Sardar Vallabh Bhai Patelसरदार पटेल: आधुनिक भारत के शिल्पकार और रियासतों के विलय की गाथा

     । सरदार वल्लभ भाई पटेल लौह पुरुष ।

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 सरदार पटेल भारत के वो दृढ इच्छाशक्ति वाले लौह पुरुष थे जिन्होंने न केवल गांधी जी के साथ स्वतंत्रता की लड़ाई में भाग लिया बल्कि देश की आज़ादी के बाद देश को टूटने से बचाने के लिए देशी रियासतों ,रजवाड़ों को न  सिर्फ़ बहला फ़ुसला कर ,प्रलोभन देकर भारत संघ में में विलय के लिए लिए राजी किया बल्कि जो रियासतें ख़ुद को आज़ाद बनाये रखने तथा पाकिस्तान में मिलने की तैयारी में लगे थे उनके साथ रक्त और लौह की नीति अपनाई उन पर बलपूर्वक सेना भेजकर भारत में मिला लिया।इस प्रकार आज के बृहद् भारत के मानचित्र जो हम देखतें है उसे आदरणीय  सरदार पटेल जी ने ही हम सब को उपहार में दिया , वरना भारत को कई टुकडों में बाँटने की पालिसी में अंग्रेज सफ़ल हो जाते।

               सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म  31   अक्टूबर1875  को  गुजरात के खेड़ा जिले के नाडियाड क़स्बे में उनके ननिहाल में हुआ था,इनके पिता  झावेड़ भाई पटेल पेशे से किसान थे,पांच भाइयों और एक बहन के बीच पिता पटेल चौथे नंबर पर थे,उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में अनेक संघर्ष करने पड़े प्राथमिक शिक्षा अपने गांव करमसद से पूरा करने के बाद वह आगे की पढाई पूरा करने के लिए पेटलद के स्कूल में भर्ती हो गये और 1897 में 22 साल की उम्र में नाडियाड के प्राथमिक स्कूल से पास की  आगे उन्होंने  पढ़ाई जारी रखा और वकालत की शिक्षा ग्रहण की 1902 में वह बोरसाद से फ़ौजदारी वकालत शुरु कर दी वकालत में काफी ख्याति प्राप्त  1909 में सरदार पटेल जी की पत्नी का निधन कैंसर के उपचार होने ,ठीक हो जाने ,के बाद भी हो गया , 36 वर्ष की उम्र में सरदार पटेल ने 1910 में बैरिस्टर की पढाई के लिए वो इंग्लैंड गए वहां उन्होंने 36 महीने के पाठ्यक्रम को 30 महीने में ही पूरा कर लिया  , दो वर्ष बाद 1913 में वापस भारत आये और वकालत के क्षेत्र में  जाने माने क्रिमिनल लायर बन गए  ,18 वर्ष की उम्र में 1893 में इनका विवाह छोबर बाई से हुआ था।

  • बारदोली का 'सरदार',

         वल्लभभाई पटेल ने प्रारम्भ में अपने क्षेत्र में  शराब ,छुआछूत ,नारी उत्थान जैसे मोर्चों पर कार्य किया।
 प्रारम्भ में उनकी राष्ट्रीय राजनीति में कोई रूचि नही थी, यहां तक  वह गांधी जी से भी असंतुष्ट थे प्रारम्भ में बात है कि एक बार जब  गांधी जी गुजरात  क्लब  भाषण देने आये तब उसी क्लब में जी वी मावलंकर के साथ ताश खेल रहे थे परंतु  अपने मित्र के कहने के बाद भी वो गांधी जी को सुनने नही गए क्योंकि शुरू में वह  गांधी जी की नीतियों से  असंतुष्ट थे , परंतु नील  आंदोलन में जब वो किसानों के साथ थे तब इस आंदोलन में गांधी जी से प्रभावित हुए और असहयोग आंदोलन में गांधी  जी के आह्वान पर वो उनके साथ जुड़ गए, 1922 में जब खेड़ा जिले में किसानों के ऊपर  बलपूर्वक टैक्स थोपे गए ,जबकि किसानों का उस वर्ष बाढ़ आ जाने से न केवल फ़सल चौपट हो गई थी बल्कि वो घर पशुधन,संपत्ति  का भी नुकसान हुआ था ,ब्रिटिश अधिकारी ने कोई भी टैक्स में राहत नही की ,बल्कि  किसानों की सम्पत्ति जब्त कर ली गई ,तब सरदार पटेल   जी आगे आये  उनको महात्मा गांधी के अहिंसा की नीति से  प्रेणना प्राप्त कर ने किसानों का नेतृत्व संभाला और टैक्स को को माफ़ करवाया,  1928 में बारदोली सत्याग्रह  में भाग लिया, अंग्रेजों ने  एक तालुका के समूचे किसानों के ऊपर भूमि कर 22 प्रतिशत बढ़ा दिया था, जो लगभग दोगुने के करीब था ,इसी तालुके में बारदोली भी आता था, जहां के आश्रमों के संघ के अध्यक्ष के पद पर पटेल पदासीन थे ,इस मुद्दे को पटेल ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया, किसानों को एक जुट करके बारदोली किसान आंदोलन शुरू कर दिया,पटेल ने किसानों से  भू कर नही देने का आह्वाहन किया ,इन्हें बारदोली की महिलाओं,पुरुषों और युवाओं का भरपूर समर्थन मिला ,इनके सफल नेतृत्व और किसानों के एकता के फलस्वरूप अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े,भू -कर में संशोधन गया और किसानों को रियायत दी गई, जबरन हड़पीं जमीनें और पालतू जानवर वापस किये गए,इससे किसानों में विश्वास साहस और संतोष का संचार हुआ,किसानों के बीच उन्होंने समय व्यतीत किया ,उनको चरखा चलाना,सूत कातना सिखाया ,बारदोली सत्याग्रह में ही वहां की महिलाओं ने उन्हें" सरदार"  की उपाधि दी  उन्होंने गांधी जी के साथ सभी आंदोलनों में भाग लिया ,  वह गांधी के पक्के समर्थक हो गए  गांधी जी ने  जब चौरी चौरा घटना के बाद असहयोग  आन्दोलन   स्थगित किया  तब सभी नेता गांधी जी का विरोध कर रहे थे तब  भी  सरदार  गांधी के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे, लिया देश जी आज़ादी के बाद सबसे बड़ी चुनौती 565 रियासतों को भारत में विलय करना था जिससे अखण्ड भारत बना रहे उसमे सरदार पटेल सफ़ल रहे ,1948 में महात्मा गांधी की मृत्यु के सदमें से सरदार उभर नही पाये और उनको हार्ट अटैक पड़ा और 15 दिसंबर 1950 को इस दुनिया से विदा हो गए।



मिशन एकीकरण


               सरदार पटेल भारत के सबसे पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे , जिन्होंने अखंड भारत बनाने के लिए रियासतों के साथ कई  समझौते किये , जानकारी हो की देश की आज़ादी से पहले एक भाग ब्रिटिश भारत का था जहां सीधे ब्रिटिश हुकूमत थी परंतु कई रियासतें थी जहां ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप  नही था बल्कि ये राजे राजवाड़े के यहां सिर्फ़ ब्रिटिश सरकार का एक प्यादा रेजिडेंट होता था जो उसके विदेश रक्षा विषय  में हस्तक्षेप करता था। ये रियासतें 1857 के विद्रोह के बाद 1858 के अधिनियम से आंशिक रूप से   ही ब्रिटिश शासन का हिस्सा थी।

             लार्ड माउंटबेटेन ने भारत में आज़ादी के प्रश्न में एक "बाल्कन प्लान" प्रस्तुत किया था उसके अनुसार सभी देशी रियासतें भी अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र रह सकती थी जिससे देश कई हिस्सों में बात जाता परंतु कांग्रेस ने इस प्लान को अस्वीकृत कर दिया, बाद में" माउंटबेटेन योजना" पेश की गई जिसमें रियासतें या तो पाकिस्तान में मिल सकती थी या फिर भारत में  ये रियासतें ख़ुद निर्णय करें कि वो कहाँ विलय करना चाहतीं है।  27 जून 1947 को माउंटबेटेन ने सरदार पटेल के लीडरशिप में   राज्य विभाग का पुनर्गठन किया पटेल के सहयोगी VP menon बहुत चतुर कूटनीतिज्ञ थे उन्होंने 5 जुलाई को रियासतों को पत्र लिखकर भारत में विलय का आमंत्रण दिया उन्होंने रियासतों से कहा कि केंद्र सरकार सिर्फ़ संचार मामले, विदेश मामले,प्रतरक्षा मामले का जिम्मा होगा शेष अधिकार रियासत के पास यथास्थित रहेंगे। आजादी के दो सप्ताह पूर्व लार्ड माउंटबेटेन ने भी "चैम्बर ऑफ़ प्रिंसेस"को संबोधित करते हुए देसी राजाओं की सभा में कहा कि रियासयों को अब महारानी की तऱफ से कोई सहायता नही मिलेगी बेहतर यही होगा की वो ख़ुद को भारत में विलय कर दें अन्यथा उनके रियासत में अराजकता के वो ख़ुद जिम्मेदार होंगे। इस प्रकार 15 अगस्त 1947 आते आते 562 रियासतों ने विलय पत्र में हस्ताक्षर कर दिए,सिर्फ़ जूनागढ़,कश्मीर, हैदराबाद ने ख़ुद को आज़ाद रखने का ख़्वाब देखा।

          इस आधार पर सरदार ने कई रियासतों से राष्ट्रवाद के नाम पर विलय पत्र पर दस्तख़त के लिए तैयार कर लिया ,कई रियासतों को प्रलोभन दिया की उनके अधिकार विलय के बाद भी नही छिनेंगे सिर्फ संचार, रक्षा,के मामले ही संघ को मिलेंगे, कई रियासतों को डराया भी गया , अंततः 560 रियासतों ने भारत में ना नुकुर के बाद दस्तख़त कर दिए पर परंतु१) जूनागढ़ रियासत जो गुजरात में थी पाकिस्तान के सिंध से जुडी थी उसने पाकिस्तान में विलय के साथ  समझौता कर लिया,,
       २) हैदराबाद रियासत का निज़ाम  आजाद बना रहना चाहता था,उसने विलय पत्र में हस्ताक्षर से इंकार किया।
         ३) जम्मूकश्मीर के राजा न पाकिस्तान में मिलना चाहते थे न ही भारत में मिलना चाहते थे ।

          ::   जूनागढ़ का भारत में विलय::

            जूनागढ़ पश्चिमी सौराष्ट्र का एक बड़ा राज्य था,जहाँ का नवाब महाबत खान था और प्रजा का ज़्यादातर हिस्सा  हिंदुओं  का था ,जिन्ना के इशारे पर जूनागढ़ का दीवान अल्लाहबख्श अपदस्थ करके शाहनवाज भुट्टो (जो  पाकिस्तान के बाद में बने प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के पिता और बेनजीर भुट्टो के बाबा थे) को बनाया गया, इस भुट्टो ने जूनागढ़ के नवाब महाबत खान पर दबाव डलवाया कि वो पाकिस्तान में विलय कर दे,14 अगस्त 1947 को महाबत खान ने जूनागढ़ को पाकिस्तान में विलय का एलान कर दिया।

          इस खबर से   सरदार पटेल बहुत ही क्रोधित हुए उन्होंने वी पी मेनन को जूनागढ़ भेजा कि नवाब अपना निर्णय बदल दें ,पर शाहनवाज भुट्टो ने नवाब की तबीयत नासाज़ बताकर मेनन को नवाब से नही मिलाया नवाब वापस लौट आये, ।

              अब सरदार पटेल ने सेना भेजकर जूनागढ़ के दो प्रान्त मांगरोल और बाबरियावाड को मेजर गुरदयाल  सिंह के नेतृत्व में सेना भेजकर कब्ज़ा कर लिया,  इसी बीच सरदार पटेल ने गांधी जी के पोते सामलदास गांधी के नेतृत्व में जनता ने विद्रोह कर दिया , अंततः बढ़ते आंदोलन के कारण महाबत खान कराची भाग गया,और अंततः शाहनवाज भुट्टो ने  जूनागढ़ के   पाकिस्तान में विलय को ख़ारिज कर दिया और  जूनागढ़ के हिंदुस्तान में विलय की घोषणा कर दी ,  इसी समय सरदार पटेल ने  नवंबर 1947 को सेना भेजकर जूनागढ़ में  कब्जा कर लिया गया और माउंटबेटेन के नाराज़गी को दूर करने के लिए जनमत संग्रह करवाया गया जिसमे 90% जनता ने भारत में विलय पर समर्थन दिया, और 20 फ़रवरी 1948 को जूनागढ़ देश का हिस्सा बन गया।

    :: हैदराबाद का भारत में विलय::

               अब हैदरा बाद की तरफ़ रुख़ करते हैं, जहाँ के निज़ाम ने ख़ुद को आज़ाद देश का सपना देखा था,..
      हैदराबाद का क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बराबर था,हैदराबाद का 80% हिन्दू आस्था थी, हैदराबाद का नवाब  अली खान आशिफ किसी भी हालात में भारत में विलय को तैयार नहीं था , उसने पाकिस्तान में भी
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हैदराबाद रियासत की स्थिति:
मिलने से इनकार कर दिया था वो आज़ाद देश बनाना  चाहता था वैसे उसकी अपनी निजी सेना संचार सब कुछ था , उसके सेना में वरिष्ठ पदों में मुस्लिम थे  ,जबकि वहां की  85 प्रतिशत जनता हिन्दू थी ,उसने जिन्ना को पत्र लिखकर पूँछा कि क्या भारत के आक्रमण करने पर     पाकिस्तान   हैदराबाद की सैन्य सहायता करेगा ,जवाब में जिन्ना ने कहा कि हम मुट्ठी भर अभिजात्य वर्ग के कारण पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरें में नही डाल सकते,
 उधर हैदराबाद के  निज़ाम ने राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने की इच्छा प्रकट की पर एटली (ब्रिटेन),की सरकार ने इनकार कर दिया।
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:हैदराबाद का निजाम और सरदार पटेल:
       निज़ाम ने हथियार ऑस्ट्रेलिया से लाने के लिए अपना एजेंट भेजा ,उसने ऑस्ट्रेलिया के हथियार विक्रेता को तैयार भी कर लिया, भारत की सरकार को इसकी खबर लग गई सरकार ने सभी उड़ान पर रोक लगा दिया ।
             माउंटबेटेन नेहरू से इस मामले में शांति पूर्ण ढंग से निपटाने को कह रहे थे ,परंतु पटेल का मानना था की ये भारत के पेट  में कैंसर की तरह है,इसको सैन्य ताकत से निपटना होगा, नेहरू और हैदराबाद के गवर्नर इस बात से चिंतित थे कि भारत के हैदराबाद सेना भेजे जाने पर  पाकिस्तान भी  जवाबी सैन्य सैन्य कार्यवाही कर सकता है,।
         उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने डिफेन्स कौंसिल की बैठक बुलाकर पूँछा की हैदराबाद के समर्थन में दिल्ली में  बम गिराया जा सकता है तो डिफेन्स कौंसिल ने
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"रजाकार "
कहा की बमवर्षक विमान कम हैं, सरदारपटेल ने   हैदराबाद में सेना को प्रवेश की अनुमति दे दी  , सेना के इस अभियान को ऑपरेशन पोलो नाम दिया गया क्योंकि उस समय सबसे ज्यादा पोलो मैदान हैदराबाद में ही थे ,पांच दिनों तक चली सैन्य कार्यवाही में हैदराबाद के 807 जवान और 1373 रजाकार मारे गए और भारतीय सेना के 66 जवान मारे गए।

      भारत की सेना की कार्यवाही शुरु किये जाने के दो दिन पूर्व मुहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु हो गई। यानी जिन्ना की मृत्यु के दो दिन बाद भारत ने हैदराबाद में चढ़ाई कर दी।ऑपरेशन पोलो 13 सितंबर 1948 को शुरू हुआ था, जबकि मुहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु 11 सितंबर 1948 को हुई थी।

      त्रावणकोर की कहानी----

 त्रावणकोर के महाराजा ने अलग देश बनाये जाने की घोषणा कर दी थी,महाराजा त्रावणकोर को उनके पास के बंदरगाह में स्थित यूरेनियम के भंडार छिन जाने का डर था, उधर जिन्ना ने महाराज से स्वतंत्र रिश्ते रखने का अनुरोध किया, इसी दौरान एक युवक ने त्रावणकोर के दीवान के चेहरे में चाकू से वार कर दिया,  इस घटना से महाराज बुरी तरह डर गए और 14 अगस्त को भारत मे विलय पत्र पर दस्तखत कर दिए।

 लक्षद्वीप में भी सरदार पटेल ने भारतीय नौसेना का के जहाज पहले ही भेजकर भारत का तिरंगा लहरा दिया ,उसके कुछ घण्टे बाद वहां पाकिस्तानी नौसेना के जहाज लक्षद्वीप में मंडराते दिखे ,परंतु भारत की सेना को देखकर वो वापस लौट आये।

      कश्मीर की नेहरू नीति से नाखुश थे पटेल-

कश्मीर छोड़ देश की सभी रियासतों के विलय का जिम्मा सरदार पटेल उठा रहे थे,कश्मीर मसले पर पटेल का कोई सीधा हस्तक्षेप नही था, जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर मसले को  गृह मंत्रालय से अलग करके अपने पास इसलिए रखा कि वो स्वयं कश्मीर के मूल निवासी है कश्मीर के भावनाओं को ज्यादा सजगता से समझते हैं ,सरदार पटेल को किनारे रखने का अंजाम ये हुआ कि नेहरू लार्ड माउंट बेटेन के बहकावे में कश्मीर मसले को संयुक्त राष्ट्र के पटल पर ले जाने को तैयार हो गए जबकि पटेल नेहरू के कश्मीर मसले को UNO ले जाने का पुरजोर विरोध किया, और संघ विराम को मान लेने की वजह से जम्मू कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में चला गया।
आइए कुछ निम्न बिंदुओं पर भी चर्चा करते हैं इस लेख में जो इस लेख को पूर्णता प्रदान करने के लिए आवश्यक है।

1. 'लौह पुरुष' और 'बिस्मार्क' की उपाधि

आप सबने ये भी सुना है कि सरदार पटेल को लौह पुरुष क्यों कहा जाता है क्या वो कोई लोहे का कवच पहनकर 562 रियासतों से लड़े थे पर ऐसी बात नहीं उनको लौह पुरुष का इंग्लिश अनुवाद आयरन मैन कहिए तो जल्द समझ में आएगा , दरअसल पश्चिम के देश जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क ने जर्मनी के आसपास के छोटे छोटे राज्यों को मिलाने में जिस तरह लौह और रक्त की कूटनीति अपनाई  उसी तरह सरदारपटेल का अपने देश को विशाल एकजुट करने में पूरी ताकत झोंक दी जिन रियासतों ने थोड़ा बहुत न नुकूर किया उनको लालच देकर या डराकर भारत संघ में मिला लिया।

  सरदार पटेल को 'भारत का बिस्मार्क' क्यों कहा जाता है ?जिस तरह ओटो वॉन बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण किया था, उसी तरह पटेल ने बिखरे हुए भारत को एक सूत्र में पिरोया। 'लौह पुरुष' की उपाधि उन्हें उनकी अडिग निर्णय क्षमता के कारण मिली। 

​2. वी.पी. मेनन की भूमिका का विस्तार

​वी.पी. मेनन ,  उनकी चतुराई का एक उदाहरण और दिया जा सकता है। पटेल और मेनन की जोड़ी को 'चाणक्य और चंद्रगुप्त' की तरह देखा जाता था। मेनन ने ही 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिबिलिटी' (विलय पत्र) का मसौदा तैयार करने में तकनीकी मदद की थी।रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल अगर 'संकल्प' थे, तो वी.पी. मेनन उस संकल्प को जमीन पर उतारने वाली 'शक्ति' थे। मेनन उस समय के सबसे अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी थे, जिन्होंने माउंटबेटन के अधीन संवैधानिक सलाहकार के रूप में भी काम किया था। जब पटेल को रियासती विभाग का कार्यभार सौंपा गया, तो उन्होंने मेनन की योग्यता को पहचानते हुए उन्हें अपना सचिव नियुक्त किया।

​इन दोनों की कार्यशैली में गजब का तालमेल था। जहाँ सरदार पटेल अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और 'लौह पुरुष' वाली छवि से राजाओं को राष्ट्रहित का महत्व समझाते थे, वहीं वी.पी. मेनन पर्दे के पीछे अपनी 'शतरंज की चालों' और कूटनीति से राजाओं को कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर भारत के पक्ष में ले आते थे।

मेनन और पटेल के बीच का अद्भुत तालमेल:

  • विलय पत्र (Instrument of Accession) का मसौदा: यह वी.पी. मेनन का ही दिमाग था जिसने 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेसिबिलिटी' का ऐसा मसौदा तैयार किया जिससे राजाओं को यह महसूस हुआ कि वे अपनी स्वायत्तता पूरी तरह नहीं खो रहे हैं, जबकि वास्तव में रक्षा, विदेश और संचार जैसे महत्वपूर्ण विषय भारत सरकार के अधीन आ रहे थे।
  • राजाओं के साथ 'मनोवैज्ञानिक खेल': जब भी कोई राजा नखरे करता या मिलने से कतराता, मेनन पहले उनसे मिलते थे। वे राजाओं को यह समझाने में माहिर थे कि यदि वे अभी पटेल की बात मानकर स्वेच्छा से भारत में शामिल नहीं हुए, तो बाद में जन-विद्रोह के समय सरदार पटेल का रुख कहीं अधिक कठोर होगा।
  • जोधपुर कांड और मेनन की सूझबूझ: जब जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह ने जिन्ना के बहकावे में आकर अपनी पिस्तौल मेनन पर तान दी थी, तब भी मेनन विचलित नहीं हुए। उन्होंने महाराजा को शांत किया और अंततः उन्हें सरदार पटेल के सामने पेश कर विलय पत्र पर हस्ताक्षर कराने में सफलता पाई।
  • पटेल का विश्वास: सरदार पटेल अक्सर कहा करते थे कि "मेनन के बिना रियासतों का एकीकरण इतना सुगम और तेज नहीं हो सकता था।" मेनन ने केवल सरकारी आदेशों का पालन नहीं किया, बल्कि वे पटेल के 'दूत' बनकर एक रियासत से दूसरी रियासत की यात्रा करते रहे और राजाओं के अहंकार व राष्ट्रवाद के बीच सेतु का कार्य किया।

​3. जोधपुर और जैसलमेर का प्रसंग (जिन्ना का 'ब्लैंक चेक')

​इतिहास में यह घटना बहुत रोमांचक है। जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह पाकिस्तान में मिलना चाहते थे। जिन्ना ने उन्हें एक खाली कागज (Blank Cheque) देकर अपनी शर्तें लिखने को कहा था। सरदार पटेल को जब यह पता चला, तो उन्होंने तुरंत महाराजा से संपर्क किया और उन्हें समझाया कि एक हिंदू बहुल रियासत का पाकिस्तान में जाना उनके और उनकी प्रजा के लिए कितना आत्मघाती होगा। यह प्रसंग पटेल की रणनीतिक फुर्ती को दर्शाता है।

​जिन्ना का 'ब्लैंक चेक' और जैसलमेर-जोधपुर का संकट

​अगस्त 1947 के करीब, जब भारत विभाजन की दहलीज पर था, तब पाकिस्तान के कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत को अंदर से तोड़ने के लिए एक बहुत बड़ी चाल चली। उनका लक्ष्य था राजस्थान की सरहदी रियासतें— जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर। यदि ये रियासतें पाकिस्तान में मिल जातीं, तो पाकिस्तान की सीमा दिल्ली के बहुत करीब तक पहुँच जाती।

जिन्ना का प्रलोभन और खाली कागज की पेशकश

​जोधपुर के युवा महाराजा हनवंत सिंह भारत में शामिल होने को लेकर थोड़े हिचकिचा रहे थे। जिन्ना ने इसी का फायदा उठाया और दिल्ली में महाराजा हनवंत सिंह और जैसलमेर के युवराज (महारावल गिरधर सिंह) के साथ एक गुप्त बैठक की।

​जिन्ना ने महाराजा हनवंत सिंह के सामने एक सफेद कागज (Blank Paper) रख दिया और अपनी हस्ताक्षर की हुई पेन देते हुए कहा:

"आप अपनी सारी शर्तें इस कागज पर लिख दीजिए, पाकिस्तान उन सबको मानने के लिए तैयार है। हमें बस आपका साथ चाहिए।"


​जिन्ना ने उन्हें कराची बंदरगाह का मुफ्त इस्तेमाल, हथियारों का आयात और रेलवे की विशेष सुविधाओं का लालच दिया। जैसलमेर के युवराज भी वहां मौजूद थे, लेकिन वे थोड़े सतर्क थे। उन्होंने जिन्ना से एक सवाल पूछा— "अगर भविष्य में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कोई सांप्रदायिक दंगा हुआ, तो क्या आप एक मुस्लिम शासक के रूप में हिंदुओं का साथ देंगे?" जिन्ना इस सवाल पर खामोश हो गए और कोई ठोस आश्वासन नहीं दे पाए।

सरदार पटेल का 'एक्स-रे' विज़न और चेतावनी

​सरदार पटेल के जासूसों ने इस गुप्त बैठक की खबर उन तक पहुँचा दी। पटेल तुरंत समझ गए कि अगर जोधपुर और जैसलमेर हाथ से निकले, तो राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा 'कैंसर' की तरह भारत के नक्शे से कट जाएगा।

​पटेल ने तुरंत महाराजा हनवंत सिंह को बुलावा भेजा। जब महाराजा उनसे मिले, तो पटेल ने बहुत ही सधे हुए लेकिन कड़े लहजे में कहा:

  1. सांप्रदायिक आधार: "आप एक हिंदू बहुल रियासत के राजा हैं। यदि आप पाकिस्तान जाते हैं, तो आपकी प्रजा विद्रोह कर देगी और पाकिस्तान भी आपको लंबे समय तक झेलने वाला नहीं है।"
  2. हथियारों की आपूर्ति: पटेल ने वादा किया कि भारत सरकार उन्हें अनाज और हथियारों की कमी नहीं होने देगी और अकाल के समय मदद करेगी।
  3. कठोर चेतावनी: अंत में पटेल ने स्पष्ट कर दिया कि यदि महाराजा ने भारत के खिलाफ जाकर पाकिस्तान से हाथ मिलाया, तो भारत इसे 'शत्रुतापूर्ण कृत्य' मानेगा और सैन्य कार्यवाही से पीछे नहीं हटेगा।

हस्ताक्षर और पिस्तौल का प्रसंग

​इसी दबाव और समझाइश के बीच, महाराजा हनवंत सिंह ने अंततः विलय पत्र पर हस्ताक्षर तो कर दिए, लेकिन वे इतने गुस्से में थे कि उन्होंने वी.पी. मेनन पर अपनी 'पेन-पिस्तौल' (Pen-Pistol) तान दी और कहा— "मैं तुम्हारे दबाव में नहीं आने वाला।" मेनन ने बड़ी शांति से उन्हें समझाया कि यह बचकानी हरकत उनके और उनके राज्य के लिए अच्छी नहीं होगी।

​अंततः, सरदार पटेल की समय पर की गई कार्यवाही और वी.पी. मेनन की भाग-दौड़ ने जैसलमेर और जोधपुर को पाकिस्तान का हिस्सा बनने से बचा लिया। जैसलमेर के युवराज भी महाराजा हनवंत सिंह के फैसले के साथ भारत में शामिल होने को राजी हो गए।

​यह प्रसंग दिखाता है कि सरदार पटेल न केवल बातचीत में माहिर थे, बल्कि वे दुश्मन की हर चाल पर बाज की नज़र रखते थे।

​4. भोपाल का विलय

​हैदराबाद और जूनागढ़ की तरह भोपाल के नवाब भी स्वतंत्र रहना चाहते थे या पाकिस्तान के करीब थे। इनकी भी कहानी को इसी लेख पूरे विवरण से आ सबकी समझाते है कि कैसे भोपाल का नवाब हमीदुल्ला खान भी भारत से आजादी के जुगत में था और सरदार पटेल ने क्या एक्शन लिया उसके खिलाफ़ कैसे घेराबंदी  की ।भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान न केवल अपनी रियासत को आजाद रखना चाहते थे, बल्कि वे पाकिस्तान के साथ भी बहुत गहरे संपर्क में थे।


भोपाल का विलय: क्या नवाब अपनी रियासत को अलग देश बनाना चाहते थे?

​भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान, जो उस समय 'चैंबर ऑफ प्रिंसेस' (देसी राजाओं की परिषद) के चांसलर थे, भारत की आजादी के समय सबसे बड़े बागी बनकर उभरे थे। वे जिन्ना के बहुत करीबी दोस्त थे और उनका सपना भोपाल को एक स्वतंत्र इस्लामी राष्ट्र बनाना था।

नवाब की रणनीति और पटेल की चुनौती:

​नवाब हमीदुल्लाह खान ने खुलेआम घोषणा कर दी थी कि वे 'बाल्कन प्लान' के समर्थक हैं और भोपाल न तो भारत में मिलेगा और न ही पाकिस्तान में, बल्कि वह एक स्वतंत्र देश रहेगा। उनकी यह सोच भारत के केंद्र में एक 'मिनी पाकिस्तान' जैसा खतरा पैदा कर रही थी।

  1. कांग्रेस से नफरत: नवाब को कांग्रेस की नीतियों से सख्त नफरत थी। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि "मैं किसी ऐसी सरकार का हिस्सा नहीं बनूँगा जहाँ कांग्रेस का बोलबाला हो।"
  2. पाकिस्तान का मोह: जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनने तक का प्रलोभन दिया था, लेकिन नवाब का दिल भोपाल की सत्ता में अटका था। वे चाहते थे कि भोपाल आजाद रहे और पाकिस्तान के साथ उनके 'विशेष व्यापारिक और रक्षा संबंध' हों।

सरदार पटेल का 'मास्टर स्ट्रोक':

​जब सरदार पटेल ने देखा कि नवाब किसी भी तरह से मानने को तैयार नहीं हैं, तो उन्होंने अपनी रणनीति बदली। पटेल जानते थे कि नवाब को झुकाने के लिए 'भीतर' और 'बाहर' दोनों तरफ से दबाव बनाना होगा।

  • जनता का विद्रोह: पटेल ने भोपाल की स्थानीय जनता और प्रजामंडल के नेताओं को प्रोत्साहित किया। भोपाल की सड़कों पर "नवाब हटाओ, भारत में मिलाओ" के नारे गूँजने लगे। जनता ने नवाब के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
  • वी.पी. मेनन की चेतावनी: सरदार पटेल के निर्देश पर वी.पी. मेनन भोपाल पहुँचे। उन्होंने नवाब को स्पष्ट कर दिया कि यदि भोपाल में विद्रोह भड़का और खून-खराबा हुआ, तो भारत सरकार मूकदर्शक नहीं बनी रहेगी और सेना भेजकर नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगी।
  • प्रिवी पर्स का लालच: अंत में, पटेल ने कूटनीति का परिचय देते हुए नवाब को समझाया कि यदि वे शांति से विलय करते हैं, तो उन्हें सम्मानजनक 'प्रिवी पर्स' (पेंशन) और उनकी संपत्तियां सुरक्षित रखने की गारंटी दी जाएगी।

विलय और नवाब की हार:

​चारों तरफ से घिर जाने के बाद, नवाब हमीदुल्लाह खान को समझ आ गया कि वे भारत के भूगोल और पटेल के इरादों के सामने नहीं टिक पाएंगे। अंततः, 1 जून 1949 को भोपाल का औपचारिक रूप से भारत में विलय हो गया। यह सरदार पटेल की एक और बड़ी जीत थी क्योंकि भोपाल का भारत के ठीक बीच में होना सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।

पटेल ने वहां के स्थानीय जन-आंदोलन को समर्थन दिया और अंततः नवाब को झुकना पड़ा। इसका उल्लेख लेख को और पूर्णता देगा।

5. सिविल सेवा के जनक (Patron Saint of Civil Services)

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का गठन। उन्होंने ही ब्रिटिश काल की 'ICS' को 'IAS' में बदला और इसे भारत का "स्टील फ्रेम" कहा। उनका मानना था कि एक मजबूत देश के लिए एक निष्पक्ष और मजबूत नौकरशाही अनिवार्य है।

​6. स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (Statue of Unity): दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा

​  उनके सम्मान में 31 अक्टूबर वो2013 को बनी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी'  यह प्रतिमा उनके द्वारा किए गए राष्ट्र के एकीकरण का प्रतीक है।182 मीटर यानी 597 फीट ऊंची यह प्रतिमा चीन के स्प्रिंग टेंपल बुद्ध 153 फीट की प्रतिमा से भी ऊंची है इस मूर्ति का निर्माण लाशन एंड टुब्रो नामक एक इंजीनियरिंग कंपनी ने किया इस प्रतिमा का निर्माण में डिज़ाइन तैयार की पद्म भूषण से सम्मानित राम वी  सुतार जी ने जिनकी मृत्यु 2025 को हो गई थी इस मूर्ति को बनने में 33 महीना का समय लगा,देश के इस लोहपुरुष की मूर्ति बनाने के लिए हर घर से लोहे का एक टुकड़ा दान स्वरूप लिया गया चूंकि वह किसानों के नेता थे इसलिए किसानों से खेती के पुराने औजार भी लिए गए उनको ही गलाकर इस विशाल प्रतिमा का निर्माण हुआ इस मूर्ति के निर्माण में सत्तर हजार तन सीमेंट और अठारह हजार तन स्टील साथ में सत्रह सौ तन तांबा बाहरी आवरण के लिए प्रयोग किया गया कुल लागत आई इस विशाल मूर्ति के निर्माण में वो है 2989 करोड़ रुपया। यह स्थान केवड़िया कहलाता है जिसे अब एकता नगर नाम दिया गया है उस जगह के लोगों को यहां के टूरिस्ट के आने से बहुत ज्यादा कमाई हो रही है।प्रतिमा के हृदय के पास एक 'व्यूइंग गैलरी' है, जहाँ से एक साथ 200 लोग सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमाला के साथ नर्मदा नदी और सरदार सरोवर बांध का भव्य दृश्य देख सकते हैं।

  1. यहाँ 'एकता नर्सरी', 'कैटरस गार्डन' और 'जंगल सफारी' जैसे आकर्षण विकसित किए गए हैं, जो पर्यावरण और विकास के बीच संवाद स्थापित करते हैं।
  2. श्रद्धांजलि: यह विशाल मूर्ति दुनिया को सरदार पटेल के उन साहसी कार्यों की याद दिलाती है, जिनके कारण आज भारत 562 टुकड़ों में बंटा हुआ देश नहीं, बल्कि एक 'अखंड राष्ट्र' है।

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