| प्रेमानंद महाराज की जीवनी।Premanand Maharaj Biography |
प्रेमानंद जी महाराज जिनका जन्म 1969 में हुआ ,कानपुर के सरसौल ब्लॉक के अखरी गांव में शम्भू कुमार पांडे के घर में हुआ था ।इनकी माता का नाम रमा देवी था।बचपन में इनका नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था,वह प्रारंभिक जीवन से ही पीले वस्त्र पहनने लगे ,जिसके वजह से उनको आसपास के लोग पीले बाबा के नाम से पुकारने लगे।प्रेमानंद जी का बचपन से ही आध्यात्मिक झुकाव था ,वह मात्र तीन वर्ष की उम्र से ही हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे ,उनके इस आध्यात्मिक प्रवृति का कारण इनके पिता और बाबा भी संन्यासी थे।चूंकि उनके गांव से कुछ दूरी पर ही गंगा नदी कल कल बहती थी और गंगा नदी के किनारे सघन वन था इसलिए शांति के लिए प्रेमानंद गंगा नदी के किनारे घंटों आध्यात्मिक लगाव में बैठे रहते थे। उन्होंने पास के ही प्राथमिक विद्यालय में शिक्षा भी ग्रहण की परंतु जब वह कक्षा पांच में ग्यारह साल के थे तब ही आध्यात्मिक पुस्तकों गीता और सुख सागर आदि ग्रन्थ का अध्ययन किया,उनको ग्यारह वर्ष की उम्र में ही आध्यात्मिक ज्ञान के लिए मन व्यग्र होने लगा। परंतु ज्यादा छोटे होने के कारण वह ज्यादा कुछ नहीं कर सके ,परंतु जब वह कक्षा 9 में पहुंचे तो जब थोड़ा बहुत ज्ञान का विस्तार हुआ तब उन्होंने घर त्याग कर ईश्वर की को जानने के लिए अपनी माता से आज्ञा मांगी और घर छोड़ दिया। गृह त्याग के बाद उन्होंने नैष्ठिक ब्रम्हचर्य से शिक्षित किया गया। और पहली बार नाम बदलकर आनंदस्वरुप ब्रम्हचारी कर दिया गया,बाद में उनका एक और नाम आनंद आश्रम भी पड़ा।वह इस समय काशी में थे और काशी के तुलसी घाट में एक पीपल के पेड़ के नीचे दस दस घंटे ध्यान करते रहते थे ,चौबीस घंटे में मात्र पंद्रह मिनट के लिए भिखारियों की लाइन में बैठ जाते थे कि शायद कुछ भोजन मिल जाए ,परंतु उनको भोजन इस अवसर में मिलता था तो ग्रहण कर लेते थे नहीं तो पंद्रह मिनट बीत जाने के बाद भूखे ही उठ जाते थे और गंगा जल पीकर अपनी भूख मिटाते थे ,कभी कभी तो कई दिन उनको भोजन नसीब नहीं होता था और वह भूखे ही रहते और ध्यान करते रहते थे।
इसी तरह जब एक बार वह तुलसी घाट में ध्यान कर रहे थे तब एक अनजाने साधु ने उन्हें बताया कि हनुमान प्रसाद पोद्दार के काशी अंध विश्विद्यालय के विशाल प्रांगण में श्रीराम शर्मा आचार्य ने दिन में चैतन्य लीला और रात में रासलीला का आयोजन किया है इस रासलीला में उनको चलना चाहिए, प्रारंभ में प्रेमानंद जी ने उन अनजाने साधु को रासलीला में जाने से इनकार किया क्योंकि उनकी इच्छा सिर्फ ध्यान पर केंद्रित थी ,परंतु जब उस साधु ने बार बार आग्रह किया तब प्रेमानंद जी ने सोचा कि शायद साधु के आग्रह के पीछे महादेव की शक्ति है। तब वह रास लीला देखने को तैयार हुए ,प्रेमानंद जी ने इसके पूर्व रासलीला नहीं देखी थी ,जब पहली बार रासलीला देखी तब वह भगवान कृष्ण की भक्ति में भाव विभोर हो गए ,उनको रासलीला इतनी अच्छी लगी कि वह एक महीने तक रासलीला रोज देखते थे।
परंतु एक महीने बाद जब रासलीला के कलाकार समापन के बाद वापस बृंदावन जाने लगे तब प्रेमानंद जी महाराज जी भी नाट्य मंडली को अपने साथ बृंदावन जाने का आग्रह किया और उसके बदले में उनकी सेवा करने को तैयार थे,परंतु नाटक मंडली के मुख्य कार्यकारी ने प्रारंभ में इनकार किया, परंतु बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कहा कि "तू एक बार बृंदावन आ जा बिहारीलाल तुझे छोड़ेंगे नहीं" ये वाक्य उनके अंतः पटल पर छा गया और उनके लिए क्रांतिकारी साबित हुआ उनके जीवन में असीम परिवर्तन लाया।
वह बृंदावन के कृष्ण भक्ति में डूबते चले गए प्रारंभ में वह वृंदावन में घूमते थे ,बाद में राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षा ली।
ट्रस्ट: श्री हित राधा केली कुंज बृंदावन में एक गैर लाभकारी संगठन है ,इस ट्रस्ट का उद्देश्य समाज की शांति और बेहतरी के लिए कार्य करना ।इसके अलावा बृंदावन में दर्शन करने आए श्रद्धालु भक्तों के लिए भोजन आवास चिकित्सा का इंतजाम करना ।
प्रेमानंद जी महाराज का ये आश्रम वृंदावन में इस्कॉन मंदिर के पास परिक्रमा मार्ग पर भक्ति वेदांता हॉस्पिटल के ठीक सामने स्थित है।
प्रेमानंद जी महाराज का अपने व्यक्तिगत जीवन में न कोई बैंक खाता है न उनका कोई आधार कार्ड है ,वह निजी जीवन में अपने पास एक रुपया भी नहीं रखते। न ही वह किसी से कुछ भी दान करने को कहते हैं।
प्रेमानंद जी महाराज का कहना है व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिकता जीवन जीने के लिए और जीवन के सत्य का सार है ,जीवन में गुरु ही सच्चा मार्ग दिखला सकता है। आध्यात्मिक शक्ति से ही व्यक्ति सकारात्मक जीवन जीता है और परिवार ,रिश्तेदार ,पड़ोसी ,मित्रों और समाज के साथ सही से ट्यूनिंग बैठाने में सक्षम होता है और आध्यात्मिक मार्ग अपनाने पर नकारात्मक विचार नहीं आते और धीरे धीरे नकारात्मकता पूरी तरह खत्म हो जाती है। साथ में ब्रम्हचर्य एक अमूल्य संपति है जो व्यक्ति को आंतरिक रूप से ऊर्जा वन रखती है साथ में स्वस्थ संतुलित और आध्यात्मिक रूप से भी ऊर्जावान रखती है।
महाराज के दर्शन :- राधा केली कुंज प्रेमानंद महाराज के आश्रम में गुरु जी के दर्शन किए जा सकते है पहला जहां पर वह अपने शिष्यों और कीर्तन मंडली के साथ कीर्तन करते हैं दूसरा गार्डन जहां एक करतीं सरोवर है वहां श्रीजी का नौका विहार होता है ,तीसरा एकांतवास जहां के लिए टोकन दिया जाता है यहां पर एक छोटा सा कमरा है जहां गुरु जी एकांत में सवालों के जवाब देते हैं।
भक्ति (Devotion)
- "राधा नाम का आश्रय लेकर जो चलता है, उसे संसार के किसी भी तूफान का भय नहीं रहता, क्योंकि वह स्वयं महाशक्ति की शरण में है।"
- "भजन का अर्थ केवल माला फेरना नहीं, बल्कि हर सांस में प्रभु की उपस्थिति का अनुभव करना और उनके चरणों में समर्पित होना है।"
- "जब तक हृदय में दीनता और समर्पण नहीं आता, तब तक सच्ची भक्ति का उदय नहीं होता; प्रभु केवल प्रेम के भूखे हैं।"
- "वृंदावन की रज और नाम संकीर्तन में वह शक्ति है जो पापी से पापी व्यक्ति के हृदय को भी निर्मल और पावन बना देती है।"
- "ईश्वर को बाहर खोजने के बजाय अपने भीतर झाँकिए, जो नाम आप जप रहे हैं, वही आपके हृदय में साक्षात प्रकट होगा।"
क्रोध (Anger)
- "क्रोध वह अग्नि है जो दूसरों को जलाने से पहले उस पात्र को जलाती है जिसमें वह रहती है, इसलिए इसे क्षमा से शांत करें।"
- "जब कोई आपका अपमान करे, तो मौन रहकर मुस्कुरा दें; आपकी शांति उस व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी सजा और आपके लिए तपस्या है।"
- "क्रोध में लिए गए निर्णय सदैव पश्चाताप की ओर ले जाते हैं, विवेक को जीवित रखने के लिए मन का स्थिर होना अनिवार्य है।"
- "अहंकार ही क्रोध की जड़ है; यदि आप स्वयं को मिट्टी के समान विनम्र बना लें, तो क्रोध का बीज कभी पनप ही नहीं पाएगा।"
- "सामर्थ्यवान होने पर भी क्षमा करना ही असली वीरता है, दुर्बल का क्रोध केवल उसकी अपनी पीड़ा को बढ़ाता है।"
कर्म (Karma)
- "अपने कर्तव्य का पालन ईश्वर की आज्ञा मानकर करें, फल की चिंता छोड़ दें क्योंकि विधान बनाने वाला कभी अन्याय नहीं करता।"
- "दूसरों का अहित करके प्राप्त किया गया सुख अंततः महादुख का कारण बनता है, इसलिए सदैव न्याय और धर्म के मार्ग पर चलें।"
- "सेवा ही परमो धर्म है; भूखे को अन्न और दुखी को सहारा देना साक्षात ईश्वर की पूजा करने के समान पुण्यदायी कर्म है।"
- "हाथों से काम करो और मुख से नाम जपो, यही गृहस्थ जीवन में रहते हुए परम पद पाने का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।"
- "आपके आज के कर्म ही कल के भाग्य का निर्माण करते हैं, इसलिए वर्तमान को प्रभु की सेवा और सत्कर्मों में व्यतीत करें।"
निष्कर्ष:-
पूज्य संत प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज एक संत है जो अपने आध्यात्मिक ज्ञान और शिक्षा से सनातन लोगों को सोशल मीडिया के माध्यम से और साक्षात् सामने दर्शन देकर समस्याओं के उन्मूलन के लिए भक्ति मार्ग को अपनाने नैतिक मूल्य उन्नयन की सलाह देकर समाज का आध्यात्मिक उन्नयन कर रहे।जिनकी दोनों किडनी खराब होने के बाद भी भक्ति मार्ग में प्रतिदिन कार्य करने में भगवान कृष्ण का जी आशीर्वाद और शक्ति प्रतीत होती है।

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