Jawahar Lal Nehru, Writer Discovery of India ,First Prime Minister


आधुनिक भारत के निर्माता: पंडित जवाहरलाल नेहरू

 जवाहर लाल नेहरू (1889-1964) 


( Jawaharlal  Nehru)

स्वतंत्रता संग्राम के बाद भारत के राजनीतिक मंच में सिर्फ एक ही नाम गूंजने लगा वो था नेहरू।

           इनका जन्म  इलाहाबाद Allahabad सेनानी पंडित मोती लाल नेहरू के घर 14 नवम्बर 1889 को हुआ था, धनाढ्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले पंडित नेहरू की शिक्षा इंग्लैंड में हुई,1912 में वो बैरिस्टर बन कर वापस लौटे,  नेहरू का राजनीतिक रुझान 1920 के बाद शुरू हुआ वह यूरोप तथा अन्य देशों की यात्राएं कीं, उन्हें रूस के समाजवाद ने बहुत प्रभावित किया परंतु जल्द ही उन्हें मालूम हो गया कि समाजवादी व्यवस्था में अत्यधिक नियंत्रण है और इस व्यवस्था में जनता के मानवाधिकारों को चकनाचूर कर दिया गया है ,1920-22 में नेहरू को असहयोग आंदोलन के समय  यू .पी . के गांव को घूमने का अवसर मिला ,एक तरफ उन्होंने देखा कि जमींदार और साहूकार कैसे छोटे किसानों का उत्पीड़न करते हैं साथ मे खेतों में मज़दूरी करने वाले लोंगों की  ग़रीबी और शोषण , उत्पीड़न का भी  गम्भीरता से देखा उन्होंंने ग्रामीण ग़रीबी को देखा था।                   
     उन्होंने बांकीपुर के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया,1921 में सविनय अवज्ञा आंदोलन से गांधी के  सम्पर्क में आये ,उन्होंने नौ बार जेल की यात्रा की ,1923 में कांग्रेस के महासचिव चुने गए और 1929,1939 और 1946 और 1951 से 1954  तक अनवरत अध्यक्ष रहे , 1946 में नेहरू अंतरिम सरकार में और स्वतंत्र भारत के  प्रथम प्रधानमंत्री बने और 1964 मृत्यु होने तक इसी पद में रहे।

             महात्मा गांधी जीने उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी माना था , क्योंकि उन्हें विश्वास था कि उनके पश्चात नेहरू देश को अहिंसा के मार्ग पर चलाते रहेंगे। 
      आर्थिक क्षेत्र में नेहरू समाजवाद  के प्रखर समर्थक थे, ये कांग्रेस के नियोजित राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष 1939 में चुने गए  , और स्वतंत्रता के बाद योजना आयोग के भी प्रधान थे , इन्ही के अनुसार देश मे योजना आयोग बना पंचवर्षीय योजनाएं बनी देश के विकास में सहायक बनी ।

             वह आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समर्थक
थे , वह भारत के उन्नति के लिए देश के कोने कोने में वैज्ञानिक औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनेक केंद्र खोले, उन्होंने कई बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भाषण भी दिए।

           पंडित जवाहर लाल नेहरू अंतर्राष्ट्रीयता के समर्थक थे , वह साम्राज्यवादी , उपनिवेशवादी देशों की भत्सर्ना करते थे ,अनगिनत अंतरराष्ट्रीय मामले अरब इजराइल झगड़े, कोरिया समस्या ,वियतनाम समस्या,स्वेज नहर समस्या जैसे विषयों में नेहरू ने शांति और मध्यस्थता  के प्रस्ताव दिए।

               भारत मे आज़ादी के बाद ही  कई समस्याएं आई जैसे देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भगाए गए हिन्दू शर्णार्थियों के पुनर्वास का प्रबंधन करना पाकिस्तान के साथ साधनों का बंटवारा , सैनिक सामग्री ,भंडारण, सैनिकों का बंटवारा बहुत ही जटिल कार्य था। इन सब मोर्चों पर नेहरू ने  बख़ूबी अंजाम दिया।
       देश की आजादी के बाद पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश को विकास पर ले जाने के लिए  औद्योगीकरण पर जोर दिया गया।

                 भारत मे 365 रियासतों का भारत मे विलय करना था ,परंतु इस काम मे सरदार पटेल ने वी. पी. मेनन के साथ मिलकर बख़ूबी अंजाम दिया , हैदराबाद और जूनागढ़ कश्मीर ने भारत मे ख़ुद को विलय का विरोध किया , परंतु ऑपरेशन पोलो से सरदार पटेल ने सेना भेजकर और जूनागढ़ में बहुसंख्यक हिन्दू प्रजा का समर्थन लेकर विलय भारत मे कर दिया , परन्तु कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने स्टैंडस्टिल का   समझौता  पाकिस्तान भारत से कर लिया भारत ने इस समझौते में  हस्ताक्षर नही किये , पाकिस्तान से आये कबाइलियों के आक्रमण से डरकर राजा हरिसिंह ने भारत मे विलय की मंजूरी दे दी।

​स्वतंत्रता संग्राम के बाद यदि भारतीय राजनीति के क्षितिज पर कोई नाम सबसे प्रखर होकर उभरा, तो वह था पंडित जवाहरलाल नेहरू। उनका व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक विचारक, लेखक और आधुनिक भारत के स्वप्नद्रष्टा का था।

​जन्म और प्रारंभिक जीवन

​नेह़रू जी का जन्म 14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित मोतीलाल नेहरू एक प्रख्यात वकील और स्वतंत्रता सेनानी थे। नेहरू जी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जिसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए। हैरो और कैम्ब्रिज (ट्रिनिटी कॉलेज) से शिक्षा प्राप्त करने के बाद, 1912 में वे बैरिस्टर बनकर भारत लौटे।

​राजनीतिक उदय और वैचारिक यात्रा

​नेहरू का वास्तविक राजनीतिक सफर 1920 के बाद शुरू हुआ। 1920-22 के असहयोग आंदोलन के दौरान जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के गांवों का दौरा किया, तो ग्रामीण भारत की गरीबी और जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण ने उनके हृदय को झकझोर दिया। यहीं से उनमें समाजवाद के प्रति झुकाव पैदा हुआ।

​वे रूस की क्रांति और वहां की समाजवादी व्यवस्था से प्रभावित तो थे, लेकिन वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के भी प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने महसूस किया कि बिना मानवीय अधिकारों के समाजवाद अधूरा है। उन्होंने नौ बार जेल की यात्राएं कीं और अपनी प्रसिद्ध पुस्तकें 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' (भारत की खोज) और 'ग्लिम्पसेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' जेल के प्रवास के दौरान ही लिखीं।

​स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और चुनौतियां

​1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तो नेहरू के कंधों पर एक बिखरे हुए राष्ट्र को जोड़ने की जिम्मेदारी थी। विभाजन के बाद शरणार्थियों का पुनर्वास और पाकिस्तान के साथ संसाधनों का बंटवारा एक बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने अत्यंत धैर्य के साथ संभाला।

गांधी जी का विश्वास: महात्मा गांधी ने उन्हें अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी चुना था क्योंकि उन्हें भरोसा था कि नेहरू की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सोच भारत को सही दिशा देगी।


​आर्थिक दृष्टिकोण और पंचवर्षीय योजनाएं

​नेहरू 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) के समर्थक थे। 1939 में वे राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष बने और आजादी के बाद योजना आयोग का गठन किया।

  • औद्योगीकरण: उन्होंने भारी उद्योगों (जैसे भिलाई, राउरकेला स्टील प्लांट) को "आधुनिक भारत के मंदिर" कहा।
  • कृषि सुधार: उन्होंने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन और सिंचाई परियोजनाओं (जैसे भाखड़ा-नांगल बांध) पर जोर दिया।

​आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper)

​नेहरू का मानना था कि भारत की समस्याओं का समाधान केवल विज्ञान और तकनीक से ही संभव है। उनके कार्यकाल में:

  • IIT और IIM जैसे विश्वस्तरीय संस्थानों की नींव रखी गई।
  • परमाणु ऊर्जा आयोग (होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में) और अंतरिक्ष अनुसंधान (विक्रम साराभाई के नेतृत्व में) की शुरुआत हुई।
  • CSIR के नेटवर्क को पूरे देश में फैलाया गया।

​विदेश नीति: गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment)

​नेहरू ने विश्व पटल पर भारत को एक स्वतंत्र आवाज दी। शीत युद्ध के दौर में जब दुनिया दो गुटों (अमेरिका और सोवियत संघ) में बंट रही थी, नेहरू ने नासिर (मिस्र) और टीटो (यूगोस्लाविया) के साथ मिलकर 'गुटनिरपेक्ष आंदोलन' (NAM) की शुरुआत की। उनके द्वारा दिए गए 'पंचशील' के सिद्धांत (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच नियम) आज भी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का आधार माने जाते हैं।

​राज्यों का पुनर्गठन और कश्मीर मुद्दा

​जहां सरदार पटेल ने रियासतों के एकीकरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, वहीं नेहरू ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन (1956) की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। कश्मीर मुद्दे पर राजा हरि सिंह के विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद, नेहरू ने इसे लोकतांत्रिक ढंग से सुलझाने का प्रयास किया, हालांकि यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पेचीदा मोड़ पर अटक गया।

​एक महान शिक्षाविद् और बच्चों के 'चाचा'

​नेहरू को बच्चों से अगाध प्रेम था, इसीलिए उनका जन्मदिन 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता है। उनका मानना था कि आज के बच्चे ही कल के भारत का निर्माण करेंगे, इसलिए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने की दिशा में कड़े कदम उठाए।

​निष्कर्ष

​27 मई 1964 को नेहरू जी का निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसा मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा छोड़ गए, जिसने भारत को कई संकटों के बावजूद स्थिर रखा। वे एक सच्चे राष्ट्रवादी और विश्व-नागरिक थे, जिन्होंने 'विविधता में एकता' के मंत्र को भारत की पहचान बनाया।


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