Samsung M-12 phone review

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ऋग्वैदिक काल का इतिहास और संस्कृति

ऋग्वैदिक  काल का इतिहास और संस्कृति

 ऋग्वैदिक  काल मे आर्यजन कितने क्षेत्र में फैले थे ,उनका राजनीतिक, सामाजिक,धार्मिक जीवन कैसा था ,उन्होंने प्रारम्भ में वेदों की रचना किन स्थानों के की वो किसको पवित्र मानते थे ,वो अपने जीवन निर्वाह के लिए क्या क्या उपाय करते थे ,ये सब जानने के लिए उस समय के रचित वैदिक ग्रन्थ ऋग्वेद का अध्ययन करना होगा क्योंकि उसके सूक्तों और श्लोकों में ही हर बात का वर्णन मिलता है।

ऋग्वैदिक आर्यों  का  भौगोलिक  विस्तार : 

आर्य का प्रारंभिक निवास स्थल आज  के  अफगानिस्तान  के पूर्वी भाग आधुनिक पाकिस्तान और पश्चिमी राजस्थान के आसपास पंजाब तक सीमित था क्योंकि ऋग्वैदिक काल मे हमे जिन नदियों का उल्लेख इस ग्रंथ में मिलता है उनमें से काबुल की  क्रमू(कुर्रम), कुभा(काबुल),सुवास्तु(स्वात) और गोमती(गोमल) का उल्लेख है ये सभी अफगानिस्तान में है इसी तरह दृषद्वती (घग्घर),विपाशा(व्यास), शतुद्री(सतलज), परूषनी (रावी), अस्किनी(चेनाब),वितस्ता(झेलम), नदियों का उल्लेख किया गया है। सिंधु और सरस्वती नदियों का सबसे अधिक वर्णन है और इनकी सबसे अधिक महिमा बताई गई है,इस प्रकार सप्तसैंधव प्रदेश था ये इसमें राजस्थान की दो नदियां दृषद्वती (घग्गर)और सरस्वती का  और  पंजाब   की पांच नदियाँ  आतीं है।   इस क्षेत्र में ही ऋग्वेद की प्रारंभिक सूक्तों की रचना हुई ,बाद में सरस्वती और दृषद्वती क्षेत्र ही अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया। इस क्षेत्र को ब्रम्हावर्त क्षेत्र कहा जाता था , गंगा और यमुना का उल्लेख ऋग्वेद में बहुत ही कम बार मिलता है परंतु नदियों के आधार पर ये कहा जा सकता है कि आर्य संस्कृति का विस्तार ,अफगानिस्तान, पाकिस्तान, पंजाब,हरियाणा राजस्थान, और पश्चमी उत्तर प्रदेश तक था। इनमे सबसे अधिक जमाव  सिंधु और सरस्वती के आसपास होगा क्योंकि सरस्वती को सबसे पवित्र नदी माना गया है,  ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का वर्णन तीन बार ही हुआ है , इसका तात्पर्य ये है कि आर्य फैलाव की  आखिरी सीमा थी। गंगा को ऋग्वैदिक आर्यों की पूर्वी सीमा मानी जाती थी।
         उत्तरवैदिक काल तक  आर्यों का भौगोलिक विस्तार हो चुका था , भौगोलिक ज्ञान ज्यादा विस्तृत था,उत्तर वैदिक काल मे हमें समुद्रों नदियों और पर्वतों के उल्लेख मिलता ,आर्य अब  भौगोलिक प्रसार करते हुये ब्रम्हावर्त, आर्यावर्त, मध्यदेश,दक्षिणा पथ तक विस्तृत थे। उत्तर वैदिक काल मे लिखित सतपथ ब्राम्हण ग्रन्थ में काम्पिल्य, कुरुक्षेत्र , हस्तिनापुर, कौशाम्बी, जैसे महत्वपूर्ण स्थल का वर्णन है उत्तरवैदिक ग्रंथों में नैमिषारण्य,अरब,सागर,हिन्द महासागर, विन्ध्यपर्वत , त्रिककुंड और क्रौंच  जो हिमालय की पर्वत श्रेणियां थी वर्णित हैं,मारू नामक रेगिस्तान का उल्लेख मिलता है जिससे ये सिद्ध होता है कि इस समय तक आर्यों का विस्तार सिर्फ पंजाब तक नही रहा बल्कि वो सम्पूर्ण उत्तर भारत मे फैल चुके थे और विंध्य पर्वत तक का भाग  आर्यों  केे अंतर्गत आ चुका था यानी उस समय विंध्य दक्षिणी सीमा थी।


    आर्यो की राजनीतिक अवस्था-- फैलाव 

आर्य जब सप्तसिंधु प्रदेश में बसे और उनके एक कुल  या क़बीले थे ,कबीले अपने क्षेत्र और पशुधन विस्तार के लिए संघर्षरत थे  ये संघर्ष चूंकि गाय और  चारागाह  से सम्बंधित था इसलिए  इसे  गविष्टि ,गव्य और गभ्य  कहा जाता था  ये कबीले रक्त संबध पर संगठित थे,ये क़बीले अनु,द्रुहु ,यदु ,तुर्वशु और मत्स्य तथा भरत थे  ,ऋग्वेद में इन कबीलों के बीच हुए युद्ध का वर्णन मिलता है  ये कबीले जिन्हें "जन" भी कहा जाता था इनका प्रथम संघर्ष 'यव्यावती' के तट पर 'हरयूपिया' नामक स्थान पर तुर्वश तथा वीचविन्तों तथा सृंजयों के बीच हुआ इस युद्ध मे वीचविन्तों की पराजय हुई  सृंजय जीत गए इस युद्ध मे 30 हजार कवचधारी योद्धाओं ने भाग लिया था यही संघर्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर नए गुटों को बनाने में योगदान दिया परिणामस्वरूप दस राजाओ और उसके मित्रों ने भाग लिया इस प्रकार समूचा ऋग्वैदिक भारत इसमे सम्मिलित हुआ  ये युद्ध पुरुषणी (रावी) नदी के किनारे हुआ जिसका मुख्य  नेतृत्वकर्ता सुदास था इस युद्ध को दस राजाओं   का युद्ध या 'दाशराज्ञ युद्ध' कहा जाता था, सुदास के विरोध में विश्वामित्र ने पंच जन अनु ,द्रुह ,यदु, तुर्वसु, पुरु को संगठित किया ,इस युद्ध मे सुदास की विजय हुई। इस युद्ध मे आर्य जन के साथ कुछ अनार्य जातियाँ जैसे अलिन (वर्तमान कफ़रिस्तान के लोग) , पक्थ (पख़्तून) जातियाँ सम्मिलित हुई थीं।

          इन आंतरिक संघर्ष के अलावा आर्यों को कुछ अनार्य  जातियों जैसे अज , यक्ष ,कीकट जातियों से भिड़ना पड़ा ये अनार्य जातियां आर्यो की ही अंश हो सकती है जो पहले आकर बसीं हो और आर्यों से सांस्कृतिक विभिन्नता रखती हों क्योंकि ऋग्वेद में  इन्हें पणि और दस्यु  संज्ञा से  संबोधित किया गया है ,पणि लोग चोरी छुपे आर्यों की गायों को ले जाते थे ,युद्ध के दरमियान आर्य इन इन पर भारी पड़ते थे और कई बार इनको बन्दी बनाकर दास बना लेते थे।

 आर्यो की राजनीतिक  व्यवस्था----

  इस समय की राजनीतिक जीवन को समझने के लिए कुछ सामाजिक संस्थाओं को समझते है जैसे सबसे प्रारंभिक संस्था थी परिवार थी जिसे गृह या कुल कहा जाता था इसका पारिवारिक मुखिया कुलप कहा जाता था इसके बाद कुछ बड़ी संस्था ग्राम थी जिसका प्रशासक ग्रामणी था इसके बाद तीसरे स्तर की बड़ी संस्था थी क़बीला जिसे जन कहा जाता था जिसमे कई ग्राम होते थे इस कबीले को "विश" कहा जाता था इस विश के मुखिया को विशपति कहा जाता था ,   इसके  बाद की  बड़ी  इकाई थी जन जो राज्य से छोटी संस्था थी  और कई छोटे और बड़े जन को मिलाकर राज्य बनता था  जन  का मुखिया 'राजन' कहलाता था  राज्य को राष्ट्र की संज्ञा भी दी जाती थी , ये सभी संस्थाएं उस काल मे संगठित रहने के योग्य बनाती थीं। राज्य का प्रमुख" राजा "होता था राजा राज्य की जनता के लिए अधिशासक था दंडाधिकारी था पर राजा स्वयं दंड से ऊपर था या 'अदंडय ' था क्योंकि ये माना जाता था राजा कोई ग़लती नहीं कर सकता , प्रजा द्वारा राजा का निर्वाचन का उल्लेख इस प्रकार ऋग्वेद में मिलता है कि राजा प्रजा को ग्राह्य होना चाहिए जिससे राष्ट्र की कोई हानि न होवे, यानी इस समय राजा को ईश्वर का अवतार नही माना जाता था बल्कि उसे क़बीले का सबसे योग्य अनुभवी व्यक्ति ही माना जाता था ,राजा को सेनानी की सहायता से कबीले के लोंगों के संपत्ति की रक्षा करने को वचनबद्ध होता था इसके,लिए वो अन्य क़बीलों से युद्ध भी करता था ,राजा की जन के लोगो स्वेच्छा जे बलि प्रदान करते थे जो उसके सैन्य रखरखाव के लिए जरूरी था ।
    न्याय प्रणाली पूर्णतया विकसित नही हुई थी राजा ही न्याय करता था,झगड़े निपटाने के लिए मध्यस्थम का भी वर्णन मिलता है , ऋग्वेद में वर्णन मिलता है कि अपराधी (जीवगृभ) को तत्काल उग्र (पुलिस) के सामने हाजिर किया जाता था।
      इस समय तीन राजनीतिक संस्थाओं का वर्णन ऋग्वेद में मिलता है,ये संस्थाएं सभा,समिति ,विदथ थीं। समिति बड़ी संस्था थी जिसमे राजा भाषण देकर सभाजनों को अपने पक्ष में करता था , सूक्त में सभी नागरिकों को एक साथ पधारने का आह्वान मिलता है, एक वाणी में बोलने एक विचारधारा बनाएं   एक  हृदय भावना के होने , एक नीति का अनुसरण करने की प्रेणना दे गई है।

सभा ,समिति और विदथ----

 राजा के ऊपर नियंत्रण करने के लिए लिए सभा समिति का महत्त्वपूर्ण योगदान था,ऋग्वेद में सभा का सदस्य होना आदर की बात की गई है,कुछ विद्वान यह मानते हैं कि सभा समिति के अधीन कार्य करती थी ,समिति का प्रमुख कार्य राजा के निर्वाचन में सहायता करना था, इन सभी संस्थाओं में राजनीतिक,धार्मिक,सामाजिक प्रश्नों पर चर्चा होती थी। ऋग्वेद तथा अथर्वेद से पता चलता है कि समिति में राजकीय विषयों पर चर्चा होती थी,तथा सहमति के आधार पर निर्णय लिए जाते थे

              कुछ साक्ष्यों से पता चलता है कि समिति के प्रमुख को 'ईशान' या 'पति' कहा जाता था,पर कुछ विद्वान राजा को ही समिति का प्रमुख मानते थे, राजा के समिति में उपस्थिति  रहने की प्रथा ऋग्वैदिक काल से उपनिषद काल तक चलती रही,परंतु धीरे धीरे समिति के कार्य अधिकार में थोड़ा बहुत परिवर्तन अवश्य हुआ होगा। अथर्वेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां बताई गई है,सभा के सदस्यों को सभासद कहा जाता था , सभा के निर्णय सभी के लिए मान्य होते थे परन्तु मैत्रायणी संहिता से ये मालूम होता है कि स्त्रियां सभा मे उपस्थित नही होती थीं,बहस में राजकीय विषयों में चर्चा होती थी  सभा से न्यायिक कार्य भी किये जाते थे । विदथ  संस्था में नववधू का स्वागत,स्त्रीयों की उपस्थिति ,तथा स्त्रीयों और पुरुषों दोनों विदथ में उपस्थित होकर विचार विमर्श के लिए भाग लेते थे,राम शरण शर्मा के अनुसार ऋग्वेद में विदथ का उल्लेख 122 बार आया है जबकि सभा समिति का उल्लेख सिर्फ 8 से 9 बार आया है,ऋग्वेद में विदथ का प्रयोग सभा समिति से कहीं अधिक  होता था ,पर उत्तरवैदिक काल मे विदथ की भूमिका कम होती चली गई। ऋग्वेद में 21 सूक्तों में विदथ में वीरों की उपस्थिति की बात की गई है,जिससे लगता है कि विदथ का प्रमुख सैन्य गतिविधियों में नियंत्रण रखता होगा यानी विदथ का प्रमुख कार्य धार्मिक  और सैनिक महत्व का था।

ऋग्वैदिक काल मे राजा की मंत्रिपरिषद---

          ऋग्वैदिक राजा कि मंत्रिपरिषद भी होती थी जिसमे पुरोहित ,सेनानी और ग्रामणी होते थे इनका कार्य राजा को सहयोग प्रदान करना था ,पुरोहित राजा को न्याय और अन्य प्रशासनिक कार्यों में सहायता देता था तो सेनानी राजा के सैन्य संचालन में मदद करता था, ग्रामणी ग्राम्य विषय के मामलों में राजा को सलाह देता था , सेना का नेतृत्व राजा करता था , सेना में  पैदल, रथ,घोड़े होते थे, सैनिक कवच(वर्म)पहनते थे लोहे की टोपी (शिप्रा) पहनते थे , धनुष और बाण जिसके नोक में ताम्बे की नोक लगी होती थी। तलवार(असि) , भाले (स्रक्ति) , आदि अस्त्र का प्रयोग होता था , रथों को खींचने के लिए घोड़े थे जिन्हें सारथी संचालित करता था ।

 ऋग्वैदिक काल मे धार्मिक जीवन और शिक्षा --

   ऋग्वेद काल मे शिक्षा ----

उस समय शिक्षा गुरुकुल में होती थी, शिक्षण में वर्णित मन्त्रो को विद्यार्थी  अध्ययन मनन करते थे ,प्रमुख शिक्षक ऋषि  और श्रुतर्षि  कहलाते थे जो अपने तप योग साधना से सत्य को जान पाते थे   वहीं  उनसेे छोटे देव संपर्क से विभिन्न मन्त्र का जन्म हुआ यही मन्त्र शिष्य एक  साथ दोहराते थे गुरु के  सानिध्य में रहकर । उस तक  के सभी छात्र सिर्फ मनन चिन्तन द्वारा वेदों के अध्ययन को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया गया , ऋग्वेद में  में उच्चतम  आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान का वर्णन है। वैदिक ज्ञान जो मौखिक रूप  से शिष्य गुरु से सीखते थे श्रुति कहलाता था यह ज्ञान गम्भीर  एकाग्र मनन द्वारा आत्मसात किया जाता था। यह केवल रटकर नही  जाानी  जा सकती थी।  ऋग्वेद में दिया गया है कि जो विद्यार्थी ऋचाओं को बिना समझे पढ़ता है उसकी शिक्षा व्यर्थ है (यस्तन वेद किम ऋचा करिष्यति), यानी प्रारम्भ में तो विद्यार्थी ऋचाओं को रटकर दोहराकर याद करता था पर अगले चरण में हर विद्यार्थी प्रत्येक ऋचा को अपने साधना और तप के द्वारा प्रत्येक ऋचा का गूढ़ अर्थ जानने की कोशिश करता था।

       यास्क के अनुसार कोई भी  शिक्षक ऐसे विद्यार्थी को नही पढ़ा सकता था जो उसके साथ न रहता हो (न अनुपस्सनाय), ऋषि के आश्रम में या ऋषि के घर मे घरेलू विद्यालय होता था ,जहां ऋषियों के साथ अनेक शिष्य रहते थे यह साथ मे  रहने वाले शिष्य ब्रतचारी अथवा ब्रम्हचारी कहलाते थे क्योंकि इनको बहुत से कठोर  तपस्या, नियमों और व्रतों का पालन करना पड़ता था , वेद कालीन भाषा भी उच्चतम ज्ञान के आधार पर जन्मी ,व्याकरण के जटिल नियम विकसित थे, ऋग्वेद की भाषा गंभीर दार्शनिक विचारों और आध्यात्मिक भावों की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त थी।

       ऋग्वेद काल की देव उपासना-----

ऋग्वेदकाल  में प्रकृति की पूजा होती थी तथा उस समय के लोग बहुदेववाद वाद को मानते थे यद्यपि प्रत्येक देवता परब्रह्म की अभिव्यक्ति के रूप में पूजा जाता था , ऋग्वेद में लिखा है कि "ऋषियों ने एक तत्व को अनेक रूप में दर्शन किया है"(एकम सतं बहुधा कल्पयन्ति) ऋग्वेद में लिखा है कि ऋषि एक सत्य। (ईश्वर) को अग्नि , मित्र, वरुण, यम ,भातृशवा आदि अनेक नामों से पुकारते है, यहाँ एक देव विष्णु को कहा गया है और ऋग्वेद के 10/82/3 सूक्त में ये लिखा गया है कि एक ही देवता (विष्णु?) जो विभिन्न देवताओं के नामों को धारण करता है (यो देवानां नामधा एक एव) ऋग्वेद में ही इस एक देव को विष्णु कहा गया है जिसकी  सर्वव्यापी उपस्थिति को योगी नित्य दर्शन(सदा पश्यन्ति) करते हैं, प्रसिद्व गायत्री मंत्र में उसी परमात्मा को  मुख्य चिंतन तत्व माना गया है जो मनुष्य के हर सांस में विद्यमान है इसलिए मनुष्य का परम कर्तव्य है कि उस सर्वेश्वर को हर क्षण ध्यान ( धीमहि) करता रहे इस गायत्री मंत्र में उसी सर्वेश्वर एक देव को सूर्य आदि बाह्य तत्वों में प्रवेश करते  तथा मनुष्य के आंतरिक मन मे प्रवेश करते  दिखाया गया है , यही एक देव मनुष्य के चेतना के रूप में विद्यमान रहता है【नृसत- नृषु चैतन्यरूपेंण  सदति इति, यही एक देव पूरे ब्राम्हण का संचालन कर्ता (ऋत) विश्व विधान का कर्ता माना जाता है।
  ऋग्वेद में 33 देवताओं का उल्लेख मिलता है इनमे भी तीन वर्ग है जैसे --
पृथ्वी के देवता-- ----पृथ्वी,अग्नि,सोम,बृहस्पति आदि
वायुमंडल के देवता ------ इंद्र वरुण,वायु,मरुत ,रुद्र आदि)
आकाश के देवता---वरुण, मित्र , सूर्य ,उषा,सविता, अश्विन आदि) 
इनमे सबसे अधिक 250 सूक्त में इन्द्र को वर्णित  किया गया, इंद्र को वर्षा और आँधी का देवता माना जाता था,वरुण (आकाश) शक्ति एवं नैतिकता का देवता, मित्र वरुण का सहयोगी था, अग्नि भी महत्त्वपूर्ण देवता थे इसके लिए ऋग्वेद में 200  ऋचाएं मिलतीं हैं यह देवता अग्नि अन्य देवता तथा मनुष्य के बीच  सम्पर्क का जरिया थे क्योंकि दवताओं को जो हवि यज्ञ में दी जाती थी उसे अग्नि के माध्यम से पहुंचाया जाता था,सोम वनस्पति का देवता था,पूषन पशुओं की रक्षा करने वाला देवता था या कृषि देवता थे तो सूर्य प्रकाश का देवता था और मरुत तूफ़ान का देवता था, इसके अलावा हमे कुछ छोटे देवता ,भूत प्रेत,राक्षस,अप्सराओं को भी प्रकृति में विद्यमान बताया गया था,कुछ देवियों का भी वर्णन है  जैसे 'अदिति 'और 'उषा'। इसके अलावा कुछ अमूर्त देवता जैसे 'ऋत' (सत्य), 'सुंरूति' ( समृद्धि), 'श्रद्धा' और 'दान' आदि अमूर्त देवताओं की कल्पना की गई है। यह अमूर्त देवताओं की कल्पना धार्मिक विचारों के विकसित होने का प्रमाण है।

       देवताओं में मानवोचित गुण होते थे वो दयालु होते थे, हर व्यक्ति के भलाई  के लिए तत्पर रहते थे ,चूंकि उस समय के लोगों को मोक्ष की अवधारणा नहीं थी इसलिए आर्य  पृथ्वी में सौ साल जीने की आकांक्षा और  ,समृद्धिपूर्ण जीवन जीने की इच्छा रखते थे इसीलिए विभिन्न देवताओं से यज्ञ द्वारा प्रसन्न किया जाता था और देवताओं से लौकिक जीवन मे सुख समृद्धि की कामना के लिए  शतवर्षीय  आयु, पुत्र ,धन धान्य और युद्ध मे विजय की कामना की जाती थी, देवताओं को प्रसन्न करने में व्यक्तिगत और सामूहिक यज्ञ होते थे जिसमें दूध ,घी ,पकवान समर्पित किये जाते थे , परंतु यज्ञ के भौतिक स्वरूप के पीछे आध्यात्मिक महत्व छिपा था, जिसमे उस आदिम दैव यज्ञ की अभिधारणा थी जिसमें एक ही सृष्टि के संचालक सर्वेश्वर ने यज्ञ द्वारा पृथ्वी और समस्त सृष्टि के संचालन के लिए अपने स्वरूप में अलग अलग कार्य के लिए अलग अलग रूप में निर्मित किया ,यही कार्य हर मनुष्य को जीवन एक तप के समान बताया गया है और उसे हर कार्य को संपादित करने के लिए ख़ुद के इच्छाओं के बलिदान और आत्म बलिदान से प्राप्त होती है और जीवन मे कुछ नए का निर्माण करने के लिए हर क्षण एक यज्ञ करना पड़ता है और यज्ञ पूरा करने के लिए ईश्वर या उस देव से उस कार्य  को प्रारंभ करने की अनुमति ली जाती है ।

          यज्ञ अनेक प्रकार के थे जैसे अग्निस्टोम, देवयज्ञ,पित्र यज्ञ ,ब्रम्ह यज्ञ,पुत्रकामेष्टि यज्ञ, आदि थे परंतु राजसूय यज्ञ तथा बाजपेय यज्ञ सिर्फ़ राजा करते थे ये यज्ञ राजा द्वारा राज्य विस्तार के बाद किये जाते थे यज्ञ संपादित किये जाबे के विधि विधान थे जो यजुर्वेद में दिए गए है ,यज्ञ संपादन में मंत्रों के जाप में अत्यधिक शुध्दता बरती जाती थी ।  बाद में उत्तरवैदिक काल के यज्ञ को संचालित करने में (expert ) दक्ष पुरोहित होने  लगे थे जो मन्त्रों के साथ आह्वाहन करने वाले अध्वर्यु कहलाते थे इसी तरह 
 'होता' पुरोहित को पूरे यज्ञ के प्रबंध की ज़िम्मेदारी संभालते थे। ये विधान उत्तरवैदिक काल के ग्रंथों में वर्णित है जबकि ऋग्वैदिक काल मे यज्ञ सरल रूप में संपादित होते थे पर उत्तरोत्तर यज्ञ में जटिलता आने लगी  थी।

ऋग्वैदिक काल मे सामाजिक जीवन--


 ऋग्वेद में  व्यक्तियों में पितृसत्तातमक व्यवस्था थी , समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार थी और कुलपति का परिवार के सदस्यों पर  नियंत्रण रहता था परिवार में कई पीढ़ियों के साथ सभी बंधु  बांधव  एक साथ रहते थे जिन्हें नृप्त कहा जाता था,अनेक मन्त्रों में योग्य पुत्रों  की कामना की गई, शायद  योग्य  पुत्रों की कामना युद्ध आदि होते रहने के कारण हुई होगी। बाल विवाह का प्रचलन नहीं था, विवाह एक धार्मिक कृत्य समझा जाता था
           परिवार पितृसत्तात्मक जरूर थे परंतु स्त्रियों का सम्मान होता था , ऋग्वेद काल मे पुरुष एक पत्नी से ही विवाहित होते थे अर्थात एक पत्नी प्रधान समाज था, बहुपत्नी प्रथा प्रारम्भ नहीं हुई थी।
    स्त्रियों को हर निर्णय लेने में भागीदार रखा जाता था, विवाह में स्त्री को विवाह संबंधी स्वतंत्रता थी यद्यपि उसमें पिता की सहमति आवश्यक थी,स्त्रियों के विवाहपरांत वधू नए घर की स्वामिनी बनतीं थीं और अपने सास-ससुर, ननद-जेठ आदि की देखभाल करती थीं , स्त्रियों को अपने पति के साथ धार्मिक कार्यों में भाग लेने की स्वतंत्रता थी , उस काल मे स्त्रियां विद्या अध्ययन भी करतीं थी कुछ विदुसी महिलाओं ने तो वेदों में कुछ सूक्तों की रचना की थी और उन्होंने ऋषियों का पद प्राप्त किया इनमे प्रमुख थीं विश्पला,घोषा,अपाला,विश्ववारा, रोमशा, पॉलोमी, सावित्री आदि ऋग्वेद में इन्हें "ऋषिका" और 'ब्रम्हवादिनी' भी कहा जाता था । स्त्रियां उस समय की राजनीतिक संस्थाएं  सभा और समिति में और विदथ में भाग लेतीं थीं।उस समय विधवा विवाह वर्जित था। 

    ब्राम्हणऔर क्षत्रिय और वैश्य प्रमुख थे ब्राम्हण और क्षत्रिय के अतिरिक्त शेष समाज विश या वैश्य कहलाता था जो व्यापार कृषि कार्य और सेवा कार्य से जुड़े थे  इस समय अनार्य जातियाँ भी सम्मिलित हो रहीं थीं,ऋग्वैदिक समाज मे दास  दस्युयों का भी  उल्लेख मिलता है दास वर्ग में आदिम जातियों के अलावा युद्ध बन्दी,दस्यूओं को आर्यों का प्रमुखता शत्रु  माना जाता था।

  भोजन और वस्त्र:

 आर्य जन घास फूस से घर बनाते थे ,ईंटो के प्रयोग का ज्ञान नही था।

आर्य जन भोजन में दूध से बने पकवान खाते थे दूध से बने पदार्थ में दही,मक्खन मट्ठा का प्रयोग होता था क्षीर पाकमोदनम , करम्भ, अपूप नामक भोज्य पदार्थ दूध से बनते थे , सकतू (सत्तू)  भूनकर पीसा गया अन्न होता था, दूध से बने अन्य खाद्य पदार्थ आमीक्षा,दधि, नवनीत, घृत, पृषद-आज्य, फाण्ट, वाजिन, आदि लोकप्रिय थे

  जौ और चावल का अनाज के रूप में प्रयोग होता था ।जौ महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है,वैदिक साहित्य में यव का अर्थ किसी भी अन्न के लिए हो सकता है,गोधूम का  उल्लेख बहुत कम होने से लगता है कि गेहूं का बहुत कम प्रयोग होता था, इसके अलावा व्रीही(चावल),माष, मुग्द(मूंग),सरसप(सरसों)का प्रयोग  होता था।

     कुछ लोग मांसाहारी भी थे बकरी तथा अन्य जानवरों का मांस खाया जाता था , गाय को अघन्या कहा जाता  था अर्थात गाय का वध नही होता था।सुरापान वर्जित था। 
  पेय में सोमरस को  सर्वाधिक  महत्व दिया गया,सोम के पौधे मुजवंत पर्वत और गौरी नदी के किनारे पाए जाते थे,इन पौधों से जो रस निकलता था उसे रस, पीयूष,अमृत तक का दर्जा दिया गया है,परंतु सोम की संतोषजनक पहचान नही हो सकी ,यह पौधा ब्राम्हण काल तक धीर धीरे गायब ह,इसी तरह सूरा का भी वैदिक  काल मे उल्लेख मिलता है किन्तु वैदिक काल मे इसे पाप क्रोध और द्यूत के साथ इसे जोड़ा गया है,
       ऋग्वेद काल मे लोग उत्तरीय (ऊपर का वस्त्र),नीवी (मध्य अंदरूनी  वस्त्र),धोती (नीचे का वस्त्र) पहने जाते थे ,कपड़ों में कढ़ाई भी प्रयुक्त होता था, वस्त्र सूती और ऊनी दोनों होते थे ,वस्त्रों को रंगने और  कशीदा कारी करनें की कला भी प्रचलित थी ,बाल संवारने के विभिन्न ढंग थे, आर्य आभूषणों के भी शौकीन थे,स्त्री पुरुष दोनों आभूषण धारण करते थे,निष्क मणि गले के आभूषण थे,रुक्म वक्ष में धारण किया जाता था,खादि एक अंगूठी रही होगी,केशों को तेल लगाकर काढ़ा जाता था,स्त्रियाँ केशों में जूड़ा लगातीं  थीं पुरूष सामान्यता दाढ़ी रखते थे ,पर क्षुर शब्द से उस्तरे का प्रयोग जान पड़ता है,मुनि  और ऋषि लोग पशु चर्म व गेरुए वस्त्र धारण करते थे।

    महिलाएं आभूषण धारण करतीं थीं ,कर्ण कुण्डल और गर्दन में आभूषण पहनने का रिवाज़ था, कुरीर सिर पर धारण करने वाला आभूषण था,ऋग्वेद के विवाह संबंधी सूक्त से ये मालूम होता है कि इसे विवाह के रूप में वधुएं धारण करतीं थी।

             महिलाएं नूपुर और बिछुआ पहनतीं थीं, वैदिक लोंगों को सप्त स्वरों का ज्ञान थ,वो लोग नर्तन, वादन में कुशल थे , दुंदभी,  कर्क़री (बांसुरी) और वीणा का व्यवहार होता था। 
   आर्य मनोरंजन के साधनों में रथों के दौड़, द्यूत क्रीड़ा ,नृत्य गान का प्रयोग करते थे । मृगया राजन्य वर्ग के मनोरंजन का साधन भी था राजा शिकार पर अपने सैन्य रक्षकों के साथ  निकलता था।
 छः मे कुछ सूक्त में नाटकों संबंधी मनोरंजन की जानकारी मिलती है।
              आर्य विभिन्न  बीमारियों से उपचार के लिए कई जड़ी बूटियों का प्रयोग करते थे, चिकित्सक का  उल्लेख बड़े आदर  के साथ किया गया है,अश्विनों को दिव्य चिकित्सक बताया गया है ऋग्वैदिक काल मे विश्पला के कटे पैर की जगह लोहे के पैर लगाए जाने की कथा वर्णित है इससे उस काल की शल्य चिकित्सा के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है।
साथ मे जादू टोनो का भी प्रयोग करते थे।
                           आर्य अतिथि सत्कार ,बड़ों का सम्मान और शिष्टाचार तथा दान देने पर विशेष बल देते थे।

  ऋग्वेदिक काल का आर्थिक  जीवन----------

 कृषि के साथ पशुपालन भी करते थे ऋग्वेदिक काल के लोग, कृषि योग्य भूमि को क्षेत्र कहा जाता था,ऋग्वेद में फॉल का उल्लेख मिलता है जो सम्भवता लकड़ी का बना होता था ,हल में 6,8,12 बैल तक जोड़े जाते  थे ,खेतों में हल बैल की सहायता से जोतकर बीज बोए जाते थे,फसलों को काटने के लिए हंसिये का प्रयोग किया जाता था,सिंचाई नहरों द्वारा होती थी कूप अवट (खोद कर बने हुए गड्ढे) का भी उल्लेख है ऋग्वेद में चक्र की सहायता से कूप से पानी निकाल जाता था और बाद में नालियों के माध्यम से खेतों में पहुंचाया जाता था लोग खाद का प्रयोग खेतों में करते थे।खेतों में गेहूं(गोधूम),व्रीही (चावल),माष, मुदग ,मसूर टिल का उल्लेख बाद के साहित्य में वर्णन मिलता है।
 कृषि के अलावा इस समय पसुपालन पर विशेष ध्यान दिया जाता था,कृषक पशुओं के बृद्धि के लिए प्रार्थना करते थे,ऋग्वेद मे पशु पालन में बैल ,घोड़ा,भेड़ ,बकरी,गधा,कुत्ता आदि मुख्य जानवर थे,घोड़ा आर्यो का दूसरा प्रिय पशु था,बैल हल जोतने व बैलगाड़ी में प्रयोग होता था,ऋग्वेद में पशुपालन का ज्यादा उल्लेख मिलता है जबकि कृषि का उल्लेख बहुत कम मिलता है।
  ऋग्वेद में 'भैषज' का व्यवसाय   अत्यंत महत्त्वपूर्ण था,वरुण, अश्विन,रुद्र देव को तो' भिषज' ही कहा गया है
     
बढई(तक्षन),रथ, अनस, नौका आदि लकड़ी की वस्तुओं को बनाता था, कर्मार ,धातुकर्मी था और अयस संबंधी वस्तुओं का निर्माण करता था, परंतु ऋग्वेद में 'अयस' यानी लोहा,ताम्बे, कांसा में किसे कहा गया  ठीक तरह ज्ञात नही हो पाया है।
 भवन निर्माण भी ऋग्वेद में होता था जो प्रायः लकड़ी के होते थे जिसमें बस बल्लियों का प्रयोग होता था घासफूस से छतों को ढका जाता था,वैदिक काल मे पुर सम्भवता मिट्टी या पत्थरों से बनते थे,अयस के पुर का उल्लेख भी वैदिक साहित्य में मिलता है।
 ऋग्वैदिक काल में व्यापारिक आदान प्रदान  होता था सम्भवता समुद्र  द्वारा भी दूरस्थ क्षेत्रों से व्यापार  होता था,कुछ विद्वानों ने व्यापारिक आदान प्रदान के लिए निष्क का प्रयोग माना है।

       निष्कर्ष-

इस प्रकार हम देखतें हैं  कि ऋग्वैदिक काल में राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक सभी क्षेत्रों में प्रगति की जो उत्तरवैदिक काल मे विकसित रूप में प्रकट होती है।



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