भारत के गौरव: प्रोफेसर गोविंद स्वरूप और रेडियो खगोल विज्ञान की क्रांति
आज जब भारत अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्र में वैश्विक ऊंचाइयों को छू रहा है, तब हमें देश के उस महान वैज्ञानिक को याद करना बेहद जरूरी है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के दौर में भारत को 'रेडियो एस्ट्रोनॉमी' का ग्लोबल हब बना दिया। हम बात कर रहे हैं प्रोफेसर गोविंद स्वरूप की।
1. प्रारंभिक जीवन, माता-पिता और मेधावी बचपन
गोविंद स्वरूप का जन्म 23 मार्च 1929 को उत्तर प्रदेश के ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद जिला) में हुआ था। उनके बचपन के दिनों में देश गुलामी और संघर्ष के दौर से गुजर रहा था। शुरुआत में उनकी शिक्षा ठाकुरद्वारा के सनातन धर्म स्कूल में हुई, जहाँ उनके दादाजी ने भी उन्हें पढ़ाया। बाद में उनका परिवार मुरादाबाद शिफ्ट हो गया, जहाँ उन्होंने हिंदू हाई स्कूल से पढ़ाई की।
उनके भीतर विज्ञान के प्रति असाधारण रुचि को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें इलाहाबाद के इविंग क्रिश्चियन कॉलेज भेजा। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1948 में BSc और 1950 में Physics से MSc की डिग्री हासिल की।
आजादी के समय इतनी प्रतिभा कैसे निकली?
उस दौर में भले ही देश आर्थिक रूप से कमजोर था और आधुनिक शिक्षा के संसाधन कम थे, लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे संस्थान बौद्धिक चेतना के केंद्र थे। गोविंद जी के भीतर मौलिक सोच, कड़ी मेहनत और देश के लिए कुछ बड़ा करने का अटूट जज्बा था, जिसने उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी एक वैश्विक वैज्ञानिक बनाया।
2. ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का सफर (विदेशी वेधशालाओं का अनुभव)
MSc के बाद वह दिल्ली के नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (NPL) से जुड़ गए। 1953 में कोलंबो प्लान के तहत उन्हें ऑस्ट्रेलिया (CSIRO) भेजा गया, जहाँ उन्होंने पॉट्स हिल (सिडनी) में रेडियो टेलीस्कोप बनाने का व्यावहारिक अनुभव लिया। यही वह समय था जब उन्होंने रेडियो तरंगों के जरिए ब्रह्मांड को समझने की कला सीखी।वह भारत के लिए रेडियो ऑब्जर्वेटरी बनाना चाहते थे,जब वह ऑस्ट्रेलिया से लौट रहे थे तब उन्होंने अपने ऑस्ट्रेलिया के प्रोफेसर से रिक्वेस्ट किया कि जो पुरानी ऑब्जर्वेटरी को पुरानी समझकर हटाया जा रहा उसके पुर्जे भारत को भेज दिया जाय तो वह भारत में भी रेडियो ऑब्जर्वेटरी बना लेंगे।परंतु जब वह भारत लौटे अपने सहयोगियों के साथ इस विषय में पूरा खाका तैयार कर लिया ,पर वह ऑस्ट्रेलिया से पुराने ऑब्जर्वेटरी के कल पुर्जे का इंतजार करते रहे पर वह भारत नहीं आए , अंततः वह पी एच डी करने के लिए अमेरिका चले गए
1956-57 में उन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में काम किया और फिर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (कैलिफोर्निया) से 1961 में अपनी PhD पूरी की। वह स्टैनफोर्ड में असिस्टेंट प्रोफेसर भी बने, लेकिन उनका दिल हमेशा भारत के लिए धड़कता रहा।
3. भारत वापसी और स्वदेशी वेधशालाओं का निर्माण
1963 में महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा के एक आमंत्रण पर गोविंद स्वरूप अपनी प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर भारत लौट आए और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) से जुड़ गए।
- ऊटी रेडियो टेलीस्कोप (ORT): भारत लौटने के महज 7 साल बाद, 1970 में उन्होंने तमिलनाडु के ऊटी में दुनिया के सबसे बड़े रेडियो टेलीस्कोप में से एक का निर्माण किया। यह एक अनूठा, पहाड़ी ढलान पर बना 530 मीटर लंबा टेलीस्कोप था, जिसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से बेहद कम बजट में बनाया गया था।
- जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (GMRT): इसके बाद उन्होंने पुणे के पास नारायणगांव में GMRT की स्थापना की, जिसमें 45 मीटर व्यास की 30 विशाल एंटिना डिश शामिल हैं। यह आज भी दुनिया के सबसे शक्तिशाली रेडियो टेलीस्कोप एरे में से एक है।
4. क्या गोविंद जी ने 'बिग बैंग' सिद्धांत की खोज की थी?
यह एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य है कि बिग बैंग सिद्धांत की खोज गोविंद जी ने नहीं की थी (इसकी खोज और पुष्टि जॉर्ज लेमैत्रे, एडविन हबल, और बाद में पेनज़ियास व विल्सन ने कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड की खोज से की थी)।
लेकिन गोविंद जी का योगदान क्या था? ऊटी रेडियो टेलीस्कोप की मदद से गोविंद स्वरूप और उनकी टीम ने 'लूनर ऑकल्टेशन' (चंद्र प्रच्छादन) की विधि से 1000 से अधिक कमजोर रेडियो स्रोतों का अध्ययन किया। उनके इन आंकड़ों ने दुनिया को 'बिग बैंग थ्योरी' के पक्ष में सबसे अचूक और स्वतंत्र प्रमाण (Independent Evidence) दिए और इसके विरोधी 'स्टेडी स्टेट थ्योरी' को खारिज करने में मदद की।
5. पुरस्कार और सम्मान
भारत सरकार और वैश्विक विज्ञान जगत ने उन्हें सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा:
- शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1972)
- पद्म श्री (1973)
- रॉयल सोसाइटी, लंदन के फेलो (FRS - 1991)
- रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी का 'हर्शेल मेडल' (2005)
लोग क्यों नहीं जानते?
हमारे देश में अक्सर अंतरिक्ष विज्ञान (Space Science) का मतलब केवल रॉकेट और सैटेलाइट (ISRO) लॉन्च तक सीमित मान लिया जाता है। रेडियो एस्ट्रोनॉमी, जो कि सुदूर ब्रह्मांड की अदृश्य तरंगों को पकड़कर इतिहास खंगालने का काम करती है, लाइमलाइट से दूर रहती है। यही कारण है कि गोविंद जी जैसे महानायक का नाम आम जनमानस में उतना चर्चित नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था।

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