प्रबल प्रताप का यह मामला हाल ही में (जुलाई 2026 में) सुप्रीम कोर्ट में काफी चर्चा में रहा। आइए इसमें डिबेट करते है और कुछ तथ्य जानते है इस प्रकरण के।
सूत्रों के अनुसार प्रबल प्रताप यादव इटावा जिले के भरथना तहसील के नागला गांव का है इसके पिताजी गांव में दुकान चलाते है ,गांव में इसके पिताजी के हिस्से में सिर्फ तीन बीघा जमीन है,प्रबल प्रताप की प्रारंभिक शिक्षा भरथना में ही हुई है।वह लखनऊ विश्वविद्यालय से लॉ कर रहा है।
1. बिना वकील (Law) किए कोई अपनी पैरवी कैसे कर सकता है?
भारत के कानून के अनुसार, कोई भी आम नागरिक कोर्ट में वकील के बिना खुद अपने केस की पैरवी कर सकता है। इसे "Petitioner-in-Person" (यानी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित याचिकाकर्ता) कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 के तहत सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक शाखा के रजिस्ट्रार पहले ऐसे व्यक्ति से बात करते हैं और यह प्रमाणित करते हैं कि वह कोर्ट में खुद बहस करने के योग्य है या नहीं। प्रबल प्रताप को भी इसी नियम के तहत खुद पैरवी करने की अनुमति मिली थी।
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| प्रबल प्रताप प्रकरण की एक काल्पनिक AI छवि |
2. उनकी समस्या क्या थी और मामला क्या था?
- मामला: यह मामला एक निजी कंपनी 'डुप्लेक्स टेक्नोलॉजीज सर्विसेज लिमिटेड' (Duplex Technologies) और लखनऊ पुलिस के खिलाफ था। प्रबल प्रताप का आरोप था कि यह कंपनी देश भर में एक बड़ा साइबर क्राइम और धोखाधड़ी का सिंडिकेट (क्रिमिनल गैंग) चला रही है।
- शुरुआत: प्रबल प्रताप ने लखनऊ के विकास नगर के ACP और पुलिस से इस कंपनी के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी। जब पुलिस ने FIR नहीं लिखी, तो वे मजिस्ट्रेट कोर्ट गए।
3. लोअर कोर्ट और हाई कोर्ट ने क्यों रिजेक्ट किया?
- लोअर कोर्ट (मजिस्ट्रेट कोर्ट): लखनऊ के स्पेशल चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट (Special CJM) ने पुलिस को सीधे FIR दर्ज करने का आदेश देने के बजाय, प्रबल प्रताप के आवेदन को "प्राइवेट कंप्लेंट" (निजी शिकायत) के रूप में बदल दिया। इसका मतलब यह था कि कोर्ट खुद मामले की सुनवाई करेगा, न कि पुलिस सीधे जांच करेगी।
- हाई कोर्ट: प्रबल प्रताप इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट गए। हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को यह कहकर खारिज (रिजेक्ट) कर दिया कि मजिस्ट्रेट के इस आदेश को कानूनी रूप से चुनौती देने का दूसरा रास्ता है, सीधे रिट याचिका (Writ Petition) के जरिए इसे हाई कोर्ट में नहीं लाया जा सकता।
4. मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा और कोर्ट में क्या हुआ?
हाई कोर्ट से झटका लगने के बाद वे स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
- खर्चा: चूंकि उन्होंने किसी वकील को नहीं रखा था, इसलिए उनका वकीलों की फीस का कोई बड़ा खर्चा नहीं हुआ। केवल कोर्ट की मामूली कागजी कार्रवाई और फाइलिंग फीस ही लगी।
- कोर्ट रूम का ड्रामा: सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप ने जजों को सम्मान देने के बजाय उन्हें "ज्यूडिशियल सर्वेंट" (न्यायिक नौकर) कहा और खुद को "सॉवरेन" (संप्रभु/राजा) बताया। उन्होंने जजों को आदेश देते हुए कहा, "मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट, मैं आपको आदेश देता हूं कि लखनऊ के ACP के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दें।" इसके बाद उन्होंने अपनी 155 पन्नों की फाइल हवा में उछाल दी और तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को गाली दी।
5. सुप्रीम कोर्ट ने क्या एक्शन लिया?
इस गंभीर अपमान (Criminal Contempt) के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के जजों (जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे) ने बेहद संयम दिखाया। सुरक्षाकर्मियों ने प्रबल प्रताप को कोर्ट रूम से बाहर निकाला। जजों ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति ठीक नहीं लग रही है, इसलिए वे उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई या अवमानना (Contempt) का केस नहीं चलाएंगे। कोर्ट ने उनके केस को मेरिट के आधार पर खारिज (Dismiss) कर दिया।
इस घटना के पीछे की मुख्य वजह उसकी एकतरफा सनक और कानूनी हताशा बताई जा रही है:
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: उसके पिता के पास करीब ढाई बीघा खेती है और वे भरथना कस्बे में एक प्राइवेट दुकान पर काम करते हैं। गांव में उसे लोग बेहद शांत स्वभाव का जानते थे, इसलिए इस हरकत से उसके परिजन और गांव वाले गहरे सदमे में हैं।
- हंगामा करने का कारण: प्रवल प्रताप लखनऊ की एक कंपनी में काम करता था, जहाँ एक सहकर्मी लड़की के मामले में विवाद होने के कारण उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। नौकरी जाने के बाद उसने बदला लेने के लिए कंपनी पर 'देश विरोधी गतिविधियों' और साइबर क्राइम में शामिल होने का मनगढ़ंत आरोप लगाया और FIR दर्ज कराने के लिए कानूनी रास्ता अपनाया।
- अदालती हताशा: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उसकी अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ अपील लेकर वह खुद (इन-पर्सन) सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
- कोर्ट में क्या हुआ: जब जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने सुनवाई शुरू हुई, तो वह जजों को ही आदेश देते हुए बोला कि लखनऊ पुलिस के खिलाफ FIR दर्ज करने का निर्देश दें। जब जजों ने इस पर हैरानी जताई, तो उसने गुस्से में आकर केस फाइल हवा में फेंक दी, जजों को 'ज्यूडिशियल सर्वेंट' कहा और बाहर ले जाए जाते समय सीजेआई (CJI) के लिए भी आपत्तिजनक अपशब्दों का इस्तेमाल किया।
- निष्कर्ष :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::
उसकी इस हरकत के पीछे व्यवस्था से नाराजगी, नौकरी जाने की हताशा और अपनी याचिका खारिज होने के बाद आया मानसिक आक्रोश माना जा रहा है।
प्रबल प्रताप की ये हताशा नौकरी से निकाले जाने के कारण हो सकती है पर वह सुप्रीम कोर्ट के जज को संबोधित करते हुए खुद को संप्रभु (राजा) कहता है और जजों को ज्यूडिशियल नौकर कहने का वाक्य बहस का विषय बन गया है कि क्या जज खुद को किंग मान कर न्याय कर रहे या खुद को जनता से ज्यादा बड़े मन रहे ,जबकि संविधान में प्रस्तावना में ही लिखा है कि हम भारत के लोग इस संविधान का निर्माण कर रहे और कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायिका को भारत की जनता को संविधान अनुरूप कार्य का निर्देश देते है यानी यहां जनता और जनता का हर सदस्य संप्रभु है , न्यायपालिका को संविधान द्वारा स्वतंत्रता दी गई है वह कार्यपालिका ,विधायिका और न्यायपालिका के तीन अंगों में एक है ,न्यायपालिका में कार्यपालिका बंदिशे नहीं लगा सकती ,और न्यायपालिका जिसमें सुप्रीम कोर्ट ,हाइकोर्ट, सेशन कोर्ट आते है क्या जब इन सिस्टम में खामियां आतीं हैं तो खुद की उतनी तेज ओवरहॉलिंग करते हैं समय के अनुसार जितनी जरूरत है, प्रबल प्रताप हो या बिहार का भरत तिवारी ये विद्रोह इसलिए करते हैं क्योंकि सिस्टम में बहुत खामियां है जिन्हें लगातार सुधारने की जरूरत है पर सुधारा नहीं जा रहा , लगता है पूरा सिस्टम सड़ चुका है ,सुप्रीम कोर्ट खुद को सुधारने के लिए कदम नहीं उठाता बल्कि वो NCERT की पुस्तकों के उस पैराग्राफ को डिलीट करवाने के लिए एड़ी चोटी एक कर देता है NCERT के निदेशक से जवाब तलब किया जाता है ,क्या सुप्रीम कोर्ट ये नहीं देख पा रहा कि हर डिस्ट्रिक कोर्ट में भ्रष्टाचार व्याप्त है सबसे छोटे कोर्ट मुंसिफ न्यायालय यानी जूनियर डिवीजन की बेंच में भ्रष्टाचार व्याप्त है भाई जजेस रेट तय कर देते है जमानत देने के लिए ,बाबू वर्ग तो अलग रिश्वत ले रहा मजिस्ट्रेट वकील से सीधे कहता है कि इतना लगेगा इस मामले में।और वकील को क्या उसे तो वकालत चमकानी है ,जब एक पक्ष कुछ दे रहा तो दूसरा पक्ष उसकी बोली से दोगुना दे दे तो जज साहब पलटी भी मार सकते है वकील तो दोनों पक्ष का संवाद करता ही है जज से इस हालत में क्या न्याय सही बंदे को मिलेगा या फिर जो ज़्यादा मोटी गड्डी नोटों की जज साहब को पहुंचाएगा उसके फेवर में जजमेंट हो गया ,ये सभी तक तहसील स्तर पर होता था "कानून गो" "तहसील कोर्ट" में तो खुलेआम पैसे रुपए का लेन देन होता है अब जुडिशरी में हो रहा ,
अब देखते है इस रिश्वत खोरी के पीछे क्या सोच हैं इन ज्यूडिशियरी ऑफिसर की और एक्जीक्यूटिव ऑफिसर की जज मुंसिफ मजिस्ट्रेट जो अभी अभी ज्यूडिशियरी एकांत पास करके जज बना है वह सोचता है तैयारी तो दोनों ने बराबर किया है कोई PCS परीक्षा प्री , मेंस , इंटरव्यू में जमकर मेहनत किया तब तहसीलदार या SDM बना,कोई PCS(J) के लिए दिन रात कर दिया तब जज बना ,अब जज साहब को लगता है कि PCS पास करने वाला रिश्वत लेकर पैसे वाला हुआ जा रहा तो PCS (J) वाला भला पीछे कैसे रह जाए।
भ्रष्टाचार का एक कारण है लोक सेवा आयोग और प्रदेशिक लोक सेवा आयोग में PCS ,या PCS J की भर्ती में लिया गया निर्धारित फॉर्मूला ,भ्रष्टाचार का कारण है लोक सेवा आयोग द्वारा उन लोगो की छटनी नहीं कर पाना जो है तो उच्च आई क्यू लेबल के इंटेलीजेंट तो हैं पर साथ में हैं आंतरिक रूप से कही ज़्यादा भ्रष्ट आप ऐसे मानो कि जैसे रावण उच्च कोटि का इंटेलीजेंट था पर उच्चतम भ्रष्ट और मानसिक अपराधी भी था यही रावण रूपी pcs और pcs (J ) में भरे जा रहे जो सिस्टम में घुसते ही अपने मानसिक भ्रष्टाचार को जमीन पर उतारने की कोशिश में लग जाते है ।
मैं कह रहा हूं आपने सतर्कता अधिकारी बनाया, आपने लोकपाल ,लोकायुक्त ,जैसे संस्थाएं बनाई ये क्या कर रहीं है ,जनता भ्रष्ट अधिकारियों के रवैए से अत्यधिक पीड़ित है पर इन अधिकारियों की इतनी पावर है कि यदि किसी ने भ्रष्ट व्यवहार की शिकायत लोकपाल या सतर्कता आयुक्त तक पहुंचाई तो शिकायत कर्ता खुद चकर गिन्नी के तरह घूम जाएगा क्योंकि ये अधिकारी जो कहते है कि हमाम में सब नंगे है यानी सभी भ्रष्ट है और यदि एक के ऊपर भी छानबीन की प्रार्थना पत्र दिया तो पूरे अधिकारी आपको किसी न किसी मुद्दे में अंदर डाल ही देंगे ,पुलिस को बेकसूर को कसूरवार बनाते देर नहीं लगती आप सीधे सलाखों के पीछे होगे या फिर भरत तिवारी की तरह गुस्से में हथियार उठा लिया तो पुलिस के एगो को इतनी ठेस पहुंचेगी कि वह फेक एनकाउंटर भी कर सकती है और इसके पीछे सफेद टोपी वाले नेता ही होते है जो अपराधी का खुद संरक्षण देते हैं किसी भी पार्टी का नेता हो अपराधियों को प्रोटेक्ट करता है जो उनकी पार्टियों के लिए फायदेमंद होते हैं।
मेरा कहना है इस लेख से की भगत सिंह ब्रिटिश पीरियड के ज्यादतियों के खिलाफ़ विद्रोह किया जनता को जगाया यूथ के अंदर अंग्रेजी शोषणकारी नीति के खिलाफ विद्रोह किया और खुद फांसी के फंदे पर झूले जिससे जनमानस में भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ़ आवाज उठे ,उसी तरह अब जब भ्रटाचार हर सरकारी गलियारे में दिख रहा गर्दन तक व्यक्ति डूब चुका है नौकर शाही और जुडिशरी के भ्रष्ट रवैए से तो अब फिर विद्रोह के स्वर भरत तिवारी और प्रबल प्रताप जैसे यूथ में दिख रहे अब धीरे धीरे यूथ में अचानक क्रांति आएगी और हो सकता है कि आगे और अधिक यूथ खुद की कुर्बानी देकर भ्रष्ट सड़े तंत्र से लड़े और शुद्ध ज्यूडिशियरी और एक्जीक्यूटिव को बनाने का प्रयास करें।
आप अपनी राय इस मुद्दे में कमेंट बॉक्स ने अवश्य दें।
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