Essay- paryavaran-- आधुनिक मनुष्य और पर्यावरण

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                 Essay- paryavaran-- आधुनिक मनुष्य और पर्यावरण                                                          आधुनिक मनुष्य और पर्यावरण::--

Essay- paryavaran-- आधुनिक मनुष्य और पर्यावरण


         क्या आधुनिक मनुष्य प्रकृति से दूर भाग रहा है?   इस प्रश्न का यही उत्तर है कि मनुष्य   विकास के साथ मनुष्य में भौतिकता  में  अभिवृद्धि
 हुई है और मनुष्य प्रकृति से दूर  भाग रहा है,    वह वन जंगल पेंड़ पौधों को ऐसे काट रहा है जैसे ये जंगल ही उसके जान के लिए आफ़त है वो इन्ही जंगल ,हरे पौधों के कारण अभी तक पिछड़ा जीवन व्यतीत करने में बाध्य रहा ,   वो नही जान रहा कि उसने पेंड़ के साथ कितने आशियानों को भी खत्म कर दिया जो उसी पेंड़ में घर बनाकर रहते थे ,  उनके घर ख़त्म होने से उनकी जनसंख्या भी कम होती जा रही है। जनसंख्या बढ़ने से वाहनों की संख्या भी बढ़ी है,वाहनों में सीसायुक पेट्रोल के कारण  अंततः  वह  महासागरों तक पहुंच रहा है, साथ में  यही सीसा युक्त  पेट्रोल के कारण वातावरण में सीसा की    सान्द्रता  बढ़  गई है ,  लेड के फैलने के  कारण ,वातावरण में जहरीली  गैस  के बढ़ने से    मिनीमाटा   जैसे रोग बढ़ रहे  हैं,   वाहनों   से निकलने वाले कार्बन  डाई ऑक्साइड के कारण   न सिर्फ हवा में इन प्रदूषक कणों के फैलने से अस्थमा और सी .ओ. पी. डी. जैसे  जानलेवा  रोग   फ़ैल रहे हैं  बल्कि   बरसात के समय में अम्ल वर्षा   भी होने लगी है  ,  संसाधनों के अत्यधिक दोहन से भविष्य में लिहाज  से कोयला अन्य खनिज संसाधन कम हो जायेंगे,  साथ में जनसंख्या की तीव्र बृद्धि से जल का अत्यधिक दोहन भी हो रहा है।   आज  भूजल का 40%भाग सिचाई के लिए प्रयोग होता है 25% उद्योग में  प्रयोग होता है  इन सब में अत्यधिक पानी के प्रयोग से  जल संकट आ गया है भूजल   स्तर तब  और नीचे चला जाता है जब  किसी कारण एक वर्ष सूखा पड़ जाता है   ,जिससे और     अधिक  जल स्तर नीचे चला जाता है,  जिसके कारण गुजरात ,राजस्थान,मध्यप्रदेश ,कर्नाटक, महाराष्ट्र में महिलाये साफ पीने के पानी के लिए प्रतदिन चार से पांच किलोमीटर   पैदल चलकर जलस्रोत तक पहुँचती है ,वहां भी पानी बहुत ही नीचे चला गया है उसमे गन्दगी व्याप्त होती है और पूरा परिवार उसी पानी को पीने को  मजबूर है ,यही पानी कई जलजनित रोगों को फैला रहा है।    इस  प्रकार पेय जल संकट बढ़ता जा रहा है। बढ़ती जनसंख्या से वन और चारागाह  निरंतर सिकुड़ते जा रहे है ,    वनों के क्षरण  के कारण   आज जंगल से बाघ  निकल कर खेतों में घुस कर   मानव भक्षी बन रहे है जिससे आदमी और जानवरों में संघर्ष बढ़ रहा है,  जंगलों के ह्रास से मिट्टी का भी क्षरण   बरसात में तेजी से हो रहा है  जिससे खद्यान्न उत्पादन में कमी का संकट बढ़ता चला जा रहा है ।  प्रदूषण  के कारण मृदा में  जहरीले   तत्व  प्रवेश कर  गए हैं ।  जिसके कारण  भारत में हजारों  हेक्टयर भूमि  कृषि  कार्यों  से  हटकर परती में बदल रही है और उधर इस कमी को पूरा करने के लिए फिर से हजारो हेक्टेयर जंगल काटकर उसे खेत में बदल रहे हैं। मनुष्य जंगल काट तो रहा है पर एक भी पेंड़ स्वतः संज्ञान में या काटे गए पेंड़ के एवज में पौध रोपण भी नही कर रहा क्योंकि वह इस कार्य को  अत्यधिक धन प्राप्त करने का साधन नही मान रहा ।
           
                 जब तक मानव प्रकृति के सहयोग से अपनी आवश्यकताओं की    पूर्ति करता   रहा है,तब तक पर्यावरण और  पारिस्थितिक   संतुलन      बना रहा,  जब अब सन्तुलन बिगड़ रहा है तो ही भयानक बाढ़ आ रहे है  पूरा का पूरा  शहर डूबा है बरसात में  जल  निकासी  के सारे    रास्ते  मनुष्य ने ही बन्द कर दिए  है जरा सा भी पानी बरसने पर पूरा शहर जलमग्न  हो रहा है पहाड़ों में भू स्खलन हो रहा है ,  कही आकाश से बिजली गिर रही है,   आधुनिक समाज की बढ़ती जनसंख्या ,भौतिक वादी जीवन,  प्रकृति के प्रति उपेक्षा पूर्ण  व्यवहार ने   न सिर्फ    अपने आसपास के  पर्यावरण को नुकसान    पहुँचा  रहा है बल्कि  ख़ुद मानव जाति के लिए संकट खड़ा कर रहा है ,क्योंकि    पारितंत्र   के थोडा भी क्षति पहुँचने पर मानव भी उसी  अनुपात में प्रभावित  होता है,   पर्यावरण   क्षति  का  प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आया   है  ,    संसाधनों   का  अत्यधिक दोहन  ,ऊर्जा का अत्यधिक प्रयोग  ,   तीव्र  औद्योगीकरण    ,शहरीकरण,   परमाणु परीक्षण     से बढ़ती रेडियोधर्मी प्रदूषण  ने ,प्रकृति के प्रति उपेक्षा के कारण पर्यावरण ह्रास की एक ऐसी समस्या पैदा हो गई है जिस पर मनुष्य ने अब भी गम्भीर चिंतन नही किया तो भावी पीढियां  बेहद   कष्टमय  जीवन व्यतीत  करना पड़ेगा।
         
        आधुनिकता के इस  वैज्ञानिक  युग में मानव की प्रकृति   के प्रति  उपेक्षा पूर्ण नीति ने अनेक समस्याएं पैदा  की हैं   , यदि प्रदूषण की बात करें तो ये दो प्रकार का होता है एक   प्राकृतिक  प्रदूषण  और दूसरा मानव जनित   प्रदूषण ।   प्राकृतिक प्रदूषण में ज्वालामुखी का फटना,  बाढ़ , मृदा अपरदन ,भूकंप, आदि हैं । वहीं मानव जनित प्रदूषण में  कीटनाशक, प्लास्टिक प्रदूषण, शहरी अपशिष्ट ,मोटरगाड़ियों से फैक्टरियों से निकलता   धुआँ  रेडियोधर्मी प्रदूषण,इलेक्ट्रॉनिक कचरा, ध्वनि प्रदूषण    , प्लास्टिक प्रदूषण को एक अलग प्रदूषण  का दर्जा दिया जा सकता है क्योंकि बीते दो दशक में पूरी दुनिया प्लास्टिक मय हो गई है ,जब पहले कभी   समारोह में भोजन परोसा जाता था तो   वह  पत्तों  को   बुनकर बने पत्तल में , दोना पत्तल  में दिया जाता  था   जिससे वन की महत्ता भी बनी थी ,और भोजन भी इकोलॉजिकल होता था यानि पत्तल कुछ दिन बाद जमीन में मिल जाते थे और पर्यावरण शुद्ध रहता था ,  अब प्लास्टिक की थाली ,प्लास्टिक के     डिस्पोजल  प्लेट  खाना खा कर फेंकने के बाद 100 साल   तक धरती पर रहेंगे, जो नाली चोक करेंगे ,गाय के  आंतों  को चोक करेंगे  ,   समुद्र में जाकर मछलियों ,कछुवों को  मारेंगे ।
     
             जैव  मंडल  की प्राकृतिक  असंतुलन हेतु सिर्फ  और  सिर्फ  मनुष्य ही उत्तरदायी है ।  उसने प्राकृतिक  तंत्र की गुणवत्ता को प्रभावित किया है ,जिसकी संरचना में अवांछनीय परिवर्तन किये हैं। दुसरे   शब्दों में मनुष्य ने प्राकृतिक संरचना और संतुलन  को   बिगाड़ने तथा उसे नष्ट करने का दुष्कृत्य किया है।
             
              विश्व में   सामाजिक,  राजनितिक,  सांस्कृतिक।  रूप से अनेक   परिवर्तन आये हैं, यातायात के  साधनों  में अप्रत्याशित रूप  से बृद्धि हुई है   अनियंत्रित  जनसंख्या बृद्धि ने आग में घी का काम किया   है  ,जनसंख्या  बृद्धि  के कारण आवास  ,  व्यवसाय  , और उद्योगों की भूमि के लिए तथा काम के लिए   अत्यधिक ऊर्जा की जरूरतें बढ़  रहीं हैं, कोयला  , प्राकृतिक गैस  ,  पेट्रोलियम आदि का अनियंत्रित   दोहन होने   लगा है  ,  ऐसे में मनुष्य,जल, भूमि  , वायु   का  का प्राकृतिक   संतुलन   बिगड़ गया है,  इस   कारण  से  ही  मनुष्य,पेंड़ , पौधों  , जीव       जंतुओं   के अस्तित्व में संकट आ  खड़ा हुआ है।  औद्योगिक  कारखानों  , मानव गतिवधियों से उत्सर्जित विषैले पदार्थों  , ताप विद्युत गृहों  ,   विद्युत जनरेटर  , विभिन्न  वाहन से  हानिकारक गैसें     कॉर्बन डाई  ऑक्साइड  ,कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि  धूल  धुआँ  वातावरण में छोड़ा जा रहा है,  जिससे   शहरों  में साँस   लेना दूभर होता जा रहा है   ,जिसके   कारण  ही  हर बन्दे में साँस और नेत्र, किडनी,   लीवर,  दिल  के रोग पैदा हो रहे  हैं ।

                 अब   अहसास  हो रहा है   कि विकास के नाम   पर अत्यधिक   पर्यावरण को क्षति पहुंचाना घातक   सिद्ध  हो रहा है,  अतः  अब   मनुष्य   जाति को  समझ   लेना जरुरी   है  कि प्रकृति का संवर्धन और  संरक्षण   उसका   नैतिक कर्तव्य है , यानी प्रकृति को बिना  हानि  पहुंचाए  विकास  करने में ही मानव मात्र का   कल्याण  निहित  है । वरना जिस तरह से आसपास   के जीवों की समूची जातियाँ  विलुप्त हो रहीं है  कहीं  ऐसा न  हो की विलुप्तिकरण के कगार पर  मानव   का ही नम्बर न आ जाये।
            वैसे मानव   एक  समझदार  प्राणी  है वह ख़ुद पे आते संकट   को  तेजी से पहचान भी लेता है  और उनको   बचने  के  उपाय भी कर लेता है ,  जैसे हाल में जब ओजोन लेयर  का अंटार्कटिक क्षेत्र  में  तेजी से  टूटना   शुरू  हुआ , तब मानव जाति ने , फ्रिज ,एयर कंडीशनिंग , उद्योग में   क्लोरो फ्लोरो कार्बन उत्सर्जन में कमी   की है     जिसके कारण  आज  ,  ओजोन  छिद्र   सिकुड़ गया है  और   आशा  है   कि  सन्  2050 तक  छिद्र   पूरी तरह बन्द हो जायेगा। और  मानव  जाति  भविष्य  की  आपदा से   ख़ुद को सुरक्षित अवश्य कर लेगा।
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एक पेंड से 24 घण्टे ऑक्सीजन कैसे मिलती है।

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