Jammu kashmir पुनर्गठन : 370 और 35(A) का समापन

      

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   जम्मू कश्मीर में लगातार अर्धसैनिक बलों का भेजा जाना , अमरनाथ यात्रियों का वापस बुलाना , सारे कश्मीर में धारा 144 लागू करना , सारे नेता महबूबा मुफ़्ती, अमर अब्दुल्ला आदि को नजरबंद करना,  फ़ोन बन्द  ,  इंटरनेट के सेवाएं बन्द करने के बाद पूरे देश में ये अफवाह उड़ रही थी कि देश में कुछ बड़ा होने वाला है ,सारे कश्मीरी नेता हाहाकार मचाये थे की धारा 370 हटेगी तो कश्मीर में स्थिति गम्भीर हो जायेगी , कश्मीर भारत के हाँथ से निकल जायेगा।
           इसका पटाक्षेप राज्यसभा में आज  सुबह 11 बजे  गृहमंत्री अमितशाह की इस उद्घोषणा के साथ हो गया जब अमित शाह में अनुच्छेद 370 को पूर्णतयः समाप्त करने की  घोंषणा कि ,इसके साथ ही  उसके साथ बाद में जोड़ी गई धारा 35-A भी ख़त्म हो गया । चूँकि ये धाराएं 1949 और 1954 में सिर्फ कैबिनेट की मीटिंग से निर्णय और राष्ट्रपति के मोहर के बाद बनी थी , इसलिए इस नियम को  सामान्य राष्ट्रपति के द्वारा ही हटाया जा सकता है।

        जम्मू कश्मीर   में  370 व 35(A)  के हटने के बाद बदलाव ::

         अब  वहां राज्यपाल के बजाए  उप राज्यपाल होगा , वहां विधानसभा का  कार्यकाल सिर्फ 5 साल का  होगा   जबकि अभी  तक यहां विधानसभा का कार्यकाल 6 साल का होता था। अब वहां भारत का झंडा ही लहराएगा , अभी तक उस state में कश्मीर का झंडा अलग फहराया जाता था और देश का झंडा अलग फहराया जाता था । अभी तक जम्मू -कश्मीर का संविधान   भारत के संविधान अलग था  , भारत सरकार  के कानून  केंद्र में बनने के बाद तभी लागू होते थे कश्मीर में जब वहां की सरकार उसका विधानसभा में अनुमोदन कर देती थी  , जैसे कई कानून कश्मीर में लागू नही थे जैसे RTE (शिक्षा का अधिकार), मनी लॉन्डरिंग कानून , कला धन का कानून  ,  73 वां संवैधानिक संशोधन का प्रावधान  लागू नही था , कोई भी व्यक्ति वहां बस सकता है , कोई भी व्यक्ति  अब वहां पर जमीन खरीदकर व्यापार   कर  सकता है, अब जम्मू कश्मीर में लागू रणवीर पैनल कोड लागू नही होगा बल्कि, अब" आई पी सी 'और "सी आर पी सी "लागू  होंगे ,पंचायतों  व स्थानीय निकायों को अधिकार देने वाला संविधान 73 वां वा 74 वां संसोधन अभी तक जम्मू कश्मीर में लागू नही है अब ये लागू हो जायेंगे, जम्मू कश्मीर के कैडर वाले आई ए एस और आई पी एस  केंद्र शासित प्रदेश के कैडर अधिकारी बन जायेंगे।अब यहां अनुच्छेद 356 यानी राष्ट्रपति शासन लागू हो सकता है, अनुच्छेद 360 वित्तीय आपात लागू हो सकता है, भारत का कोई भी नागरिक जम्मू कश्मीर में मतदाता और उम्मीदवार बन सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले अब जम्मू कश्मीर के साथ लद्दाख में भी लागू होंगे।
 साथ में जम्मू कश्मीर राज्य में में वही कानून लागू होंगे जो पूरे भारत में लागू होते है।

     जम्मू कश्मीर का इतिहास आजादी से पूर्व-- 


जम्मू  कश्मीर का लिखित इतिहास राजतरंगणी नामक ग्रन्थ से होती है ,राजतरंगणी  नामक पुस्तक  को  कल्हण ने लिखा , बाद में 1150 में जोनराज ने इस इतिहास के आगे के भाग को लिखा ,श्रीवर ने इसे और आगे बढ़ाया।
कश्मीर में 800 ईस्वी पूर्व सिर्फ सनातन संस्कृति ही विद्यमान थी। यहां की जनश्रुति के अनुसार यहां पर  यहां पर पहले मानव आबादी से पूर्व पूरी घाटी पानी में   डूबी थी  और इस पानी में एक राक्षस नाग रहता था ,जिसको वैदिक  ऋषि कश्यप और देवी सती ने मिलकर पराजित किया और इस घाटी में फैले सारे पानी को( वितस्ता) झेलम नदी से बहा दिया  इस प्रकार इस जगह का नाम  सती सर पड़ा और बाद में सती सर से काशमर पड़ा एक अन्य मान्यता थी कि इस झील में कछुए( कश्यप)  अधिक होते थे इसलिए इसे कश्यप सर यानी कछुवों की झील पड़ा,।
 कश्मीर में वैसे तो इस समय सभी पूजा पंथ के लोग रहते हैं, संपूर्ण कश्मीर में कश्मीरियत दिखती है हर जगह अलग अलग बोली भाषा के लोग घुले मिले रहते हैं ,जिसे लोग संजो कर रखना चाहते हैं।
कश्मीर  के राजतरंगणी से मालूम होता है कि यहां ईशा से तीसरी पूर्व मौर्य सम्राट अशोक का शासन रहा ,साथ में किशन सम्राट कनिष्क ने कश्मीर में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया और कश्मीर बौद्ध संस्कृति और ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बन गया था।    कश्मीर में एक महिला शासिका महारानी  दिद्दा का भी शासन रहा ,जिसने अपनी सूझ बुझ और चतुराई से जम्मू कश्मीर के आधारशिला को मजबूत किया।
जब मध्ययुग में ललितादित्य मुक्तापीड़ ने विशाल साम्राज्य स्थापित किया तब यह  कश्मीर संस्कृति एवं विद्या का विशाल केंद्र था।
    मध्ययुग में एक मुस्लिम कट्टरपंथी शासक सिकंदर बुतशिकन हुआ जिसने सत्ता में बैठते है सैकड़ों मन्दिर गिरा दिए हिन्दुवों को या तो कश्मीर से खदेड़ दिया या फिर उन पर जुल्म सितम ढा कर इनको हिन्दू से मुसलमान बना दिया। परंतु कश्मीर के इतिहास में एक अतिउदार शशक सिकंदर के बाद हुआ इस राजा की दयालुता ,न्याय प्रियता ,सहिष्णुता के कारण इसे हातिमताई की उपाधि दी गई कश्मीर का अकबर भी कहा जाता है। इसका नाम था जैन उल अबादीन। ---------
 कश्मीर में सोलहवीं सदी में मुग़लों का अधिपत्य हो गया।
मुग़लों के बाद हिन्दू  राजा ग़ुलाब सिंह डोगरा ने ब्रिटिश लोंगों से संधि करके अपने राज्य को जम्मू से बढ़ाकर कश्मीर तक विस्तृत कर लिया ,डोगरा वंश आजादी तक कायम रहा उस समय कश्मीर घाटी में 20 प्रतिशत हिन्दू आबादी थी। कश्मीर घाटी जम्मू से अलग है ।
     देश की आज़ादी के समय 1947 में पाकिस्तान ने कबाइलियों को कश्मीर भेजकर  गिलगित -बाल्टिस्तान का हिस्सा छीन लिया। इस हिस्से को POK यानि pak occupied kashmir कहते हैं।
जम्मू कश्मीर का कुल क्षेत्रफल 2,22,236 वर्ग किलोमीटर है जिसमे पाक अधिकृत क्षेत्र का 78,114 वर्ग किलोमीटर है। इसमें पाकिस्तान ने 5130 किलोमीटर क्षेत्रफल  चीन को भेंट स्वरूप दे दिया।
 वहीं अक्साई चिन हिस्सा का क्षेत्रफल 42,685 किलोमीटर है इस क्षेत्र पर चीन ने 1962 के भारत चीन युद्ध के बाद बलपूर्वक कब्ज़ा जमा रखा है,|
   जम्मू और पूरा कश्मीर (पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर मिलाकर) पूरा कश्मीर का अस्तित्व 16 मार्च 1846 के अमृतसर की संधि से राज्य और राज्य संरचना के रूप में आया था , यह संधि महाराजा ग़ुलाब सिंह और ब्रिटिश सरकार द्वारा हस्ताक्षर किये गए थे,सिंधु नदी के उत्तरी क्षेत्र महाराजा रणवीर सिंह के समय विलय हुआ और ब्रिटिश सरकार द्वारा इसका अनुमोदन भी हुआ।
  इधर पाक अधिकृत कश्मीर कराची   समझौता के बाद पाकिस्तान के सीधे नियंत्रण में आ गया, और  24 अक्टूबर 1947 में pok में एक युद्ध परिषद् स्थापित हुई,पाकिस्तान ने  आजाद जम्मू कश्मीर राज्य से नामित इस जगह पर AJK सरकार को नाममात्र की शक्तियां दी हैं  वास्तविक शक्ति तो पाकिस्तान के पास ही है। A J K की सरकार 1953 से 1974 तक बर्खास्त ही रहीं।



  जम्मू कश्मीर पुनर्गठन क़ानून के बाद  जम्मू काश्मीर की स्थिति:


          अब   जम्मू कश्मीर दो भागों में बटेगा  , एक क्षेत्र जम्मू  कश्मीर  होगा दूसरा लद्दाख  होगा ,  दोनों केंद्र  शासित प्रदेश होंगे। पहले  केंद्र  शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर  में विधानसभा भी होगी जैसे दिल्ली में है , इसी तरह लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा भी  नही  होगी   इसकी स्थिति चंडीगढ़ या पांडिचेरी जैसी होगी । केंद्र शासित प्रदेश में जहां  विधान सभा होती है वहाँ राज्यपाल न होकर उप राज्यपाल होते है और   केंद्र की सरकार से उनका सम्पर्क अधिक होता  ,  और जिस   केंद्र   शासित   प्रदेश  में विधानसभा नही होती    वहां   का  प्रशासक केंद्र द्वारा भेजे गए उपराज्यपाल या   डिप्टी गवर्नर द्वारा   शासित होता है।

    जम्मू कश्मीर का इतिहास ; आजादी के समय:

 1947 में भारत और पाकिस्तान को अंग्रेजों ने आज़ादी दी,भारतीय स्वतंत्रता एक्ट 1947 के अनुसार तमाम रियासतों को ये चयन करने की सुविधा दी  गई कि वे भारत के साथ रहना चाहते हैं या पाकिस्तान के साथ जुड़ना चाहते हैं उस समय जम्मू-कश्मीर देश की सबसे बड़ी रियासत हुआ करती थी                यहां महाराजा  हरिसिंह शासन करते थे    ,वहां की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के हिसाब से पाकिस्तान को लगा कि ये रियासत उसके साथ जाएगी ,परंतु हरिसिंह कश्मीर को न भारत मे मिलाने के इक्षुक थे न ही पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे बल्कि वो कश्मीर को स्वतंत्र रखने का फैसला किया।
       अब हम थोड़ा कश्मीर के इतिहास में चलते है , वास्तव में देश की आजादी के समय जब सारी रियासतों को सरदार पटेल ने एक एक कर भारत संघ में मिला लिया था ,तब तीन रियासतें हैदराबाद , और कश्मीर ने आज़ाद रहने यानि न पाकिस्तान              में जाने न ही भारत में मिलने का एलान किया,क्योंकि राजा हरि सिंह कश्मीर को स्विट्जरलैंड बनाने का सपना देख रहे थे। , 
          वहीं जूनागढ़ ने ख़ुद को पाकिस्तान में मिलाने की पेशकश की। इसमें दो रियासतें तो भारत में कूटनीति और सेना भेजकर मिला ली गईं , परंतु कश्मीर के  राजा  हरि सिंह  कश्मीर को आजाद रखने के लिए इंस्ट्रुमेंट ऑफ़ एक्सेसन  यानि   विलय पत्र में  हस्ताक्षर नही किया ,  उन्होंने भारत और पाकिस्तान के साथ यथा स्थिति (स्टैंड स्टिल)  का समझौता किया ,  पाकिस्तान ने standstill    की  बात  मान ली    परंतु उधर से  चुपचाप पाकिस्तान  ने    मुस्लिम  बहुल  क्षेत्र को हथियाने के लिए     अपने पाकिस्तानी सैनिकों और जनजातियों के साथ , हमला कर  दिया में काबाइली के रूप में सैनिक भी  भेज दिए ),ये काबाइली लगातार जम्मू की तरफ बढ़ रहे थे। इस हालात में राजा हरि सिंह का सपना चूर चूर हो गया कश्मीर को स्विट्जरलैंड बनाने का।
उधर   इस   गंम्भीर  हालात  में  भी माउंटबेटेन कश्मीर में  भारत   की   सेना  भेजने को तैयार नही था  , जबकि नेहरू और पटेल  भारत की सेना भेजने को  दबाव बना रहे थे  ,  माउंटबेटेन बिना विलय पत्र में singnature  किये कश्मीर में सेना भेजना अंतर्राष्ट्रीय नियम के ख़िलाफ़ बता रहे थे , उन्होंने नेहरू और पटेल से इस बारे में विवशता प्रकट की ।
            जब कश्मीर में 22 अक्टूबर 1947  को  जम्मू तक कबाइली घुस आये   और 24 अक्टूबर तक ये पाकिस्तानी कबाइली बारामूला तक घुस आये , इन कबाइलियों को रोकने के लिए  हरि सिंह के सेनापति राजेंदर सिंह ने रास्ते के सारे पुल तुड़वा दिए ,ताकि कबाइलियों को रसद की व्यवस्था  को रोका जा सके,  वो लगातार कबाइलियों से मोर्चा लिए रहे पर वो उनसे युद्ध करते करते  शहीद हो गए ,  जब सिर में  पाकिस्तानी कबाइलियों का ख़ौफ़  राजा साहब को आया  , तब  राजा हरिसिंह ने  24 अक्टूबर 1947 भारत में विलय  करने  की इच्छा   भारत सरकार को चिट्ठी लिखकर प्रकट की, साथ में विलयपत्र भी   संलग्न   दिया, जिसको राजा हरी सिंह के प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन लेकर दिल्ली पहुंचे  ,  इस आधार पर  भारत  के  तब   के गृह सचिव VP menon  ने जम्मू में राजा हरिसिंह को  26 अक्टूबर 1947 को विलयपत्र  (  इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सशन )   में  हस्ताक्षर  करवाया  ,   27 अक्टूबर को  गवर्नर  जनरल माउंटबेटेन  ने  इसे  स्वीकार  कर  लिया  , माउंटबेटेन ने कहा    कि "    जैसे  ही   कश्मीर  से घुसपैठिये    राज्य से खदेड़  दिए जायेंगे   ,कानून  व्यवस्था दुरुस्त कर  ली जायेगी  वैसे ही। वहां की अवाम   की  भावना  के अनुसार  राज्य का  विलय  किया  जायेगा ,"  वैसे आपको बतातें चले कि इसी इंस्ट्रूमेंट ऑफ़  एक्सेशन में   राजा  ने प्रावधान  किया की   भारत सरकार  को सिर्फ संचार ,रक्षा,विदेश मामले में अधिकार  होगा अन्य विषय पर  कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्य को होगा इसके क्लाज पांच में कहा  कि  मेरे   विलय    के दस्तावेज में किसी  भी  भारत  के कानून द्वारा  संशोधन नही  कर सकती जब तक उनकी यानि राजा जी की इच्छा न हो ,,,1948   में  प्रस्तुत श्वेत पत्र में  भारत  सरकार  ने जम्मू कश्मीर के विलय को अस्थाई   और तत्कालिक  बताया था।
       हरि सिंह ने अपनी  इच्छा से  विलय पत्र में  हस्ताक्षर   कर  दिए और   विलय पत्र में हस्ताक्षर के  बाद   ही  कश्मीर में सेना भेजी गई ,  परंतु सेना   भेजने में   देरी   हुई , राजा हरि  सिंह ने तो ये  कह दिया था अपने , सचिव से कि यदि सुबह  4 बजे तक भारत   की सेना न आये तो सोते  सोते  नींद  में  ही गोली मार देना।  अंततः   सेना  का  प्रवेश कश्मीर में हुआ , तब तक कबाइली लोग जम्मू में घुस चुके थे ,हजारों  जम्मू  के निर्दोष  लोंगो  को उन्होंने एक  झटके में  गोली से उड़ा दिया इन कबाइलियों  ने हजारों कश्मीरी महिलाओं को बेआबरू किया इन कबाइलियों ने  कबाइलियों के भेष में ये वास्तव में  पाकिस्तानी थे । यानि आप समझिये कुछ माह के लिए जम्मू कश्मीर नर्क में बदल गया ।
           परंतु   भारत  की सेना ने सिचुएशन को  तेजी से सम्भाला ,सेना ने सीधे आक्रमण करके सारे कबाइलियों को मात्र 14 महीनो में आज की लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल तक धकेल दिया  [यदि  एक -दो महीने सेना को और मिल जाते तो वो पूरी तरह से इन कबाइली सेना को पूरे कश्मीर से खदेड़ देती   और आज कोई काश्मीर समस्या ही नही होती बल्कि जो हिस्सा POK का है वो हमारा ही होता    सिर्फ आधे हिस्से   के  भारत के अधिकार से निकलने  के कारण ही  आज ये क्षेत्र विवादास्पद  कहलाता है  ।], परंतु इसी बीच माउंटबैटन   ने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को UNO ले जाने के लिए जवाहर लाल नेहरू से कहा  जबकि  सरदार पटेल  बिना पूरा कश्मीर से कबाइलियों को खदेड़े  UNO जाने के पक्ष में नही थे , पर  नेहरू को लगा कि इस मामले में भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ जाने की सम्भावना है अतः नेहरू को माउंटबेटेन की बात समझ में आ गई अगले एक दिन बाद नेहरू ने रेडियो में जम्मू कश्मीर  में जनमत संग्रह कराने और UNO में ले जाने की बात कही, 1 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सामने कश्मीर  मुद्दा रखा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल 1948 को "प्रस्ताव 47'' पारित किया, इसके तहत दोनों देशों को संघर्ष विराम को कहा गया,साथ ही पाकिस्तान से कहा कि वह जम्मू कश्मीर से शीघ्र ही पीछे हटे। और पूरा कश्मीर में कब्जे वाली जगह  खाली करे।
   UNO  में  प्रस्ताव पहुँचते ही मामला अन्तराष्ट्रीय हो गया। UNO तक पहुँचते ही  इस मामले में  UNO ने लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल घोषित कर दी दोनों के अधिगृहीत भूभाग उनके अधिकार में रह गए , दोनों देशों की सेनाएं हटाये जाने के बाद UNO  की सेना की उपस्थिति में जनमत संग्रह  कराने  की  बात   पूरे जम्मू कश्मीर (पाक अधिकृत भी) में कराने की बात हुई। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद द्वारा युद्धविराम संधि की अलग अलग व्याख्या के कारण भारत और पाक संतुष्ट नहीं थे,बहरहाल नवंबर 1948 में दोनों देश जनमत संग्रह को राजी हुए, परंतु भारत ने पहले पाक अधिकृत कश्मीर से सेना    हटाने के बाद  ही इस शर्त को मानने की बात की , इस शर्त को पाक ने भी नही माना  पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर से    पाकिस्तान   ने कभी   भी सेना नही हटाई।

 पाकिस्तान द्वारा काश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद:


                    लगातार भारत के हिस्से  में आतंकी कार्यवाहियों को जन्म देता रहा है, और  कश्मीर की स्थिति 1990 से अधिक नाज़ुक हो गई जब पाक ने इसके लिए लक्ष्य बनाकर आतंकी घुसपैठिये भेजने को अंजाम देता रहा,।
             इसी समय कश्मीरी पंडितों के लिए नर्क हो गया कश्मीर में रहना , मस्जिदों से लगातार   चिल्ला चिल्ला कर  बोला जाता था की कश्मीरी पण्डित   कश्मीर को एक सप्ताह में छोड़ दे , रात को उनके घरों    के  गेट  में  इस्तिहार चस्पा कर दिया जाता था कि कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़कर चलें जाये और अपनी बहु बेटियों को उनके लिए छोड़ जाये, जो कश्मीरी पंडित तिलक लगाकर घूमता था उसके माथे में कील तक ठोक दी गई ,हजारों पंडितों ने   दहशत  में रातों रात काश्मीर घाटी छोड़ दी और   दिल्ली ,पंजाब ,और अन्य शहरों में जा बसे।  , इस दौरान 1990 से 2019 तक करीब 41 हजार जम्मू और कश्मीर घाटी के नौजवान मारे गए आतंकियों के  शैतानी  हांथों  से, पाकिस्तान  जब प्रत्यक्ष रूप से युद्ध करके भारत को हरा नही पाया तो उसने मिलिटैन्ट का सहारा लिया ,उसके द्वारा पाक अधिकृत कश्मीर में बाकायदा मिलिटैन्ट ट्रेनिंग दी जाती है, जिनका काम भारत की बॉर्डर को पार करके आतंकी कार्यवाहियों को अंजाम देना , ये आतंकी भीड़भाड़ वाली जगहों में विस्फ़ोट करते है या फिर सेना के बेस कैम्प में  आत्मघाती हमला करते है ,जैसा उरी और पुलवामा के हमले को भुलाया नही जा सकता ,दो चार आतंकी सेना द्वारा मुठभेड़ में मारे जाते है ,ये आतंकी किसी भी घर में घुसकर धमकाकर वहां से गतिविधियों को भी अंजाम देते है। घुसपैठिये भी 99%मारे ही जाते है ,वो भी 6 महीने या साल भर के अंदर , कभी कभी इंटेलिजेंस फेल होने पर आतंकी हमला करने में सफ़ल भी हो जातें है ,पाकिस्तान काश्मीर के भटके हुए  नौजवानों के लिए पहले तो पत्थर बाज बनाता है फिर उन्ही में से किसी को उकसा कर आतंकी बनाता है और टेरर कैम्प में प्रशिक्षण भी दिलाता है । कुछ अलगाव वादी नेताओं की पाकिस्तान परस्त  कार्यवाहियों से भी आतंकवाद पनपा।

           धारा 370 जब से लगी तभी से कश्मीर के लोग  ख़ुद को  मानसिक  तौर  पर भारत से उस तरह नही जोड़ पाये जैसे अन्य प्रदेश के लोग भारत के  संविधान से अटूट रिश्ता रखते हैं। वहीं अलगाव वादी नेता  कश्मीर में तेजी से सक्रिय हुए , और कश्मीर ये अलगाववादी पकिस्तान के पैसों से काश्मीर के नौजवानों को भटकाकर पत्थर बाज बनाने लगे।


Jammu kashmir पुनर्गठन : 370 और 35(A) का समापन कैसे।

अनुच्छेद 370 और 35(A) - संविधान में कैसे जुड़े?


         अब ये  370 और 35 A कहाँ से आगए तो आप ये समझिये की  जम्मू कश्मीर के ख़राब हालात को जवाहरलाल नेहरू ने गृहमंत्रालय से ख़ुद अपने अधिकार में रखा , यानी कश्मीर की गृह मंत्रालय की सभी  कार्यवाहियां सीधे PMO से डील होतीं थीं।
          इस बीच शेख अब्दुल्ला ने आंदोलन छेड़ दिया जिसने नवजवानों को भारत में मिलने के लिए तैयार किया,   शेख अब्दुल्ला ने कबाइलियों को भारत से खदेड़ने में भारतीय सेना का साथ भी दिया था , शेख अब्दुल्ला ने नेशनल कॉन्फ्रेंस का गठन करके  जम्मू कश्मीर की जनता को भारत के पक्ष  में मोड़ा , परंतु कभी कभी उनका रुख पाकिस्तान में मिलने का हो जाता था  बाद में तो नेहरू ने 1962 में दस साल के लिए जेल भेज दिया क्योंकि वह  क्योंकि वह अमेरिका को उकसा रहे थे कश्मीर को आज़ाद कराने के लिये।,  इस कारण उनको कई बार नजर बन्द किया गया ,आप ये समझो कि  ये नेता  शुरू से ही  कश्मीरी जनता को भ्रमित करते रहे ,वो जवाहर लाल नेहरू के खास मित्रों में थे ,  इसलिए जब वो नेहरू से मिल लेते थे वो भारत के पक्ष में पूर्णतयः खड़े हो जाते थे , कभी किसी मुद्दे पर पाकिस्तानी सपोर्ट की बात बीच बीच करते रहते थे , क्योंकि कुछ अलगाववादी नेता भी थे ,  ये सब उनके सुरों में सुर मिलाने के कारण होता था।
        धारा 370 भी इसी प्रयोजन से सम्मिलित की गई थी काश्मीर में क्योंकि उस समय हालात सामान्य नही थे ये एक अस्थाई प्रावधान था । इससे जुड़ा 35 (A)  तो  सिर्फ   सामान्य कैबिनेट प्रस्ताव से राष्ट्रपति द्वारा ही हटाया जा सकता था , परंतु बहुत लंबे समय इच्छाशक्ति के आभाव के कारण सरकारे 370 के हटाने के लिए कुछ नही कर सकी ,1960 में कांग्रेस सरकार ने आगे बढ़ने का कुछ प्रयत्न किया पर फिर से पीछे हट गई उस समय गुलजारी लाल नंदा गृह मंत्री ने वक्तव्य दिया की अभी भी धारा 370 हटाने का समय नही आया ,इसके लिए कुछ वर्ष और इंतजार करना चाहिए। इस सम्बद्ध में कई याचिकाये सुप्रीम कोर्ट में लंबित  है कई में सुनवाई चल रही है जिसमे अनुच्छेद 370 और 35(अ) को संविधान के मूल अधिकार के ख़िलाफ़ और मानवाधिकार के ख़िलाफ़ बताया है।

        26 अक्टूबर 1947 को जब राजा हरि सिंह ने भारत में मिलने का  कश्मीर  के  भारत  में  विलय की संधि कि तभी राजा ने कश्मीर के निवासियों को राजा द्वारा  दिए  गए 1927  और 1932 के विशेषाधिकार को बताया जिसमे जम्मू कश्मीर के वो नागरिक माने जाते थे जो 1911 से पहले कश्मीर में रहे  हैं और वहां पर  सम्पत्ति खरीदी हो ,, 1952 में    भारत के संविधान के प्रथम अनुसूची के "भाग ख"   राज्य में जम्मू कश्मीर को जोड़ा गया।

 इसी तरह    काश्मीर के   लिए  स्पेशल अधिकार देने के लिए   अनुच्छेद 370 की व्यवस्था संविधान में रखी गई , धारा 370  सन्  1952 में संविधान में जोड़ी गई  , उसी समय 1952 में ही "जम्मू कश्मीर "को   संविधान की  पहली अनुसूची    के  भाग ख  में   राज्य की लिस्ट में जोड़ा गया , और  जम्मू कश्मीर  के संविधान सभा द्वारा अनुमोदित की गई,   फ़रवरी 1954 में ही जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने  भारत में विलय की   पुष्टि  की। और 26 जनवरी 1957 को जम्मू कश्मीर  की   संविधान सभा ने अपना ख़ुद  का संविधान बनाकर पूरा किया , जो भारत के संविधान  से  अलग था , भारत में पहली बार अपने  किसी  निजी प्रदेश में  ख़ुद का संविधान बनाया गया था, और दुर्भाग्यपूर्ण था , चूँकि आपको  बताते चलें की जितनी भी रियासतें    भारत में विलय की गईं सभी ने मिलने से पहले कोई न कोई रियायत मांगी विलयनामा में दस्तख़त से पूर्व ,पर सरदार पटेल ने सभी से दृढ़ता से सभी मांगों को खरिज कर दिया बल्कि सिर्फ़ देश की मज़बूती के लिये एक होने को कहा।   

                                : 370 अनुच्छेद से  हुई केंद्र की ढीली पकड़: बढ़ा अलगाववाद:

 अनुच्छेद 370  ,के लागू होने के बाद जम्मू कश्मीर में केंद्र की सारी शक्तियां सिर्फ तीन विषय संचार ,रक्षा,और विदेश मामलों तक  सीमित हो गई।  अन्य सभी  मामले पर राज्य सरकार को ही कानून बनाने का अधिकार था , यहां तक किसी भी केंद्रीय विषय पर किसी क़ानून को कश्मीर में लागू करने के लिए राज्य के विधानसभा की जर्रूरत पड़ती है , समवर्ती सूची के विषय में क़ानून बनाने का अधिकार भी विधान सभा को थी वहीं  अवशिष्ट अधिकार भी राज्य तक ही सीमित हो गये और इसमें जम्मू कश्मीर के लिए अपना सद्र ए रियासत का प्रावधान भी था ,जो 1963तक रहा।
                 धारा 370(१) ये उस सन्धि की बात करता है जिसमे कश्मीर को भारत में कुछ शर्त के साथ सुविधाओं की बात की है,
                 धारा 370(२) और धारा 370(३) में कुछ विशेष रियायतें अलग विधान सभा ,अलग संविधान ,अलग झंडे, जम्मू कश्मीर के नागरिक पहचान  की बात की गई है । वहीं 35(A)   जो   1954 में अनुच्छेद 370 के साथ जोड़ा गया ये वहां के नागरिकों के नागरिकता के पहचान से सम्बंधित है अनुच्छेद 35 A  जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच 1952 के  दिल्ली समझौते से जोड़ा गया, जिसमे  ये भी जोड़ा गया कि जम्मू कश्मीर में भारत का तिरंगा और कश्मीर  का झंडा अगल बगल फहराया जायेगा, कश्मीर में आंतरिक गड़बड़ी  होने पर बिना राज्य सरकार की अनुमति के  भारत सेना नही भेज सकता है, साथ में अविशिष्ट शक्तियां कश्मीर के पास ही रहेंगी और कश्मीर से बहार का कोई व्यक्ति वहां  कोई सम्पत्ति नही ख़रीद  सकता है, जो 35A का प्रावधान जोड़ा गया  वो भी धारा 370 के भाग 3 से   ही   जोड़ा गया   जो सिर्फ राष्ट्रपति के आदेश  से   जोड़ा   गया   कभी   भी   देश   की   संसद में इसके लिए बिल लाकर  नही जोड़ा गया यानी इस अनुच्छेद की उम्र सिर्फ 6 महीने ही होना  चाहिए थी जैसे राष्ट्रपति का आदेश सिर्फ 6 महीने तक ही  अधिकार में रहता  है

      अनुच्छेद 35-A का कश्मीरी जनता, शरणार्थियों में प्रभाव:


, अनुच्छेद 35-A जिसमे काश्मीर के नागरिको  के नागरिकता वहां निवास करने वहां सम्पति अर्जित करने का प्रवधाम करती है। अनुच्छेद 35 A राज्य की विधानसभा को अधिकार देती है कि वह कश्मीर के नागरिकों  की पहचान करे ,इस अनुच्छेद के कारण कई दशक से पश्चिमी   से आये  पांच हजार शरणार्थी परिवारो को वहां की स्थाई नागरिकता नही मिली,  कैबिनेट के प्रस्ताव से 1957  में पंजाब से बाल्मीकि समुदाय के लोगों को  कश्मीर  में  सफाई  के  काम के लिए भेजा गया  था,    परंतु उनके बच्चे  आज   भी सिर्फ सफ़ाई के काम का ही अधिकार है  अन्य किसी नौकरी या रोज़गार नही कर सकते । आज इन सब शरणार्थी के बच्चे   किसी  स्कूल   में   शिक्षा नही   ले   सकते , ये शरणार्थी यहां के विधानसभा और पंचायत में अपना वोट नही डाल सकते। इस  अनुच्छेद से जम्मू कश्मीर से बहार के लोग यहां पर कोई संम्पत्ति नही खरीद सकते,  कोई लड़की यदि वो कश्मीर की है और उसकी अपनी निजी  सम्पत्ति भी है और उस लड़की ने भारत के अन्य प्रदेश के लड़के से शादी कर ली तो उसकी सम्पत्ति  उसके हाँथ से निकल जायेगी।

         जम्मू-कश्मीर, लद्दाख में सरकार द्वारा गुड गवर्नेंस के उपाय और विकास:


               जम्मू कश्मीर चूँकि  लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के पास का एक सेंसिटिव एरिया में अवस्थित है इसलिए इसकी यूनियन टेरिटरी की स्थिति को बनाया गया है नए पुनर्गठन कानून में ,आप देखते भी है बॉर्डर में झड़पों को ,कारगिल वॉर  के बटालिक, द्रास सेक्टर   सभी लद्दाख के ही हिस्से हैं ,  ये अति पिछड़ा एरिया है , यहाँ पर बौद्ध और मुस्लिम धर्मावलंबी और गुर्जर ,बकरवाल भी रहते है ,बौद्ध 40% है मुस्लिम 30% शेष बकरवाल ,गुर्जर और अन्य समुदाय के हैं,  जाड़े में ये भूभाग जम्मू कश्मीर से पूरी तरह कट जाता है , अत्यधिक शीत पड़ने के कारण बर्फ जम जाती है ,   आपने three इडियट्स फ़िल्म में आमिरखान के रोल वाले वान्शुक का नाम सुना ,वो इसी लद्दाख के है  जिन्होंने कई खोज की है   के लिए जैसे बर्फ को एकत्र करके शुद्ध जल की आपूर्ति आदि ,इनको रमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिल  चुका है ,  इस क्षेत्र में भरपूर पर्यटन , औषधि , योगा , आदि की सम्भावनाएं    हैं   , जो इसके अलग   UT  बनाये   जाने से पूरी  हो सकतीं है , परंतु  गृह   मंत्री श्री अमित शाह ने कहा है कि समय के साथ इसको पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जायेगा।
               अब सरकार की सारी विकासपरक नीतियां और गुड गवर्नेंस का प्रभाव  बढ़ेगा तो यहां बिजली , पानी , स्वास्थ्य, सड़क, शिक्षा जैसे मूलभूत चीजों में तेजी से विकास होगा, यहां पर्यटन, ऊर्जा, और सोलार ऊर्जा, औषधि उत्पादन के भरपूर अवसर हैं।
                  अभी तक घाटी का विकास नही हो पाने का कारण ये था कि केंद्र द्वारा भेजे गए पैसे को ये नेता  नीचे  तक नहीं पहुंचने दे रहे थे। दो साल पहले केंद्र सरकार ने 80 हजार करोङ रुपये भेजे थे ,ये सरकार ने  पंचायत के माध्यम से विकास को जन जन तक पहुँचाने  में कामयाब रही, अब केंद्र सरकार विकास के लिए और अधिक धन भेजेगा , केंद्र ने सारे अलगाववादी नेताओं को पहले ही जेल भेज दिया है शब्बीर शाह जेल में है,अब्दुल गनी लोन बीमार चल रहे हैं, इधर फ़ारुख़ अब्दुल्ला के ऊपर ED की जाँच चल रही है , महबूबा मुफ़्ती पर एंटी curruption टीम ने जम्मू कश्मीर बैंक से अपने चहेतों को नियम भंग कराकर नियुक्ति देने और ऋण देने की जाँच चल रही है ,इस प्रकार हर क़दम प्लानिंग से उठा रही है, मोदी सरकार ।
              ये दुर्भाग्य पूर्ण है कि 70 साल पुरानी भूल को यदि सुधार दिया गया है तो कांग्रेस और अन्य पार्टीयां जो इस संशोधन का विरोध कर रही है उनको  जनता की नब्ज पकड़ना नही आता , क्योंकि देश की जनता कश्मीर के आतंकवाद के कारण बहुत  ज़्यादा मानसिक रूप से परेशान रहती थी ,उसे अब निज़ात मिलेगी।

              Jammu kashmir पुनर्गठन : 370 और 35(A) का समापन

       जम्मू कश्मीर और लद्दाख की 31 अक्टूबर 2019 के बाद कि संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति--------  

    31 अक्टूबर 2019 को जम्मू कश्मीर  के उपराज्यपाल  गिरीश चन्द्र मुर्मू और लद्दाख  राधाकृष्ण माथुर पहले  उपराज्यपाल के रूप में शपथ ली, अब केंद्र शाषित प्रदेश जम्मू कश्मीर में राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह बदल जाएगी,मुख्यमंत्री के अधिकार भी सीमित होंगे, विधान सभा की सीटों की संख्या 107 होगी, जिसे परिसीमन के बाद 114 तक बढ़ाये जाने का प्रस्ताव होगा , राज्य के संवैधानिक मुखिया जम्मू कश्मीर में नहीं होंगे बल्कि उसकी जगह अन्य  केंद्र शासित प्रदेशों की तरह जम्मू कश्मीर में विधान परिषद  नहीं होगी ,जम्मू कश्मीर को विधान परिषद को 17  अक्टूबर को ही राज्य सरकार ने जम्मू कश्मीर की पुनर्गठन अधिनियम की धारा 57 के तहत समाप्त कर दिया था।
   एकीकृत जम्मू कश्मीर जिसका लद्दाख भी हिस्सा रहा है,में विधानसभा की 111 सीटें थीं,इनमे चार सीटें लद्दाख प्रान्त की हैं ,इन्हें हटाये  जाने के  बाद  केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में 107  सीटें रह गईं हैं, लद्दाख में अलग केंद्रशासित क्षेत्र बन जाने से उनकी चारों विधानसभा सीटों का अस्तित्व समाप्त हो गया, मौजूदा समय में यदि जम्मू कश्मीर में चुनाव होगा तो 83  सीटों पर ही चुनाव होगा ,इसके अतिरिक्त दो सदस्यों को नामांकित किया जायेगा, जम्मू कश्मीर के लिए आरक्षित 24 सीटों पर पहले की तरह कोई चुनाब नही होगा,केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में विधानसभा सीटों को 107 से बढ़ाकर 114  किये जाने का प्रस्ताव है ,इस सन्दर्भ में 2011 कई जनगणना के आधार पर परिसीमन किया  जाएगा।

 केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री की संवैधनिक स्थिति पूरी  तरह दिल्ली और केंद्रशासित प्रदेश  पांडुचेरी के मुंख्यमंत्री के समान होगी , मुख्यमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ विधायकों को  ही मंत्री बना सकेंगे, इसके अलावा राज्य विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक को या प्रस्ताव को उपराज्यपाल की मंजूरी के  बाद ही लागू किया जाएगा, उपराज्यपाल चाहें तो किसी भी बिल या प्रस्ताव को नकार नही सकते ,उनके लिए मुंख्यमंत्री या  राज्यविधान सभा के प्रस्ताव को मंजूरी देना बाध्यकारी नहीं होगा ,राज्यविधानसभा का कार्यकाल भी पांच साल रहेगा,जबकि एकीकृत जम्मू कश्मीर में कार्यकाल छः साल का होता था।
       31 अक्टूबर 2019 से से उपराज्यपाल के शपथ ग्रहण के  साथ जम्मू कश्मीर में व लद्दाख में  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अधिनियम समेत 106 केंद्रीय क़ानून लागू होंगे, प्रदेश में पहले चल रहे 153 कानून और राज्य अधिनियम के जरिये बने 11 कानून  पूर्णतया समाप्त हो जाएंगे, वैसे अधिकांश  केंद्रीय क़ानून  पहले से लागू थे, परंतु केंद्रीय सूचना अधिनियम, शत्रु संपत्ति अधिनियम ,राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम क़ानून अब लागू होंगे।
   शिक्षा, सड़क,स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं का अधिकार राज्यों के पास होगा, राजस्व विभाग पूरी तरह राज्य सरकार के अधीन होगा, कृषि भूमि,कृषि ऋण, कृषि भूमि के हस्तांतरण  के अधिकार पूरी तरह राज्य सरकार के अंतर्गत होंगे।

   35-Aपूरी तरह निष्प्रभावी--- 

35-a पूरी तरह निष्प्रभावी हो गया है,अब जम्मू कश्मीर में संचालित प्रॉफेशनल कॉलेजों में कोई भी देश का नागरिक दाखिला ले सकता है ,और जम्मू कश्मीर में स्थाई तौर पर रह सकता है, वहाँ जमीन भी खरीद सकता है ।
        अब  केंद्र शाषित राज्य जम्मू कश्मीर में संम्पति स्थांतरण अधिनियम,जम्मू कश्मीर एलाइनेशन ऑफ लैण्ड एक्ट ,जम्मू कश्मीर कृषि और कृषक सुधार अधिनियम में नई व्यवस्था के अनुसार आवश्यक संसोधन किया जाएगा।
          35-A हटने के बाद पहले जम्मू कश्मीर से बाहर ब्याही गई बेटियां व उनके  बच्चों के सारे अधिकार खत्म हो  जाते थे, वह अपने पिता की संपत्ति से वंचित हो जातीं थीं ,लेकिन अब जम्मू कश्मीर की बेटी के अन्य प्रदेशों  में विवाह होने पर पूरे अधिकार मिलेंगे।
15 देशों के राजनयिकों ने देखा नया कश्मीर-------
अनुच्छेद 370 हटने के बाद  जम्मू कश्मीर के हालात का जायजा लेने के लिए 15 देशों के  राजनयिकों ने दो दिवसीय   (9 जनवरी 2020 से 10 जनवरी 2020 ) जम्मू कश्मीर की यात्रा की ,  इन विदेशी मेहमानों में से किसी ने भी अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध नहीं किया  ,इन्होंने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के मुद्दे का हल करने पर जोर दिया साथ में जम्मू कश्मीर में मौलिक संरचना विकास और रोजगार से जुड़े मुद्दों को हल करने पर जोर दिया।
15 देशों में अमेरिकी राजदूत केनेथ आई जस्टर थी इसके अलावा प्रतनिधि मण्डल में बांग्लादेश, वियतनाम, नार्वे, मालद्वीप, दक्षिण कोरिया ,मोरक्को ,नाईजीरिया ,पेरू,  आदि देशों के राजनयिक सम्मिलित थे ।
  • राजनयिकों ने कश्मीर घाटी में  विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक में खुला संवाद किया, इस बैठक में मीडिया को दूर रखा गया, सवाल जवाब में किसी तरह की रूकावट नहीं थी, श्रीनगर में आम जनों के बीच करीब सात घण्टे रहने के बाद शाम करीब पांच बजे उपराज्यपाल के राजभवन जम्मू में पहुंचे वहां पर इस प्रतिनिधि मण्डल ने करीब एक घण्टे उपराज्यपाल से बातचीत की ,यहां पर उपराज्यपाल ने जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति, विकास योजनाओं, जम्मू कश्मीर में पंचायत और स्थानीय निकायों के गतिविधि के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए , आतंकवाद पर काबू पाने के लिए जारी गतिविधियों पर रोशनी डाली ,बीते पांच महीने में जम्मू कश्मीर में विदेशी राजनयिकों का दूसरा प्रतिनिधि मण्डल था,इसके पहले अक्टूबर 2019  माह में यूरोपीय संघ के प्रतिनिधि मण्डल ने दौरा किया था।

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