रिमांड का कानून: CrPC 167 बनाम BNSS 187 – एक संपूर्ण कानूनी विश्लेषण

 सामान्य व्यक्तियों ने एक शब्द बहुत सुना होता है कि पुलिस ने फला फला अपराधी को रिमांड में ले लिया है अब पुलिस अपने हथकंडे से उससे सब कुछ कबूल करवा लेगी , सारे सबूत जुटा लेगी जो अपराधी ने अपराध करने में प्रयोग की है ,"जरूर इसने कुछ बड़ा किया है, तभी तो रिमांड मिली है।" वहीं अभियुक्त के परिवार के लोग पुलिस के रिमांड आवेदन से भय में आ जाते है कि अब उसके आरोपित रिश्तेदार या परिवार जन के साथ पुलिस बुरा बर्ताव करेगी इसलिए वह अपने बचाव पक्ष के वकील से कुछ भी करने के लिए प्रार्थना करता है  उसे कानूनी चिंता सताने लगती है : "रिमांड के दौरान कहीं पुलिस उससे जबरन कोरे कागज पर दस्तखत न करा ले।"

     वहीं बचाव पक्ष के वकील साहब रिमांड के आवेदन के बाद कही ज़्यादा सतर्क हो जाते  हैं और जज साहब से रिमांड रिव्यू के लिए आवेदन करते है कि पूछताछ के लिए रिमांड की कोई आवश्यकता नहीं है साथ में  वकील  कोर्ट से अपने क्लाइंट के मेडीकल परीक्षण के लिए आवेदन कर देता है जिससे रिमांड के दौरान पुलिस क्लाइंट को प्रताड़ित नहीं करे ।चलिए  अब विस्तार से पढ़ते हैं कि रिमांड के क्या प्रावधान है।

​1. रिमांड का अर्थ और कानूनी दर्शन (Philosophy of Remand)

​रिमांड (Remand) शब्द का सामान्य अर्थ है 'वापस भेजना'। कानून की भाषा में, जब किसी व्यक्ति को किसी अपराध के संदेह में गिरफ्तार किया जाता है, तो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(2) और CrPC की धारा 57 (अब BNSS की धारा 58) के अनुसार, उसे 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। यदि जांच 24 घंटे में पूरी नहीं होती है, तो पुलिस अधिकारी अभियुक्त को आगे की हिरासत में रखने की मांग करता है, जिसे 'रिमांड' कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य जांच एजेंसी को साक्ष्य जुटाने का समय देना और साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बिना न्यायिक निगरानी के न हो। एक अधिवक्ता के लिए यह समझना जरूरी है कि रिमांड कोई दंडात्मक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह केवल जांच के सुचारू संचालन के लिए एक अस्थायी व्यवस्था है। इसमें मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह यह देखे कि क्या वास्तव में अभियुक्त को हिरासत में रखने का ठोस आधार मौजूद है या नहीं।

​2. CrPC में रिमांड के विभिन्न प्रावधान और प्रक्रिया

​CrPC की धारा 167 रिमांड की रीढ़ मानी जाती है। जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है और 24 घंटे की समय सीमा समाप्त होने वाली होती है, तो धारा 167(1) के तहत उसे डायरी प्रविष्टियों के साथ मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। यहाँ धारा 167(2) मजिस्ट्रेट को शक्ति देती है कि वह अभियुक्त को अधिकतम 15 दिनों के लिए पुलिस हिरासत (Police Custody) में भेज सके। इसके बाद, रिमांड केवल न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) के रूप में दी जा सकती है। इसी धारा के अंतर्गत 'डिफ़ॉल्ट बेल' (Default Bail) का सिद्धांत आता है। यदि अपराध 10 वर्ष से अधिक की सजा, आजीवन कारावास या मृत्युदंड से संबंधित है, तो 90 दिनों के भीतर आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल करना अनिवार्य है, अन्यथा 60 दिनों के भीतर। इसके अलावा, धारा 209 के तहत जब मामला सत्र न्यायालय (Sessions Court) को सुपुर्द किया जाता है, तब भी रिमांड दी जाती है। धारा 309 के तहत मुकदमे की कार्यवाही के दौरान भी रिमांड का प्रावधान है, जिसे 'जेल वारंट' पर भेजना कहा जाता है।

​"Law of Remand under BNSS 187 and CrPC 167: A Complete Legal Guide for Judiciary Students and Advocates."
                 ​"रिमांड के कानूनी प्रावधान: BNSS 187 और CrPC 167 का तुलनात्मक अध्ययन"

​3. BNSS 2023 में रिमांड और क्रांतिकारी बदलाव

​भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 ने पुराने CrPC की धारा 167 की जगह ली है। इसमें सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव पुलिस रिमांड की अवधि को लेकर है। CrPC के तहत, पुलिस रिमांड केवल गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों के भीतर ही ली जा सकती थी। लेकिन BNSS की धारा 187(2) अब यह प्रावधान करती है कि 15 दिनों की पुलिस रिमांड को पहले 40 दिनों (सामान्य अपराधों में) या 60 दिनों (गंभीर अपराधों में) के पूरे रिमांड काल के दौरान छोटे-छोटे टुकड़ों में लिया जा सकता है। एक छात्र के लिए यह समझना आवश्यक है कि यह बदलाव इसलिए लाया गया ताकि यदि कोई अभियुक्त बीमार हो जाए या जांच के बीच में नए तथ्य सामने आएं, तो पुलिस को दोबारा रिमांड मिल सके। हालांकि, अधिवक्ताओं ने इस पर चिंता जताई है कि इससे अभियुक्त को परेशान किया जा सकता है, लेकिन कानून का तर्क यह है कि इससे 'जांच की प्रभावशीलता' बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त, BNSS अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से रिमांड बढ़ाने की अनुमति को और अधिक सुदृढ़ बनाता है।

​4. प्रमुख न्यायिक निर्णय और गहन विश्लेषण

​रिमांड के कानून को समझने के लिए केवल धाराओं का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का विश्लेषण अनिवार्य है।

  • सीबीआई बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी (1992): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि पुलिस रिमांड केवल गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों के भीतर ही दी जा सकती है। यह फैसला दशकों तक कानून रहा, जिसे अब BNSS ने बदल दिया है।
  • डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997): यह मामला रिमांड और गिरफ्तारी के दौरान अभियुक्त के अधिकारों का चार्टर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिमांड के दौरान किसी भी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। प्रत्येक अधिवक्ता को रिमांड का विरोध करते समय इस केस का संदर्भ देना चाहिए।
  • सत्येंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022): इसमें कोर्ट ने रिमांड और जमानत के बीच के अंतर्संबंधों पर जोर दिया और कहा कि जांच में सहयोग करने वाले व्यक्ति को अनावश्यक रिमांड पर नहीं भेजा जाना चाहिए।
  • वी. सेंथिल बालाजी बनाम राज्य (2023): इस हालिया निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि पुलिस को उचित कारणों से शुरुआती दिनों में रिमांड नहीं मिल पाई, तो वह बाद में भी इसकी मांग कर सकती है। इसी निर्णय की छाया हमें BNSS की धारा 187 में दिखाई देती है। विश्लेषण यह कहता है कि अब न्यायपालिका का झुकाव जांच की पूर्णता की ओर अधिक है।

​5. छात्रों और अधिवक्ताओं के लिए व्यावहारिक सुझाव

​एक विधि छात्र को यह ध्यान रखना चाहिए कि रिमांड के आवेदन का विरोध करते समय हमेशा पुलिस डायरी (Case Diary) की मांग करनी चाहिए। CrPC की धारा 172 (BNSS 184) के तहत पुलिस को केस डायरी व्यवस्थित रखनी होती है। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि जांच में कोई प्रगति नहीं हुई है, तो वह रिमांड देने से इनकार कर सकता है। अधिवक्ता के रूप में, आपको यह तर्क देना चाहिए कि क्या अभियुक्त की उपस्थिति जांच के लिए अपरिहार्य है? क्या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना है? यदि नहीं, तो न्यायिक हिरासत या जमानत ही एकमात्र विकल्प होना चाहिए। डिफ़ॉल्ट बेल के समय की गणना करना भी एक कला है; इसमें गिरफ्तारी के दिन को छोड़कर गणना की जाती है। BNSS के लागू होने के बाद, अब आपको यह भी ट्रैक करना होगा कि पुलिस ने उन 40 या 60 दिनों में से कितने दिन की रिमांड पहले ही ले ली है।

अब देखते है कि बचाव पक्ष का वकील क्या एक्शन लेता है जब उसके क्लाइंट को पुलिस रिमांड पर लेने का आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत करती है।

पुलिस रिमांड का आवेदन आने पर बचाव पक्ष के वकील पर दबाव तो बढ़ता है, लेकिन वे घबराते नहीं बल्कि तुरंत सतर्क हो जाते हैं। वकील का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी के साथ पुलिस हिरासत में मारपीट न हो और रिमांड की अवधि कम से कम हो।

​रिमांड के समय एक अनुभवी वकील निम्नलिखित कदम उठाता है:

  • तथ्यों की पड़ताल: वह पुलिस द्वारा रिमांड मांगने के आधारों को चुनौती देता है कि पूछताछ के लिए कस्टडी क्यों जरूरी है।
  • मेडिकल की मांग: वकील जज साहब से आरोपी का मेडिकल परीक्षण कराने की मांग करता है ताकि पुलिस प्रताड़ना का डर कम हो।
  • कानूनी काट: वे जमानत की दलीलों को और मजबूत करने के लिए केस डायरी और धाराओं का बारीकी से अध्ययन शुरू कर देते हैं।
  • सांत्वना देना: वकील अपने क्लाइंट और उसके परिवार को समझाता है कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है, ताकि वे हिम्मत न हारें।

​6. रिमांड के प्रकार: एक सूक्ष्म वर्गीकरण (Types of Remand)

​मुख्य परीक्षा में अक्सर पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत के बीच अंतर पूछा जाता है। इसे एक तालिका या स्पष्ट बिंदुओं में जोड़ना उपयोगी होगा:

  • पुलिस हिरासत (Police Custody): इसमें अभियुक्त पुलिस स्टेशन के लॉक-अप में होता है और जांच अधिकारी की प्रत्यक्ष पहुंच में होता है। इसका उद्देश्य पूछताछ और बरामदगी (धारा 27 साक्ष्य अधिनियम) होता है।
  • न्यायिक हिरासत (Judicial Custody): इसमें अभियुक्त जेल प्रशासन की देखरेख में होता है और मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस पूछताछ नहीं कर सकती। यह व्यक्ति की सुरक्षा और निष्पक्ष प्रक्रिया के लिए है।
  • ट्रांजिट रिमांड (Transit Remand): जब किसी अभियुक्त को उस क्षेत्राधिकार से बाहर गिरफ्तार किया जाता है जहाँ अपराध हुआ है, तो उसे संबंधित मजिस्ट्रेट तक ले जाने के लिए लगने वाले समय हेतु 'ट्रांजिट रिमांड' ली जाती है।

​7. संवैधानिक सुरक्षा कवच और मजिस्ट्रेट की भूमिका

​अक्सर छात्र केवल धारा 167 (अब BNSS 187) लिखते हैं, लेकिन इसमें संवैधानिक आयाम जोड़ना अंक बढ़ाता है:

  • अनुच्छेद 22(1): गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने का अधिकार है। रिमांड के समय वकील की उपस्थिति अनिवार्य है।
  • मजिस्ट्रेट का 'Judicial Mind' लागू करना: सुप्रीम कोर्ट ने मंजूभाई रतिभाई पटेल बनाम गुजरात राज्य में कहा था कि रिमांड देना एक 'यांत्रिक प्रक्रिया' (Mechanical process) नहीं है। मजिस्ट्रेट को लिखित में कारण दर्ज करने होंगे कि रिमांड क्यों आवश्यक है।
  • निशुल्क कानूनी सहायता: खत्री बनाम बिहार राज्य (भागलपुर अंफोड़ना मामला) में कहा गया कि रिमांड के समय यदि अभियुक्त गरीब है, तो उसे राज्य के खर्च पर वकील उपलब्ध कराना मजिस्ट्रेट की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

​8. 'डिफ़ॉल्ट बेल' (Default Bail): एक अविच्छेद्य अधिकार

​PCS-J Mains के लिए यह हिस्सा बहुत महत्वपूर्ण है:

  • धारा 167(2) का प्रोविजो (अब BNSS 187): यह केवल एक प्रक्रियात्मक नियम नहीं है, बल्कि नबीबाद बनाम राज्य के अनुसार यह एक 'मौलिक अधिकार' के समान है।
  • समय सीमा की गणना: स्पष्ट करें कि यदि अंतिम दिन छुट्टी है, तो भी पुलिस को चार्जशीट दाखिल करनी होगी, वरना अधिकार उत्पन्न हो जाएगा।
  • BNSS का प्रभाव: छात्रों को यह बताएं कि अब 60/90 दिन की गणना में वह समय भी शामिल होगा जब अभियुक्त पुलिस रिमांड में था, चाहे वह किस्तों में ही क्यों न ली गई हो।

​9. मानवाधिकार और रिमांड (Human Rights Perspective)

​विभिन्न जर्नल्स में रिमांड के दौरान होने वाली 'कस्टोडियल टॉर्चर' पर काफी चर्चा होती है:

  • चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination): CrPC की धारा 54 (BNSS 53) के तहत प्रत्येक अभियुक्त का मेडिकल परीक्षण अनिवार्य है। रिमांड के दौरान भी वकील अभियुक्त के शरीर पर चोट के निशानों की जांच की मांग कर सकता है।
  • हथकड़ी का प्रयोग: प्रेम शंकर शुक्ला बनाम दिल्ली प्रशासन के अनुसार, रिमांड पर ले जाते समय बिना ठोस कारण के हथकड़ी लगाना मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

​10. रिमांड के विरुद्ध उपचार (Remedy against Remand Order)

​एक अधिवक्ता के लिए यह जानना जरूरी है कि यदि मजिस्ट्रेट गलत तरीके से रिमांड दे देता है, तो क्या करें:

  • पुनरीक्षण (Revision): क्या रिमांड आदेश अंतरवर्ती (Interlocutory) है? कई उच्च न्यायालयों का मानना है कि रिमांड आदेश 'मध्यवर्ती' (Intermediate) है, इसलिए इसके विरुद्ध धारा 397 CrPC (BNSS 438) के तहत 'Revision' फाइल की जा सकती है क्योंकि यह व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करता है।
  • हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus): यदि रिमांड आदेश पूरी तरह से अवैध और बिना अधिकार क्षेत्र के है, तो अनुच्छेद 32 या 226 के तहत रिट भी दाखिल की जा सकती है।

​महत्वपूर्ण कानूनी सूत्र (Legal Maxims) जो छात्र उत्तर में लिख सकते हैं:

  1. "Salus Populi Est Suprema Lex" (जनता का कल्याण ही सर्वोच्च कानून है) - रिमांड और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन दिखाने के लिए।
  2. "Nemo Tenetur Seipsum Accusare" (किसी को भी अपने विरुद्ध गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता) - पुलिस रिमांड के दौरान आत्म-अभिशंसन से सुरक्षा के लिए।

तुलनात्मक तालिका: CrPC 167 vs BNSS 187


पुरानी CrPC (Dhara 167)

नई BNSS (Dhara 187)

रिमांड की अवधि

पुलिस रिमांड केवल पहले 15 दिनों में ही संभव थी।

पुलिस रिमांड पहले 40 या 60 दिनों के दौरान कभी भी ली जा सकती है।

रिमांड के टुकड़े

टुकड़ों में रिमांड (Splitting) पर स्पष्टता नहीं थी (सिर्फ शुरुआती 15 दिन)।

पुलिस रिमांड छोटे-छोटे हिस्सों (Instalments) में ली जा सकती है।

अधिकतम समय

अधिकतम 15 दिन पुलिस रिमांड, फिर न्यायिक हिरासत।

कुल 15 दिन पुलिस रिमांड, लेकिन इसे 40/60 दिन के भीतर कभी भी फैलाया जा सकता है।

वीडियो कॉन्फ्रेंस

प्रावधान सीमित था।

वीडियो लिंकिंग (VC) के माध्यम से रिमांड बढ़ाने को अनिवार्य और सुदृढ़ बनाया गया है।

डिफ़ॉल्ट बेल

60 या 90 दिनों के बाद अधिकार मिलता था।

वही समय सीमा है, लेकिन पुलिस रिमांड की नई प्रक्रिया इसमें शामिल है।

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छात्रों के लिए मुख्य 'Key Points' (परीक्षा हेतु)

  • अनुपम कुलकर्णी केस का अंत: पहले 'अनुपम कुलकर्णी' केस के अनुसार 15 दिन के बाद पुलिस रिमांड नहीं मिल सकती थी, लेकिन BNSS की धारा 187 ने इस सिद्धांत को पूरी तरह बदल दिया है।
  • उद्देश्य: यह बदलाव इसलिए किया गया ताकि यदि कोई अपराधी जांच में सहयोग न करे या बीमार होने का नाटक करे, तो पुलिस बाद में (40/60 दिन के भीतर) उसकी रिमांड दोबारा मांग सके।
  • अधिवक्ता का तर्क: छात्रों को मेन्स में यह लिखना चाहिए कि यह पुलिस को अधिक शक्ति देता है, जिससे अभियुक्त की सुरक्षा (Protection against torture) पर खतरा बढ़ सकता है।

UP और MP Civil Judge (Mains) की परीक्षा के पैटर्न को ध्यान में रखते हुए, रिमांड और BNSS के नए बदलावों पर आधारित कुछ महत्वपूर्ण संभावित प्रश्न यहाँ दिए गए हैं। ये प्रश्न 'Problem Based' और 'Theoretical' दोनों श्रेणियों में हैं:

Section A: सैद्धांतिक प्रश्न (Theoretical Questions)

प्रश्न 1: "रिमांड की शक्ति का प्रयोग यांत्रिक तरीके (Mechanically) से नहीं किया जाना चाहिए।" इस कथन के आलोक में रिमांड देते समय मजिस्ट्रेट के कर्तव्यों की विवेचना कीजिए। क्या BNSS 2023 के तहत पुलिस रिमांड की अवधि में किए गए बदलाव अभियुक्त के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं?

प्रश्न 2: CrPC की धारा 167 और BNSS की धारा 187 के बीच मुख्य अंतरों को स्पष्ट कीजिए। विशेष रूप से '15 दिनों की पुलिस हिरासत' के नियम में आए बदलावों पर टिप्पणी कीजिए।

प्रश्न 3: 'डिफ़ॉल्ट बेल' (Default Bail) से आप क्या समझते हैं? क्या आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल न होने पर मिलने वाला जमानत का अधिकार एक 'अविच्छेद्य अधिकार' (Indefeasible Right) है? प्रमुख न्यायिक निर्णयों की सहायता से समझाइए।

Section B: समस्यात्मक प्रश्न (Problem Based Questions)

प्रश्न 4: 'A' को हत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार किया गया। मजिस्ट्रेट ने उसे 10 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा। 10 दिन बाद 'A' गंभीर रूप से बीमार हो गया और उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया। स्वस्थ होने के बाद, पुलिस ने उसकी शेष 5 दिन की रिमांड की मांग गिरफ्तारी के 25वें दिन की।

  • ​(क) क्या पुराने CrPC के तहत यह मांग स्वीकार्य थी?
  • ​(ख) BNSS की धारा 187 के तहत मजिस्ट्रेट का इस पर क्या निर्णय होगा?

प्रश्न 5: एक पुलिस अधिकारी एक अभियुक्त को बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के 30 घंटे तक हिरासत में रखता है और तर्क देता है कि जांच जटिल थी।

  • ​इस स्थिति में अभियुक्त के पास क्या कानूनी उपचार उपलब्ध हैं?
  • ​डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के दिशा-निर्देशों के उल्लंघन का क्या प्रभाव होगा?

Section C: सूक्ष्म अंतर (Distinguish Between)

प्रश्न 6: निम्नलिखित के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए (प्रत्येक 5 अंक):

  1. ​पुलिस हिरासत (Police Custody) बनाम न्यायिक हिरासत (Judicial Custody)।
  2. ​साधारण रिमांड बनाम ट्रांजिट रिमांड (Transit Remand)।

छात्रों के लिए लेखन सुझाव (Writing Tips):

  • Case Laws का उल्लेख: उत्तर लिखते समय सीबीआई बनाम अनुपम कुलकर्णी और सत्येंद्र कुमार अंतिल जैसे केस जरूर लिखें।
  • संवैधानिक जुड़ाव: अनुच्छेद 21 और 22(2) का संदर्भ अवश्य दें, इससे उत्तर में गहराई आती है।
  • समय की गणना: डिफ़ॉल्ट बेल के प्रश्नों में 60 और 90 दिनों की गणना का नियम (गिरफ्तारी का दिन छोड़कर)

उत्तर की संरचना को समझने के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण प्रश्न 'BNSS के तहत पुलिस रिमांड के नए नियमों' पर आधारित है। यहाँ प्रश्न संख्या 4 का एक आदर्श उत्तर दिया गया है:

आदर्श उत्तर (Model Answer)

प्रश्न: 'A' को हत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया गया। 10 दिन की पुलिस रिमांड के बाद वह बीमार हो गया। स्वस्थ होने पर पुलिस ने गिरफ्तारी के 25वें दिन शेष 5 दिन की रिमांड मांगी। BNSS की धारा 187 के तहत इस स्थिति का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर की रूपरेखा:

1. परिचय (Introduction)

​प्रस्तुत समस्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड की अवधि और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया से संबंधित है। यह धारा पुराने CrPC की धारा 167 का संशोधित रूप है।

2. कानूनी प्रावधान (Legal Provisions)

  • अनुच्छेद 22(2) व BNSS धारा 58: किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
  • BNSS धारा 187(2): यह मजिस्ट्रेट को शक्ति देती है कि वह अभियुक्त को पुलिस हिरासत (Police Custody) में भेज सके।
  • नया बदलाव: जहाँ पुराने कानून (CrPC) में पुलिस रिमांड केवल गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों के भीतर ही ली जा सकती थी, वहीं BNSS की धारा 187(2) के अनुसार, 15 दिनों की पुलिस हिरासत को शुरुआती 40 दिनों (सामान्य अपराध) या 60 दिनों (गंभीर अपराध) के भीतर छोटे-छोटे हिस्सों (Instalments) में लिया जा सकता है।

3. समस्या का विश्लेषण (Analysis of the Problem)

  • पुराने कानून (CrPC) के तहत स्थिति: सीबीआई बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी (1992) के सिद्धांत के अनुसार, पुलिस रिमांड केवल पहले 15 दिनों तक सीमित थी। चूंकि यहाँ पुलिस 25वें दिन रिमांड मांग रही है, अतः पुराने कानून के तहत यह अस्वीकार्य होती।
  • नए कानून (BNSS) के तहत स्थिति: समस्या में 'A' पर हत्या के प्रयास (गंभीर अपराध) का आरोप है। BNSS की धारा 187 स्पष्ट करती है कि 15 दिन की कुल पुलिस रिमांड को शुरुआती 60 दिनों के भीतर कभी भी मांगा जा सकता है।

4. निष्कर्ष (Conclusion)

​उपरोक्त कानूनी विश्लेषण के आधार पर, मजिस्ट्रेट 'A' की शेष 5 दिन की पुलिस रिमांड की मांग को स्वीकार कर सकता है। अभियुक्त का बीमार होना एक वैध आधार है, और चूंकि अभी 60 दिन की अवधि समाप्त नहीं हुई है, इसलिए पुलिस का आवेदन कानूनी रूप से वैध है।

मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु विशेष सुझाव:

  1. फ्लोचार्ट का प्रयोग: उत्तर के बीच में एक छोटा फ्लोचार्ट बनाएँ (जैसे: गिरफ्तारी \rightarrow 24 घंटे \rightarrow मजिस्ट्रेट \rightarrow रिमांड)।
  2. तुलना: उत्तर में यह जरूर लिखें कि यह बदलाव 'जांच की प्रभावशीलता' बढ़ाने के लिए किया गया है ताकि अपराधी बीमारी या अन्य बहानों से जांच न रोक सकें।
  3. केस लॉ: वी. सेंथिल बालाजी बनाम राज्य (2023) का संदर्भ दें, जिसने इस विधायी बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया।

उत्तर की संरचना को समझने के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और महत्वपूर्ण प्रश्न 'BNSS के तहत पुलिस रिमांड के नए नियमों' पर आधारित है। यहाँ प्रश्न संख्या 4 का एक आदर्श उत्तर दिया गया है:

आदर्श उत्तर (Model Answer)

प्रश्न: 'A' को हत्या के प्रयास में गिरफ्तार किया गया। 10 दिन की पुलिस रिमांड के बाद वह बीमार हो गया। स्वस्थ होने पर पुलिस ने गिरफ्तारी के 25वें दिन शेष 5 दिन की रिमांड मांगी। BNSS की धारा 187 के तहत इस स्थिति का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर की रूपरेखा:

1. परिचय (Introduction)

​प्रस्तुत समस्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड की अवधि और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया से संबंधित है। यह धारा पुराने CrPC की धारा 167 का संशोधित रूप है।

2. कानूनी प्रावधान (Legal Provisions)

  • अनुच्छेद 22(2) व BNSS धारा 58: किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
  • BNSS धारा 187(2): यह मजिस्ट्रेट को शक्ति देती है कि वह अभियुक्त को पुलिस हिरासत (Police Custody) में भेज सके।
  • नया बदलाव: जहाँ पुराने कानून (CrPC) में पुलिस रिमांड केवल गिरफ्तारी के पहले 15 दिनों के भीतर ही ली जा सकती थी, वहीं BNSS की धारा 187(2) के अनुसार, 15 दिनों की पुलिस हिरासत को शुरुआती 40 दिनों (सामान्य अपराध) या 60 दिनों (गंभीर अपराध) के भीतर छोटे-छोटे हिस्सों (Instalments) में लिया जा सकता है।

3. समस्या का विश्लेषण (Analysis of the Problem)

  • पुराने कानून (CrPC) के तहत स्थिति: सीबीआई बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी (1992) के सिद्धांत के अनुसार, पुलिस रिमांड केवल पहले 15 दिनों तक सीमित थी। चूंकि यहाँ पुलिस 25वें दिन रिमांड मांग रही है, अतः पुराने कानून के तहत यह अस्वीकार्य होती।
  • नए कानून (BNSS) के तहत स्थिति: समस्या में 'A' पर हत्या के प्रयास (गंभीर अपराध) का आरोप है। BNSS की धारा 187 स्पष्ट करती है कि 15 दिन की कुल पुलिस रिमांड को शुरुआती 60 दिनों के भीतर कभी भी मांगा जा सकता है।

4. निष्कर्ष (Conclusion)

​उपरोक्त कानूनी विश्लेषण के आधार पर, मजिस्ट्रेट 'A' की शेष 5 दिन की पुलिस रिमांड की मांग को स्वीकार कर सकता है। अभियुक्त का बीमार होना एक वैध आधार है, और चूंकि अभी 60 दिन की अवधि समाप्त नहीं हुई है, इसलिए पुलिस का आवेदन कानूनी रूप से वैध है।

मुख्य परीक्षा (Mains) हेतु विशेष सुझाव:

  1. फ्लोचार्ट का प्रयोग: उत्तर के बीच में एक छोटा फ्लोचार्ट बनाएँ (जैसे: गिरफ्तारी \rightarrow 24 घंटे \rightarrow मजिस्ट्रेट \rightarrow रिमांड)।
  2. तुलना: उत्तर में यह जरूर लिखें कि यह बदलाव 'जांच की प्रभावशीलता' बढ़ाने के लिए किया गया है ताकि अपराधी बीमारी या अन्य बहानों से जांच न रोक सकें।
  3. केस लॉ: वी. सेंथिल बालाजी बनाम राज्य (2023) का संदर्भ दें, जिसने इस विधायी बदलाव का मार्ग प्रशस्त किया।

मेन्स परीक्षा में 'डिफ़ॉल्ट बेल' (Default Bail) की गणना का प्रश्न अक्सर पूछा जाता है। समय की गलत गणना के कारण पूरे अंक कट सकते हैं। छात्रों के लिए इसे याद रखने का सबसे आसान "कैलेंडर फॉर्मूला" नीचे दिया गया है:

डिफ़ॉल्ट बेल गणना: 3-स्टेप फॉर्मूला

स्टेप 1: अपराध की प्रकृति पहचानें (Category)

​सबसे पहले देखें कि अपराध कितना गंभीर है:

  • 90 दिन की अवधि: यदि अपराध मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अधिक की सजा वाला है।
  • 60 दिन की अवधि: अन्य सभी अपराधों के लिए।

स्टेप 2: 'X' दिन का नियम (The Exclusion Rule)

​गणना करते समय सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है:

"जिस दिन मजिस्ट्रेट ने पहली बार रिमांड दी, उस दिन को छोड़ दें (Exclude the day of first remand order)."

तारीख की गिनती अगले दिन से शुरू होगी।

स्टेप 3: 'अधिकार' उत्पन्न होने का समय (Accrual of Right)

  • ​यदि पुलिस ने 60वें या 90वें दिन के कार्यकारी समय (Office Hours) के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं की, तो 61वें या 91वें दिन की सुबह अभियुक्त को डिफ़ॉल्ट बेल का अधिकार मिल जाता है।

उदाहरण से समझें (Practical Example):

​मान लीजिए 'A' को 1 जनवरी को गिरफ्तार किया गया और उसी दिन मजिस्ट्रेट ने रिमांड दी। अपराध चोरी का है (60 दिन की श्रेणी)।

  1. गिनती शुरू: 2 जनवरी से (1 जनवरी को छोड़ दें)।
  2. जनवरी के दिन: 30 दिन (2 से 31 तक)।
  3. फरवरी के दिन: 30 दिन।
  4. कुल 60 दिन: 2 मार्च को पूरे होंगे।
  5. डिफ़ॉल्ट बेल का अधिकार: यदि 2 मार्च तक चार्जशीट नहीं आई, तो 3 मार्च को 'A' बेल के लिए आवेदन कर सकता है।

छात्रों के लिए 3 'प्रो-टिप्स' (Pro-Tips for Mains):

  1. छुट्टी का नियम (Holiday Rule): यदि 60वां या 90वां दिन रविवार या कोर्ट की छुट्टी है, तो क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने 'साधु सिंह बनाम राज्य' में स्पष्ट किया कि पुलिस को छुट्टी का लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें छुट्टी से पहले या छुट्टी के दिन भी चार्जशीट (ई-फाइलिंग या मजिस्ट्रेट के घर पर) पेश करनी होगी, अन्यथा बेल का अधिकार मिल जाएगा।
  2. आवेदन अनिवार्य है: यह अधिकार अपने आप नहीं मिलता। छात्र उत्तर में लिखें कि अभियुक्त को धारा 167(2) [BNSS 187] के तहत आवेदन (Application) देना होगा और जमानत की शर्तें (Bail Bonds) भरने के लिए तैयार रहना होगा।
  3. चार्जशीट बनाम आवेदन: यदि अभियुक्त ने 91वें दिन सुबह 10 बजे बेल का आवेदन दे दिया और पुलिस ने दोपहर 2 बजे चार्जशीट दाखिल की, तो भी अभियुक्त को बेल मिलेगी क्योंकि उसने अपना अधिकार पहले 'Exercise' कर लिया था।
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