असित कुमार हलदार आर्टिस्ट की जीवनी।Asit Kumar Haldar biography

 असित कुमार हाल्दार आर्टिस्ट की बायोग्राफी

Asit Kumar Haldar Artist ki Biography
असित कुमार हाल्दार - आधुनिक भारतीय चित्रकार, साहित्यकार और लखनऊ कला विद्यालय के पूर्व प्रिंसिपल की जीवनी।
असित कुमार हालदार 

असित कुमार हाल्दार: भारतीय कला के पुनर्जागरण के पुरोधा (पूर्ण जीवनी)

असित कुमार हाल्दार (1890-1964) केवल एक चित्रकार नहीं, बल्कि एक कल्पनाशील साहित्यकार, शिल्पकार, कला समालोचक, और विचारक थे। वे भारतीय कला जगत के उन स्तंभों में से एक हैं जिन्होंने पारंपरिक कला को आधुनिकता के साथ जोड़ा।

असित कुमार हाल्दार का प्रारंभिक जीवन---

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

​असित कुमार हाल्दार का जन्म 1890 में पश्चिम बंगाल के जोड़ासांको स्थित प्रसिद्ध टैगोर भवन के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। कला और विद्वत्ता उनके रक्त में थी। उनकी नानी विश्वकवि रवींद्र नाथ टैगोर की बहन थीं।

​उनके बाबा, राखालदास हाल्दार, लंदन विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक थे और उनके पिता सुकुमार हाल्दार भी कला में निपुण थे। पिता की प्रेरणा  से असित कुमार हाल्दार की चित्रकला में रुचि जगी और बचपन में ग्रामीणों  के बीच रहकर उनकी पटचित्र कला को करीब से   देखा  और समझा  उनके इस अनुभव ने असित कुमार के मन में कला के प्रति गहरा प्रेम जगाया।

शिक्षा और गुरु का सानिध्य

​15 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट में प्रविष्ट हुए। यहाँ उन्हें महान गुरु अवनींद्र नाथ टैगोर का मार्गदर्शन मिला। उन्होंने मूर्तिकला की बारीकियां जादू पाल और बकेश्वर पाल से सीखीं। उनके साथ कक्षा में शारदा चरण उकील, नंदलाल बोस और सुरेंद्र नाथ गांगुली जैसे प्रतिभावान सहपाठी थे। बाद में उन्होंने लंदन के वास्तुशिल्पी लियोनार्ड जेनिंग्स से शिल्पकारी का उच्च प्रशिक्षण भी लिया।

ऐतिहासिक भित्ति चित्र  निर्माण---

​हाल्दार जी ने भारतीय प्राचीन कला को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:

  • 1910: लेडी हरिंघम के साथ अजंता की गुफाओं की प्रतिकृतियां तैयार कीं।
  • 1914: समरेंद्र नाथ गुप्ता के साथ जोगीमारा गुफाओं (मध्य प्रदेश) के चित्रों की नकल बनाई।
  • 1921: नंदलाल बोस और सुरेंद्र कर के साथ मिलकर बाघ गुफाओं की प्रतिकृतियां तैयार कीं।

असित कुमार हाल्दार: प्रमुख कलात्मक उपलब्धियाँ

  • अजंता की प्रतिकृतियाँ (1910): 1910 में लेडी हरिंघम के नेतृत्व में असित कुमार हाल्दार और नंदलाल बसु अजंता की प्रतिकृतियाँ तैयार करने के लिए भेजे गए।
  • जोगीमारा की गुफाएँ (1914): भारतीय पुरातत्व विभाग ने 1914 में असित कुमार हाल्दार को समरेंद्र नाथ गुप्ता के साथ मध्यप्रदेश के रामगढ़ पहाड़ियों में स्थित जोगीमारा की गुफाओं के चित्रों की प्रतिकृतियों को बनाने के लिए भेजा।
  • बाघ गुफाओं का कार्य (1917 - 1921): 1917 में ग्वालियर स्टेट ने मध्यप्रदेश में स्थित बाघ गुफाओं की प्रतिकृतियों को लेने के लिए हाल्दार को बुलाया। 1921 में असित कुमार हाल्दार बाघ गुफाओं की अनुकृतियों को बनाने के लिए गए, इस समय इनका साथ नंदलाल बसु और सुरेंद्र कर ने दिया।
  • सम्राट जॉर्ज पंचम का आगमन: कलकत्ता में सम्राट जॉर्ज पंचम के आगमन पर असित कुमार हाल्दार तथा नंदलाल बसु और वेंकटप्पा के साथ पंडाल में बड़े-बड़े भित्ति चित्र (फ्रेस्को तकनीक से) बनाए थे।

कला शिक्षक और लेखन---

असित कुमार हाल्दार चित्रकार के साथ साथ ,साहित्यकार,समीक्षक,चिंतक,मूर्तिकार,शिक्षक, भी थे।

असित कुमार हाल्दार केवल चित्रकारी में ही दक्ष नही थे बल्कि उन्होंने कई वर्ष तक शिक्षण कार्य किया पहले उन्होंने,1923 में शांतिनिकेतन के कला भवन में प्रिंसिपल बने 1924 में राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट जयपुर में प्रिंसिपल  उसके बाद लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट में शिक्षण कार्य किया  1925 में लखनऊ कला विद्यालय में प्रिंसिपल बने और 1945 तक  यहां सेवा देते रहे।

उन्होंने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम इंडियन कल्चर एट के ग्लान्स" Indian Culture at a glance"  लिखा। उन्होंने अनेक कविताओं की रचना की संस्कृत के अनेक श्लोक की रचना की ।उन्होंने मेघदूत और ऋतु संहार का बंगला में अनुवाद किया।

हाल्दार एक कवि भी थे जिन्होंने जीवन भर कविताएं कीं उन्होंने कालिदास की मेघदूत को ट्रांसलेट भी किया।

वह पहले भारतीय थे जिन्होंने रॉयल सोसाइटी ऑफ आर्ट लंदन से फेलोशिप  मिला।

कला यात्रा---

असित कुमार हाल्दार ने प्रारम्भ भित्ति चित्रण से किया पर बाद में कला के हर विधा और आयाम में काम किया ,उन्होंने बाद में तेल रंग,टेम्परा तकनीक ,जल रंग में भांति भांति प्रयोग किये। आपने स्केच चित्रण भी किया।

असित कुमार हाल्दार की कला यात्रा अनोखी है उनकी कला भावप्रवण है।  इन्होंने अधिकांशतया अपने चित्रों में ऐतिहासिक घटनाओं और पुराख्यानों को आधार बनाया असित कुमार हलदार ने ऐतिहासिक कविताओं पर आधारित 30 चित्र बनवाये। रवींद्र नाथ टैगोर ने उनके चित्रों को देखकर टिप्पणी की कि;"तुम चित्रकार ही नहीं कवि भी हो यही कारण है कि तुम्हारी तूलिका से रसधारा बहती है,आपकी चेतना ने मिट्टी में भी प्राण फूंक दिए हैं।आपकी कला में संगीत के  मादक लय के साथ कला की मुगल शैली,कला की फारस की शैली की नफासत भी दिखाई देती है।

इन्होंने मेघदूत,ऋतु संहार,उमर खैय्याम,रामायण आदि पर चित्र श्रृंखला बनाई।

आपके प्रारंभिक चित्रों में सीता,नृत्यांगना,यशोदा मां है।

इनके चित्रों में  संथाल लोक नृत्य,रासलीला ,अशोक व पुत्र कुणाल ,बसंत बाहर ,नाव वधू ,कच-देवयानी,प्रारब्ध ,अनजाना सफ़र ,झरना,द स्प्रिट ऑफ स्टॉर्म आदि उल्लेखनीय है।

हाल्दार ने कॉस्मिक पेंटिंग की इन चित्रों में हृदय की भावनाओं के साथ साथ अतिरिक्त सजावट पर भी ध्यान दिया।

इन्होंने वाश में काम किया,टेम्परा में काम किया,तैल में काम किया भित्ति चित्रण में कार्य किया केनवास में भी काम किया  कागज में भी काम किया,काष्ठ में काम किया,लेसिट विधि से काम किया।

असित कुमार हाल्दार ने  चित्रण के साथ साथ पत्थर की प्रतिमाएं,कांस्य की प्रतिमाएं,काष्ठ की प्रतिमाएं  भी बनाईं।

असित कुमार  हाल्दार ने अपनी निजी चित्रकला पद्धति को विकसित किया जिसे लेसिट  पद्धति कहा गया ,जो इस प्रकार है

असित कुमार हलदार भारतीय पुनर्जागरण कला के प्रमुख स्तंभ थे। उनकी सबसे महंगी पेंटिंग 'रजत ज्योति' (Silver Light) मानी जाती है, जो ऊंचे दामों में नीमी गई थी।

प्रमुख जानकारी

  • माध्यम: उन्होंने मुख्य रूप से वॉश (Wash) और टेम्परा (Tempera) तकनीक का प्रयोग किया। इसके अलावा 'लेसिट' (Lacit) नामक नई शैली भी विकसित की।
  • कला की विशेषता: उनकी कला में कोमलता और लयबद्धता थी। वे शांतिनिकेतन शैली के अग्रणी कलाकार थे।
  • कमी/आलोचना: कुछ आलोचकों के अनुसार, उनकी बाद की कृतियों में रंगों का दोहराव था और उनमें मौलिकता की थोड़ी कमी दिखने लगी थी।

याद करने के आसान तरीके

  1. 'असित' से 'अमिट': याद रखें कि उन्होंने अजंता और बाघ की गुफाओं की अमिट (असित) प्रतियां बनाईं।
  2. लखनऊ कनेक्शन: वे लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट्स के पहले भारतीय प्रिंसिपल थे; इसे 'नवाबों की लय' (लयबद्ध कला) से जोड़ें।
  3. संगीत और कविता: उनकी पेंटिंग्स में कविता जैसा प्रवाह है, इसलिए उन्हें 'कवि कलाकार' के रूप में याद करें।

असित कुमार हाल्दार की विशिष्ट तकनीक: 'लेसिट' (Lacit)

असित कुमार हाल्दार केवल पारंपरिक विधाओं तक सीमित नहीं थे। उन्होंने चित्रकला में एक बिल्कुल नई विधा को जन्म दिया जिसे 'लेसिट' (Lacit) कहा जाता है। इस तकनीक में उन्होंने लकड़ी (Wood) पर वार्निश और रंगों के विशेष मिश्रण का उपयोग किया। इस प्रयोग ने भारतीय आधुनिक कला को एक नया धरातल दिया, जहाँ लकड़ी की प्राकृतिक बनावट और रंगों का मेल अद्भुत प्रभाव पैदा करता था।

​साथ ही, उनका लखनऊ से गहरा जुड़ाव रहा। 1925 में जब वे लखनऊ स्कूल ऑफ आर्ट्स के पहले भारतीय प्रिंसिपल बने, तो उन्होंने वहाँ की शिक्षा प्रणाली में भारतीयता और लोक कला का समावेश किया, जिससे उत्तर प्रदेश में कला की एक नई पीढ़ी तैयार हुई।

संग्रह---

असित कुमार हाल्दार  की बनाईं कलाकृतियां दुनिया भर के कई संग्रहालयों में हैं जैसे 'इलाहाबाद म्यूनिसिपल  म्यूजियम' के हाल्दार भवन में हैं ,इसके अलावा,बोस्टन म्यूजियम,विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम लंदन,इंडियन म्यूज़ियम कलकत्ता,श्री चित्रालयम आर्ट गैलरी त्रिवेंद्रम तथा रामस्वामी मुदलियार संग्रहालय में है। परंतु ज़्यादातर कलाकृतियां इलाहाबाद(प्रयागराज)के म्यूनिसिपल संग्रहालय में है।

निष्कर्ष---

उस प्रकार कहा जा सकता है कि  असित कुमार हाल्दार ने भारतीय कला के विशाल सेतु  के एक और स्तम्भ को मजबूत किया तथा कला को एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

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