जगदीश स्वामीनाथन Jagdeesh Swaminathan Artist ki Jivni

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जगदीश स्वमीनाथन Jagdeesh Swaminathan Artist ki Jivni जगदीश स्वामीनाथ( Jagdeesh Swaminathan ) भारतीय चित्रकला क्षेत्र के वो सितारे थे जिन्होंने अपनी एक अलग फक्कड़ जिंदगी व्यतीत किया ,उन्होंने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व में जासूसी उपन्यास भी लिखे तो सिनेमा के टिकट भी बेचें।उन्होंने कभी भी अपनी सुख सुविधाओं की ओर ध्यान नहीं दिया ।   जगदीश स्वामीनाथन का बचपन -(Childhood of Jagdish Swminathan) जगदीश स्वामीनाथन का जन्म 21 जून 1928 को शिमला के एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ।इनके पिता एन. वी. जगदीश अय्यर एक परिश्रमी कृषक थे एवं उनकी माता जमींदार घराने की थी  और तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे। जगदीश स्वामीनाथन उनका प्रारंभिक जीवन शिमला में व्यतीत हुआ था ।शिमला में ही प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की यहां पर इनके बचपन के मित्र निर्मल वर्मा और रामकुमार भी थे। जगदीश स्वामीनाथन बचपन से बहुत जिद्दी स्वभाव के थे,उनकी चित्रकला में रुचि बचपन से थी पर अपनी जिद्द के कारण उन्होंने कला विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया। उन्होंने हाईस्कूल पास करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की PMT परीक्षा (प्री मेडिकल टेस्ट) में

Dengue se kaise bachenडेंगू बुखार के लक्षण और उपचार

 Dengue se kaise bachenडेंगू बुखार के लक्षण और उपचार

डेंगू बुखार क्या है, कब से शुरू हुआ?

Dengue se kaise bachen-डेंगू बुखार क्या है लक्षण और उपचार


 डेंगू बुखार क्या है, कब से शुरू हुआ?

 डेंगू बुखार का नाम सुनते ही  बड़े बड़ों को भय हो जाता है क्योंकि बीते दस साल में हमने हजारों लोगों को मरते देखा है, गांव के गांव इस बुख़ार से पीड़ित हुआ और बहुत से नवजवान ,बच्चे,बूढ़े इसके गिरफ्त में आये, आज डेंगू  लगभग पूरी दुनिया में अपने मौत का शिकंजा पहुंचा चुका है ,संसार के लगभग 115 देश इस  आपदा के शिकार हैं।
     डेंगू के लक्षण का पहला लिखित  वर्णन 1780 में मिलता है, परंतु डेंगू बुख़ार वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से  1945 -46  से   विस्तारित होना शुरू  हुआ , फिर धीरे धीरे पूरी दुनिया में आवागमन से फैला और 2010 के बाद ये अधिक देशों में फ़ैल गया , यदि 1945 से 2010 के बीच डेंगू से होने वाली मौत की तुलना करें तो इसमें 35% बृद्धि दर्ज की गई , क्योंकि यदि सामान्य व्यक्ति भी डेंगू प्रभावित क्षेत्र में दस दिन रुक कर वापस आ जाये तो उसको भी डेंगू  होने के चाँस बढ़ जाते हैं ,और यदि उसको हुआ तो वह अपने परिवार वालों को भी वही रोग फैला सकता है,ये रोग छुआछूत से नही फैलता बल्कि यदि डेंगूं से बीमार बन्दा खुले आसमान के नीचे या बिना मच्छरदानी के लेटा है तो जब उसको कोई मच्छर काटेगा तो वही मच्छर  उड़कर बारी बारी से सभी घर वालों को काटे तो जिसकी इम्युनिटी या प्रतिरोधक क्षमता कम होगी उसको डेंगू हो जायेगा। इसलिए डेंगू के मरीज को मच्छरदानी में ही सुलाना लाभकारी है। भारत  में इस बुख़ार को आम जन की भाषा में हड्डी तोड़ बुख़ार भी कहतें है ,क्योंकि इसके  संक्रमण के बाद अस्थि पीड़ा एक सामान्य लक्षण है ।

          डेंगू बुख़ार कैसे और क्यों होता है?

 डेंगू बुख़ार फ़ैलाने वाले मच्छर है , मानव में डेंगू बुख़ार  मादा एडीज  ईजिप्टी  मच्छर की प्रजाति के काटने से फैलता है , इस मच्छर का शरीर में सफ़ेद धारियां होती है । डेंगू मच्छर का नाम एडीज  ईजिप्टी मच्छर है ,जिसके शरीर में 'डेन' वायरस बनाकर रहता है  और  मनुष्य इस वायरस का प्राथमिक पोषक (primary host)  है   , मादा एडीज मच्छर सामान्यता प्रातःकाल और सायंकाल में ही काटता  है। जब ये मच्छर मनुष्य को काटता है तो ये वायरस  मच्छर से मनुष्य के रक्त में प्रवेश कर  जाता है , और सिर्फ एक बार ही काटने से  मानव में बिषाणु का संक्रमण हो जाता है और आप ये समझो की डेंगू फ़ैलाने वाला डेन  वायरस भी चार प्रकार का होता है , डेंगू    वायरस के इन चार स्ट्रेन्स को सीरम प्रकार या सेरोटाइप्स (serotypes)   कहा जाता है ,इनका नाम विज्ञान की भाषा में     den-1,den-2,den-3,den-4  वायरस   है , इनमे डेन -2 और डेन - 4  वायरस प्रभावित व्यक्ति को ज्यादा समस्या आ जाती है वरना den-1 और den-3 से  संक्रमित व्यक्ति सामान्य बुख़ार से पीड़ित होता है और  पांच से सात दिन में  बुख़ार खत्म हो जाता है और पूर्णतया फिट हो जाता है।

  डेंगू बिषाणु का प्रत्येक सीरम प्रकार बीमारी को पूर्ण रूप से प्रकट करता है ,एक सीरम प्रकार (डेन ) से संक्रमित होने पर दुबारा उस बिषाणु के शरीर में जीवन पर्यन्त मच्छरों के काटने पर पहुँचने पर डेंगू नहीं हो सकता क्योंकि उस बिषाणु की संरचना को हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली हमेशा के लिए पहचान लेता है ,परंतु शेष बचे तीन प्रकार के डेन यदि मच्छर के काटने से शरीर में प्रवेश किया तो  फिर डेंगू बुख़ार हो सकता है 

 , इसलिए डेंगू बुख़ार से पीड़ित हो जाने पर भी तुरंत डरें नही , और ये भी समझे की  मच्छरों के काटने और डेंगू का लार्वा आपके शरीर में पहुँचने पर उसी दिन से बुख़ार नही आता बल्कि  10 से 12 दिन बाद डेंगू के लक्षण दिखाई देने लगते है, यानी आप ये समझो कि मानव शरीर में डेंगू बुख़ार के प्रवेश से लेकर डेंगू ज्वर के लक्षण प्रकट होने तक के समय को उद्भवन काल कहते हैं ,अधिकांश दशाओं में यह चार से सात दिन का होता है परंतु कभी कभी 3 से 14 दिन भी हो सकता है ,अतः डेंगू प्रभावित क्षेत्र से आये व्यक्ति को ये बुख़ार 14 दिन बाद भी हो सकता है।  शिशुओं और बढ़ते बच्चों में यह बीमारी ज़्यादा घातक होती है ,यह अच्छे खानपान वाले बच्चों में भी होता है , डेंगू  रोग अस्थमा (दमा) और  डायबिटीज से ग्रसित व्यक्तियों के लिए अधिक घातक हो सकता है।

     ::  डेंगू बुख़ार के लक्षण::

         डेंगू बुख़ार के लक्षण--
  1. --बुख़ार आना ,और बुख़ार बहुत ही तेज करीब 102 से 104 डिग्री फारेनहाइट तक आता है,
  2.    --- दूसरा लक्षण सिरदर्द होना ,भूख न लगना
  3.    -- तीसरा लक्षण आँखों में दर्द होना ।
  4.    --- चौथा लक्षण उल्टी आना,दस्त आना,कभी कभी  रोग जटिल होने पर उलटी के साथ ख़ून आना और दस्त में  ख़ून भी आने लगता है
  5.    --पांचवा लक्षण साँस में तकलीफ़ होंना         
  6.    -छठा लक्षण शरीर मांसपेशीयों  वा जोड़ों में दर्द।      
  7.   --सातवां लक्षण शरीर में सूजन आना।
  8. --- आठवां लक्षण त्वचा में लाल निसान,चकत्ते  आना।
  9.  --- नवां लक्षण  मसूढ़ों से , नांक से रक्तस्राव , हाँथ में जो टीका लगाया गया था उस स्थान से भी रक्तस्राव हो जाता है।
  10.    ---दसवां लक्षण , डेंगूं अत्यधिक बढ़ने पर दौरे आना, बेहोशी छा जाना।
  11.  ---- ग्यारहवां लक्षण , डेंगू के में ब्लड प्रेशर अचानक कम होना , और ब्लड प्रेशर  ऊपर वाला 100 से कम होने लगता है, और कम BP होने से शरीर के महत्वपूर्ण ऑर्गन किडनी, लीवर ,ह्रदय आदि में ठीक से ख़ून की सप्लाई नही हो पाती, जिससे फेफड़े और पेट में पानी भरने लगता है जो चिंताजनक होता है। 

    पर ध्यान रहे डेंगू से होने वाली मौत कुल संक्रमित व्यक्ति में सिर्फ 1% है यानि 99% व्यक्ति संक्रमित होने के बाद भी सुरक्षित रहते हैं।

                डेंगू से बचने के तरीके::

 भाई  साहब डेंगू  मच्छर से फैलता है वो भी स्पेशल मच्छर से जो दिन के समय काटता है , और दिन के समय में भी सुबह काटेगा , यानि जब आप कुछ ऑफिस या घर में काम कर रहे होते है। ये शाम के वक्त  में भी रोशनी होने पर काटता है। ये मच्छर जुलाई से नवम्बर महीने तक डेंगू फैलाता है ,क्योंकि इसको अंडे देने के लिए नमी वाली जगह और उमस वाली गर्मी की जरूरत होती है।
                अब इस मच्छर से बचना है तो पहले इन मच्छरों को मारो इनके अंडे वाली जगह को खत्म करो ,तो आप समझें की जब भी मानसूनी बारिश होती है तब  ज्यादातर घर की छतों में पुराने  कबाड़ की चीजें पड़ी होती है जैसे कोई पुराने बर्तन , टूटे फूटे गमले ,टायर , नारियल के खोल , रबड़ के बैग , इन सब में वर्षा का साफ़ पानी भर जाता है , दीवालों में दो दरारों के बीच मे  और  ईंटों  में ऊपर बने गड्ढे में पानी एकत्र होने पर मच्छर के लिए सुरक्षित जगह हैं  और मच्छर इन्ही साफ़ पानी की जगह में अंडे देते हैं , जो डेंगू प्रजाति के मच्छरों को फ़ैलाने में सहायक होते हैं। अतः इन जगह से वो सारी चीजें हटा दें जिससे मच्छर अंडे दे सकें, साथ में अपने पड़ोसियों को भी देख लें  कि कहीं उनके यहां तो मच्छर पनपने की कोई जगह तो नहीं  है क्योंकि मच्छर यदि वहाँ भी पैदा हुआ तो 100 मीटर तक के क्षेत्र में वो  कहीं भी उड़कर जा सकता है। डेंगू का मच्छर सामान्यता तीन  फुट की ऊंचाई तक ही उड़ता है , यदि छत में मच्छर अंडे देगा तो वहां भी तीन फुट तक ही उड़ता है।
                अब आईये घरों में आप देखे कि पानी की टंकी में कोई भाग टूटा फूटा तो नही जिससे वहां भी मच्छर प्रजनन कर सकते है ,पानी की टंकी साफ करें, कूलर का प्रयोग नही होने पर उसे साफ़ करके रख दें।
             -- मच्छरदानी  लगाकर सोना फायदेमंद है ,मुख्यता जो पीड़ित हो उसको तो दिन रात मच्छरदानी के अंदर ही रहना फ़ायदेमन्द है।
  • पूरे आस्तीन के कपड़े पहने
  • जूते का प्रयोग करें जिससे पंजे भी खुले न रहे ।     
  • घर मे कपूर को जलाकर हर कमरे में कुछ देर के लिए रखें ,कपूर की गंध से मच्छर दूर भगतें हैं।
  •   इस मौसम में स्नान के बाद नीम का तेल लगाये जिससे मच्छर आपसे दूर रहेंगे ,साथ में नीम के तेल से दीपक जलाकर रखें जितनी देर नीम का तेल जलेगा उसकी गंध से मच्छर दूर भागेंगे। शरीर में कोई सुगन्धित तेल न लगाएं जिससे मच्छर आपकी तरफ   आकर्षित हों ,कोई ऐसी मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाये जिससे मच्छर आप से दूर रहें।
  •  आसपास के घरों के गड्ढों में  लार्वा खाने वाली गैम्बुस मछलियों को डालें ,सामान्यता गैम्बुस मछलियां साफ पानी मे ही रहने को अभ्यस्त होती हैं। और डेंगू के मच्छर  साफ पानी में ही अंडे देते हैं।

                   डेंगू का उपचार ::

डेंगू  का प्राथमिक उपचार लगातार पानी लेते रहें ,सब्जियोंकासूप, मूंग दाल, नारियल पानी, नीबू पानी,
,तरल पेय पदार्थ फलों का रस आदि लेते रहें ,ग्लूकोस को पानी मे डालकर लेते  रहें ओ. आर. एस. का घोल लेते रहें जिससेशरीर मे लगातार दस्त आने से सोडियम , पोटेशियम ,मैग्नीशियम जैसे लवण की मात्रा कम होने पर उनको संतुलित किया जा सके , आयुर्वेदिक उपचार में                                            गिलोय   या गुडूची पौधे का तना----  
गिलोय के  पांच सेंटीमीटर  तने  को गिलोय (गुरुची)  ,पपीते के पत्ते के साथ एक गिलास पानी मे मिलाकर तब तक  उबालें जब तक पानी आधा गिलास न रह जाय , उसको ठंढा करके सुबह शाम पीना चाहिए जिससे डेंगू के कारण कम हुईं प्लेटलेट्स को बढ़ाया जा सके ,

      बकरी का दूध--
बकरी का दूध भी डेंगू के उपचार के लिए फायदेमंद है  क्योंकि बकरी के दूध में सेलेनियम नामक तत्व पाया जाता है इस तत्व के कारण प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ती है .

आंवला -
आंवला भरपूर बिटामिन सी का स्रोत है और बिटामिन सी से ही रोग प्रतिरोधक   तंत्र का विकास होता है, इसके खाने से डेंगू से पीड़ित व्यक्ति जल्द ठीक हो जाता है।
  एलोवेरा--
एलोवेरा भी रोग प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ाता है ,डेंगू के उपचार में सहायक है।गेहूं के ज्वारे का रस को एलोवेरा जूस और शहद से मिलाकर देना लाभकारी होता है।
                              कीवी का फल- 
डेंगू हो जाने पर कीवी के फल को खाना अत्यधिक लाभदायक है ,इसके खाने से प्लेटलेट्स घटाने में मदद मिलती है।                         

   इस रोग के उपचार में  एंटीपायेरेटिक्स (बुखार उतारने वाली दवा) ही लेना चाहिए , कोई भी पेन किलर का प्रयोग नहीं करना चाहिए । 
         भोजन में खिचड़ी और तरल भोजन सुपाच्य भोजन का प्रयोग करना चाहिए। खट्टे फल संतरा ,अमरुद का सेवन करना चाहिए,पपीते का फल खाना चाहिए ,कच्चे हरे पपीते की सब्जी बनाकर भी खाया जा सकता है।
  सामान्यता  स्वस्थ व्यक्ति के शरीर मे चार लाख प्लेट लेटस की संख्या होती है ,परंतु डेंगू से बीमार व्यक्ति में इसकी संख्या तेजी से घटती है , कभी कभी पेशेंट के सीरियस हो जाने पर प्लेटलेट्स की संख्या 50 हज़ार तक ही रह जाती है इस स्थिति में पेशेंट को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है , और प्लेटलेट्स की संख्या 20 हजार तक रह जाने पड़ प्लेटलेट्स को रोगी के शरीर मे चढ़ाना पड़ता है।

सिट्रियोडोरा का पौधा---

सिट्रियोडोरा का पौधा जिसको सामान्य भाषा में लेमन मिंट या लेमन बिबन कहा जाता है जो  इस समय विलुप्तिकरण के कगार पर है , और ऋषिकेश में इस पौधे को विलुप्त होने से बचाने के लिए ग्रीनहाउस विधि से फिर से रोपित किया जा रहा है  इस पौधे के शोध में ये बात निकल कर सामने आई है कि जब इस पौधे को यदि घर के आँगन में लगाया जाता है या फिर लॉन में लगाया जाता है तो डेंगूं फैलाने वाले एडीज इजिप्टी मच्छर को आसानी से दूर भगाया जा सकता है ,इसकी गंध से डेंगू के मच्छर दूर भागते हैं।

सी ओ पी डी जो एक स्वास रोग है इस रोग संबधी पोस्ट पढ़े इस लिंक से---
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