेसर, दार एस सलाम विश्वविद्यालय, तंजानिया।

1984 से 1989 तक

* पूर्णकालिक सदस्य, दिल्ली शहरी कला आयोग।

*सदस्य, अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड,

*सदस्य अंतर्राष्ट्रीय जूरी,- 5वां त्रैमासिक-भारत,

*अध्यक्ष, ललित कला अकादमी।

प्रमुख पुरस्कार प्राप्त हुुए

 1956: ललित कला अकादमी द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार।

1971:   पद्मश्री पुरस्कार

 1974: डी. लिट।  (ऑनोरिस कौसा) सेंटर एस्कोलर यूनिवर्सिटी, फिलीपींस द्वारा।

 1979: विश्व-भारती विश्वविद्यालय से अबान-गगन पुरस्कार।

 1982: फेलो, ललित कला अकादमी।

 1997: रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट।

 1998: विश्व भारती विश्वविद्यालय द्वारा देसीकोट्टमा (मानद डॉक्टरेट)।

2000-02: काली दास सम्मान।

2002: आदित्य बिड़ला कला शिखर पुरस्कार।

2004: ललित कला अकादमी द्वारा सम्मानित "ललित कला रत्न"।

2004: "लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड" लीजेंड ऑफ इंडिया।

संगोष्टियों में भाग लेना--

1964: पोलैंड का व्याख्यान दौरा;  कलाकार संघ के अतिथि के रूप में रूस का दौरा किया।

 1969: ललित कला अकादमी के लिए प्रदर्शित "भारत की लोक और जनजातीय छवियां" का आयोजन।

    1972: अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड की ओर से ग्रामीण भारत परिसर का आयोजन।

 1976: टैगोर, डार्लिंगटन, इंग्लैंड पर संगोष्ठी में भाग लिया।

1976-77: ललित कला अकादमी के लिए गढ़ी में कलाकारों के स्टूडियो का आयोजन।

    1982: ब्रिटिश संग्रहालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी में भाग लिया, भारत महोत्सव में पुस्तकों की एक प्रदर्शनी का आयोजन किया।

 1983 में बगदाद में कला आयोजन में बुलाया गया।

1985: लोक विद्या परंपरा के संरक्षण पर यूनेस्को, पेरिस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

 1985: बुखारेस्ट का दौरा किया - ग्राम संग्रहालय।

 1982: यूनेस्को, वेनिस द्वारा प्रायोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

1986: ओस्लो, लिलेहैमर में नृवंशविज्ञान संग्रहालय का दौरा किया और कोपेनहेगन, डेनमार्क में खुला - वायु संग्रहालय।

1988: विजिटिंग फेलो के रूप में जापान का दौरा किया और इंडोनेशिया का दौरा किया।

 1989: चीनी लोगों के निमंत्रण पर चीन के एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया - विदेशी देश के साथ मित्रता के लिए सोसायटी।

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 प्रमुख प्रदर्शनियां ---

 1946: पहला वन-मैन शो, बॉम्बे।

 1954: समकालीन मूर्तिकला की प्रदर्शनी,आधुनिक कला की राष्ट्रीय गैलरी।

1957: नई दिल्ली में वन-मैन शो।

 1969: बॉम्बे में वन-मैन शो।

1971: रेट्रोस्पेक्टिव शो: नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट।

1979: इरा चौधरी, बॉम्बे के साथ संयुक्त प्रदर्शनी।

1987: वन-मैन शो, नई दिल्ली

1987: स्केच और ड्राइंग का वन-मैन शो, कलकत्ता।

 1991: वन-मैन शो, कलकत्ता।

 1992: एलटीजी गैलरी, नई दिल्ली में वन-मैन शो।

1995: वन-मैन शो, सिमरोज़ा आर्ट गैलरी, बॉम्बे।

2004: बड़ौदा में वन-मैन शो, सरजन आर्ट गैलरी द्वारा आयोजित 

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