श्रीकृष्णा' फेम सर्वदमन डी. बनर्जी की जीवनी: उन्नाव से ऋषिकेश तक का आध्यात्मिक सफर

 

श्रीकृष्णा' से ऋषिकेश तक: सर्वदमन डी. बनर्जी का आध्यात्मिक और फिल्मी सफर

​जब भी भारतीय टेलीविजन के इतिहास में सबसे प्रभावशाली और जीवंत किरदारों की बात होगी, तो रामानंद सागर के धारावाहिक 'श्री कृष्णा' में भगवान कृष्ण की भूमिका निभाने वाले सर्वदमन डी. बनर्जी का नाम सबसे ऊपर आएगा। उनकी वह अलौकिक मुस्कान, शांत आंखें और चेहरे का दिव्य तेज आज भी करोड़ों दर्शकों के दिलों में बसा हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पर्दे पर भगवान का यह सबसे सुंदर रूप रचने वाले सर्वदमन असल जिंदगी में कौन हैं, कहां से आए और आज कहां हैं? आइए, उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से निकलकर अध्यात्म की ऊंचाइयों तक पहुंचने वाले इस महान कलाकार के जीवन को करीब से जानते हैं।

श्रीकृष्णा' फेम सर्वदमन डी. बनर्जी की जीवनी: उन्नाव से ऋषिकेश तक का आध्यात्मिक सफर
सर्वदमन बनर्जी ,श्रीकृष्ण

​शुरुआती जीवन, जन्म और शिक्षा

​सर्वदमन डी. बनर्जी का जन्म 14 मार्च 1965 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के एक छोटे से कस्बे मगरवारा में हुआ था। वह एक बंगाली ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। मगरवारा और गंगा किनारे बसे इस पूरे क्षेत्र की मिट्टी का असर उनके शुरुआती जीवन पर गहरा पड़ा। बचपन से ही उनके भीतर एक स्वाभाविक शांति और कला के प्रति गहरा झुकाव था।

​उनकी प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पास के ही औद्योगिक शहर कानपुर के प्रसिद्ध सेंट एलॉयसियस स्कूल (St. Aloysius School) से हुई। स्कूल के दिनों में ही उनकी गंभीर आवाज और आकर्षक व्यक्तित्व ने लोगों का ध्यान खींचना शुरू कर दिया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने अभिनय को अपने करियर के रूप में चुना। अपनी कला को तराशने के लिए उन्होंने भारत के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII), पुणे में दाखिला लिया। यहाँ उन्होंने अभिनय की बारीकियों को सीखा, जिसने आगे चलकर उन्हें एक बेहतरीन अभिनेता बनने में मदद की।

​अभिनय करियर की शुरुआत और क्षेत्रीय सिनेमा में पहचान

​FTII से पास आउट होने के बाद, सर्वदमन बनर्जी ने मुंबई (तब बॉम्बे) का रुख किया। हालांकि, उन्हें मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा से पहले दक्षिण भारतीय सिनेमा और कला फिल्मों (Art Cinema) में अपनी पहचान बनाने का मौका मिला।

​उनकी शुरुआती बड़ी सफलताओं में प्रसिद्ध निर्देशक के. विश्वनाथ की तेलुगु फिल्म 'सिरीवेनेला' (Sirivennela - 1986) शामिल थी। इस फिल्म में उन्होंने एक अंधे बांसुरी वादक की बेहद चुनौतीपूर्ण और भावुक भूमिका निभाई थी। उनके अभिनय की इतनी तारीफ हुई कि दक्षिण भारत के दर्शकों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। इसके बाद उन्होंने 'स्वयंक्रुषि', 'ओ कत्तु कधु' और 'मराली गुड़िगे' जैसी कई प्रशंसित फिल्मों में काम किया। उन्होंने बंगाली और हिंदी की कुछ समानांतर फिल्मों (Parallel Cinema) में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जहाँ उनके अभिनय की गहराई को सराहा गया।

​'श्री कृष्णा': वह किरदार जिसने इतिहास रच दिया

​साल 1993 में निर्देशक रामानंद सागर अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'श्री कृष्णा' के लिए मुख्य अभिनेता की तलाश कर रहे थे। 'रामायण' की अभूतपूर्व सफलता के बाद, सागर साहब पर एक ऐसा कृष्ण ढूंढने का भारी दबाव था, जो दर्शकों को सीधे भगवान से जोड़ सके। कई ऑडिशन के बाद, जब सर्वदमन बनर्जी उनके सामने आए, तो रामानंद सागर को अपनी खोज पूरी होती हुई दिखी।

एक दिलचस्प किस्सा: जब सर्वदमन बनर्जी को इस रोल के लिए चुना गया, तो उन्होंने शुरुआत में इसे करने में थोड़ी झिझक दिखाई थी। वह फिल्मों में काम कर रहे थे और टीवी सीरियल्स का रुख नहीं करना चाहते थे। लेकिन जब रामानंद सागर ने उन्हें कहानी और इस किरदार के आध्यात्मिक महत्व को समझाया, तो वह मना नहीं कर सके।


​'श्री कृष्णा' सीरियल का प्रसारण शुरू होते ही इतिहास बन गया। सर्वदमन बनर्जी ने जब पर्दे पर कदम रखा, तो लोगों को लगा कि साक्षात भगवान द्वारकाधीश उनके सामने खड़े हैं। उनकी मनमोहक मुस्कान, बात करने का धीमा और गंभीर तरीका, और आंखों की करुणा ने जादुई असर किया।

​कृष्ण के किरदार की विशेषताएं:

  • अलौकिक मुस्कान: सीरियल में जब भी कोई संकट आता, कृष्ण की एक हल्की सी मुस्कान दर्शकों को तनावमुक्त कर देती थी।
  • गीता उपदेश: कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश देते समय सर्वदमन के चेहरे के भावों में जो गंभीरता, ज्ञान और दिव्यता थी, उसने उस कठिन दृश्य को हर साधारण मनुष्य के लिए सुलभ बना दिया।
  • आध्यात्मिक जुड़ाव: लोग अपने घरों में टीवी सेट पर माला चढ़ाने लगे थे। जब वह पर्दे पर आते, तो लोग सम्मान में खड़े हो जाते थे। इस भूमिका ने सर्वदमन बनर्जी को सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस में एक पूजनीय व्यक्तित्व बना दिया।

​अन्य प्रमुख भूमिकाएं: विवेकानंद और आदि शंकराचार्य

​सर्वदमन बनर्जी का चेहरा और उनकी ऊर्जा कुछ ऐसी थी कि निर्देशकों को उनमें हमेशा दिव्य और ऐतिहासिक चरित्र ही नजर आते थे। कृष्ण के अलावा उन्होंने दो और ऐसे किरदार निभाए, जो भारतीय संस्कृति के स्तंभ हैं:

  1. आदि शंकराचार्य (1983): जी. वी. अय्यर द्वारा निर्देशित इस ऐतिहासिक संस्कृत फिल्म में सर्वदमन ने मुख्य भूमिका निभाई थी। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास में संस्कृत भाषा में बनी पहली फिल्म थी, जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। इसमें उनके अभिनय को कालजयी माना गया।
  2. स्वामी विवेकानंद (1998): इस फिल्म में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों, उनकी ऊर्जा और उनके ओजस्वी व्यक्तित्व को पर्दे पर जीवंत किया। इस रोल के लिए उन्होंने काफी अध्ययन और ध्यान का सहारा लिया था।

​ग्लैमर की दुनिया से अचानक दूरी और आध्यात्मिक खोज

​जब 'श्री कृष्णा' के बाद सर्वदमन बनर्जी अपने करियर के चरम पर थे, तब उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने बॉलीवुड और चकाचौंध भरी इस ग्लैमर इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। बहुत से लोग हैरान थे कि इतना बड़ा स्टार अचानक गायब क्यों हो गया?

​दरअसल, सर्वदमन बनर्जी बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। कृष्ण, शंकराचार्य और विवेकानंद के किरदारों को जीते-जीते उनके भीतर का वैराग्य और गहरा हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि मुंबई की भागदौड़ और व्यावसायिकता उनके आंतरिक विकास में बाधा बन रही है। वह अभिनय के मुखौटों को उतारकर अपने वास्तविक स्वरूप को जानना चाहते थे।

​एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था:

​"मैंने फिल्मों और सीरियल्स में काम सिर्फ पैसे या प्रसिद्धि के लिए नहीं किया था। जब मुझे लगा कि मेरा काम पूरा हो चुका है और मेरा आंतरिक मन मुझे प्रकृति और ध्यान की ओर बुला रहा है, तो मैंने बिना किसी पछतावे के मुंबई छोड़ दी।"


​ऋषिकेश में नया जीवन: ध्यान और समाज सेवा

​मुंबई छोड़ने के बाद, सर्वदमन बनर्जी उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में जाकर बस गए। गंगा के किनारे, हिमालय की वादियों में उन्होंने अपना ठिकाना बनाया। यहाँ आकर वह पूरी तरह से बदल गए। आज वह एक आधुनिक संन्यासी की तरह जीवन जीते हैं।

​1. ध्यान और योग केंद्र (Meditation Camps):

​ऋषिकेश में वह नियमित रूप से ध्यान (Meditation) और योग सिखाते हैं। देश-विदेश से लोग उनके पास मानसिक शांति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए आते हैं। उनका मानना है कि ध्यान ही मनुष्य को खुद से जोड़ने का एकमात्र साधन है।

​2. 'पंख' (Pankh) एनजीओ - बच्चों की शिक्षा:

​सर्वदमन बनर्जी केवल अपनी व्यक्तिगत साधना में ही लीन नहीं हैं, बल्कि वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहे हैं। वह 'पंख' नाम की एक सामाजिक संस्था (NGO) चलाते हैं।

  • ​यह संस्था ऋषिकेश और उसके आसपास के झुग्गी-झोपड़ियों के गरीब और वंचित बच्चों को मुफ्त शिक्षा, कंप्यूटर ट्रेनिंग और कला कौशल सिखाती है।
  • ​वह इन बच्चों के रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं।
  • ​इसके अलावा, वह स्थानीय महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई-कढ़ाई और अन्य कुटीर उद्योगों का प्रशिक्षण भी दिलाते हैं।

​फिल्मों में संक्षिप्त वापसी (कैमियो रोल)

​लंबे समय तक पर्दे से दूर रहने के बाद, साल 2016 में वह निर्देशक एमएस धोनी की बायोपिक 'एम.एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' में एक छोटी सी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आए। फिल्म में उन्होंने धोनी के कोच चंचल भट्टाचार्य के गुरु (शास्त्री जी) का किरदार निभाया था। इसके बाद साल 2022 में तेलुगु फिल्म 'गॉडफादर' (जिसमें चिरंजीवी और सलमान खान थे) में भी वह एक मुख्यमंत्री के कैमियो रोल में दिखाई दिए। हालांकि, अब वह फिल्में सिर्फ अपने पुराने मित्रों के अनुरोध पर या शौकिया तौर पर ही करते हैं; उनका मुख्य ध्यान उनकी संस्था और ध्यान पर ही रहता है।

​व्यक्तित्व और जीवन दर्शन: एक सच्चा 'कृष्ण'

​सर्वदमन डी. बनर्जी का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कोई व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी कैसे जमीन से जुड़ा रह सकता है। जिस तरह भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में 'निष्काम कर्म' (बिना फल की इच्छा के कर्म करना) का उपदेश दिया, सर्वदमन ने उस उपदेश को अपने जीवन में सचमुच उतार लिया।

​आज ६० वर्ष से अधिक की आयु में भी उनके चेहरे का तेज वैसा ही है। वह सादगी से रहते हैं, जींस और टी-शर्ट पहनते हैं, बच्चों के साथ खेलते हैं और गंगा किनारे घंटों ध्यान में बैठते हैं। उन्हें इस बात का कोई घमंड नहीं है कि कभी पूरा देश उनके पैरों में झुकता था।

​निष्कर्ष

​उन्नाव के मगरवारा कस्बे से शुरू हुआ सर्वदमन बनर्जी का सफर आज ऋषिकेश की वादियों में मानवता की सेवा और ईश्वर की खोज में तल्लीन है। उन्होंने पर्दे पर कृष्ण का जो रूप दिखाया, वह तो अद्भुत था ही, लेकिन पर्दे के पीछे का उनका वास्तविक जीवन उससे भी कहीं अधिक सुंदर और प्रेरणादायक है। वह कल भी लोगों के लिए 'कान्हा' थे, और आज अपने कर्मों से समाज के अनगिनत बच्चों के जीवन में उजाला फैलाकर, सचमुच कृष्ण के संदेश को जी रहे हैं।

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