ऑप्शन ट्रेडिंग (Options Trading): शुरुआती लोगों के लिए A-to-Zगाइड
शेयर बाजार की दुनिया में कदम रखते ही 'ऑप्शन ट्रेडिंग' का नाम सबसे ज्यादा सुनाई देता है। कम निवेश में रातों-रात अमीर बनने के सपने देखने वाले लोग अक्सर यहाँ खिंचे चले आते हैं। लेकिन क्या यह वाकई इतना आसान है? आइए, इस पेचीदा खेल को एक सरल कहानी की तरह समझते हैं। शेयर बाज़ार में जब लोग कुछ जानकारी के बाद डी मैट अकाउंट खुलवा लेते है , तो वह प्रारंभ में सिर्फ विभिन्न कंपनियों में निवेश करते है,वह उन कंपनियों में निवेश करते है जिसमें कुछ दिन बाद या एक साल में बढ़ने के चांस लगते है , इसमें कुछ कंपनियां तो छह महीने में बीस प्रतिशत तक रिटर्न देतीं है कुछ छह महीने में दस प्रतिशत रिटर्न देती हैं कुछ को खरीदने के बाद घाटा झेलना पड़ता है ,अब दूसरा इंट्राडे में एक दिन में ट्रेडिंग होती है इसमें एक दिन में लाभ हानि होती है कुछ ट्रेडर खरीददार को कुछ शेयर में पांच गुणा या चार गुणा या फ़िर कुछ शेयर में दो गुणा तक लीवरेज देते है पर उसमें ज़्यादा लाभ लेने के लिए खुद के पास भी अधिक पूंजी हो तब लाभ मिलेगा और घाटा भी बहुत अधिक हो सकता है तीसरा प्लेटफॉर्म ऑप्शन ट्रेडिंग का है जहां कम पूंजी में अधिक लाभ मिल सकता है यदि आप कुछ जानते हो ऑप्शन ट्रेडिंग के बारे में क्योंकि ये किसी कंपनी के अंदर आपको शेयरधारक नहीं बनाता बल्कि एक अनुमान के आधारित पर उसमें आप प्रीमियम के आधार पर खरीद फरोख्त कर सकते हो। अब इसे आगे जानने की कोशिश करेंगे।
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1. क्या है ऑप्शन ट्रेडिंग? (बुनियादी समझ)
कल्पना कीजिए कि आप एक जमीन खरीदना चाहते हैं जिसकी कीमत ₹50 लाख है, लेकिन आपको लगता है कि अगले हफ्ते वहां सड़क बनने की घोषणा होगी और दाम बढ़ जाएंगे। आप मालिक को ₹50,000 का 'बयाना' (टोकन मनी) देते हैं कि मैं इसे अगले हफ्ते इसी भाव पर खरीदूँगा। अगर दाम बढ़े, तो फायदा आपका, और अगर नहीं बढ़े, तो सिर्फ बयाना डूबेगा।स्टॉक मार्केट में यही 'बयाना' प्रीमियम है।
- Call (CE): जब आपको उम्मीद हो कि बाजार रॉकेट की तरह ऊपर जाएगा।
- Put (PE): जब आपको लगे कि बाजार में गिरावट की आंधी आने वाली है।
ऑप्शन ट्रेडिंग: आसान शब्दों में 'बयाने' का खेल
जैसा कि कहा गया है , स्टॉक मार्केट में आप पूरी जमीन (पूरे शेयर) नहीं खरीदते, बल्कि सिर्फ एक हक (Right) बयाना या टोकन मनी देते हैं या खरीदते हैं। अब हम आगे कॉल ऑप्शन और पुट ऑप्शन को अच्छे से समझने के लिए थोड़ा विस्तार से पढ़ते हैं जानने की कोशिश करते हैं।
1. कॉल ऑप्शन (Call Option - CE)
सोच: कॉल ऑप्शन इस अनुमान पर खरीदा जाता है कि आगे शेयर बाज़ार बढ़ेगा या कोई शेयर की "कीमत बढ़ेगी!"
- उदाहरण: मान लीजिए रिलायंस का शेयर अभी ₹3000 का है। आपको लगता है कि अगले हफ्ते कोई बड़ी खबर आएगी और यह ₹3200 का हो जाएगा।
- सौदा: आप ₹50 का 'बयाना' (प्रीमियम) देकर एक कॉन्ट्रैक्ट करते हैं कि आप इसे ₹3000 में ही खरीदेंगे।
- फायदा: अगर भाव ₹3200 हो गया, तो भी आपको वह ₹3000 में ही मिलेगा। यानी ₹200 का फायदा, जिसमें से ₹50 प्रीमियम घटा दें तो ₹150 का शुद्ध मुनाफा।
- नुकसान: अगर भाव नहीं बढ़ा या गिर गया, तो आप सौदा कैंसिल कर देंगे। आपका नुकसान सिर्फ वह ₹50 का 'बयाना' होगा।
2. पुट ऑप्शन (Put Option - PE)
सोच: पुट ऑप्शन को इस आधार पर खरीदा जाता है कि आगे शेयर बाज़ार गिरेगा या किसी शेयर की कीमत कम होगी या "कीमत गिरेगी!"
- उदाहरण: आपको लगता है कि किसी कंपनी का बुरा वक्त आने वाला है और उसका शेयर ₹1000 से गिरकर ₹800 पर आ जाएगा।
- सौदा: यहाँ आप 'बयाना' देते हैं यह हक पाने के लिए कि आप शेयर को ₹1000 (महंगे दाम) पर बेच सकें।
- फायदा: अगर दाम ₹800 गिर गया, तब भी आप मार्केट से सस्ता खरीदकर पुराने कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से ₹1000 में बेच पाएंगे।
- नुकसान: अगर दाम गिरना तो दूर, उल्टा बढ़ गया, तो आप अपना हक छोड़ देंगे और सिर्फ आपका प्रीमियम डूबेगा।
2. स्ट्राइक प्राइस का चुनाव: कहाँ दांव लगाएं?
बाजार में तीन तरह के खिलाड़ी होते हैं, जो अपनी रिस्क क्षमता के अनुसार 'स्ट्राइक प्राइस' चुनते हैं:
- ATM (At-the-Money): जहां बाजार अभी खड़ा है। यह सबसे संतुलित रास्ता है।
1. ATM का सरल मतलब क्या है?
जब किसी स्टॉक या इंडेक्स (जैसे Nifty या Bank Nifty) की मौजूदा कीमत (Current Market Price - CMP) और उसके स्ट्राइक प्राइस (Strike Price) लगभग बराबर होते हैं, तो उसे ATM कहा जाता है।
उदाहरण: मान लीजिए Nifty अभी 22,410 पर ट्रेड कर रहा है। तो 22,400 या 22,450 के स्ट्राइक प्राइस को 'ATM' माना जाएगा क्योंकि बाजार अभी बिल्कुल वहीं खड़ा है।
2. एक नौसिखिया ट्रेडर के लिए यह "संतुलित" क्यों है?
ATM को सबसे संतुलित रास्ता इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें जोखिम और रिवॉर्ड के बीच एक बारीक तालमेल होता है:
- डेल्टा (Delta) लगभग 0.50: इसका तकनीकी मतलब यह है कि अगर बाजार 100 पॉइंट हिलता है, तो आपके प्रीमियम की कीमत लगभग 50 पॉइंट बढ़ेगी या घटेगी। यह ITM (In-the-Money) जितना महंगा नहीं होता और OTM (Out-of-the-Money) जितना सुस्त नहीं।
- सबसे ज्यादा लिक्विडिटी: सबसे ज्यादा खरीद-फरोख्त (Buying/Selling) इसी पॉइंट पर होती है। यानी आप जब चाहें अपनी ट्रेड से बाहर निकल सकते हैं, आपको खरीदार या विक्रेता तुरंत मिल जाएंगे। जबकि इन द मनी और आउट द मनी में इतनी ज़्यादा ख़रीद फ़रोख्त नहीं होने के कारण लिक्विडिटी बहुत कम होती है।
- टाइम वैल्यू (Time Value): ATM ऑप्शन में 'Intrinsic Value' (वास्तविक मूल्य) जीरो होती है, इसमें सिर्फ 'Extrinsic Value' (समय की वैल्यू) होती है।
3. ATM ट्रेड करने के फायदे और नुकसान
फायदे (Pros)
नुकसान (Cons)
तेजी से रिस्पॉन्स: बाजार की थोड़ी सी हलचल पर प्रीमियम में तुरंत बदलाव दिखता है।
तेजी से गिरावट (Theta Decay): अगर बाजार एक ही जगह खड़ा रह गया, तो समय बीतने के साथ इसका प्रीमियम बहुत जल्दी घटता है।
सस्ता सौदा: ITM के मुकाबले यह कम बजट में मिल जाता है।
अनिश्चितता: यह "मेक और ब्रेक" लेवल है। बाजार जरा सा गिरा तो यह OTM बन जाएगा और बढ़ा तो ITM।
- ITM (In-the-Money): यह महंगा है लेकिन भरोसेमंद है। इसमें 'समय की गिरावट' (Time Decay) का डर कम होता है।
- OTM (Out-of-the-Money): यह सबसे सस्ता और खतरनाक है। इसे 'लॉटरी टिकट' समझें; 90% मामलों में यह शून्य हो जाता है।
4. नौसिखिया ट्रेडर के लिए प्रो-टिप
यदि आप अभी शुरुआत कर रहे हैं, तो ATM आपके लिए सबसे अच्छा 'लर्निंग ग्राउंड' है।
- OTM के लालच से बचें: अक्सर नए ट्रेडर्स बहुत दूर का (सस्ता) स्ट्राइक प्राइस ले लेते हैं (OTM), जिसके जीरो होने के चांस 90% होते हैं। ATM महंगा जरूर लग सकता है, लेकिन इसके जीतने की संभावना (Probability of Profit) उससे कहीं ज्यादा होती है।
- डायरेक्शनल ट्रेड: अगर आपको लगता है कि मार्केट यहां से 50-100 पॉइंट ऊपर जाएगा, तो सीधा ATM कॉल खरीदें। यह आपको सबसे सटीक मुनाफा देगा।
- नुकसान का डर: इंडेक्स (Nifty) में उतार-चढ़ाव धीरे होता है, लेकिन व्यक्तिगत शेयरों में कोई बुरी खबर आते ही शेयर 10-15% गिर सकता है, जिससे आपका प्रीमियम पलक झपकते ही खत्म हो सकता है। साथ ही, इनमें 'लिक्विडिटी' कम होती है, यानी कभी-कभी आप बेचना चाहें तो खरीदार ही नहीं मिलता। क्योंकि शेयर बाज़ार खरीददार और बेचने वालों के संतुलन पर ही निर्भर करता है।
- ऑप्शन ट्रेडिंग: यहाँ आप सिर्फ 'अधिकार' खरीदते हैं। अगर बाजार आपके खिलाफ गया, तो आपका नुकसान सिर्फ आपके द्वारा दिए गए 'प्रीमियम' तक सीमित है।
- फ्यूचर ट्रेडिंग (Future): यह एक 'बाध्यता' (Obligation) है। इसमें प्रीमियम नहीं, बल्कि भारी-भरकम 'मार्जिन मनी' लगती है। अगर बाजार उल्टा चला, तो नुकसान की कोई सीमा नहीं होती। फ्यूचर में समय की गिरावट (Theta) का डर नहीं होता, लेकिन रिस्क बहुत ज्यादा होता है।
- Intraday: आज खरीदा, आज ही बेचा। यह सुरक्षित है क्योंकि आप रात की खबरों के तनाव से मुक्त रहते हैं।
- STBT/BTST (अगले दिन के लिए): यदि आप ट्रेड को अगले दिन ले जाते हैं, तो 'Time Decay' (Theta) नाम का दुश्मन आपके प्रीमियम को कुतरने लगता है। बाजार अगर स्थिर भी रहा, तो भी सुबह आपके ऑप्शन की कीमत कम मिलेगी।
- नियम: अपनी कुल पूंजी का केवल 5% ही एक ट्रेड में लगाएं।
- कितना SL लगाएं? हमेशा अपने प्रीमियम का 10% से 15% स्टॉप लॉस सेट करें। अगर ₹100 पर खरीदा है, तो ₹85 पर बाहर निकल जाएं। जिद्दी न बनें, बाजार आपसे बड़ा है।
- फायदे: इस दिन प्रीमियम बहुत कम (सस्ते) होते हैं, जिससे कम पैसों में बड़ी मात्रा (Lot) खरीदी जा सकती है और 'हीरो या जीरो' ट्रेड की संभावना बनती है।
- नुकसान: 'टाइम डिके' (Theta Decay) बहुत तेज़ होता है, जिससे अगर बाजार आपकी दिशा में तुरंत नहीं बढ़ा, तो आपके प्रीमियम की वैल्यू तेजी से शून्य हो सकती है।
- अपना सेटअप बनाइए: दूसरे की टिप पर नहीं, अपनी रिसर्च पर भरोसा करें।
- नुकसान को स्वीकार करना सीखें: छोटा घाटा लेकर निकल जाना ही असल समझदारी है।
- कम ट्रेड करें: दिन में एक या दो अच्छे ट्रेड, दस खराब ट्रेडों से कहीं बेहतर हैं।
- ओवर-ट्रेडिंग: एक घाटा पूरा करने के चक्कर में दस और ट्रेड लेना।
- रिवेंज ट्रेडिंग: बाजार से बदला लेने की कोशिश करना।
- टिप्स पर निर्भरता: टेलीग्राम या यूट्यूब के 'गुरुओं' के चक्कर में पड़ना।
प्रारंभ में मैं डरते हुए स्टॉक प्राइस के थोड़ा बहुत जानकारी के बाद एट द मनी के बारे में जाना फिर ऑप्शन की बॉय किया ,तो कुछ रुपया लगाकर सिर्फ एक लॉट निफ्टी में खरीदा वो भी इंट्राडे में और मैने स्टॉपलॉस भी लगाया तो मुझे एक हजार रुपया का फायदा मिला क्योंकि उस दिन शेयर बाजार के थोड़ा सा बढ़ने की उम्मीद मैने की थी और शेयर बाजार बढ़ा भी तो मुझे सीधा फायदा मिला।
3. स्टॉक ऑप्शंस: इंडेक्स से इतर कंपनियों में ट्रेडिंग
सिर्फ निफ्टी या बैंक निफ्टी ही नहीं, आप HDFC Bank, ICICI Bank या सरकारी PSU (जैसे SBI, ONGC, नवरत्न कंपनियां) के शेयरों में भी ऑप्शन ट्रेडिंग कर सकते हैं।
खरीद-फरोख्त का सिस्टम:
स्टॉक ऑप्शंस में 'लॉट साइज' बहुत बड़े होते हैं। जैसे निफ्टी का लॉट 25 का है, वैसे ही किसी शेयर का लॉट 1000 या 2000 शेयरों का हो सकता है।
4. ऑप्शन ट्रेडिंग बनाम फ्यूचर ट्रेडिंग: क्या है अंतर?
अक्सर लोग इन दोनों में भ्रमित हो जाते हैं। क्योंकि जब लोग एफ. एंड ओ. कहते
5. इंट्राडे बनाम होल्डिंग: समय का चक्र
6. रिस्क मैनेजमेंट और स्टॉप लॉस (SL)
ऑप्शन ट्रेडिंग में बिना हेलमेट (Stop Loss) के गाड़ी चलाना आत्महत्या जैसा है।
ऑप्शन ट्रेडिंग में बिना स्टॉप लॉस के उतरना किसी ऊँची इमारत से बिना पैराशूट के कूदने जैसा है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं—मान लीजिए आप समुद्र की लहरों के बीच नाव चला रहे हैं, तो स्टॉप लॉस वह लंगर (Anchor) है जो तूफ़ान आने पर आपकी नाव को पूरी तरह बहने से बचाता है।
बाज़ार में अक्सर हम अपनी 'ईगो' या ज़िद को बीच में ले आते हैं; हमें लगता है कि अगर प्रीमियम ₹100 से गिरकर ₹90 हो गया है, तो यह वापस ज़रूर ऊपर जाएगा। लेकिन ऑप्शंस की दुनिया में 'समय की वैल्यू' (Theta Decay) एक ऐसी दीमक है जो आपके प्रीमियम को धीरे-धीरे चाटती रहती है। एक समझदार ट्रेडर वह नहीं है जो हर बार सही साबित हो, बल्कि वह है जो गलत होने पर सबसे कम नुकसान लेकर मैदान से बाहर निकल जाए ताकि वह अगले दिन फिर से लड़ सके। जब आप ₹100 के प्रीमियम पर ₹15 का स्टॉप लॉस लगाते हैं, तो आप दरअसल बाज़ार को यह कह रहे होते हैं कि "मैने अपनी हार स्वीकार कर ली है, पर मेरे पास अभी भी ₹85 सुरक्षित हैं जिनसे मैं अगली चाल चलूँगा।" याद रखिए, शेयर बाज़ार में पैसा कमाने से ज़्यादा ज़रूरी है 'कैपिटल को बचाए रखना'। अगर आपकी जेब में पैसा ही नहीं बचेगा, तो बाज़ार में मिलने वाले सुनहरे मौके आपके किसी काम के नहीं रहेंगे। इसलिए, स्टॉप लॉस को एक खर्चे या नुकसान की तरह न देखें, बल्कि इसे एक 'इंश्योरेंस प्रीमियम' की तरह समझें जो आपके ट्रेडिंग करियर को लंबी उम्र देता है। बाज़ार कभी किसी का सगा नहीं होता, वह केवल अनुशासन का सम्मान करता है, और स्टॉप लॉस ही उस अनुशासन की पहली सीढ़ी है।
7. 90% लोग फेल क्यों होते हैं? (कड़वा सच)
सेबी के मुताबिक, अधिकतर लोग यहाँ पैसा गंवाते हैं। कारण?
देखिये भाई, शेयर बाजार की जो ये 90% वाली हकीकत है न, ये सुनने में जितनी कड़वी है, पचाने में उससे कहीं ज्यादा मुश्किल। लोग इसे 'अमीर बनने की मशीन' समझकर आते हैं, लेकिन बिना तैयारी के ये 'पैसे गवाने की मशीन' बन जाती है। SEBI का डेटा साफ कहता है कि 10 में से 9 लोग यहाँ अपना हाथ जला बैठते हैं।
अगर हम गहराई में जाकर देखें कि आखिर ऐसा होता क्यों है, तो इसके पीछे गणित कम और इंसान का अपना स्वभाव (Psychology) ज्यादा जिम्मेदार है। चलिए, इसे विस्तार से समझते हैं:
1. ओवर-ट्रेडिंग: जब दिमाग नहीं, उंगलियां चलती हैं
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि जितना ज्यादा ट्रेड करेंगे, उतना ज्यादा पैसा बनेगा। जबकि सच इसके बिल्कुल उलट है। होता क्या है? सुबह एक छोटा सा घाटा हुआ, उसे रिकवर करने के लिए आपने दूसरा ट्रेड लिया। उसमें भी घाटा हुआ, तो उसे कवर करने के लिए तीसरा।
शाम होते-होते आप 20 ट्रेड ले चुके होते हैं। मुनाफा तो छोड़िए, जो ब्रोकरेज और टैक्स आप भरते हैं, वो आपके बचे-खुचे कैपिटल को भी साफ कर देता है। ये ट्रेडिंग नहीं, एक तरह का नशा बन जाता है जहाँ इंसान को बस 'स्क्रीन' पर कुछ न कुछ करते रहना होता है।
2. रिवेंज ट्रेडिंग: बाजार से 'बदला' लेने की जिद
ये सबसे खतरनाक मोड़ है। जब किसी का नुकसान होता है, तो उसका ईगो (अहंकार) चोटिल हो जाता है। वो सोचने लगता है, "बाजार ने मेरे पैसे कैसे छीन लिए? मैं अभी इसे वापस लेकर दिखाऊंगा।"
यहीं से शुरू होती है 'रिवेंज ट्रेडिंग'। आप मार्केट से लड़ने लगते हैं। आप भूल जाते हैं कि बाजार आपसे बहुत बड़ा है। गुस्से में लिया गया हर फैसला गलत होता है क्योंकि तब आप चार्ट नहीं देख रहे होते, बल्कि अपनी हताशा निकाल रहे होते हैं। बाजार को आपसे कोई दुश्मनी नहीं है, वो तो अपनी चाल चलेगा ही, लेकिन आपकी जिद आपको ले डूबती है।
3. टिप्स पर निर्भरता: दूसरों के कंधों पर बंदूक चलाना
आजकल टेलीग्राम और यूट्यूब पर 'गुरुओं' की बाढ़ आई हुई है। लोग अपनी मेहनत की कमाई उन लोगों के कहने पर लगा देते हैं जिन्हें वे जानते तक नहीं।
सोचिए, अगर किसी के पास वाकई पैसा बनाने का कोई जादुई मंत्र होता, तो क्या वो उसे ₹500 के टेलीग्राम ग्रुप में बेच रहा होता? कभी नहीं। टिप्स पर काम करने का मतलब है कि आपके पास 'एंट्री' का सिग्नल तो है, लेकिन 'एग्जिट' का कोई प्लान नहीं। जब तक वो गुरु आपको निकलने को कहेगा, तब तक आप लुट चुके होंगे। बिना सीखे ट्रेड करना वैसा ही है जैसे बिना तैरना सीखे समंदर के बीचों-बीच कूद जाना।
4. अनुशासन की कमी और लालच
लोग यहाँ 'रातों-रात करोड़पति' बनने का सपना लेकर आते हैं। वे भूल जाते हैं कि ट्रेडिंग एक बिजनेस है, जुआ नहीं। यहाँ 2% का स्टॉप लॉस (Stop Loss) लगाने में लोगों को दर्द होता है, लेकिन 50% कैपिटल गवाने तक वो उम्मीद में बैठे रहते हैं कि "अब मार्केट ऊपर आएगा।" ये उम्मीद ही ट्रेडिंग की सबसे बड़ी दुश्मन है।
क्या निफ़्टी एक्सपायरी के दिन ऑप्शन ट्रेडिंग करना चाहिए?
एक्सपायरी के दिन ट्रेडिंग करना पूरी तरह आपके जोखिम सहने की क्षमता पर निर्भर करता है। इसके फायदे और नुकसान दोनों नीचे दिए गए हैं:
यदि आप नए ट्रेडर हैं, तो भारी उतार-चढ़ाव के कारण एक्सपायरी से बचना बेहतर है। क्या आप एक्सपायरी के लिए कोई विशेष स्ट्रेटेजी सीखना चाहेंगे?
कड़वा सच यही है कि दोस्त अगर आपको
उन 10% लोगों में आना है जो पैसा कमाते हैं, तो सबसे पहले अपनी आदतों को बदलना होगा।
याद रखिये, बाज़ार कहीं नहीं जा रहा, वो कल भी खुलेगा। लेकिन अगर आपने आज सारा पैसा खत्म कर दिया, तो कल बाजी खेलने के लिए आप यहाँ नहीं होंगे।
Option Trading में अनुशासन अति आवश्यक है बिना धैर्य अनुशासन के यदि ट्रेडिंग करते हो तो बहुत ज्यादा घाटा सहना पड़ सकता है , ऑप्शन ट्रेडिंग में स्टॉपलॉस रखना अति आवश्यक है और एक निश्चित टार्गेट स्ट्राइक होने से आपको मालूम रहता है कि इस जगह मुझे अधिकतम लाभ मिल सकता है ऑप्शन ट्रेडिंग में समय का बहुत ज़्यादा मूल्य है।जब मैने पहली बार ऑप्शन में खरीददारी की तो बहुत ही डर लग रहा था दिल की धड़कन असमान्य थी परंतु मैने स्टॉप लॉस को बहुत नजदीक लगाया था क्योंकि रिस्क बहुत ही कम ले सकता था पर लाभ अर्जित करना चाहता था , स्टॉप लॉस नहीं लगाने पर बहुत ही ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता था, ऑप्शन ट्रेडिंग एक जुआ नहीं पर आप कुछ बेसिक जानकारी के साथ खेलते हो तो फ़ायदा है क्योंकि ये भी एक अनुमान पर आधारित है ।

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