टेम्पो ड्राइवर से शंख एयरलाइंस के मालिक बने श्रवण कुमार विश्वकर्मा की प्रेरक कहानी

 ये कहानी है ऐसे बंदे की जिसको बचपन से ग़रीबी से दो चार होना पड़ा पर हर पड़ाव में हार नहीं मानी उसने अपनी जिद और संघर्ष रिस्क लेने की आदत से आकाश को भी जमीन में रहकर नाप दिया ये व्यक्ति का नाम है श्रवण कुमार विश्वकर्मा,श्रवण कुमार विश्वकर्मा ने बचपन से ही गरीबी झेली उनका बचपन से पढ़ने में भी मन नहीं लगा ,पर वह हर हाल में कुछ करना चाहते थे गरीबी के थपेड़े ने तपाकर उन्हें खरा सोना बना दिया वह दिन रात संघर्ष करते थे दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष किया  । उन्होंने कोई MBA किए बिना ही MBA में पढ़ाई जाने वाले  सारे फैक्ट  को काम करके  सीख लिया ,वह हर धंधे में जो हाथ आजमाया उसमे उस व्यापार के चैन सप्लाई कस्टमर डीलिंग

टेम्पो ड्राइवर से शंख एयरलाइंस के मालिक बने श्रवण कुमार विश्वकर्मा की प्रेरक कहानी

 से लेकर उसके सबसे बड़े व्यापार विस्तार के खोजा यानी व्यापार के टॉप से बॉटम को काम करते हुए सीखा।
श्रवण कुमार विश्वकर्मा का  पैतृक घर उन्नाव के कलेक्टरगंज फाटक के पास था,वहीं पास में इनके चाचा थे उनका टेंट का व्यवसाय था ,उन्होंने चाचा के साथ रहकर टेंट के व्यापार की बारीकियां  सीखें उस समय इनकी उम्र महज चौदह साल की थी धीरे  उनके साथ जुड़कर अपना एक लोडर लिया जिसमें टेंट का समान लाया ले  जाया जाता था। बाद में चाचा से अलग खुद  आत्मनिर्भरता के लिए  दूसरे के ऑटो और टेंपो लेकर सवारियां ढोई , लोडर चलाया , मजदूरी की  अपना खुद का टेंट व्यवसाय  उन्नाव में  किया उसमें खास मुनाफा नहीं हुआ इसी तरह कई धंधों में अपना हाथ आजमाया पर सफलता हांथ नहीं मिली ,परंतु इस जीवट बंदे ने हार नहीं मानी और कहा कि लोहार का हाथ है  मेहनत से अपने ही हाथ से सरिया भी मोड़ देता है। अब क्या था उनके दिमाग में सीमेंट सरिया का व्यापार एंट्री कर गया उन्होंने इस व्यापार के कायदे नियम जाने इसमें कुछ दिन दूसरे सेठ के साथ असिस्टेंट के रूप में काम किया पर उद्देश्य नौकरी नहीं बल्कि व्यापार करना था एक एक बारीकी जान लेने के बाद  अपने टेम्पो और  रिक्शा को बेचकर  जो पैसा मिला    उसको प्रापर्टी डीलर के साथ मिलकर प्लॉट बिकवाने में लगाया,अब इस प्लाटिंग के काम से जो फ़ायदा हुआ उसे उससे वह सीमेंट सरिया के  धंधे ने कूद गए।श्रवण कुमार विश्वकर्मा का मूल निवास उन्नाव का चांदपुर गजौली गांव था, लेकिन उनका बचपन और संघर्ष कानपुर व उन्नाव दोनों जगह बीता। उन्होंने हमेशा यह माना कि "बिजनेस पैसों से नहीं, बल्कि सही विजन और जोखिम लेने की हिम्मत से खड़ा होता है।" उनका कहना था कि टेंपो चलाने के अनुभव ने ही उन्हें ग्राहकों को आकर्षित करने और जमीनी स्तर पर सेवा देने की बारीकियां सिखाईं।,2

​उन्नाव और लखनऊ के सफर तथा उनके बिजनेस की पूरी कहानी इस प्रकार है:

​लखनऊ का सफर और नया बिजनेस

  • कानपुर से ट्रांसपोर्ट का विस्तार (2017): कानपुर आने के बाद 2017 में उन्होंने ट्रांसपोर्ट और माइनिंग (खनन) के क्षेत्र में कदम रखा। दिन-रात की मेहनत से उन्होंने 400 से ज्यादा ट्रकों और डंपरों का एक बड़ा बेड़ा खड़ा कर लिया।
  • लखनऊ कैसे पहुंचे: ट्रांसपोर्ट, कंस्ट्रक्शन और माइनिंग सेक्टर में बड़ी सफलता और पर्याप्त पूंजी (Capital) कमाने के बाद वे अपने काम को बड़े स्तर पर ले जाने के लिए लखनऊ शिफ्ट हो गए। वर्तमान में वे लखनऊ के गोमती नगर में रहते हैं।
  • लखनऊ में नया बिजनेस: लखनऊ में उन्होंने खुद की एविएशन कंपनी 'शंख एयरलाइन' (Shankh Air) का मुख्यालय बनाया। नागरिक उड्डयन मंत्रालय से एनओसी (NOC) मिलने के बाद, यह उत्तर प्रदेश की पहली घरेलू फुल-सर्विस एयरलाइन बन गई है, जो लखनऊ से दिल्ली जैसी जगहों के लिए उड़ानें संचालित करने की तैयारी में है।

​एक समय टेंपो और लोडर चलाने वाले श्रवण कुमार विश्वकर्मा ने अपनी सूझबूझ, सीमेंट-सरिया के व्यापार, और फिर ट्रांसपोर्ट व माइनिंग से कमाए पैसे के दम पर आज खुद की एयरलाइन कंपनी खड़ी कर ली है।

​2. सीमेंट, सरिया और लॉजिस्टिक्स में एंट्री

​उनका पहला बड़ा व्यावसायिक ब्रेक साल 2014 में आया जब उन्होंने सीमेंट और स्टील (सरिया) के व्यापार में हाथ आजमाया।  उन्नाव में साल 2016 तक रहे। 2016 में नोटबंदी के बाद वे अपने माता-पिता के साथ कानपुर के लाटूश रोड शिफ्ट हो गए। आपको जानकारी हो कि कानपुर का लाटूश रोड  एरिया सीमेंट के काम का ,सभी प्रकार की मशीनरी की बहुत बड़ी मंडी है।अब जब सीमेंट की एजेंसी ले ली। उनको टेम्पो टैक्सी के व्यापार से और घर की बचत की हुई पूंजी को दुकान के रजिस्ट्रेशन ,सिक्योरिटी डिपॉजिट में लगा दिया,उन्होंने बड़ी दुकान खोजने के बजाए छोटे से डिपो से शुरुआत की ,वह क्रेडिट में व्यापार किया जितना दिन भर में सीमेंट बेचते थे व्यापारिक मुनाफा के बाद शाम को डीलर्स को दे दिया जिससे उनकी साख बाजार में बनती चली गई।क्रेडिट (उधारी) और विश्वास का चक्र: सीमेंट और सरिया के बिजनेस में सबसे बड़ी टेक्निक 'मार्केट क्रेडिट' (बाजार की साख) होती है। उन्होंने शुरुआत में कंपनियों या बड़े डीलरों से बहुत छोटे स्तर पर माल 'क्रेडिट' यानी उधारी पर उठाना शुरू किया। दिनभर में जो माल बिकता, उसका पैसा वे तुरंत डीलर को चुकाते थे। इस ईमानदारी से कंपनियों और बड़े सप्लायर्स का उन पर भरोसा बढ़ गया और उन्हें बिना ज्यादा एडवांस पैसे के बड़ा स्टॉक मिलने लगा। निर्माण सामग्री के  काम में उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती चली गई ,परंतु बार बार मॉल जब मांगना पड़ता था तो बाहरी ट्रांसपोर्ट के ट्रकों पर ही निर्भर रहना पड़ता था जिससे  सीमेंट के लाने ले जाने में समस्या आने लगी ,

तो उन्होंने  सोचा कि क्या हम अपने खुद के ट्रैक से मॉल की सप्लाई न करें इस idea के दिमाग में आते ही उन्होंने पहले एक ट्रक खरीदा फिर दूसरा खरीदा और ट्रक को अंबार लगा दिया उनका खुद का अपना ट्रांसपोर्ट बिजनेस खड़ा हो गया। खुद का परिवहन लॉजिस्टिक साम्राज्य खड़ा किया।

सीमेंट और सरिया के बिजनेस में 'लॉजिस्टिक्स' (यानी माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना) सबसे बड़ा खर्च और सबसे बड़ी सिरदर्दी होता है। श्रवण कुमार ने यहीं पर अपनी सबसे बड़ी टेक्निक लगाई:

  • भाड़े के खर्च को निवेश में बदला: शुरुआत में वे दूसरों के ट्रकों और लोडर से माल भिजवाते थे, जिसका भारी भाड़ा देना पड़ता था। उन्होंने देखा कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा तो ट्रांसपोर्टर ले जा रहे हैं।
  • फाइनेंस और बैंक लोन (Hypothecation): जब उनका सीमेंट-सरिया का टर्नओवर (बिक्री) अच्छा हो गया, तो बैंकों और फाइनेंस कंपनियों (जैसे श्रीराम ट्रांसपोर्ट फाइनेंस या चोलामंडलम आदि) ने उनके बिजनेस की बैलेंस शीट देखकर आसानी से कम डाउनपेमेंट पर पहला ट्रक फाइनेंस कर दिया।
  • एक ट्रक से दूसरा ट्रक (Self-Sustaining Model): पहले ट्रक ने जो भाड़ा बचाया और जो कमाई की, उसी के मुनाफे से उन्होंने दूसरे ट्रक की डाउनपेमेंट निकाली। इस तरह एक के बाद एक ट्रक उनके बेड़े में जुड़ते गए। चूंकि वे खुद पहले टेम्पो और लोडर चला चुके थे, इसलिए उन्हें गाड़ियों की मेंटेनेंस, माइलेज और रूट की पूरी जमीनी जानकारी थी, जिसका उन्हें भरपूर फायदा मिला।

​4.  भाई इतने बड़े ट्रकों के बेड़े को कैसे संभाला ,ट्रकों के पूरे कमांड (सिस्टम) को कैसे संभाला?

​जैसे-जैसे उनके पास गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी, उन्होंने इसे संभालने के लिए कुछ खास तरीके अपनाए:

  • ड्राइवरों के साथ सीधा जुड़ाव: वे खुद जमीन से उठे थे, इसलिए ड्राइवरों की समस्याओं (जैसे पुलिस की परेशानी, रास्तों के खर्चे, डीजल चोरी) को अच्छे से समझते थे। उन्होंने ड्राइवरों के लिए एक पारदर्शी सिस्टम और इंसेंटिव (ज्यादा चक्कर लगाने पर अतिरिक्त पैसे) तय किए।
  • रूट ऑप्टिमाइजेशन: उनके ट्रक कभी खाली नहीं चलते थे। जब ट्रक सीमेंट या सरिया लेने फैक्ट्री जाता, तो कंपनी का माल लाता; और जब वहां से लौटता, तो किसी और पार्टी का लोकल माल या माइनिंग (गिट्टी/बालू) लोड करके आता था। इससे ट्रकों की रनिंग कॉस्ट आधी हो गई।

​5.  अब आप शायद ये सोच रहे होंगे कि जब ट्रक के धंधे में कूद गए तो सीमेंट वाका व्यवसाय  बंद कर दिया होगा तो उत्तर होगा नहीं  उन्होंने दोनों धंधे साथ में चलने दिया।

​ट्रकों का बिजनेस आने से उनका सीमेंट-सरिया का धंधा और ज्यादा बड़ा हो गया, क्योंकि अब वे अपने खुद के ट्रकों की मदद से बहुत ही कम लागत में और बहुत तेजी से ग्राहकों तक माल पहुंचाने लगे। इसी का नतीजा था कि साल 2022 में उन्होंने इन दोनों कामों को मिलाकर 'शंख एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड' बनाई, जो आज भी कंस्ट्रक्शन मटेरियल की थोक ट्रेडिंग और बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक्स/ट्रांसपोर्टेशन का काम एक साथ करती है। इसी कंबाइंड बिजनेस के मुनाफे ने उन्हें बाद में एयरलाइन सेक्टर में उतरने का हौसला दिया।

​3. एक ट्रक से 400 ट्रक का सफर: क्या थी तकनीक?

​उन्होंने 'शंख एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड' के बैनर तले अपना खुद का ट्रांसपोर्ट नेटवर्क बनाना शुरू किया। शुरुआत सिर्फ एक ट्रक से हुई थी, जो आगे चलकर 400 से अधिक ट्रकों के विशाल बेड़े में बदल गया। जब चार सौ ट्रक काफिले  में सम्मिलित थे ही तब  श्रवण कुमार विश्वकर्मा  जी  ने हमीरपुर के यमुना बेतवा की बालू खनन  में खुद प्रवेश किया श्रवण कुमार विश्वकर्मा के पास खुद के माइनिंग पट्टे (खनन खदानें) थे। उन्होंने सिर्फ दूसरों की मोरंग ढोने के लिए ट्रक नहीं चलाए, बल्कि खनन के कारोबार में वह सीधे पट्टेदार (माइनर) के तौर पर उतरे थे।

  • खुद की खदानें और पट्टे: उन्होंने हमीरपुर और बुंदेलखंड के अन्य खनन क्षेत्रों में सरकारी टेंडर के जरिए मोरंग और बालू के खनन पट्टे अपने नाम पर लिए थे।
  • बिजनेस मॉडल: खनन के पट्टे होने के कारण मोरंग सीधे उनकी अपनी खदानों से निकलती थी, जिसे उनके 450 से अधिक ट्रकों का विशाल बेड़ा सीधे कानपुर, लखनऊ और उन्नाव जैसे शहरों के बड़े बाजारों तक सप्लाई करता था।

​इसी खनन (माइनिंग) और बड़े पैमाने पर किए गए ट्रांसपोर्टेशन के सीधे कंट्रोल ने उन्हें इतना बड़ा मुनाफा दिया, जिससे उन्होंने 'शंख एयरलाइंस' की शुरुआत की।

पीछे की मुख्य तकनीकें और रणनीतियां ये थीं:

  • कैप्टिव डिमांड (Captive Demand): उनके पास सीमेंट, सरिया और माइनिंग (खनन) का अपना खुद का बड़ा कारोबार था। इसलिए उनके ट्रकों को कभी भी फेरे (trips) के लिए इंतजार नहीं करना पड़ता था। माल उनका खुद का था और गाड़ियां भी खुद कीं, जिससे लागत बेहद कम हो गई।
  • रिवर्स लॉजिस्टिक्स (Backhauling): जब एक ट्रक सीमेंट छोड़कर वापस आता था, तो वह खाली नहीं आता था। वे उसमें माइनिंग का माल या कंक्रीट लोड करवाते थे। इस 'नो-एम्प्टी-रिटर्न' पॉलिसी से उनका मुनाफा दोगुना हो गया।
  • नेटवर्किंग और गारन्टी सिस्टम: उन्होंने बड़े उद्योगों और स्थानीय परिवहन ऑपरेटरों के साथ मजबूत गठजोड़ किया और मुनाफे को लगातार री-इन्वेस्ट (पुनः निवेश) कर नए ट्रक फाइनेंस कराए।

​4. एविएशन क्षेत्र में अचानक कदम और सफलता

​लॉजिस्टिक्स और माइनिंग में मजबूत कैश फ्लो (नकद प्रवाह) बनाने के बाद श्रवण कुमार ने कुछ बड़ा करने की सोची।

  • हवाई चप्पल से हवाई जहाज: उनका विजन था कि वे आम लोगों (हवाई चप्पल पहनने वालों) को भी किफायती हवाई सफर कराएंगे।
  • कैश फ्लो रणनीति: उन्होंने एविएशन सेक्टर को इसलिए चुना क्योंकि इस क्षेत्र में उधारी पर काम नहीं होता। टिकट बुक होते ही पैसा तुरंत मिलता है, जिससे बिजनेस में कैश की कमी नहीं होती।
  • ​उन्होंने लगभग 26 महीने की कड़ी मेहनत और कागजी प्रक्रियाओं के बाद नागरिक उड्डयन मंत्रालय से NOC (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) हासिल किया और शंख एयरलाइंस की स्थापना की। यह एयरलाइन लखनऊ और दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों को जोड़ने के साथ उत्तर प्रदेश के आंतरिक शहरों को जोड़ने के विजन पर काम कर रही है।
जिस क्षेत्र में सहारा और जेट आम बंदे के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाई और और लाइन क्षेत्र में उनको असफलता हाथ लगी उसी क्षेत्र में उनकी असफलता को देखकर श्रवण कुमार विश्वकर्मा ने हाथ आजमाया कि एक गरीब किसान मजदूर भी एक बार जीवन में अपने हवाई चप्पलों से सफर कर पाए उसके लिए हवाई जहाज में उड़ना एक सपना न रहे पर इसके लागत और व्यापारिक अवरोधों को इतना कम किया जाए कि न्यूनतम किराया में एक शहर कानपुर से दूसरे शहर गोरखपुर बनारस अलीगढ़ मेरठ जाने के लिए विकल्प के तौर पर वह हवाई जहाज से जा सके यदि उन्हें इमरजेंसी में जाना है या फिर ट्रेन छूट गई अब क्या करे अब विकल्प के तौर पर बस मिलेगी अभी तो हवाई जहाज में बैठकर बस मिनट में दिल्ली से बनारस आइए शंख एयरलाइन से।

 निष्कर्ष (Conclusion)

​श्रवण कुमार विश्वकर्मा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की गाथा नहीं है, बल्कि यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर आपके भीतर कुछ कर गुजरने की जिद और जीवटता हो, तो डिग्रियों की कमी या तंगहाली आपका रास्ता नहीं रोक सकती। एक आम ऑटो और लोडर चलाने वाले साधारण युवक ने जिस तरह अपनी 'स्ट्रीट स्मार्टनेस', ईमानदारी और सही समय पर सही रिस्क लेने की क्षमता से पहले सीमेंट-सरिया और फिर 400 से अधिक ट्रकों का साम्राज्य खड़ा किया, वह हर उभरते हुए उद्यमी (Entrepreneur) के लिए एक केस स्टडी है।

​आज 'शंख एयरलाइंस' के जरिए हवाई चप्पल पहनने वाले आम नागरिक को आसमान की सैर कराने का उनका यह सपना भारतीय विमानन क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत है। श्रवण कुमार जी का यह सफर साबित करता है कि "लोहार का हाथ अगर मेहनत से सरिया मोड़ सकता है, तो वही फौलादी इरादा आसमान में कामयाबी के नए पंख भी लगा सकता है।"

बिजनेस टेकअवे: बड़ी शुरुआत करने के लिए बड़े पैसे की नहीं, बल्कि बाजार में अपनी साख (Credit) और सही 'लॉजिस्टिक्स मैनेजमेंट' की जरूरत होती है। जैसा कि श्रवण कुमार जी ने कर दिखाया!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) - श्रवण कुमार विश्वकर्मा

​पाठकों के मन में श्रवण कुमार विश्वकर्मा जी के निजी जीवन और उनके सफर को लेकर कई सवाल रहते हैं। आइए, उनके कुछ प्रमुख प्रश्नों के सीधे उत्तर जानते हैं:

प्रश्न: श्रवण कुमार विश्वकर्मा कौन हैं?

उत्तर: श्रवण कुमार विश्वकर्मा एक सफल भारतीय उद्यमी (Entrepreneur) हैं, जो 'शंख एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड' और भारत की नई रीजनल एयरलाइन 'शंख एयर' (Shankh Air) के संस्थापक (Founder) हैं। उन्होंने कानपुर में एक टेम्पो ड्राइवर से अपने करियर की शुरुआत की थी।

प्रश्न: श्रवण कुमार विश्वकर्मा की उम्र कितनी है?

उत्तर: श्रवण कुमार विश्वकर्मा का जन्म 1970 के दशक के मध्य में हुआ था, इस समय (वर्ष 2026 में) उनकी उम्र लगभग 48 से 50 वर्ष के बीच है।

प्रश्न: श्रवण कुमार विश्वकर्मा कितने पढ़े-लिखे हैं?

उत्तर: श्रवण कुमार का बचपन भारी आर्थिक तंगी में बीता और उनका पढ़ाई में बहुत ज्यादा मन नहीं लगता था। उन्होंने कोई डिग्री या MBA नहीं किया है, बल्कि उन्होंने बिजनेस के सारे गुर जमीनी स्तर पर काम करके (स्ट्रीट स्मार्ट तरीके से) सीखे हैं।

प्रश्न: श्रवण कुमार विश्वकर्मा के माता-पिता कौन थे और कहां रहते थे?

उत्तर: वे एक बेहद साधारण और गरीब परिवार से आते हैं। उनका परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के कानपुर/उन्नाव क्षेत्र का रहने वाला है। उनके पिता एक साधारण कारीगर/मजदूर थे, जिन्होंने तंगहाली के दिनों में भी परिवार को संभाला।

प्रश्न: श्रवण कुमार विश्वकर्मा इस समय क्या कर रहे हैं और कहां रहते हैं?

उत्तर: इस समय वे अपनी नई विमानन कंपनी 'शंख एयरलाइंस' के ऑपरेशन्स, रूट्स और विस्तार को संभालने में व्यस्त हैं ताकि आम लोगों को किफायती हवाई सफर दिया जा सके। उनका मुख्य बिजनेस हेडक्वार्टर और निवास कानपुर और लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में है, जबकि एयरलाइन के काम के सिलसिले में वे दिल्ली व मुंबई में भी सक्रिय रहते हैं।

प्रश्न: क्या शंख एयरलाइंस शुरू होने के बाद उन्होंने सीमेंट-सरिया का बिजनेस बंद कर दिया?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। उनका सीमेंट, सरिया, माइनिंग और 400 से अधिक ट्रकों का लॉजिस्टिक्स बिजनेस ('शंख एजेंसीज') आज भी पूरी तरह चालू है। यही बिजनेस उनके पूरे साम्राज्य की रीढ़ है, जिससे मिलने वाले प्रॉफिट (Cash Flow) के दम पर उन्होंने एविएशन सेक्टर में कदम रखा है।

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