इस समय नया डिबेट आप टी वी और सोशल मीडिया में सुन रहे होंगे कि क्या अब गाड़ी पेट्रोल से नहीं चलेंगी, सरकार पेट्रोल में दारू मिलाकर गाड़ी चलाएगी,कुछ दारूबाज तो इस इंतजार में है कि कब सौ प्रतिशत गाड़ी दारू से चलेगी,भाई गाड़ी दारू से नहीं बल्कि अल्कोहल से चलेगी और अल्कोहल का नाम है एथिल अल्कोहल ,उसको धीरे धीरे पेट्रोल में बढ़ा बढ़ा मिलाया जाएगा,जिससे देश में पेट्रोल को मंगाने में बहुत ज्यादा रुपया बाहरी देशों को न देना पड़े, इसीलिए सरकार ग्रीन फ्यूल की तरफ बढ़ रही है ,सरकार का उद्देश्य इसे सौ प्रतिशत तक ले जाना है यानी किसी समय पेट्रोल बिल्कुल ही प्रयोग न हो बल्कि सीधे ग्रीन फ्यूल का प्रयोग हो, ये एथेनॉल वास्तव में बनेगा कैसे इस पर बहस छिड़ी रहती है सोशल मीडिया में ,और लोग चिंता कर रहे हैं कि अब चीनी नहीं बनेगी बल्कि पूरी की पूरी गन्ने की खेती एथेनॉल बनाने में खत्म हो जाएगी, उनका चिन्तित होना स्वाभाविक है पर क्या सरकार आप नहीं चुनते क्या जो इसी सब चीजों को रेगुलेट करने के लिए बनी है, सरकार सीधे गन्ने का प्रयोग करेगी पर जब करेगी जब देश में जितनी चीनी की आवश्यकता है उसकी बनावट के बाद के गन्ने से ग्रीन फ्यूल बनेगा।
ग्रीन फ्यूल का निर्माण सर्वप्रथम राजस्थान में पाए जाने वाले एक जंगली पौधे से किया गया जिसे जेट्रोफा या हिंदी में रत्न ज्योत कहते है, रतन जोत की फसल पूरे देश में नहीं होती,भारत के अलग अलग हिस्से में विभिन्न फसलों के वेस्ट प्रोडक्ट से एथेनॉल बनेगा,पर अगले स्टेप में बनेगा फिलहाल गन्ने से, गन्ने के सीरे से वो खाद्यान्न जो गोदामों में सड़ रहा देश में फसल के ज्यादा उत्पादन से इसके अलावा मक्के का प्रयोग होगा ग्रीन फ्यूल निर्माण ,इस ग्रीन फ्यूल को पेट्रोल में मिक्स करके बेचने से पेट्रोल के लिए विदेशी मुद्रा खर्च नहीं करनी पड़ेगी।
भविष्य में आप देखोगे कि पेट्रोल पंप तो है पर उसमें पेट्रोल की जगह ग्रीन फ्यूल अलग से मिल रहा,या ग्रीन फ्यूल के अलग स्टेशन बनाए गए है ,ये ग्रीन फ्यूल के निर्माण में करोड़ों रुपया का निवेश एक साथ करनी पड़ेगी इसके लिए ज्यादातर बड़े व्यापारिक घराने निवेश करेंगे ग्रीन फ्यूल पेट्रोल पंप को बनाना उतना कठिन नहीं जितना कठिन एथेनॉल को चावल , धान ,मक्का और गन्ने के रस से फिल्टरेट करके अलग करने में होगी आप इसे ऐसे समझो कि पचास हजार किलो प्रतिदिन जिस प्लांट में ग्रीन फ्यूल बनेगा उसके निर्माण में पचास करोड़ से सौ करोड़ तक का खर्चा बैठेगा,और कच्चा मॉल का तो सबसे बड़ा हेडेक क्योंकि पचास हजार प्रतिदिन फ्यूल बनाने के लिए प्रतिदिन सौ टन तो कच्चा मॉल चाहिए ही ,इस हेडेक को खत्म करने के लिए इस डिस्टलरी प्लांट को लगाने के लिए उस जगह को चुना जाएगा जहां पर कई चीनी मिल आसपास हो जिससे कम से कम चीनी मिल का वेस्ट प्रोडक्ट तो मिलता रहे क्योंकि ज्यादा तर चीनी मिल इस वेस्ट प्रोडक्ट को या तो नाले में बहा देती थी या फिर खुला मैदानों में छोड़ देती थी जो अत्यधिक दुर्गंध फैलता है पर्यावरण में ।
सबसे प्रमुख चीज ये है कि जब सरकार सन 2003 से पेट्रोल में ग्रीन फ्यूल मिलाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे बढ़ा रही है जो पॉलिसी सरकार कि थी कि सन 2030 तक पेट्रोल में बीस प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाया जाएगा उस टाइम पीरियड को अब सरकार ने घटाकर सन 2026 अंत तक बीस प्रतिशत तक मिलाने की कार्ययोजना तैयार कर ली,यानी अब जो पेट्रोल आप भरवाते जो पेट्रोल पंप में उसमें बीस प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता है। अब आपको चिंता ये होती है कि भैया मेरा इंजन तो नहीं खराब होगा या क्या मेंटीनेंस करना पड़ेगा अपनी बाइक और फोर व्हीलर का। तो जानिए डिटेल में पूरी जानकारी अधोलिखित बिंदुओं पर।
1. पुरानी गाड़ी का रखरखाव: इंजन को कबाड़ होने से कैसे बचाएं?
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि भाई, हमारे पास जो सालों पुरानी भरोसेमंद स्प्लेंडर खड़ी है या जो मारुति कार है, उसका क्या होगा? वो तो विशुद्ध (100%) पेट्रोल पीने के लिए बनी थी। अब जब उसमें 20% अल्कोहल वाला ईंधन जाएगा, तो इंजन तो चिल्लाएगा ही! लेकिन घबराने की जरूरत नहीं है, कुछ छोटी मगर मोटी बातें समझ लीजिए ताकि आपकी जेब पर भारी मेंटेनेंस का खर्चा न आए।
- गाड़ी को 'खड़ा' रखने की गलती मत करना: एथेनॉल की एक गंदी आदत होती है—यह हवा से नमी यानी पानी को अपनी तरफ खींचता है। अगर आपने अपनी बाइक या कार को 15-20 दिनों के लिए गैराज में ऐसे ही छोड़ दिया, तो टंकी के अंदर खेल हो जाएगा। पानी नीचे बैठ जाएगा और पेट्रोल ऊपर तैरने लगेगा (वैज्ञानिक भाषा में इसे फेज सेपरेशन कहते हैं)। नतीजा? इंजन स्टार्ट ही नहीं होगा और टंकी के अंदर चुपके-चुपके जंग लगने लगेगी। इसलिए गाड़ी को हर दो-चार दिन में घुमाते रहिए।
- रबर और प्लास्टिक के पुर्जों पर पैनी नजर: यह जो एथेनॉल है न, यह पुरानी गाड़ियों की रबर की पाइपों (फ्यूल होसेस) और सील का जानी दुश्मन है। यह उन्हें धीरे-धीरे गलाने लगता है। अब जब भी आप मैकेनिक के पास सर्विसिंग के लिए जाएं, तो उससे कहें कि भाई, जरा पेट्रोल की पाइप और कार्बोरेटर के रबर पार्ट्स को आंख गड़ाकर चेक कर ले। जरा सा भी ढीला या गला हुआ दिखे, तो ₹50-100 का लालच किए बिना उसे तुरंत बदलवा लें।
- टंकी की अंदरूनी सफाई है जरूरी: अगर आपकी गाड़ी 5 से 10 साल पुरानी है, तो साल-दो साल में एक बार उसकी पेट्रोल टंकी को पूरा खाली करवाकर अंदर से साफ जरूर करवाएं। एथेनॉल की वजह से जो हल्की नमी नीचे बैठती है, वह टंकी के पेंदे में कत्थई रंग का जंग जमा कर देती है। समय पर सफाई होगी, तो कचरा इंजन के सिलेंडर तक नहीं पहुंचेगा।
- फ्यूल एडिटिव्स का जादुई इस्तेमाल: आजकल बाजार में और पेट्रोल पंपों पर 'एथेनॉल प्रोटेक्शन लिक्विड' या फ्यूल एडिटिव्स मिलने लगे हैं। जब भी आप टंकी फुल करवाएं, इसकी कुछ बूंदें मैकेनिक की सलाह से डाल दें। यह लिक्विड पेट्रोल में पानी को अलग नहीं होने देता और एथेनॉल के तेजाबी असर को काफी हद तक शांत कर देता है।
2. सरकार का मास्टर प्लान: कब और कितना मिल रहा है एथेनॉल?
कई लोगों को लगता है कि एथेनॉल मिलाने का खेल अभी साल-दो साल पहले शुरू हुआ है, पर ऐसा नहीं है। सरकार ने इसकी नींव साल 2003 में ही रख दी थी, लेकिन तब गाड़ी कछुए की रफ्तार से चल रही थी। असली तेजी तो अब आई है, जब विदेशी तेल के बढ़ते दामों ने देश का बजट हिलाना शुरू किया है।
- 20% एथेनॉल (E20 पेट्रोल) का सच: सरकार ने पहले लक्ष्य रखा था कि हम साल 2030 तक पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाएंगे। लेकिन काम इतनी तेजी से हुआ कि इस टारगेट को घटाकर साल 2026 के अंत तक ही कर दिया गया। यानी आज आप जिस पेट्रोल पंप पर जाकर गाड़ी में तेल भरवा रहे हैं, उसमें पहले से ही 20% तक एथेनॉल मिक्स है। आने वाले साल 2027 तक देश के हर कोने में सिर्फ और सिर्फ यही E20 पेट्रोल मिलेगा।
- क्या आएगी 100% एथेनॉल वाली गाड़ियां? जी हां, बिल्कुल आएंगी और बहुत जल्द आपके सामने सड़कों पर दौड़ती दिखेंगी। इन्हें तकनीकी दुनिया में 'फ्लेक्स-फ्यूल इंजन' (Flex-Fuel Engine) कहा जाता है। इन गाड़ियों की बनावट ही अलग होती है; इनकी फ्यूल पाइपें, इंजन ब्लॉक और कोटिंग ऐसी धातुओं से की जाती है जिन पर अल्कोहल का कोई असर नहीं होता, चाहे आप 100% शुद्ध अल्कोहल ही क्यों न डाल दें।
- दिमाग वाले इंजन की एंट्री: इन फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में एक बेहद स्मार्ट सेंसर लगा होता है। जैसे ही आप तेल डलवाएंगे, यह सेंसर भांप लेगा कि टंकी में शुद्ध पेट्रोल है, आधा पेट्रोल-आधा एथेनॉल है, या पूरा 100% एथेनॉल है। वह उसी सेकंड में इंजन की सेटिंग को खुद-ब-खुद बदल देगा ताकि गाड़ी बिना किसी झटके के मक्खन जैसी चलती रहे। टीवीएस, बजाज और टोयोटा जैसी बड़ी कंपनियों ने तो अपनी ऐसी गाड़ियाँ बाजार में दिखानी भी शुरू कर दी हैं।
3. यह 2G और 3G एथेनॉल प्लांट क्या बला है? समझिए रिलायंस का असली गेम
अब आपके दिमाग में एक नया कौतूहल जाग रहा होगा कि जब एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और अनाज की इतनी मारामारी है, तो फिर आगे क्या होगा? यहीं पर एंट्री होती है विज्ञान की नई पीढ़ी की, जिसे हम 2G (सेकंड जनरेशन) और 3G (थर्ड जनरेशन) प्लांट कहते हैं। रिलायंस जैसी देश की सबसे बड़ी कंपनियाँ इसी तकनीक पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं।
- कच्चे माल का असली गणित (1G बनाम 2G): जो पुराने प्लांट हैं (1G), वे सीधे गन्ने के रस, मक्के या टूटे चावल से एथेनॉल बनाते हैं—यानी वह चीज जिसे इंसान या जानवर खा सकते हैं। लेकिन 2G प्लांट में इंसान के भोजन को छुआ भी नहीं जाता। इसमें खेतों का वो कचरा इस्तेमाल होता है जिसे किसान जला देते हैं, जैसे धान की पराली, गेहूं का भूसा, गन्ने की खोई और बांस। यानी आम के आम और गुठलियों के दाम! पराली से होने वाला प्रदूषण भी खत्म और गाड़ी के लिए ईंधन भी तैयार।
- 3G प्लांट: बिना जमीन के पानी से बनेगा ईंधन: तीसरी पीढ़ी (3G) की तकनीक तो और भी जादुई है। इसके लिए न गन्ने की जरूरत है, न पराली की और न ही किसी उपजाऊ जमीन की। यह प्लांट समुद्र की काई (Algae), गंदे पानी में पलने वाले विशेष बैक्टीरिया और कारखानों से निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को सोखकर सीधे ईंधन बना देते हैं। प्रदूषण फैलाने वाली गैस को पकड़कर गाड़ी का तेल बना देना, है न कमाल की तकनीक!
- अरबों का निवेश और बड़ी कंपनियों की नजर: अब भाई, पराली और काई से पेट्रोल जैसी चीज निकालना कोई आसान काम तो है नहीं। इसके लिए बहुत ही जटिल केमिकल और एडवांस एंजाइम ट्रीटमेंट की जरूरत होती है। जहाँ साधारण 1G प्लांट ₹50-100 करोड़ में लग जाता है, वहीं एक हाई-टेक 2G या 3G प्लांट खड़ा करने में ₹500 करोड़ से लेकर ₹1000 करोड़ तक का भारी-भरकम खर्च आता है। यही वजह है कि रिलायंस और इंडियन ऑयल जैसी दिग्गज कंपनियाँ इसमें बड़ा निवेश कर रही हैं ताकि भविष्य में हमारे देश को ईंधन के लिए किसी भी बाहरी देश के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

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