सोनम वांगचुक: लद्दाख की बर्फीली वादियों से उपजी एक नवोन्मेषी क्रांति
(Sonam Wangchuk: An innovative revolution born from the icy valleys of Ladakh)
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| सोनम वांगचुक |
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के उलेतोक्पो (Uleytokpo) नामक एक छोटे और दुर्गम गांव में हुआ
था। उनके पिता सोनम वांग्याल एक सरकारी कर्मचारी थे और बाद में जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रहे।
वांगचुक का शुरुआती बचपन आम बच्चों से काफी अलग था। जिस उम्र में बच्चे स्कूलों में दाखिला लेते हैं, उस उम्र में वे लद्दाख की वादियों में प्रकृति के करीब रहकर बड़े हो रहे थे। उनके गांव में 9 साल की उम्र तक कोई स्कूल नहीं था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा अपनी मां त्सेरिंग वांगमो से मातृभाषा 'भोटी' में ग्रहण की। प्रकृति, नदियां, मिट्टी और पहाड़ ही उनके पहले शिक्षक बने, जिसने उनकी सोचने की क्षमता और व्यावहारिक समझ को एक अनोखा आकार दिया।
सन1975 की बात है उनके पिता सोनम वांगयाल जम्मू कश्मीर राज्य में मंत्री बने और श्रीनगर में रहने लगे, तब सोनम वांगचुक की उम्र 9 वर्ष थी तब उन्हें औपचारिक शिक्षा के लिए श्रीनगर के एक विद्यालय में एडमिशन हुआ।। अब यहां एक समस्या ये आई कि वो लद्दाखी भाषा ही जानते थे और जबकि जम्मू में उर्दू हिन्दी और अंग्रेजी में शिक्षा दी जाती थी ,जब स्कूल के शिक्षक उनसे कोई प्रश्न पूछते थे तो वह कोई जवाब नहीं दे पाते थे जिससे उनके साथी उनको मंद बुद्धि समझ कर मजाक उड़ाते थे ,इसके अलावा लद्दाखी चेहरे मोहरे होने और अलग टाइप के पहनावे के कारण उनके साथी उनसे दूरी बनाकर रखते थे,लद्दाख में भीषण ठंड पड़ती थी जबकि जम्मू अपेक्षाकृत ठंडा क्षेत्र था इसलिए उनके चेहरे में फोड़े फुंसियां निकल आती थी हालांकि अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और लगन के बल पर उन्होंने तेजी से पढ़ाई में अपनी पकड़ बनाई। बाद में जब वह 11 साल के हुए तो दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय में एडमिशन लिया और हॉस्टल में रहे,ये कहानी बहुत रोचक है वह जब दो साल जम्मू में खुद को अलग थलग महसूस किया तो एक दिन खुद दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय पहुंचकर खुद प्रिंसिपल से मिले अपनी समस्या बताई कि वह पढ़ना तो चाहते हैं पर जम्मू में इस तरह का उपेक्षित माहौल होने के कारण पढ़ नहीं पा रहे ,उनकी इन बातों से प्रिंसिपल बहुत प्रभावित हुए उनके हिम्मत और लगन से प्रभावित होकर केंद्रीय विद्यालय में एडमिशन दे दिया।इस तरह दिल्ली में हॉस्टल में रहकर 12 वीं क्लास तक की शिक्षा प्राप्त की।
माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, वे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना चाहते थे। परंतु उनके पिता चाहते थे कि वो सिविल सेवा की तैयारी करें क्योंकि एक सिविल सेवक बनने के बाद वह लद्दाख के लिए बहुत कुछ कर पाएंगे जबकि एक इंजीनियर बनने के बाद उनके पास लद्दाख को विकसित करने के अवसर बहुत कम होंगे वह एक सरकारी अधिकारी ही बनकर रह जाएंगे। इसलिए उनके पिता ने उनके इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने का विरोध किया ,और पिता ने पूरी तरह से आर्थिक मदद बंद कर दी पारिवारिक असहमति के बावजूद, उन्होंने अपने बलबूते पर राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), श्रीनगर में दाखिला लिया,इस तरह संघर्ष करते हुए 1988 में मेकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की। अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। ट्यूशन पढ़ाने के इसी दौर ने उनके जीवन का उद्देश्य बदल दिया और उन्हें लद्दाख की शिक्षा प्रणाली की कड़वी सच्चाई से रूबरू कराया।
शिक्षा प्रणाली में सुधार और SECMOL की स्थापना
इंजीनियरिंग के दौरान जब वांगचुक बच्चों को पढ़ा रहे थे, तो उन्होंने देखा कि लद्दाख में 10वीं की राज्य बोर्ड परीक्षा में असफल होने वाले छात्रों का आंकड़ा 90% से अधिक था। इसका कारण छात्रों की योग्यता में कमी नहीं, बल्कि एक दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली थी। लद्दाख के बच्चों को ऐसी भाषा (अंग्रेजी और उर्दू) और ऐसे पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहे थे, जिनका उनके दैनिक जीवन, भूगोल और संस्कृति से कोई संबंध ही नहीं था। उन्होंने देखा कि लद्दाख के बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जा रही उनका माध्यम उर्दू या अंग्रेजी था ,जिसके कारण जब लद्दाखी भाषा समझने वाले बच्चों को इस भाषा में पढ़ाया जाता था तो वह विषय को बिना समझे रटने की कोशिश करते थे साथ में जो पाठ्यक्रम था उस समय की शिक्षा व्यवस्था में वह भी जटिल था क्योंकि लद्दाख के छोटे बच्चों को ऐसे उदाहरण दिए जाते थे जो लद्दाख के भूगोल में नहीं थे आम का पेड़ ,समुद्र, मानसून ,जैसे बाते सिर्फ काल्पनिक थी क्योंकि लद्दाख के बर्फीले मौसम में न आम का पेड़ होता था न समुद्र , अव्यवहारिक पाठ्यक्रम था। इस तरह सोनम वांगचुक ने ये जाना कि इतना खराब रिजल्ट आने का कारण बच्चों का दिमाग का कम होना नहीं बल्कि भाषा की जटिल समस्या और पाठ्यक्रम का जम्मू राज्य के अनुसार होना न की लद्दाख के जलवायु के अनुसार होना।
उस समय दसवीं बोर्ड के परीक्षा में लद्दाख के 95 प्रतिशत बच्चे इसी लंगड़ी शिक्षा व्यवस्था के कारण फेल हो जाते थे , इसी खराब रिजल्ट के कारण लोग लद्दाख वासियों को कम दिमाग़ का मान लेते थे,परंतु सोनम वांगचुक ने खोजा कि लद्दाख के बच्चे बहुत ही टैलेंटेड और प्रतिभाशाली हैं पर सिर्फ समस्या पूरे एजुकेशन सिस्टम में है और पढ़ाने का ढंग बिल्कुल ही ग़लत है।
इस विकट समस्या का समाधान करने के लिए सोनम वांगचुक ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 1988 में SECMOL (Students' Educational and Cultural Movement of Ladakh) यानी में स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख' की स्थापना की।
SECMOL मॉडल: असफलता को सफलता में बदलना
SECMOL का मुख्य उद्देश्य लद्दाख की शिक्षा प्रणाली में सुधार करना और उन छात्रों को संवारना था, जिन्हें पारंपरिक शिक्षा प्रणाली ने 'फेल' घोषित कर दिया था।
- फेल्ड छात्रों का घर: वांगचुक ने लेह के पास फे गांव में एक अनूठा परिसर (Campus) बनाया। यह स्कूल पूरी तरह से छात्रों द्वारा ही चलाया जाता है।
- व्यावहारिक शिक्षा: यहाँ किताबों के रटने पर नहीं, बल्कि 'करके सीखने' (Learning by Doing) पर बल दिया जाता है। छात्र खुद निर्णय लेते हैं, खेती करते हैं, सौर ऊर्जा का प्रबंधन करते हैं और अपना स्वशासन चलाते हैं।
- परिणाम: SECMOL और जम्मू-कश्मीर सरकार के सहयोग से चलाए गए 'ऑपरेशन न्यू होप' के कारण लद्दाख में 10वीं बोर्ड परीक्षा का सफलता प्रतिशत 10-15% से बढ़कर 75% से अधिक हो गया।
तकनीकी नवाचार: आइस स्तूप और सौर वास्तुकला
सोनम वांगचुक का मानना है कि "इंजीनियरिंग वह है जो आम इंसान की रोजमर्रा की समस्याओं का सरल और सस्ता समाधान दे।" लद्दाख में पानी की भयंकर कमी और भीषण ठंड जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए उन्होंने विज्ञान का अद्भुत उपयोग किया।
1. आइस स्तूप (Ice Stupa) - कृत्रिम हिमनद
लद्दाख एक उच्च-ऊंचाई वाला शीत मरुस्थल (Cold Desert) है। यहाँ वसंत के महीनों (अप्रैल-मई) में जब फसलों को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब नदियां सूखी होती हैं क्योंकि ग्लेशियर पिघलना शुरू नहीं होते। वहीं, सर्दियों में लाखों लीटर पानी बेकार बह जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए वांगचुक ने 2013-14 में 'आइस स्तूप' की अवधारणा विकसित की।
- तकनीक: इसमें सर्दियों के दौरान पहाड़ी से नीचे आने वाले पानी को पाइप के जरिए लाया जाता है और एक ऊंचे ढांचे से फव्वारे के रूप में हवा में छोड़ा जाता है। शून्य से नीचे (-)20°C तापमान होने के कारण यह पानी हवा में ही जम जाता है और बौद्ध स्तूप के आकार का एक विशाल बर्फ का पहाड़ बन जाता है।
- उपयोगिता: इसका आकार शंक्वाकार (Cone-shaped) होने के कारण यह सूरज की किरणों से धीरे-धीरे पिघलता है और जून-जुलाई तक स्थानीय किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है।
- अंतरराष्ट्रीय पहचान: इस नवाचार के लिए उन्हें पूरी दुनिया में सराहा गया और स्विट्जरलैंड तथा पेरू जैसे देशों में भी इस मॉडल को अपनाया गया।
2. सौर-संचालित मिट्टी के घर (Solar-Heated Mud Structures)
लद्दाख में सर्दियों में तापमान (-)30°C तक गिर जाता है, जिससे घरों को गर्म रखने के लिए भारी मात्रा में मिट्टी का तेल और लकड़ी जलानी पड़ती थी। वांगचुक ने पारंपरिक मिट्टी के घरों को सोलर तकनीक से जोड़ा। ये घर दिन के समय सूरज की गर्मी को अवशोषित करते हैं और रात भर अंदर का तापमान (+)15°C से (+)20°C तक बनाए रखते हैं, वह भी बिना किसी ईंधन के उपयोग के।
भारतीय सेना के जवानों के लिए शून्य से नीचे के तापमान में रहने हेतु उन्होंने 'पैसिव सोलर हीटेड मड हट्स' का निर्माण भी किया, जिसे सेना द्वारा अत्यधिक सराहा गया।
हिमालयन अल्टरनेटिव इंस्टीट्यूट लद्दाख (HIAL)
शिक्षा और नवाचार के इस सफर को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने HIAL (Himalayan Alternative Institute of Ladakh) की नींव रखी। यह एक ऐसा वैकल्पिक विश्वविद्यालय है जहाँ पारंपरिक विश्वविद्यालय प्रणाली से अलग, हिमालयी क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याओं (जैसे जलवायु परिवर्तन, पर्यटन, सतत विकास) के समाधान पर आधारित व्यावहारिक अध्ययन कराया जाता है।
पर्यावरण, समाज और राजनीतिक आंदोलन
सोनम वांगचुक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित रहने वाले वैज्ञानिक नहीं हैं; वे एक सजग नागरिक और आंदोलनकारी भी हैं।
1. 'बॉयकॉट मेड इन चाइना' अभियान
2020 में भारत-चीन सीमा (गलवान घाटी) तनाव के दौरान उन्होंने 'बॉयकॉट मेड इन चाइना' अभियान शुरू किया। उनका विचार था कि चीन को केवल सीमा पर सैन्य बल से ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी उत्तर देना चाहिए। उन्होंने भारतीयों से चीनी सामानों और ऐप्स का बहिष्कार करने का आह्वान किया, जो देश भर में बहुत लोकप्रिय हुआ।
2. लद्दाख की पर्यावरण और संवैधानिक सुरक्षा (छठी अनुसूची की मांग)
5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया और लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश (UT) बनाया गया, तब शुरुआत में लद्दाखियों ने इसका स्वागत किया। लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि बिना विधानसभा के लद्दाख का प्रशासन पूरी तरह से बाहरी नौकरशाहों के हाथों में चला गया है।
वांगचुक ने लद्दाख के पर्यावरण, ग्लेशियरों, जनजातीय संस्कृति और जमीन को बड़े औद्योगिक घरानों और अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों से बचाने के लिए आवाज उठाई।
- प्रमुख मांगें: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करना और उसे पूर्ण राज्य का दर्जा देना।
- जलवायु अनशन (Climate Fast): उन्होंने शून्य से नीचे के तापमान में कई दिनों तक 'क्लाइमेट फास्ट' (भूख हड़ताल) किए। उनका कहना है कि लद्दाख के नाजुक ग्लेशियरों को बचाने के लिए स्थानीय लोगों को निर्णय लेने का अधिकार मिलना आवश्यक है।
- इस मामले में सरकार का कहना है कि लद्दाख को स्वायत्त राज्य का दर्जा देना व्यावहारिक नहीं है क्योंकि लद्दाख में कुल मानव आबादी सिर्फ तीन लाख है ,और कारगिल और लद्दाख क्षेत्र है लद्दाख बौद्ध बाहुल्य क्षेत्र है तो कारगिल मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र साथ में अपना अलग राज्य बनाने पर विधान सभा ,मंत्रिमंडल के लिए आबादी अत्यधिक कम है केंद्र सरकार का कहना है कि अलग राज्य बनाए रखने के लिए अपनी राज्य की कमाई होना चाहिए पर तीन लाख आबादी से टैक्स बिल्कुल नहीं मिलेगा जिससे खर्च चलाने के लिए हमेशा केंद्र सरकार का मुंह ताकना पड़ेगा।
प्रमुख पुरस्कार और सम्मान
सोनम वांगचुक के अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:
- रमन मैगसेसे पुरस्कार (2018): इसे 'एशिया का नोबेल पुरस्कार' माना जाता है। उन्हें समुदाय को सशक्त बनाने के लिए अपनी अनूठी शिक्षा प्रणाली और पर्यावरण-अनुकूल नवाचारों के लिए यह सम्मान मिला।
- रोलेक्स अवार्ड फॉर एंटरप्राइज (2016): आइस स्तूप के सफल निर्माण और क्रियान्वयन के लिए।
- ग्लोबल एवार्ड फॉर सस्टेनेबल आर्किटेक्चर (2017)
- द सीएनएन-न्यूज18 इंडियन ऑफ द ईयर (2017)
- ब्रांड इंडिया सम्मिट अवार्ड
सोनम वांगचुक: विवाद, आरोप और आलोचनात्मक पक्ष
सोनम वांगचुक के शैक्षणिक और पर्यावरणीय योगदानों के साथ-साथ हाल के वर्षों में उनसे जुड़े कई विवाद, सुरक्षा एजेंसियों के आरोप और राजनीतिक बयानबाज़ियाँ भी चर्चा में रही हैं। उनके जीवन और राजनीतिक रुख के आलोचकों तथा जाँच एजेंसियों द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. FCRA (विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम) के उल्लंघन के आरोप
सन 2007 (यूपीए शासनकाल) के दौरान सोनम वांगचुक के संगठन SECMOL पर विदेशी फंडिंग से जुड़े नियमों के उल्लंघन का आरोप लगा। उनके भारत के दुश्मन देशों के साथ तथाकथित संबंधों के कारण नोटिस दी गई थी।
- आरोप का स्वरूप: गृह मंत्रालय के वित्तीय मानकों के अनुसार विदेशी दान प्राप्त करने के लिए FCRA क्लियरेंस अनिवार्य होता है। आलोचकों और जाँच एजेंसियों का दावा था कि संगठन ने विदेशी धन के रख-रखाव और उसके ऑडिट में स्थापित प्रक्रियाओं का पूर्ण पालन नहीं किया।
- वर्तमान स्थिति: वांगचुक और उनके समर्थकों का रुख रहा है कि ये तकनीकी कमियाँ थीं जिन्हें समय-समय पर स्पष्ट कर दिया गया था, जबकि आलोचक इसे वित्तीय अनियमितता के रूप में देखते हैं।
2. पाकिस्तान यात्रा और बयानबाज़ी
सोनम वांगचुक की पाकिस्तान यात्रा और वहाँ दिए गए वक्तव्यों को लेकर भी भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
- पाकिस्तान दौरा: वे जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण विषय पर आयोजित सम्मेलनों में भाग लेने पाकिस्तान गए थे। वह पाकिस्तान में Breathe Pakistan नामक कार्यक्रम में भाग लेने सीधे पाकिस्तान चले गए जबकि ये वहां के एक अखबार "डॉन " द्वारा आयोजित किया गया था और ये पेपर भारत विरोधी गतिविधियों के लिए जाना जाता है।
- विवादित वक्तव्य: यात्रा के दौरान और उसके बाद दिए गए बयानों में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव को कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए 'ट्रैक-2 कूटनीति' की बात कही। सोनम वांगचुक पाकिस्तान में pok के क्षेत्र स्कारदू को जिस प्रकार स्वायत्तता पाकिस्तान द्वारा दी गई है उसी तरह स्वायत्तता लद्दाख को देने की बात कहते हैं जबकि सभी को जानकारी है कि पाकिस्तान ने कश्मीर के इस हिस्से में अवैध कब्जा किया हुआ है।
- आलोचना: आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान जैसे देश में जाकर सीमा पार के मंचों से भारतीय नीतियों या सीमा सुरक्षा पर ऐसी टिप्पणी करना संवेदनशील मामलों में भारत के रणनीतिक रुख को कमजोर करता है।
3. बांग्लादेश और मुहम्मद यूनुस से मुलाकात
बांग्लादेश में तख्तापलट और राजनीतिक अस्थिरता के दौर के आसपास सोनम वांगचुक की नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस (जो बाद में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख बने) से हुई बातचीत/मुलाकात को भी संदेह की दृष्टि से देखा गया।जब बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्ल- ए- आम हो रहा था तब सोनम वांगचुक मुहम्मद युनुस से क्यों मिले।
- आलोचकों का तर्क: भारत में जब लद्दाख आंदोलन हिंसक या तीखा रूप ले रहा था, उसी दौरान विदेशी नेताओं या भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील हस्तियों से संपर्क साधना भारत विरोधी तत्वों के प्रभाव की आशंका उत्पन्न करता है।
4. चीन घुसपैठ पर दिया गया बयान
चीन और गलवान घाटी तनाव के समय वांगचुक ने एक बयान में कहा था कि:
"यदि लद्दाख का स्थानीय निवासी चीनी घुसपैठ का विरोध न करे या सेना का सहयोग न करे, तो चीनी सैनिक आसानी से भारतीय सीमा में प्रवेश कर सकते हैं।"
- पक्ष और विपक्ष: * आलोचकों का रुख: इस बयान की कड़ी आलोचना हुई और इसे भारतीय सशस्त्र बलों (Indian Armed Forces) के सामर्थ्य और तैयारियों पर सवाल उठाने जैसा माना गया। आलोचकों के अनुसार यह बयान ऐसा संदेश देता है मानो सीमा सुरक्षा केवल स्थानीय असंतोष पर टिकी है, न कि सेना की दक्षता पर। सितंबर 2025 दिए गए एक विवादित और भड़काऊ भाषण के कारण उनको लद्दाख में हिंसा हुई,वह जानबूझकर बीस तरह के वक्तव्य देते हैं जिससे भारत कमजोर हो ।
- समर्थकों/वांगचुक का स्पष्टीकरण: उन्होंने तर्क दिया था कि वे सीमा पर सेना और स्थानीय देशभक्त लद्दाखी जनता के बीच के गहरे संबंध और स्थानीय नागरिकों के महत्व को रेखांकित कर रहे थे।
5. लद्दाख में राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा एजेंसियों की चिंताएँ
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने और लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने के बाद, वांगचुक द्वारा छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे की माँग को लेकर किए गए बड़े आंदोलनों ने केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान खींचा।छठी अनुसूची का मतलब लद्दाख को स्टेटहुड देना यानी लद्दाख को एक राज्य का दर्जा मिले न कि केंद्र शासित प्रदेश हो।
- आंदोलन का तरीका: शून्य से नीचे तापमान में जलवायु अनशन और जन-प्रदर्शनों से लद्दाख जैसे रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील (Border Region) इलाके में कानून-व्यवस्था और राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हुई।
- एजेंसियों का रुख: सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और पाकिस्तान सीमा से सटे संवेदनशील क्षेत्र में किसी भी प्रकार का बड़ा आंतरिक असंतोष या उग्र जन-आंदोलन राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से जोखिम भरा हो सकता है। साथ में केंद्र सरकार का ये कहना है कि लद्दाख में सिर्फ तीन लाख जनसंख्या है इतने कम आबादी में स्टेट के दर्जे में विधानसभा के सदस्य और सचिवालय आदि नहीं बनाया जा सकता है।
6. कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में तीन मांगों के लिए अनशन
व्यक्तित्व का प्रभाव और भविष्य की राह
सोनम वांगचुक का जीवन यह सिखाता है कि जब तक ज्ञान का उपयोग समाज की वास्तविक समस्याओं को हल करने में नहीं होता, तब तक शिक्षा अधूरी है। उन्होंने साबित किया कि संसाधनों की कमी कभी भी नवाचार के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।
जहाँ एक ओर पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण क्षरण के संकट से जूझ रही है, वहीं सोनम वांगचुक जैसे विचारक और कर्मयोगी मानवता को एक नई दिशा दिखाते हैं। लद्दाख की जमीनी हकीकत को बदलने से लेकर वैश्विक मंचों पर पर्यावरण की आवाज बनने तक, सोनम वांगचुक का जीवन सतत विकास, आत्मनिर्भरता और साहस की एक अमर गाथा है।
इस स्थित में वर्तमान में सोनम वांगचुक के कार्य भारत के विरोधी रुख की तरफ अधिक झुकते दिखते है।'

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