अजीत डोभाल (Ajit Doval) सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति का वह मजबूत स्तंभ हैं जिन्होंने अपने जीवन के 5 दशकों से भी अधिक समय तक देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को अभेद्य बनाया। पाकिस्तान की जमीन पर गुप्त जासूसी से लेकर पूर्वोत्तर में विद्रोहियों के खात्मे तक, उनकी जिंदगी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।
आइए जानते हैं भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल के जीवन, संघर्ष और उनके 10 सबसे बड़े साहसिक कारनामों के बारे में।
प्रारंभिक जीवन, बचपन और शिक्षा
- जन्म व परिवार: अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल स्थित घिरी बनेलस्यूं गांव में एक गढ़वाली परिवार में हुआ था। उनके पिता जी. एन. डोभाल भारतीय सेना में अधिकारी थे, जिससे उन्हें बचपन से ही अनुशासन और देशभक्ति का माहौल मिला।
- बचपन का संघर्ष व पढ़ाई: पहाड़ों के कठिन परिवेश में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनका दाखिला राजस्थान के 'अजमेर मिलिट्री स्कूल' में कराया गया।
- यूनिवर्सिटी टॉपर: उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र (Economics) में स्नातकोत्तर (M.A./M.Sc.) की पढ़ाई की और पूरी यूनिवर्सिटी में पहला स्थान प्राप्त कर गोल्ड मेडल जीता।
पुलिस सेवा में प्रवेश और करियर की शुरुआत
1968 में मात्र 23 वर्ष की उम्र में उन्होंने UPSC परीक्षा पास की और उन्हें केरला कैडर का IPS अधिकारी चुना गया।
- थलास्सेरी दंगा नियंत्रण (1971): केरल के थलास्सेरी में जब भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़के और स्थिति बेकाबू हो गई, तब युवा IPS डोभाल को वहां भेजा गया। उन्होंने बिना किसी बड़े बल प्रयोग के महज कुछ दिनों में दंगों पर काबू पाया और शांति बहाल की।
- IB में चयन (1972): उनकी तीक्ष्ण कार्यकुशलता को देखते हुए 1972 में उन्हें 'इंटेलिजेंस ब्यूरो' (IB) में शामिल कर लिया गया।
अजीत डोभाल के 10 अति-महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कारनामे
1. सिक्किम का भारत में विलय (1975)
1975 में सिक्किम के विलय के दौरान चीन की नजरें वहां पर बनी हुई थीं। डोभाल ने सिक्किम में गुप्त रूप से रहकर स्थानीय लोगों के बीच भारत के पक्ष में माहौल बनाया और चोग्याल (राजा) के समर्थकों की हर गुप्त योजना को विफल कर दिया।
2. पाकिस्तान में 7 साल गुप्त जासूसी (Undercover Agent)
डोभाल ने पाकिस्तान के इस्लामाबाद में 7 साल एक गुप्त जासूस के रूप में बिताए। वह स्थानीय भाषा, रीति-रिवाजों में ढल गए और कई बार फटे कपड़े पहनकर भिखारी व दर्जी का भेष धरकर घूमते रहे।
3. कहुटा परमाणु संयंत्र का पर्दाफाश (नाई की दुकान की रणनीति)
पाकिस्तान जब कहुटा में गुप्त रूप से परमाणु बम बना रहा था, तब डोभाल ने वहां के वैज्ञानिकों की नाई की दुकान से उनके कटे हुए बालों के सैंपल जुटाए। लैब टेस्ट में बालों में यूरेनियम और रेडिएशन मिलने से पाकिस्तान के परमाणु प्लान का पूरी दुनिया के सामने भंडाफोड़ हो गया।
4. मिजोरम उग्रवाद का खात्मा (1986)
मिज़ो नेशनल फ्रंट (MNF) के उग्रवादी लालडेंगा के खिलाफ उन्होंने बर्मा सीमा पर स्थित उग्रवादियों के कैंप में घुसपैठ की। उन्होंने लालडेंगा के 7 में से 6 मुख्य सैन्य कमांडरों को भारत सरकार के पक्ष में मोड़ दिया, जिससे मिजो शांति समझौता संभव हो सका।
5. ऑपरेशन ब्लैक थंडर - स्वर्ण मंदिर (1988)
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों की सटीक जानकारी हासिल करने के लिए वे आईएसआई (ISI) का एजेंट बनकर मंदिर के अंदर घुस गए। उन्होंने आतंकियों को गलत रणनीति बताई और सुरक्षा बलों को मंदिर का सटीक ब्लूप्रिंट मुहैया कराया। इस वीरता के लिए उन्हें 'कीर्ति चक्र' से सम्मानित किया गया, जो यह पदक पाने वाले पहले पुलिस अधिकारी बने।
6. कश्मीर में 'इखवान' का गठन (1990 का दशक)
कश्मीर में आतंकवाद को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए डोभाल ने 'कूका पारे' जैसे पूर्व उग्रवादियों का हृदय परिवर्तन किया और 'इखवान' नामक उग्रवाद-विरोधी गुट बनाया, जिसने पाकिस्तानी आतंकियों को खदेड़ने में सुरक्षा बलों की मदद की।
7. कंधार विमान अपहरण (IC-814, 1999)
जब भारतीय विमान IC-814 का अपहरण करके उसे कंधार (अफगानिस्तान) ले जाया गया, तब भारत सरकार की ओर से आतंकियों और तालिबान से वार्ता करने वाली मुख्य टीम की कमान डोभाल के हाथों में ही थी।
8. सर्जिकल स्ट्राइक (2016)
उरी हमले के जवाब में भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में घुसकर किए गए सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी रणनीति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में अजीत डोभाल ने तैयार की थी।
9. बालाकोट एयरस्ट्राइक (2019)
पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों पर की गई एयरस्ट्राइक का ब्लूप्रिंट भी डोभाल और उनकी टीम के नेतृत्व में बना था।
10. डोकलाम और लद्दाख सीमा विवाद पर रणनीति
चीन के साथ डोकलाम गतिरोध और लद्दाख सीमा विवाद के दौरान डोभाल की आक्रामक कूटनीति (Doval Doctrine) के कारण भारतीय सेना चीन के सामने मजबूती से डटी रही और चीन को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा।
निष्कर्ष
अजीत डोभाल का जीवन यह सिखाता है कि निडरता, बुद्धिमत्ता और देश के प्रति अटूट निष्ठा से किसी भी चुनौती पर विजय पाई जा सकती है। 2005 में IB के डायरेक्टर पद से सेवानिवृत्त होने के बाद, 2014 से वह लगातार भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में देश को सुरक्षा की दृष्टि से एक नई ऊंचाई पर ले जा रहे हैं।

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