सिंधु सभ्यता की विशेषतायें क्या थीं

  सिंधु सभ्यता  की विशेषतायें ---


सिंधु सभ्यता   की विशेषतायें  क्या थीं

हड़प्पा  सभ्यता अपने समकालीन सभ्यताओं मेसोपोटामिया की सभ्यता और मिस्र की  सभ्यताओं से अलग विशेषतायें थीं।
 सिंधु सभ्यता का विस्तार-
        इस सभ्यता का विस्तार व्यापक था ,ये सभ्यता उत्तर में जम्मू के मांडा तक विस्तृत थी तो दक्षिण में नर्मदा नदी  तट तक      विस्तृत थी   ,उसी तरह पूर्व में आलमगीरपुर स्थल से पश्चिम में बलूचिस्तान तक सुत्कागेंडोर और सोतकाकोह तक विस्तृत थी ।
   इस सभ्यता की महत्वपूर्ण विशेषता ये नगरीय सभ्यता थी , सिंधु युगीन  स्थलों की सूची 1450 के आसपास है जिनमे कुछ नगरीय थे और कुछ ग्रामीण भी थे।
 सिंधु सभ्यता का नगरीय जीवन की विशेषता--


यदि हम ग्रामीण और नगरीय जीवन में विभेद करें तो पाते है कि कुछ तत्व जो नगरीय जीवन में पाये जाते हैं वो ग्रामीण जीवन में नहीं पाये जाते , सामान्यता ग्रामीण बस्ती का आकार छोटा होता है जो पांच से आठ दस हेक्टयर तक होती हैं जबकि नगरों का विस्तार 20 हेक्टयर से अधिक होता है यदि हम सैंधव कालीन बस्तियों के बारे में  अध्ययन   करें तो पाते हैं की इनका विस्तार 60 से 100 हेक्टेयर  के बीच या उससे भी ज़्यादा था।  नगरों  का एक तत्व और होता है वह है गैर कृषि कार्यों में  लगा होना जैसे कुछ लोंगो का व्यापार और  शिल्प में लगा होना ,ये तत्व भी सैंधव नगरीय बस्तियों में विद्यमान था। नगर में हर कार्य के सुव्यवस्थित पूर्वक करने के लिए एक शासक वर्ग का होना बहुत जरुरी है जो  सैंधव नगरों में एक प्रशासक और शासक वर्ग के बारे में कई मुहरों से आभास होता हैं। हड़प्पा सभ्यता की एक महत्वपूर्ण विशेषता जो समकालीन कांस्य युगीन बस्तियों बहुत कम दिखती है नगर में सड़कों एवं गलियों का निर्माण ,उत्तम जल प्रबन्धन उपर्युक्त सभी हड़प्पा सभ्यता की विशेषता  थी।

हड़प्पा संस्कृति में नगरीकरण तभी संभव हो पाया जब कृषि में अधिशेष(surplus)उत्पादन हुआ, अधिशेष उत्पादन तभी संभव हुआ जब कृषि कार्यों में तकनीकी ज्ञान बढ़ा ,जुताई गहराई तक हुई । अधिशेष उत्पादन में धर्म और एक  सुदृढ़ प्रशासन की भी भूमिका रही होगी।

     इसके नगरीय स्वरुप का निर्धारक तत्व  इसका well organised ( समुन्नत) नगर नियोजन था ,इस नगरीय नियोजन से आभास होता है कि उस समय  तकनीकी ज्ञान में पर्याप्त उन्नति हो चुकी थी,
 इसमें   हर क्षेत्र  दुर्ग और आवासीय क्षेत्र दो भागों में बटा होता था   ,,अपवाद स्वरुप धौलावीरा तीन भागों  में विभाजित था ,ये नगर जो ऊँचे और निचले भाग में विभाजित थे  ,ये सभी रक्षा प्राचीर यानी एक मोटी किलेनुमा दीवार से घिरे होते थे, वैसे सभी नगरों में एक ही तरह की निर्माण योजना का प्रयोग नही हुआ  जैसे हम देखते हैं कि हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगां में दुर्ग और निचले क्षेत्र के बीच एक दीवार से विभाजन है जबकि लोथल और सुरकोतदा  में ये विभाजन  देखने को नहीं  मिलता।

सिंधु सभ्यता के नगरों की एक विशेषता यह भी थी की कि वो ग्रिड प्रणाली पर निर्मित थे जबकि समकालीन मेसोपोटामिया के नगर बेतरतीब रूप से बसे हुए थे।
 सारी जगह समानांतर सड़क थीं और एक  शतरंज के खेल की खानों की तरह एक दूसरे को समकोण पर काटतीं थीं
इस युग में नालियों की व्यवस्था अद्वितीय थी  घर की नालियां एक बड़े चैम्बर में एकत्र होती थी वहां से वह सड़क की नालियों से मिलतीं थी, सड़क में भी बीच बीच में मैनहोल थे जहां गंदगी एकत्र होती थी वहीं से पानी धीरे धीरे आगे जाता था सफाई कर्मी इन्ही गड्ढों से सफाई कर देते थे ,कुछ जगह नालियां सड़क के बीच से निकलतीं थीं, ये सभी नालियां बड़ी बड़ी ईंटों से ढकी रहतीं थीं। कालीबंगां के आवासों में हम कच्ची ईंटों का प्रयोग की जानकारी मिलती है जबकि हर जगह पक्की ईंटे प्रयोग में लाई गईं कुछ एक दो जगह जैसे सुरकोतदा और धौलावीरा में पत्थर का प्रयोग आवास निर्माण में हुआ था।
 
           2- सिंधु घाटी सभ्यता में आवास भी सुनियोजित बनाए गए थे , आवास में आँगन होता था और आसपास कमरे होते थे ,आँगन के बगल में स्नानघर होता था साथ में हर घर में एक कुआँ भी पाया जाता थ,,भवनों में मुख्य प्रवेश द्वार मुख्य  रास्ते में न खुलकर  गलियों में खुलते थे , कुछ भवन दुमञ्जली     भी होते थे , ऊपर जाने के लिए सीढियाँ बनाई जाती थीं ,  घरो में कोई अलंकारिकता नहीं होती थी।

,कुछ प्रमुख नगर ,विशाल स्नानागार ,अन्नागार ,प्रमुख थे। जिनके आकर बृहद थे। जैसे-
  इनमे एक था 230'×78'का भवन था जिसके अंदर कई कमरे थे जो विद्यालय सदृश था
  दूसरा 90'×90'खम्भों वाला बड़ा कमरा था जो नगरपालिका भवन था।
     हड़प्पा में 150×200' का राजकीय अन्न भण्डार था जिसमे 50'×20'के छोटे छोटे  भण्डार थे।
  108'×108'का सार्वजनिक स्नान-भवन था। जिसमे 40'×24'×8' का तैरने का तालाब था।
   3- मृण्मूर्तियों में मातृदेवी की मृणमूर्तियों के आधार पर ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि स्त्रियों की दशा उन्नत रही होगी और समाज में उनकी हर कार्यों में भागीदारी होगी।
साथ में इतनी उन्नत प्रणाली के संचालन के लिए सुदृढ़ प्रशासन होगा और एक नौकरशाही होगी जो समाज में ऊँचा  दर्जा रखती होगी।

    4-  व्यापार ,कृषि की विशेषतायें---
सिंधु युगीन आर्थिक जीवन कृषि एवं पशु पालन  के साथ व्यापार पर निर्भर था , सिंधु सभ्यता के समय  व्यापारिक गतिविधियाँ सिर्फ आपसी सैन्धव स्थलों तक सीमित नहीं थीं बल्कि इसका व्यापार सुदूर मेसोपोटामिया की सभ्यता से था ,क्योंकि वहां से प्राप्त मुहरों से ज्ञात होता है की मेलुहा से व्यापारिक सामग्रियाँ मंगाई जाती थीं , लोथल से प्राप्त गोदीवाड़ा से बेलनाकार मुंहरें मिलीं है जिनका प्रचलन मेसोपोटामिया सभ्यता के उर ,आदि जगह पर था। सिंधु सभ्यता में स्थानीय व्यापार भी होता था  , फारस ,बदख्शां , और दक्षिण के स्थल में आपसी व्यापार होता था ।
      सिंधु युगीन आर्थिक जीवन कृषि एवं पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका थी,विभिन्न प्रकार की फसलें गेहूं, जौ, रागी, सरसों ,चावल आदि थे ,कालीबंगां में दो प्रकार की फसलें उगाई  जाने का  साक्ष्य उनकी उन्नत कृषि प्रणाली को  दर्शाती है।

    व्यापारिक गतिविधियों में अनाज का व्यापार या अन्य व्यापार में हर चीज निश्चित मानक के आधार पर लेनदेन होती थी ,व्यापार में कई प्रकार के नाम के बाँट मिले है , जो 16 के गुणांक में थे , हांथी दांत के बने पैमाने मिले हैं जो उस समय के लेनदेन में माप को सिद्ध करते हैं निश्चित ही एक गणितीय पद्धति का प्रयोग होता था , अनाज के व्यापारी फसल को बड़े बड़े कोठारों और अन्नागारों  में एकत्र किया जाता था , और अनाज का स्थान्तरण नदियों के माध्यम से होता था, क्योंकि मोहनजोदड़ो की दो मुद्राओं पर नावों की आकृतियां अंकित हैं एक नाव में तो मस्तूल दिख रहा है और लंबी पतवार  चलाते मांझी को दिखाया गया है और एक दूसरे मुहर पर  एक चौकौर केबिन और जहाज अंकित है ये सब बातें सिद्ध करती हैं कि समुद्री मार्ग से सुमेर और इलाम से व्यापार करते थे।

         व्यापार का माध्यम माध्यम किसी निश्चित मुद्रा के आभाव में विनिमय पद्धति पर आधारित रही होगी ,परन्तु व्यापारी माल को एक दूसरे जगह के व्यापारियों तक पहुंचाने के लिए मुहर का प्रयोग करते होंगे। इन
मुंहरों की संख्या 2000 से अधिक है। इन मुहरों पर लेख खुदे हुए हैं यद्यपि इन लेखों को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है ,इन मुद्राओं में शेर,चीते, गैंडे, रीछ ,गीदड़, भेड़िये, हिरण , बराहसींगा ,कूबड़दार साँड़ ,भैंसे ,मेढ़े ,पक्षी और अन्य जीवों की सजीव आकृतियां हैं , सिंध युग में ईंटो की इमारतों से पता चलता है की इन ईंटो को पकाने के लिए भट्ठा उद्योग भी विकसित था  ।
     सिंधु सभ्यता में यदि गौर करेंगे तो हमे हड़प्पा में औद्योगिक बस्तियों के खण्डहर मिले हैं जो 16 खण्डों में स्थित थे ,इस समय आटा पीसने के चक्कियों के अवशेष भी मिलते हैं ,उनके लिए बनाये गए ईंटों की फर्श  में लकड़ी के ओखल को फंसाने के लिए खाँचे बने होते थे , इन ओखलों में भारी मूसलों से अन्न पीसकर आटा बनाया जाता  था, इन फर्शों की दरारों से गेहूं जौ और चोकर के अवशेष भी मिले हैं।
 सिंधु युग की धार्मिक विशेषता--
     सिंधु युगीन धार्मिक धार्मिक विशेषताओं की बात करें तो सैंधव वासी बहुदेववादी एवं प्रकृतिपूजक सिद्ध करती है,इसके बाद सैन्धव वासी मातृ देवी के उपासक थे पशुपति की भी पूजा करते थे बृक्ष की पूजा ,पशु पूजा ,नाग पूजा करते थे ,  पुरुष देवताओं में सबसे प्रमुख देवता  त्रिमुखी देवता  हैं मार्शल ने इसे आदि शिव(proto-shiva)की संज्ञा दी है।
परंतु आश्चर्य की बात है की सैंधव सभ्यता में किसी मन्दिर के साक्ष्य नहीं मिलते ,जबकि समकालीन मेसोपोटामिया की सभ्यता में जिगुरत के अवशेष मिलते है। अन्तेष्टि क्रिया में हमे पूर्ण समाधी करण और दाहकर्म प्रचलित थे।
     भाषा और लिपि की विशेषता--
    सिंधु सभ्यता में भाषा और लिपि का भी विकास हुआ ,इस चित्रात्मक लिपि में करीब  400 चिन्ह थे ,परंतु अभी तक इसे पढ़ने में सफलता नहीं मिली,इस लिपि की मुख्य विशेषता  इसकी   सुस्पष्टता  और खड़ी सीधी रेखाओं (rectillinear)   की   विशिष्टता  है ज्यादातर लिपि  बाएं से दायें लिखी गई (जैसे आधुनिक अरबी लिपि)  हालाँकि कुछ साक्ष्य बाएं से दायें लिखे जाने के भी मिलते हैं  जो  साक्ष्य में पौराणिक आख्यान का वर्णन है  और जिसमे लेख दो या दो से  अधिक  का है    इस लिपि को बुस्ट्रोफेदन लिपि  या गोमूत्रिका लिपि कहा जाता था। ऐसे लेख के साक्ष्य       कालीबंगां   से  प्राप्त एक मृदभांड के टुकड़े से होती है ,     लिपि के  चिन्ह में सबसे ज्यादा अंग्रेजी के U अकार का चिन्ह व  पशु चिन्ह के रूप में मछली का निसान जैसा चित्र मिलता है । एस आर राव नामक विद्वान ने इस लिपि में मूल रूप से 52  चिन्ह का प्रयोग माना है।
         सिंधु सभ्यता के निवासियों ने रसायन, धातुकर्म, औषधि एवं शल्य चिकित्सा का ज्ञान था ,धातुकर्म का श्रेष्ठ उदाहरण मोहनजोदड़ो से प्राप्त कांस्य की मूर्ति है ,इस मूर्ति से नर्तकी की मूर्ति मिलती है जो अपने पैरों की गति से संगीत की ताल का अनुसरण करती हुई जान पड़ती है। हड़प्पा सभ्यता में तांबे के बर्तन भी मिले हैं इसी तरह कांसे के बर्तन मिले हैं कुछ बर्तन चांदी के मिले हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है ,और धातु के बर्तन भी मिट्टी के बर्तनों की तुलना में कम ही है। लोथल से एक सुई मिली है जिसके नोक में छेद है हड़प्पा से  तांबे  का बना प्रसाधन केस(vainity box)  मिला है ।

 हड़प्पा से बड़ी संख्या में औजार, हथियार, उपकरण मिले हैं ,इन हथियारों में कुल्हाड़ी ,धनुष , बाण,भाला,गदा,बल्लम  और औजारों में  आरा, छेनी, कुल्हाड़ी मिले हैं। औजार , बर्तन, हथियार, मूर्तियां आदि बनाने के लिए मुख्य दो धातुऐं ताम्बा और कांसा का प्रयोग होता था,  धातु की बनी अन्य वस्तुओं के विश्लेषण से  पता चलता है कि निकल और पारा को भी मिश्रीत किया जाता था। धातुओं से मूर्तियां बनाने में  मोम साँचा विधि का प्रयोग होता था।सैंधव निवासी कांसा बनाने की विधि से परिचित थे परंतु कांसे की बनी वस्तुएं बहुत ज्यादा नहीं मिलीं हैं,ताम्बा राजस्थान के खेतड़ी से मंगाया जाता था वहीं टिन अफगानिस्तान से मंगाया जाता था।
इस युग में धातुओं को गलाने ,ढालने का प्रचलन हो चुका था ।
  इस प्रकार हम देखते है कि


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हड़प्पा समाज में,राजनैतिक संगठन, प्रशासन एवं धर्म संबधी अनेक विशेषताएं थीं।

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