Full form of ED

E D का full form--

Directorate General of Economic Enforce ment) आर्थिक प्रवर्तन महानिदेशक--यह संस्थान जी स्थापना एक मई 1956 को आर्थिक कार्य विभाग में प्रवर्तन इकाई के रूप में की गई  1957  में इस संस्थान का नाम बदलकर प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate ) कर दिया गया।
,यह विधि प्रवर्तन और आर्थिक आसूचना एजेंसी है जो भारत में आर्थिक कानून लागू करने और आर्थिक अपराध रोकने के लिए गठित की गई है,इस संगठन में भारतीय राजस्व सेवा,भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं। इस समय ये मुख्यता दो मुख्य अधिनियम जो वित्त अपराध को नियंत्रित करते है ये हैं विदेश विनिमय प्रबंधन अधिनियम1999 fema) और धन आशोधन निवारण अधिनियम 2002 (PMLA)

हड़प्पा संस्कृति का पतन कैसे हुआ

 हड़प्पा संस्कृति का उद्भव पर जिस तरह अनेक मत है विद्वानों के उसी तरह हड़प्पा संस्कृति के पतन होना भी एक आश्चर्य ही है कि इतनी विकसित और विस्तृत सभ्यता धीरे धीरे विलुप्त क्यों हो गई ,और इस सभ्यता के व्यक्ति और उनके साथ उनकी विकसित वैज्ञानिक  संस्कृति भी कैसे बाद के समय में बदल गई या गायब हो गई ,इस पर कई विद्वानों ने अपने अपने मत प्रस्तुत किया है।

हड़प्पा संस्कृति का पतन--
दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व हड़प्पा संस्कृति का शहरी चरण समाप्त हो गया ,हालाँकि उसके ह्रास के लक्षण  बहुत पहले ही दिखने लगे थे जब हड़प्पा मोहनजोदड़ो तथा कालीबंगां में शहरी योजना के आधार पर निर्माण कार्य बहुत ही कम हो गए थे । ये शहर  अब कच्चे भवनों  और झोपड़ पट्टियों में बदलते जा रहे थे। शहरी योजना के आधार पर निर्माण कार्य तो कम हुआ ही था साथ में माप तौल के उपकरण, हड़प्पाई लिपि, कांसे के औजार भी खत्म हो गए लगभग 1800 ईसा पूर्व हड़प्पाई शहर वीरान हो गए थे,इस समय तक मेसोपोटामिया से प्राप्त मुहरों में भी मेलुहा का कोई जिक्र नहीं मिलता हैं,अब ये हड़प्पाई बस्तियों के लोग धीरे धीरे गांव की तरफ कृषक कार्यो को अपनाने लगे ,अब गैर हड़प्पाई ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति की बस्तियां देश भर में फ़ैल चुकीं थीं।


       हड़प्पा संस्कृति के पतन के कारण---
हड़प्पा संस्कृति के पतन के अनेक कारण सुझाये गए हैं ,इन कारणों में प्रमुख है विदेशी आक्रमण , सभ्यता के स्वरुप में परिवर्तन, भैगोलिक एवं प्राकृतिक कारण ,हड़प्पा  संस्कृति जैसी विस्तृत क्षेत्र में फैली सभ्यता में अचानक पतन न होकर क्रमशः कई परिस्थितियों के  कारण हुआ लगता है ।हर विद्वान ने अलग अलग कारण बताये हैं पतन के।
      विदेशी आक्रमण----
गार्डन चाइल्ड और स्टुवर्ट पिगट  ने हड़प्पा संस्कृति के विनाश का कारण आर्यों   के   आक्रमण को माना है ,इनके तर्क के अनुसार साहित्यिक स्रोतों में इंद्र को पुरंदर अर्थात किलों को  नष्ट करने वाला कहा गया है ,अर्थात ऋग्वेद में आर्यों के शत्रुओं के दुर्गों को नष्ट करने के लिए इंद्र देव से प्रार्थना की जाती थी ,इसमें इंद्र द्वारा कई दुर्ग जैसे हरयूपीय , वैलाश थानक ,महा वैलास्थ आदि की जानकारी मिलती है।
   दूसरी तरफ मोहनजोदड़ो से  38 नरकंकाल मिले है जिनके शरीर में किसी अस्त्र के घाव के साक्ष्य मिलते हैं ,इनमे कुछ कंकाल गहने पहने हुए हैं,ये नर कंकाल कुछ समूहों में मिलते है कुछ इर्द गिर्द मिलते हैं ,जैसे कुछ सीढ़ियों में मिले हैं कुछ कमरों में पड़े मिले हैं कुछ मकान के बाहर पड़े मिले हैं ,यहां स्त्री पुरुष और छोटे  बच्चों के कंकाल मिले हैं , इन विद्वानों  का  कहना है कि आक्रमण इतनी तेज था कि लोंगों को भागने का मौका नही मिला ।
    इस मत का विरोध- आर्य आक्रमण मत का विरोध आर एस शर्मा ने किया है उनका कहना है की आर्य आक्रमणकारी इतनी बड़ी संख्या में नही आये कि उस समय की मोहन जोदड़ो की अनुमानित आबादी 41 हजार को पूरी तरह से  खत्म करने में सफल हो जाते ,
दूसरा बचाव का तर्क ये भी है कि हर नरकंकाल में अस्त्र से घाव का चिन्ह नहीं मिलता, प्राप्त नर कंकाल एक काल के नहीं हैं ,इस कारण ये सम्भावना ज्यादा है कि ये नरकंकाल किसी प्लेग जैसे बीमारी के अचानक फैलने से हुआ हो जो किसी कारण इतने असहाय थे कि वो भाग भी नही पाये जान बचाने को या फिर किसी जंगली लुटेरों का अचानक हमला हुआ होगा जिसमे इतने लोग मारे गए होंगे क्योंकि सबसे बड़ी समस्या दोनों की काल अवधि अलग अलग है जहां हड़प्पा1 सभ्यता का पतन 1750 ईसा पूर्व हुआ वहीं ऋग्वेद सभ्यता 1500 ईसा पूर्व का है यानि दोनों के बीच क़रीब 250 वर्ष का अंतर है।
प्राकृतिक कारण---
हड़प्पा  संस्कृति को  खत्म होने में  अनेक विद्वानों ने प्राकृतिक कारण पर बल दिया है ,मानवीय जनसंख्या बढ़ने , महामारी बढ़ने से, बाढ़ का प्रकोप , जलप्लावन ,सूखा पड़ना आदि हैं।
  बाढ़ का प्रकोप --
सिंधु सभ्यता के स्थल नदियो के किनारे बसे थे , अचानक मौसमी बदलावों से लागातार अतिवृष्टी हुई और हर साल बाढ़ भी आने लगी,बाढ़ की सुरक्षा के लिए हर साल घरों के फर्श को ऊंचा किया जाने लगा , जैसा की मोहनजोदड़ो के मकानों में में बालू पाये जाने के प्रमाण मिले हैं,बाढ़ के कारण खेती  नष्ट होने लगी और अर्थव्यवस्था को बहुत ज़्यादा चोट पहुंची ,राव तथा मैके नामक विद्वान का तो मानना है की      लोथल और  चन्हूदड़ों  दोनों बाढ़ के कारण ही नष्ट हो गए थे।
  नदियों की जलधारा में परिवर्तन---

आर एस वत्स के अनुसार रावी नदी के मार्ग में बदलाव के कारण ही इस सभ्यता में धीरे धीरे अवसान हुआ।
समय के साथ धीरे धीरे नदियां हर साल कुछ पीछे जाने लगती है इसी प्रकार हड़प्पा जो रावी नदी के किनारे की एक उन्नत सिन्धुकालीन बस्ती 2500 वर्ष पूर्व थी आज जब उसके उत्खनन क्षेत्र को देखेंगे तो पाएंगे कि रावी नदी आज इस जगह से 6 किलोमीटर दूर जा चुकी है जबकि उस समय इस बस्ती से सटी हुई बहती थी,इसी प्रकार सुतकांगेंडोर ,सोतकाकोह तथा    बालाकोट जो उस समय   समुद्र  किनारे  के       व्यापारिक  स्थल   थे आज  ये नगर जो उस समय समुद्र के किनारे स्थिति थे आज वो  समुद्र से बहुत दूर हैं डेल्स नामक विद्वान के अनुसार घग्गर क्षेत्र में नदी परिवर्तन के कारण अनेक बस्तियां उजड़  गईं थीं।
 भुतात्विक परवर्तन और जलप्लावन के कारण --
सिंधु सभ्यता के पतन का कारण बाढ़ से न होकर जलप्लावन या जलभराव से हुआ था , ये सिद्धान्त के प्रतिपादक थे एम आर साहिनी  थे , इसी तरह अन्य विद्वान आर एल राइक्स के अनुसार  विवर्तनिक हलचल यानि भूकंप आने से मोहनजोदड़ो का बांध टूट गया साथ में यही पानी आगे इसलिए नही निकल पाया क्योंकि आगे की भूमि की ऊंचाई भूकम्प आने से बढ़ गई थी , पानी धीरे धीरे निकाला गया , परंतु मिट्टी गाद के रूप में नीचे रह गई  ,सतह ऊँची होने से  , मकान कमजोर होने लगे हर साल उनके जीर्णोद्धार की जरूरत पड़ने लगी।
हर बार मोहन जोदड़ो में बरसात में जलभराव होने से कृषि कार्यों में और व्यापार में समस्याएं आने लगी।
 भूमि की शुष्कता का बढ़ना ---
गुरुदीप सिंह नामक विद्वान के अनुसार इस क्षेत्र में जलवायु परवर्तन के कारण सभ्यता का पतन हुआ, उस समय तेजी से जलवायु परवर्तन हुआ ,क्योंकि जनसंख्या में तीव्र बृद्धि हुई उनके लिए पक्के मकानों के लिए ईंट बनाये गए ईंट पकाने के लिए भट्ठे बनाये गए ,इन  भाठ्ठों के लिए जंगल से ज्यादा लकड़ियाँ काटी    गईं  जिससे  वन कटाव से जलवायु में परिवर्तन हुआ, परिणामस्वरूप वर्षा कम होने लगी ,नदियां सूखने लगीं सरस्वती नदी के आसपास रेगिस्तान का विस्तार होने लगा। शुष्कता के सिद्धान्त को IIT खड़कपुर के वैज्ञानिको ने अपने शोध से पता  लगाया है  वैज्ञानिकों ने 5000 साल पुराने   तक मौसम के पैटर्न को नमूना बनाया और लद्दाख के झीलों के बर्फ़ को शोध का आधार बनाया और निष्कर्ष निकाला की आज से 2250 ईशा पूर्व से 1550 ईसा पूर्व अचानक शुष्कता बढ़ गई ये अवधि 800 वर्ष तक बनी रही , हर वर्ष धीरे धीरे वर्षा होना कम होता चला गया और अंत में सारा क्षेत्र रेगिस्तान में बदल गया ।
अग्नि का प्रकोप ---
अग्नि का प्रकोप भी कुछ सैंधव बस्तियों को खत्म करने का एक कारण प्रतीत होता है क्योंकि राणा घुंडाई, नाल , डाबरकोट में ऊपरी सतह पर राख जी परत मिली है जो किसी बृहद अग्निकांड का कारण लगता है ,ये विशाल अग्नि बढ़ती शुष्कता के कारण लगी होगी या फिर किसी भूकंप के कारण लगी होगी। आग से पूरा क्षेत्र तो प्रभावित नहीं हुआ बल्कि कुछ भाग ही नष्ट हुआ होगा।
महामारी का प्रकोप---
महामारी हड़प्पा सभ्यता पतन का जिम्मेदार था, ये चांस ज्यादा हैं की हड़प्पा सभ्यता में किसी महामारी से बस्तियों के लोग सुरक्षित जगह में चले गए और बहुत बड़ी जनसंख्या कल कलवित हो गई , मलेरिया ,कालरा या प्लेग जैसे महामारियों से 100 साल पहले भी करोंडो लोग काल के ग्रास एक साथ बन गए थे तब ,इसी तरह की महामारी सैंधव बस्तियों में भी फ़ैल गई होगी ,   बचे हुए     लोंगों  की स्वास्थ्य की दशा अचानक  ख़राब हो जाने के कारण लंबे समय तक स्वस्थ नही हो पाये होंगे ,जिससे व्यापारिक गतिविधियों में बुरा असर पड़ा होगा ,सुदूर देशों मेसोपोटामिया , अफगानिस्तान , ईरान से व्यापार में धीरे धीरे रूकावट  आ गई होगी।
  बढ़ती जनसंख्या तथा प्रशासनिक शिथिलता--
प्रशासनिक शिथिलता के कारण सिन्धु सभ्यता के पतन का सिद्धान्त  का प्रतिपादन    सर जान मार्शल ने किया था।
 सैंधव सभ्यता के पतन का एक कारण जनसंख्या बृद्धि  भी  थी ,प्राकृतिक कारण से संसाधन कम हुए और बढ़ती जनसंख्या को संसाधन और बढ़ाने चाहिए थे पर प्रशासनिक शिथिलता के कारण ऐसा नही हो पाया ,व्हीलर महोदय ने मोहनजोदड़ो के उत्खनन के  अंतिम चरण के स्तर में ह्रास देखा,मकानों के आकार ,दीवारों निर्माण में पुरानी सामग्री का प्रयोग ,पहले के अलंकृत मृदभांड की जगह  सादे मृदभांड प्रयोग होने लगे,  सेलखड़ी की मुहरें जो  पहले मिलती थीं  अब मिलना बन्द हो गईं, यानि अब नगरी जीवन का पतन हो रहा था और धीरे धीरे लोग ग्रामीण जीवन की तरफ बढ़ने लगे थे। इस प्रकार के पतन के प्रमाण  लोथल  ,मोहन जोदड़ो और कालीबंगा से मिलता है।
   निष्कर्ष--- 
   इस प्रकार हम पाते है की हड़प्पा सभ्यता के पतन के कई कारण थे कोई एक कारण से पूरी सभ्यता नष्ट नही हुई  बल्कि सभी कारणों का थोडा थोडा योगदान था इस के पतन के लिए


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