भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): धारा 89 CPC और आर्बिट्रेशन अधिनियम 1996 का विधिक विश्लेषण
भारत में वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR): धारा 89 CPC और 1996 के अधिनियम का विस्तृत विश्लेषण भारत की न्याय प्रणाली में मुकदमों के बोझ को कम करने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution - ADR) एक अनिवार्य स्तंभ बन चुका है। यह लेख कानूनी पेशेवरों (Advocates) और उनके क्लाइंट्स के लिए धारा 89 CPC और माध्यस्थम अधिनियम की बारीकियों को समझने का एक विस्तृत रोडमैप प्रदान करता है। 1. धारा 89 CPC: न्यायिक समाधान का नया मार्ग सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 89 न्यायपालिका को यह शक्ति प्रदान करती है कि वह मुकदमों को अदालत की औपचारिक कार्यवाही से बाहर सुलझाने के लिए निर्देशित करे। इसका मुख्य दर्शन यह है कि हर विवाद का अंत केवल कोर्ट के फैसले से ही नहीं, बल्कि आपसी सहमति से भी संभव है। यदि न्यायाधीश को लगता है कि पक्षकारों के बीच समझौते की गुंजाइश है, तो वह मामले को मध्यस्थता (Arbitration), सुलह (Conciliation), लोक अदालत या मीडिएशन (Mediation) के लिए भेज सकता है। यह प्रावधान न केवल समय की बचत करता है, बल्कि पक्षकारों के बीच कानून...