केपीएस गिल: KPS Gill।Biography।एक 'सुपरकॉप' की विस्तृत जीवनी

जब मैं शायद दसवीं क्लास का स्टूडेंट था उस समय मैं अखबार में पढ़ता था कि  पंजाब में सिख आतंकी मार रहे है मैं बच्चा था पर इतना पढ़ा था कि गुरु गोविंद सिंह ने हिंदू के हर जाती के वीरों को मिलाकर एक युद्धक सेना तैयार की थी जो  मुस्लिम आक्रांता औरंगजेब से सीधे लिया ले सके ,तब आज कैसे सिख खुद को हिंदू से अलग फोर्स में दिखाई देने लगे ,परंतु मेरा ऐसा सोचना ग़लत था क्योंकि सिख में 95 प्रतिशत बंदे भले ही ड्रेस से अलग लगते हो पर उनसे बड़ा राष्ट्रभक्त  कोई नहीं ,वह आज ही खुद को हिंदू ही मानते हैं ,सिख आतंकवाद वास्तव में पाकिस्तान के सहायता से खड़ा किया गया एक अलगाव वादी आंदोलन था जब पाकिस्तानी सीधे भारत से युद्ध में जीत नहीं पाया तो परोक्ष युद्ध करने लगा ,

 जब आतंकवाद चरम पर था तो एक ऐसे जांबाज सिख जो के पी एस गिल थे उभरे पंजाब के मुख्य चीफ ऑफिसर ,उन्होंने आतंकवाद को जड़ से  उखाड़ फेंका ,अपने टैक्टिक्स और सख्त रवैए से।यद्यपि उन पर मानवाधिकार उल्लंघन के कई मामले लगे पर अंततोगत्वा वो आधार हीन प्रतीत हुए।पंजाब से उग्रवाद को समाप्त करने और वहां शांति बहाल करने में उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के कारण ही उन्हें भारतीय पुलिस इतिहास का एक 'सुपरकॉप' माना जाता है।

आइए इस लेख में के पी एस गिल की मुख्य जीवनी जानने की कोशिश करते है यद्यपि ये महान शख्शियत ने 2017 में अपना शरीर छोड़ दिया।

आज इनके जीवनी को लोग इसलिए भी खोज रहे क्योंकि एक फिल्म सतलज में इन्हें खलनायक के रूप में प्रस्तुत कर दिया जबकि शायद ही इन्होंने किसी निर्दोष को मारा हो ,कहते है कि करीब पच्चीस हजार निर्दोष भी मारे गए आतंकियों के साथ जिन्हें पुलिस ने लावारिश लाश कह कर अंतिम संस्कार कर दिया।यद्यपि इस फिल्म को बैन कर दिया गया है।

केपीएस गिल: एक 'सुपरकॉप' की विस्तृत जीवनी

1. प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

​कंवर पाल सिंह गिल का जन्म 29 दिसंबर 1934 को पंजाब के लुधियाना में एक संभ्रांत सिख परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा शिमला के सेंट एडवर्ड स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर (विभाजन से पहले) और बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्री हासिल की। वे कॉलेज के दिनों से ही एक प्रखर वक्ता और दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति माने जाते थे।

2. भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में प्रवेश और उत्तर-पूर्व का कार्यकाल

​1958 में केपीएस गिल ने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें असम-मेघालय कैडर आवंटित किया गया। अपने करियर के शुरुआती लगभग 28 वर्ष उन्होंने उत्तर-पूर्वी राज्यों में बिताए।

  • असम आंदोलन (1980 के दशक): असम में जब अवैध प्रवासियों के खिलाफ हिंसक आंदोलन भड़का, तब गिल को वहां कानून-व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने उग्र भीड़ और उग्रवादियों से निपटने के लिए बेहद कड़े कदम उठाए, जिससे वे पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए।

3. पंजाब वापसी और खालिस्तानी आतंकवाद का दौर

​1980 के दशक के मध्य में जब पंजाब खालिस्तानी उग्रवाद की आग में झुलस रहा था, तब केंद्र सरकार ने उनके कड़े प्रशासनिक कौशल को देखते हुए 1984 में उन्हें पंजाब ट्रांसफर कर दिया। 1988 में उन्हें पहली बार पंजाब पुलिस का महानिदेशक (DGP) नियुक्त किया गया।

ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II (1988)

​1984 के 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' के घाव अभी भरे नहीं थे कि उग्रवादियों ने फिर से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया। मई 1988 में केपीएस गिल ने 'ऑपरेशन ब्लैक थंडर' की कमान संभाली।

  • ​उन्होंने सेना भेजने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) और पंजाब पुलिस के अचूक तालमेल का उपयोग किया।
  • ​मंदिर की बिजली-पानी की सप्लाई काट दी गई और स्नाइपर्स की मदद से आतंकियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया गया।
  • ​इस ऑपरेशन की खास बात यह थी कि स्वर्ण मंदिर के मुख्य ढांचे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा और न ही सिख भावनाएं आहत हुईं। यह गिल की रणनीतिक सूझबूझ की बड़ी जीत थी।

4. आतंकवाद का पूर्ण खात्मा (1991-1995)

​1990 में कुछ समय के लिए उन्हें पंजाब से हटाया गया, लेकिन जब राज्य में स्थिति बेकाबू होने लगी, तो 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने उन्हें दोबारा पंजाब का DGP बनाकर भेजा। इस बार गिल को आतंकवाद को जड़ से खत्म करने की पूरी छूट दी गई।

  • 'गिल डॉक्ट्रिन' (Gill Doctrine): गिल ने एक नई रणनीति अपनाई, जिसे सुरक्षा विश्लेषकों ने 'गिल डॉक्ट्रिन' कहा। इसके तहत उन्होंने पुलिस बल का आधुनिकीकरण किया, उन्हें अत्याधुनिक हथियार दिए और स्थानीय खुफिया तंत्र (Local Intelligence) को मजबूत किया।
  • सिख पुलिसकर्मियों पर भरोसा: उन्होंने इस धारणा को तोड़ा कि सिख समुदाय उग्रवादियों के साथ है। उन्होंने पंजाब पुलिस के बहुसंख्यक सिख जवानों और अफसरों को प्रेरित किया कि वे देश की अखंडता के लिए लड़ें।
  • बुलेट का जवाब बुलेट: गिल ने उग्रवादियों के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई। 1993-94 आते-आते गुरजंत सिंह बुढसिंहवाला और वासन सिंह जफरवाल जैसे बड़े उग्रवादी कमांडर या तो मारे गए या देश छोड़कर भाग गए। 1995 में उनके रिटायर होने तक पंजाब में पूरी तरह शांति बहाल हो चुकी थी।

5. सेवानिवृत्ति के बाद की भूमिकाएँ

​1995 में पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी सुरक्षा विशेषज्ञता की मांग बनी रही:

  • सुरक्षा सलाहकार: 2002 के गोधरा कांड के बाद गुजरात में कानून-व्यवस्था सुधारने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें अपना सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया। बाद में 2006 में छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए उन्हें आमंत्रित किया।
  • संस्थान की स्थापना: उन्होंने आतंकवाद और सुरक्षा मामलों के अध्ययन के लिए 'इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट' (ICM) की स्थापना की।
  • खेल प्रशासन: वे कई वर्षों तक 'इंडियन हॉकी फेडरेशन' (IHF) के अध्यक्ष भी रहे, हालांकि उनके इस कार्यकाल के दौरान कई प्रशासनिक विवाद भी सामने आए।

6. विवाद और मानवाधिकारों के आरोप

​केपीएस गिल का व्यक्तित्व जितना प्रभावी था, उतना ही विवादास्पद भी रहा:

  • मानवाधिकार उल्लंघन: उन पर और पंजाब पुलिस पर आतंकवाद को कुचलने के नाम पर कानून को ताक पर रखने, फर्जी मुठभेड़ (Fake Encounters) करने और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं (जैसे जसवंत सिंह खालरा) के लापता होने के गंभीर आरोप लगे। आलोचकों का मानना था कि उनकी नीतियां क्रूर थीं।
  • रुपन देयोल बजाज मामला: 1988 की एक आधिकारिक पार्टी में एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी रुपन देयोल बजाज के साथ अनुचित व्यवहार (छेड़छाड़) के मामले में उन पर मुकदमा चला। 1996 में अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया, जिसकी पुष्टि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी की।

7. सम्मान और अंतिम समय

​राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1989 में देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाजा था।

निधन: उम्र बढ़ने के साथ वे किडनी और दिल की बीमारियों से पीड़ित हो गए थे। 26 मई 2017 को 82 वर्ष की आयु में नई दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

निष्कर्ष

​केपीएस गिल को इतिहास में एक ऐसे नायक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी अटूट इच्छाशक्ति से देश को टूटने से बचाया। जहां एक वर्ग उन्हें पंजाब का रक्षक और 'सुपरकॉप' मानता है, वहीं दूसरा वर्ग उनके तौर-तरीकों को लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ देखता है। बहरहाल, भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में उनका नाम हमेशा शीर्ष पर रहेगा। के पी एस गिल के सुपरकॉप बनने पंजाब के रक्षक के रूप में एक लौह इच्छा शक्ति वाले व्यक्तित्व के रूप में उभर कर आती है वह सामान्यता पुलिस से ज़्यादा कोई सैनिक कमांडर लगते थे ,उनका व्यक्तित्व और इंटेलिजेंस इतना महान था कि की लोग ख़ुद  ही उनको  फॉलो करते है। ऐसे महान अधिकारी से आज के हर पुलिस अधिकारी को शिक्षा लेना पड़ेगा अपने ट्रेनिंग के दौरान।


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