Bio Diversity या जैव विविधता kya hai-kaise bachaayen

           
        हमारे पृथ्वी में एक ही जाति के पौधे में ,जानवरों,जीव जन्तुओं में भारी विविधता  है, यदि हम गौर करें कृषि में तो हमें धान ,दाल और हर खाद्यान्न की कई वैराइटी मिलती है , जिनमे अपनी कुछ निजी विशेषतायें भी होती है,इसी तरह पक्षियों में देखिये उदाहरण तोता लेते है दुनिया भर में तोते अलग अलग चोंच ,रंग,पंख के रंग,उनके आकार ,उनके पंजो में अलग अलग बनावट मिलेगी   घरों में पाले जाने वाले विभिन्न नस्ल के कुत्ते देखतें ही है हम सब , पशुपालन में भैंस ,गाय की  विविध  नस्ल    की दुधारू  जानवरों को श्रेणीबद्ध करतें है ये विविधता "आनुवंशिक विविधता "कहलाती है क्योंकि एक जाति के जीव में जीन्स के





 

बदलाव से एक नई नस्ल का जीव बनता है जो अपने पूर्वज से भिन्न गुण रखता है , इसीतरह दुनिया भर में एक ही जीव की हजारों प्रजातियां पाई जाती है  सूक्ष्म जीव से लेकर विशाल हाँथी तक के अलग अलग किस्म की प्रजातियाँ  "प्रजाति विविधता "कहलाती है, हमारे पृथ्वी में इस समय 20 हजार चींटियों की जातियां,28 हजार मछलियों की जातियाँ,3 लाख भौंरों की जातियाँ पाई जातीं है,  परंतु ये जाति गणना अभी भी पूर्ण नही है क्योंकी उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में अभी भी गणना शेष है,  रोबर्ट मेय नामक साइंटिस्ट के अनुसार पादप और जीवों की कुल जातीय विविधता  70 लाख हो सकती है,यानि कुल 70 लाख वैराइटी के पेंड़ पौधे ,जीव जंतुओं के नमूने मिलेंगे दुनिया भर में।  ये विविधता पहले से है या बढ़ रही ऐसे प्रश्न उठतें है? मानव जीवन इस विविधता से किस प्रकार जुड़ा है, क्या इन जीवों की जातियों के खत्म होने से मानव भी प्रभावित होता है? जैसे गिद्ध के खत्म होने पर मानव में क्या प्रभाव पड़ा?


     -: जैव विविधता का अर्थ:- 

जैवविविधता का अर्थ पृथ्वी में पाये जाने वाले वाले जीवों की विविधता से है अर्थात किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में में पाये जाने वाले जीवों एवं वनस्पतियों की संख्या एवं प्रकारों को  जैव विविधता   माना जाता है,  इसका सम्बन्ध पौधों के प्रकारों ,प्राणियों एवं सूक्ष्म जीवों से है ,किन्तु जैवविविधता सिर्फ़ प्राणियों की विविधता तक सीमित नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत उस पर्यावरण को भी सम्मिलित किया जाता है जिसमें वो निवास करते हैं। इस प्रकार विभिन्न पारिस्थितिकी तन्त्रों में पाए जाने वाले जीवों की विविधता है।  1992 में रियो डि जिनेरियो में आयोजित पृथ्वी सम्मेलन में जैवविविधता की परिभाषा के अनुसार--                               
 "जैव विविधता समुद्री जीवों स्थलीय जीवों जलीय जीवों तथा अन्य  पारिस्थितिक    तंत्रों के मध्य अंतर तथा जिस पारिस्थितिक समूह जिनके वो भाग है ,उनमें पायी जाने वाली विविधताऐं हैं, इसमें एक प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता , विभिन्न जातियों के मध्य पाई जाने वाली विविधता , विभिन्न प्रजाति के अंदर पाई जाने वाली विविधता है।"

  हॉट स्पॉट क्षेत्र---

 विश्व के कुछ क्षेत्रों में प्रजातियों की अत्यधिक संख्या पाई जाती है, जिसे हॉट स्पॉट या मेगा डाइवर्सिटी कहतें है, विश्व के   पक्षियों  ,   उभयचरों, सरीसृपों  , स्तनधारियों  ,  पौधों की  60% प्रजातियां  इन्हीं  क्षेत्रों में   पाई जाती  हैं। विश्व  भर में अलग अलग क्षेत्रों में  इन हॉटस्पॉट क्षेत्रों की कुल संख्या 35 है , विश्व हॉटस्पॉट क्षेत्रों में विश्व भर में कुल 50% पेंड़ और पौधों की प्रजातियां पाई जातीं है व स्थलीय


कशेरुकियों की 43% प्रजातियां पाई जातीं हैं,पृथ्वी के स्थलीय भाग के2.3% भाग में हॉटस्पॉट क्षेत्र फैला है। और इन 35क्षेत्रों में भी 8 क्षेत्र ऐसे हैं जहां सबसे अधिक प्रजाति का घनत्व है    या जैव विविधता सबसे ज़्यादा है,   इस क्षेत्र को अत्यधिक हॉटस्पॉट ( Hottest hotspot) क्षेत्र कहते हैं।हॉट स्पॉट क्षेत्र की संकल्पना सर्वप्रथम  प्रसिद्ध पर्यावरणविद नार्मन मायर्स ने की थी।


Bio Diversity kya  hai-kaise bachaayen
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जैव विविधता शब्द जीववैज्ञानिक एडवर्ड विलसन ने किया ,  उनके अनुसार हमारे जैवमंडल जहां पर हम निवास करतें है ,वहां सूक्ष्म एक कोशकीय जीव से बृहद् कोशकीय जीव तक में  विविधता मिलती है,उनके अनुसार ये विविधता आनुवंशिक आधार पर हो सकती है यानी एक ही जगह के आसपास पाये जाने वाले पौधों में अलग अलग मात्रा में  गुण पाये जाना ,जैसे उत्तर भारत में उगाये जाने वाले गन्ने या ईंख में शक्कर की मात्रा में विभिन्नता पाया जाना,  तीसरी प्रकार की विविधता   अलग क्षेत्र में पाये जाने वाले विविधता ,गर्म और ठंढे रेगिस्तान के प्राणियों में भिन्नता , आर्द्र भूमि(wet land) में पाये जाने वाले जीव, नदियों के जीव, पहाड़ों में पाये जाने वाले जीव, समुद्र के अंदर पाये जाने वाले प्रवाल भित्तियां या मूँगा प्रजाति के जीव सभी अपनी विशिष्टता बनाते है भौगोलिक परिवेश के अनुसार  जैसे भारत के  पूर्वी घाट तेलंगाना,उड़ीसा, तमिलनाडु के जीव पश्चिमी घाट महाराष्ट्र ,केरल, आदि से अलग विशेषता लिए होंगे, और तीसरा प्रकार जैसे सहारा रेगिस्तान के जीव अमेरिका के कैलिफोर्निया के जीव, या ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ़ से अलग होंगे ।

जैव विविधता के प्रकार--(Types of Biodiversity)

1- आनुवंशिक विविधता--

आनुवंशिक विविधता का आशय किसी समुदाय के एक ही प्रजाति के जीवों में जीन में होने वाले बदलाव से है। जलवायु बदल जाने पर जीवों में ख़ुद को उस  बदले जलवायु के अनुसार adapt(अनुकूलित)करने की क्षमता होती है, जलवायु बदल जाने से इनके जीन में भी कुछ बदलाव हो जाते है जिससे बदले वातावरण में वो जीवित रह पाने में सक्षम हो जाते हैं,एक ही प्रजाति(breed) के वनस्पति, जीव जन्तुओं में समानता होती है जो निर्धारित करती है कि वो कहाँ किस प्रकार दिखेंगे, एक ही प्रजाति के सदस्यों में बहुत कम अंतर होता है।


  एक ही जाति के जीव में  कुल आनुवंशिक विविधता जीन पूल कहलाती है । पेंड पौधों  और जीव जन्तुओं  में जीन की  संख्या का अनुमान जीनोम अनुक्रम द्वारा किया जाता है जैसे इ कोलाई में 4000 जीन पाये गए है तो मनुष्य में लगभग 35 हजार जीन पाये गए है,अगर आनुवंशिक विविधता  कम है तो जातियों के रूप में थोडा बहुत अंतर होता है ,आनुवंशिक विविधता बढ़ने के साथ प्रजातियों में पर्यावरण में हुए बदलाव के साथ उसी अनुरूप ख़ुद को ढालने की क्षमता बढ़ जाती है।

2-प्रजातीय विविधता-

प्रजातीय विविधता किसी समुदाय प्रजाति की विभिन्न किस्म को बताता है,क्षेत्रफल  बढ़ने या घटने


 के साथ समुदाय में प्रजाति की संख्या भी बढ़ती और घटती है,  आप ये समझो की एक निश्चित एरिया में अलग अलग प्रकार के जीव जन्तु जैसे भारत में हांथी, बन्दर, तेंदुआ, चीता ,शेर, मोर, कबूतर , नीम का पेंड ,बरगद के पेंड, अन्य छोटे पौधे आदि आदि,जलवायु परिवर्तन के साथ समुदायों की प्रजातियों में परिवर्तन होते रहते है जिससे प्रजातियों की संख्या में बृद्धि होती रहती है।जिससे खाद्य सृंखला भी जटिल होती जाती है।जिससे पर्यावरण अधिक मजबूत और टिकाऊ होता जाता है।
 3-समुदायिक विविधता---

पारिस्थितिकी तंत्र में जीव समुदाय विभिन्न प्रकार के आवासों में एक साथ रहते है तथा एक दूसरे को प्रभावित करते है,विभिन्न प्रकार के अलग अलग पर्यावरण के आवास हैं जैसे घास के मैदान, पर्वतीय आवास क्षेत्र, झील ,मरुस्थल,  उष्ण कटिबंधीय वर्षा वन  आदि, प्रत्येक आवास के पर्यावरणीय दशाओं में अंतर पाये जाने के कारण जीव जन्तुओं और समुदायों में अंतर पाया जाता है ।
यानी एक समुदाय के जीव जन्तुओं  एवं दूसरे समुदायों के जीव जन्तुओं  एवं वनस्पतियों के अंदर पाई जाने वाली विविधता पारितंत्र विविधता कहलाती है ।
कृपया इस पोस्ट को भी पढ़े---पर्यावरण पर निबंध


   पूरी पृथ्वी में कितनी जातियाँ हैं ??
 पूरी पृथ्वी में अलग अलग विविधता है ,चूँकि पृथ्वी गोल है और अपने अक्ष में 23 १/२ अंश झुकी हुई है अतः सूर्य की सीधी किरणें पृथ्वी के विषुवतीय भाग ,जिसे tropical region, या उष्ण कटिबंधीय  प्रदेश भी कहतें है ,  इस  भाग में साल भर सूर्य की सीधी किरणें पड़तीं है इसीलिए अधिक गर्मी होती है और इस विषुवतीय भाग में वर्षा अधिक  होती है, वर्षा अधिक  होने  से   इस क्षेत्र में सघन जंगल फैला हुआ है ,जहाँ पर सूर्य की किरणे ऊँचे ऊँचे पेंड़ो से जमीन पर नही आ पातीं है , इस 0 से 5 डिग्री अक्षांश के बीच की पट्टी जिसमे सैकड़ों  हज़ारों प्रकार के जीव जंतु पाये जाते हैं , विषुवतीय प्रदेश की बात करें तो इसमें सबसे ज्यादा जंगल दक्षिण अमेरिका के ब्राजील के



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उत्तरी भाग में पाया जाने वाला अति सघन जंगल जो अमेज़न नदी के फैलाव क्षेत्र में पाया जाता है , जिसमे अति ज़हरीले कीड़े मकोड़े ,जहरीले सांप ,जहरीले बिच्छु, जहरीली मक्खियाँ पाये जाते है जिनके काटते ही जीवन का अंत हो जाता है ,यहाँ पर आम व्यक्ति का पहुंचना यानि मौत को दावत देना ,इसीलिए यहां के कुछ ही जीव जंतुवो की खोज हो पाई है  कुछ बाकी है , यहाँ पर 40 हजार पक्षी जातियाँ,3हजार मत्स्य जातियॉं,1300 पक्षी जातियाँ,430 पक्षी जातियाँ,420 उभयचर और  और 380 सरीसृप जातियाँ और 1 लाख पच्चीस हजार से अधिक अकशेरुकी जातियाँ है। मानवीय हस्तक्षेप के कारण ही यहाँ लाखों प्रजातियों के जीव सुरक्षित भी है , यहाँ पर सीधे सूर्य की किरणे साल भर प्रकाश फैलाती है जिससे पेंड़ पौधों ,सूक्ष्म जीवों को ज्यादा भोज्य सामग्री के निर्माण का अवसर भी मिल जाता है इसलिए भी हजारों प्रजातियां फल फूल रहीं है,  यहाँ पृथ्वी की सबसे अधिक जैव विविधता है यहाँ 40 हजार पौधों की जातियाँ ,3 हजार  मछली की जातियाँ, 1300 पक्षी की जातियाँ ,427 स्तनधारी जातियाँ,427 उभयचर जातियाँ,378 रेंगने वाले सरीसृप जातियाँ, है और करीब 2 लाख कीट की जातियाँ इन वनो में खोजना बाकी है!!

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इसीप्रकार के वर्षा वन इंडोनेशिया द्वीप में है ,परंतु द्वीप की रचना से    50% जीव की ख़ोज हो चुकी है,।
इसी तरह शीतोष्ण कटिबद्ध वो क्षेत्र है पृथ्वी में जो 5 से 35 और 35  से 65 डिग्री अक्षांश में पड़ता है,यहां पर सघन जंगल नही होने से विवधता कम है , यदि हम अक्षांश के साथ पृथ्वी के गोलार्ध में चले तो देखने को मिलता है कि शून्य डिग्री अक्षांश से चलकर ध्रुवों की तरफ़ क्रमशः जीवों की संख्या कम होती जाती है जैसे जीरो डिग्री अक्षांश में स्थित कोलम्बिया में पक्षियों की 1400 जातियाँ पाई गईं तो आगे  जब 41 डिग्री अक्षांश में स्थित न्यूयार्क शहर पहुंचतें है तो संख्या घटकर मात्र 105 पक्षी जातियाँ मिली, इसी प्रकार और अधिक ऊँचे अक्षांश 71 डिग्री में पहुँचने पर सिर्फ 56 जातियाँ ही मिल पातीं है इससे सिद्ध हुआ की विषुवत रेखा से ध्रुव की तरफ़ बढ़ने पर जैव विवधता कम होती जाती है, ध्रुवीय प्रदेश  में हर साल ग्लेशियर पिघलतें है जिससे जैव जातियाँ अत्यधिक ठंढ से खत्म हो जातें है, सर्दी में ख़ुद को जीवित रह पाने में सक्षम जीव  जैसे पेंगुइन, रेनडियर,   सफ़ेद भालू, सील , वालरस जैसे जीव  ख़ुद को ऐसे ठंढक में भी  जिन्दा बचाये रखतें  हैं ,75 डिग्री अक्षांश  से ध्रुवों की तरफ़ जाने में जैव  विविधता  और कम हो जाती है।
       सम्पूर्ण पृथ्वी में 70%  जंतु है और 22% पादप जातियाँ है ,  जंतुओं  में कीट सबसे अधिक समृद्धि जाति  समूह है जो सम्पूर्ण जीव  जगत (पादप को हटाकर) में 70 % है ,यानी आप ये समझो मोटे तौर में पृथ्वी में 10  जंतुओं  में हर 7 वां जीव कीट है।

          इस जैव विविधता में हम उन एक कोशकीय जीवों को नही सम्मिलित करतें जिनके कोशिका में केन्द्रक नही पाया जाता जिन्हें प्रोकैरियोटिक कहा जाता है।Bio Diversity या जैव विविधता kya  hai-kaise bachaayen।

          ::भारत में जैव विविधता::Bio Diversity in India:

Bio Diversity या जैव विविधता kya hai-kaise bachaayen


विश्व के 17 मेगा डाइवर्सिटी प्रदेशों में भारत को शामिल किया गया है, भारत का कुल क्षेत्रफल 32.84 लाख वर्ग किलोमीटर है इसमें इसमें 21.54% भाग में जंगल पाये जाते हैं,इसमें भी जंगल में सदाबहार पर्णपाती वन,शीतोष्ण कटिबंधी और उष्ण कटिबंधी तथा शंकुधारी वन पाये जाते हैं,भारत में जैव विविधता जंगली जीवों में और जंगली बृक्षों मेअधिक दिखाई देती है,भारत में सबसे अधिक स्तनधारी प्रजातियां, सरीसृपों की प्रजातियां ,और पक्षियों की प्रजातियां पाई जातीं हैं।

विश्व के हॉट स्पॉट क्षेत्रों की बात की जाए तो भारत अत्यधिक हॉट स्पॉट क्षेत्रों में  से एक है ,भारत की जैव विविधता विश्व के हॉटस्पॉट क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान(16.86%) रखता है।

,IUCN के अनुसार भारत में इस समय जीवों की 91 हजार प्रजातियां पाईं जातीं है,प्रजातियों की दृष्टि से भारत स्तनधारी, पक्षियों ,सरीसृपों  की संख्या के मामले में  अग्रणी है,विश्व के बड़े स्तनधारी प्रजातियों की दृष्टि से भारत अग्रणी है।
भारत के प्रमुख़ हॉटस्पॉट क्षेत्र----
हॉटस्पॉट शब्द का  प्रयोग सर्वप्रथम नार्मन मायर्स ने किया था,भारत के चार क्षेत्र जो जैव विविधता की दृष्टि से श्रेष्ठ हैं।
1-इंडो बर्मा क्षेत्र
2-हिमालयन क्षेत्र
3- पश्चिमी घाट एवं श्री लंका
4- सुंडालैंड क्षेत्र
भारत जैव विविधता हॉट स्पॉट के रूप में वैश्विक जैव विविधता में महत्वपूर्ण स्थान (16.86%) रखता है। भारत राजनीतिक भूभाग के अंतर्गत पश्चिमी घाट हॉटस्पॉट का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा 65.95% है ,हिमालय क्षेत्र में44.37%,इंडो बर्मा का क्षेत्रफल 5.13% तथा सुंडा लैंड हॉट स्पॉट का क्षेत्रफल 1.28% है। सुंडा लैंड को 2013 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने हॉटस्पॉट क्षेत्र घोषित किया था जिसके अंतर्गत निकोबार द्वीप समूह ,त्रिनकेट सहित , नानकाऊरी द्वीप समूह भी आता है।

  1-हिमालयी हॉटस्पॉट क्षेत्र--

विभिन्न जैव भौगोलिक क्षेत्रों का संगम होने के कारण हिमालय पर्वत जैव विविधता के हिसाब से अत्यंत समृद्धि  क्षेत्र है ,यहां पर स्लोथ बेयर , हिम तेंदुआ, मुंतजैक, ब्लैक बेयर , नीली भेंड़ गंगा डॉल्फ़िन, पानी में रहने  वाला जंगली भैंसा, नामदफा में उड़ने वाली गिलहरी अतिसंकट ग्रस्त जीव है।
 2-इंडो बर्मा हॉटस्पॉट क्षेत्र--
ये क्षेत्र कई देशों में फैला है,ये मलेशिया, लाओस, कोबोडिया। , वियतनाम , थाईलैंड ,म्यांमार, ब्रम्हपुत्र नदी के दक्षिण में फैला है ये सघन वन क्षेत्र में फैला है यहां पर गिब्बन, लंगूर ,बन्दर, ताजे पानी के कछुओं की प्रजातियां अत्यधिक पाई जाती हैं यहां  व्हाइट   इएर्ड नाईट हेरान, ऑरेंज नेक्ड पार्ट्रिज जैसी विलुप्तप्राय प्रजातियां पाई जातीं हैं।

3-पश्चिमी घाट और श्री लंका हॉट स्पॉट क्षेत्र---

यह हॉट स्पॉट क्षेत्र दक्षिणी पश्चिमी भारत और श्री लंका के दक्षिण पश्चिम के उच्च भूमि क्षेत्र तक फैला है ,भारत के पश्चिमी घाट का ज्यादातर भाग पर्वतीय क्षेत्र है यहां अत्यधिक बर्षा के कारण वर्षा वन व आर्द्र पर्णपाती वन पाये जाते हैं यहां पर पौधों की 6 हजार प्रजातियां पाई जातीं हैं इनमे से तीन हज़ार स्थानिक प्रजातियां पाइ जाती हैं,यहां पर एशियाई हाँथी, भारतीय बाघ,नीलगिरि ताहर, शेर की पूँछ वाला बन्दर, बड़े आकार की गिलहरी भी पाई जाती है       4-सुंडालैंड हॉटस्पॉट क्षेत्र---
 सुंडा लैंड हॉटस्पॉट क्षेत्र दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित इंडो मलाया द्वीप समूह के पश्चिम में पाया जाता है,इस क्षेत्र की प्रजातियां हैं प्रवाल,व्हेल,कछुआ, मगरमच्छ, डीयूगाँग आदि। इस क्षेत्र के समुद्री दोहन के कारण जैव विविधता अत्यधिक प्रभावित हो रही है।

       भारत सम्पूर्ण पृथ्वी के क्षेत्रफल का 2.4% है, इसकी वैश्विक जातीय विविधता 8.1% है , भारत में 45 हजार से अधिक प्रकार के पादप है तो 90 हजार से अधिक प्रकार के जीव जंतु हैं ,परंतु ये सब कुल 22% है शेष 78% की ख़ोज बाकी है !!

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 भारत में भी जैव विविधता में कमी आ रही है, हाल ही में गिद्ध बिलकुल विलुप्त हो चुकें है ,गौरैया जो घरों के आँगन तक फ़ुदकती फिरती थी  आज कभी कभार दिख  पाती है ,इसलिए ही सन् 2010 से  बीस मार्च को हर साल विश्व गौरैया दिवस बनाया जा रहा है ,' क्या आपने कभी मटकी में छेद करके गौरैया के लिए घर बनाया'  आप कौवे को भी देखते होंगे की 10 साल में कितने कम  हो गए है  मुंडेर में कम ही दीखते है , आकाश में मृत जीवों की तलाश में ऊंचाई तक उड़ने वाले यदि गिद्ध विलुप्ति के कगार पर हैं तो उनका साथी चील भी गगन में पींगे लगाता नही दीखता , मेढक बरसात में  टर्र टर्र करते नही दीखते  ,मधु मक्खियाँ ,तितलियां ग़ायब हो रही है , बहुत से जीव आज भी शिकार के कारण मारे जा रहे है , और बहुत से जंतु  इसलिए  ग़ायब  हो  रहे हैं  क्योंकि तीव्र शहरीकरण के कारण जब समूचे जंगल काटे जाते है तो पेंड़ो पर  आश्रीत पूरा का पूरा जन्तुवों का कुनबा या पारितंत्र ख़तम हो जाता है।
     भारत में जैव विविधता के क्षेत्र पश्चिमी घाट,  सुन्दरवन ,हिमालय के क्षेत्र है,  अरावली की पहाड़ियां (राजस्थान) , मेघालय में गारो खासी जयंतियाँ की  पहाड़ियां  ,  मध्य प्रदेश के  बस्तर के वन  हैं। सरकार ने जैव संरक्षण के लिए  भारत में 14 बायोस्फियर रिज़र्व, 90 नेशनल पार्क,448 वन्य जीव  अभ्यारण्य   बनाये हैं।
(मदुमलै टाइगर रिज़र्व तमिलनाडु ,INDIA)
                दिल्ली ,कोलकाता कानपूर,लखनऊ,चेन्नई,मुम्बई, आदि जगह ज़ू(चिड़िया घर) में जीव संरक्षित है।
         वैसे आपको बताते चलें कि भारतीय सनातन संस्कृति में बृक्ष पूजा, जानवरों की पूजा, पहाड़ ,नदी की पूजा , प्राचीन काल से चली आ रही है तुलसी हर घर में मिलेगा, पीपल ,बरगद की पूजा हर व्यक्ति करता है पीपल में कृष्ण अपने देवताओं के साथ निवास करतें है ऐसी धार्मिक आस्था है,तुलसी भगवान विष्णु या कृष्ण का प्रिय है।ये पौधे 24 ऑवर ऑक्सीजन रिलीज़ करते है आपको मालूम है।

              भारत सरकार ने वन्य जीवन की रक्षा के लिए वन्य जीव अधिनियम 1972 बनाया था , उसे 2013 में  संशोधन किया गया , अवैध शिकार , वन्य जीवों को पकड़ने के लिए जंगल में आग लगाने ,पशुओं  की खाल  , हड्डियों  का  व्यापार करने जैसे मामलों में 10 साल की सज़ा का प्रावधान किया गया है।
जैव विविधता  का महत्व--
 जैव विविधता में विभिन्न प्रकार  के जीवों की  अलग अलग विशेषता होती है ,जो कि विविध गुणों को रखते हैं,मनुष्य को जीव जंतुवो और वनस्पतियों को भोजन और आवास के लिए जरुरी संसाधन  कपडे और औसधियां प्राप्त होते है।
    जैव विविधता का निम्नलिखित महत्व है---
उत्पादक मूल्य--
 जैव विविधता से अत्यधिक उत्पादों की प्राप्ति होती है,जिससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ अर्जित किया जाता है,मनुष्य को मृदा की उत्पादक क्षमता बढ़ाने के लिए जैविक खाद की फसलों को नए उन्नत बीजों को जेनेटिकली तय्यार8 किया जाता है,20% वानस्पतिक प्रजातियों को 85% मानव जनसंख्या को खाद्य पदार्थो की प्राप्ति होती है,कृषि पदार्थो में  गेहूं ,मक्का,बाजरा,चावल ,दाल मनुष्य को भोजन की दो तिहाई उपलब्धता प्रदान करते हैं।
सौंदर्य मूल्य----
मनुष्य जैव विविधता से चिड़ियों का मधुर संगीत सुनता है ,तितलियों को उड़ते देखता है,फूलों के सुगंध सुनता है,घने जंगली जानवर में रहने वाले शेर , चीता ,तेंदुआ, हांथी, हिरण आदि व्यक्ति को अचंभित करते हैं ,व्यक्ति जंगल में भ्रमण करता है और इनके स्वाभाव आदि को बारीकी से देखता है ,इस लिए मनुष्य इनके रख रखाव का प्रयास करता है  इसके लिए  वानस्पतिक और प्राणी उद्यान जैव विविधता के साधन हैं।
  नैतिक मूल्य--
मनुष्य इसी पृथ्वी में सबसे अधिक बुद्धिमान है,इसलिए मनुष्य को अन्य जीवों को संरक्षित करने की मुख्य जिम्मेदारी है।
पारिस्थितिक मूल्य---
 जैव विविधता  पारिस्थितिक मूल्य रखती है क्योंकि यह परिस्थितिक संतुलन बनाये रखने के लिए आवश्यक है ,परिस्थितिक बदलाव से ही मनुष्य में अलग अलग जीव जन्तु हो जाते हैं,यदि किसी भी प्रजाति के जीव में अचानक संकट आ जाता है तो मानव अस्तित्व भी संकट में पड़ जाता है।
आर्थिक मूल्य---
जैव विविधता का महान आर्थिक मूल्य है क्योंकि आर्थिक विकास जैविक संसाधनों के कुशल  एवं आर्थिक प्रबंध पर निर्भर करता है, बेहतर आर्थिक विकास के लिए  मनुष्य अपने आसपास की प्रजातियों की देखभाल करना और उनकी सेवा का  अनुकूलतम उपयोग करना बेहद आवश्यक है,आदमी का अस्तित्व भी जीव मण्डल के जीवित रहने पर ही है।

             :: जंतुओं का विलुप्त होना ::

  जीव पृथ्वी में विचरण करतें है और नए जीवों की रचना भी होती है और पुराने जीव नष्ट भी होते है ,डायनासोर के बारे में आज सभी जानते है की 250   करोङ साल पहले पृथ्वी पर विचरण करते थे आज सिर्फ उनके जीवाश्म ही मिलते है , कहीं कहीं उनके अंडो के जीवाश्म भी मिले हैं।
        पिछले 100 साल में जितने जीव जातियों का विलोपन हुआ है उतना आज से 10 हजार साल पूर्व  हिमयुग के समय हुआ था,जैसे हिमयुग के समय मैमथ नामक विशालकाय जीव हाँथी की तरह था जो विलुप्त होगया था उसके जीवाश्म मिलतें हैं आज, इसी तरह कई जीव उस समय विलुप्त हो गए थे, परंतु ये विलुप्तिकरण 100 साल में नही हुआ था बल्कि हजारों सालों में धीरे धीरे हुआ था।
                आज आप देखते होंगे कई प्राणी 50 साल में विलुप्त हो गए,जैसे मॉरीशस द्वीप का डोडो पक्षी जो अंग्रेजों के अति शिकार के कारण ख़त्म हो गए,  तश्मानिया  बाघ  ग़ायब हो गया ,इसी तरह कई प्राणी जो

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"Doda pakshi"
   वैज्ञानिकों को जब कोई जीव लगातार 15 वर्ष से अपने निवास के आसपास  नही दीखते वो एक्सटिंक्ट या लुप्तप्राय माने जाते है, यानि आप ये समझो की उनकी प्रजाति का आखिरी जीवित बचा जीव भी अब खत्म हो चूका, इन विलुप्तप्राय प्राणियों को रेड डेटा बुक में सूचीबद्ध किया गया है। इसी तरह endangerd, प्राणी भी है जिनकी जाति संकटापन्न है ,जो निकट भविष्य में विलुप्त हो जाएँगी ,जैसे भारत में  ग्रेट इंडियन बास्टर्ड पक्षी जो राजस्थान में पाया जाता है। इसी तरह ये समझो कि गौरैया पक्षी को भी IUCN ने रेड सूची में डाल दिया है।

IUCN के अनुसार पिछले 500 वर्षों में 784 जातियाँ ( 338कशेरुकी+ 359अकशेरुकी+ 87पादप) विलुप्त हो चुकीं है,और पिछले 20 साल में ही 27 जातियाँ विलुप्त हो गईं, और आगे समझिये की 12%पक्षी ,23%स्तनधारी,32%उभयचर जातियाँ निकट भविष्य में विलुप्त हो जाने वालीं हैं।

              जैव संरक्षण को बचाने के लिए विश्व भर के लोग 1992 में ब्राजील के शहर' रियो डी जिनेरो" में पृथ्वी सम्मेलन के अवसर पर एकत्र हुए।
              2002 में कोपेनहेगन में के विश्व शिखर सम्मेलन में 190 देशों ने जीवों की रक्षा की  शपथ ली।

        वर्ल्ड लाइफ फण्ड की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2018 ::

वर्ल्ड लाइफ फण्ड की लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट दुनिया के  50 देशों के 159 लेखकों ने    1500 सरकारी तथा गैसरकारी   और  वैज्ञानिक आंकड़ों के रिसर्च के बाद  तैयार किया है।
            ये 15 वर्षों के दौरान पहली व्यापारिक रिपोर्ट है जो 1970 से 2014 तक के तस्वीर को प्रस्तुत करती है। इसमें 4 हजार प्रजातियों का अध्ययन किया गया है!Bio Diversity या जैव विविधता kya  hai-kaise bachaayen
       इस रिपोर्ट में कहा गया है की मानव की बढ़ती जनसंख्या और मानव  ख़ुद के जीवन को अत्यधिक आरामदायक बनाने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों के भरपूर दोहन लगातार कर रहा है,जिससे लगातार जीव जंतु विलुप्त हो रहे हैं यदि जल्द इन जीवों के संरक्षण पर ठोस कदम नही उठाये जायेंगे तो कई जीव विलुप्त हो जायेंगे ,निश्चित इनके विलुप्त होने मानव का अस्तित्व भी संकट में आ जायेगा। रिपोर्ट के कुछ सार बिंदु ये है !!
      जो ये निष्कर्ष निकालती है---
            १) वन्य प्राणियों की संख्या में 60%गिरावट आई  है।
            २) रिपोर्ट के अनुसार 1970 से अब तक  रीढ़  की हड्डी  वाले  60%   जीव खत्म हो गए हैं,इनमे मछलियाँ,पक्षी,उभयचर, सरीसृप, स्तनधारी जीव भी शामिल हैं।
             ३)2067 तक 48%जीव ख़त्म हो जायेंगे
             ४) जल के जीव जन्तुवो की संख्या में 80%कमी देखी गई है।
             ५) उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के जंगल तेजी से काटे जा रहे है 1980 से सन् 2000 के बीच 100 मिलियन हेक्टयर उष्ण कटिबंधीय वन नष्ट हो चुके हैं ,सबसे अधिक लैटिन अमेरिका के जंगल काटे जा रहे है ,आमेजन के जंगल में 23%कमी आई है,ये अमेजन के जंगल पूरी पृथ्वी को 22%ऑक्सीजन मुफ़्त में देते है यानि ये पृथ्वी के फेफड़े भी कहे जाते है।
            ६) 1992 से अब तक शहरी क्षेत्र दोगुने से अधिक हो चुके हैं।जिससे वन्य प्राणियों के आवास खत्म हो रहे है वन्य जीव  बस्तियों में घुसकर हमला कर रहे है।
            ७) मृदा यानी मिट्टी की उत्पादकता में 23% कमी देखी गई है।
            ८) अत्यधिक कृतिम प्रकाश ने कीटों ,जानवरों के स्वाभाव में प्रतिकूल परिवर्तन किया है,जानवरों की प्रतिरक्षा प्रणाली में भी प्रभाव डाला है।
           ९) मधुमक्खियों के संख्या में गिरावट आने से फसल उत्पादन में एक तिहाई कमी आ जायेगी क्योंकि मधुमक्खी ही परागण में अधिक योगदान देती हैं।
           १०) प्लास्टिक उत्पादन में 1980 के बाद 10 गुणा बृद्ध हुई है।
         ११) हर साल दुनिया में 300 से 400 मिलियन टन भारी धातुवों को कचरे में बहा दिया जाता है।
         १२)1997-2000 के बीच नेपाल में घड़ियालों की संख्या में  58% कमी दर्ज हुई है।
          १३)  मानव ने प्लास्टिक कचरे से सबसे अधिक प्रदूषण फैलाया है,ये प्लास्टिक नालों और नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुँच रहा है ,ये सीवर ट्रीटमेंट प्लांट, बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन,फिशिंग अदि माध्यम से समुद्र में पहुँच रहा है, समुद्री जीव माइक्रो प्लास्टिक(4 mm से कम प्लास्टिक टुकड़े को माइक्रो प्लास्टिक कहतें है) को खातें है ,जो पचता नही है जिससे प्लास्टिक उनके शरीर में एकत्र हो रहा है ,जीव धीरे धीरे खत्म हो जाता है,
    प्लास्टिक समुद्री कार्य फिशिंग से भी पहुंच रहा है, प्लास्टिक का सबसे अधिक कुप्रभाव समुद्री कछुवे (turtule) पर पड़ा है।
             

Bio Diversity या जैव विविधता kya hai-kaise bachaayen

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