जगदीश स्वामीनाथन Jagdeesh Swaminathan Artist ki Jivni

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जगदीश स्वमीनाथन Jagdeesh Swaminathan Artist ki Jivni जगदीश स्वामीनाथ( Jagdeesh Swaminathan ) भारतीय चित्रकला क्षेत्र के वो सितारे थे जिन्होंने अपनी एक अलग फक्कड़ जिंदगी व्यतीत किया ,उन्होंने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व में जासूसी उपन्यास भी लिखे तो सिनेमा के टिकट भी बेचें।उन्होंने कभी भी अपनी सुख सुविधाओं की ओर ध्यान नहीं दिया ।   जगदीश स्वामीनाथन का बचपन -(Childhood of Jagdish Swminathan) जगदीश स्वामीनाथन का जन्म 21 जून 1928 को शिमला के एक मध्यम वर्गीय किसान परिवार में हुआ।इनके पिता एन. वी. जगदीश अय्यर एक परिश्रमी कृषक थे एवं उनकी माता जमींदार घराने की थी  और तमिलनाडु से ताल्लुक रखते थे। जगदीश स्वामीनाथन उनका प्रारंभिक जीवन शिमला में व्यतीत हुआ था ।शिमला में ही प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की यहां पर इनके बचपन के मित्र निर्मल वर्मा और रामकुमार भी थे। जगदीश स्वामीनाथन बचपन से बहुत जिद्दी स्वभाव के थे,उनकी चित्रकला में रुचि बचपन से थी पर अपनी जिद्द के कारण उन्होंने कला विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया। उन्होंने हाईस्कूल पास करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय की PMT परीक्षा (प्री मेडिकल टेस्ट) में

कोरोना दूसरी लहर |एक आर्टिकल

     कोरोना की दूसरी लहर -एक लेख

भारत मे कोरोना की दूसरी लहर का आगाज़  साल 2021  में होली के समय  मार्च महीने  से होना शुरु को हुआ सबसे पहले पूरे महाराष्ट्र को गिरफ़्त में ले लिया,फिर धीरे धीरे  दिल्ली ,मध्यप्रदेश,गुजरात बंगाल ,उत्तरप्रदेश, बिहार ,कर्नाटक आदि में कोरोना ने अपना विस्तार कर लिया,दिल्ली में तो चौथी लहर है ,वहां पर रोज एक 800 रोगी मरने लगे। शहर में हाहाकर मच गया ,अस्पताल में जगह नहीं थी, लोग बाहर ही मर रहे थे अस्पताल जाते जाते या अस्पताल में ऑक्सीजन के आभाव में या फिर एक दो दिन भर्ती होने के बाद सारे ऑर्गन फेल होने पर  रोगी की मृत्यु हो जा रही थी ,लोगों के मरने के बाद रत्ती भर जगह नहीं बच रही थी श्मशान घरों में मृतक के शरीर को जलाने के लिए । एक चिता ठंढी नहीं हो पाती थी कि दूसरे डेड बॉडी को भी उसी जगह जला दिया जाता था , लगातार जलती चिताओं को देख कर सारी दिल्ली और सारा देश कांप उठा था कि हे भगवान! कैसी विपदा आ गई इस देश में।

कोरोना दूसरी लहर :एक आर्टिकल

 दिल्ली के आसपास सैकड़ों गांव हैं जो समृद्धिशाली हैं  जहां अस्पतालों के आभाव है वहां के लोगों ने खुद को घरों में बंद कर लिया। इन दिल्ली के गांव की तस्वीरों को देखेंगे तो पाएंगे सिर्फ 15 दिनों में लास्ट अप्रैल से दस मई 2021 तक हर गाँव से दस-बीस लोग मारे गए । ऐसी खौफनाक तस्वीरे 100 साल पहले के स्पेनिश फ्लू के समय की पुराने अखबारों में मिलती हैं।उस समय इस  स्पेनिश फ्लू से  सिर्फ भारत में ही 2 करोङ लोग मारे गए थे। पूरी दुनिया मे करीब पांच करोङ लोग मारे गये थे।

    उत्तरप्रदेश की हालत भी पंचायत चुनाव के दरमियान अचानक खराब हुई , हालांकि लखनऊ में कोरोना की हल्की  पुलकी शुरुआत हो चुकी थी , ऐसा लगा कि  कोरोना लखनऊ से ही पूरे यू. पी. में फैल गया, गांव गांव में कोविड पॉजिटिव मरीज़ मिले हर गांव से लगभग बीस लोगों की मृत्यु सिर्फ  पन्द्रह बीस दिनों में हो गई। कुछ गांव में तो रोज आठ दस लोग मरे पर इन्होंने कोई कोविड जांच नहीं कराई ,बदनामी से बचने के लिए,एक डर के कारण, इसी कारण ख़ुद से आयुर्वेदिक का उपचार किया और मेडिकल स्टोर गांव के झोला छाप से इलाज करवाया उनकी स्थिति तो ठीक हो गई पर कुछ अन्य को संक्रमित कर दिया जिनकी इम्युनिटी कम थी वो शारीरिक रूप से पहले से शुगर से पीड़ित थे या लिवर के रोग सांस के रोग से पीड़ित थे, वो ख़त्म हो गए । कई पेसेन्ट की हालत झोलाछाप के यहाँ इलाज़ कराने से ही  सुधर गई  तो कोई परलोक सुधार गए।

  इनमें 70 से 85 साल के बृद्ध पुरुष महिलाएं अधिक थीं पर नवजवान  22 से 32 साल के  व अधेड़ 45 से 55 साल के व्यक्ति भी काल कलवित हुए ,गाँव मे किसी ने वैक्सीन नहीं लगवाई थी अभी तक इसीलिए मौत का आंकड़ा और अधिक हो गया ,क्योंकि गांव के लोगों के बीच ये अफ़वाह थी कि  वैक्सीन लगवाने के तुरंत बाद भी लोग मर रहे हैं। ये अफवाह विपक्ष ने बहुत चालाकी से फैलाई और ये अफवाह यू पी ,बिहार ,मध्यप्रदेश , बुंदेलखंड , में बढ़िया से फैली आज भी यदि वैक्सीन लगाने के लिए गांव में कैम्प लग रहा तो डॉक्टर की टीम को पुलिस को साथ मे ले जाना पड़ता है क्योंकि ऐसी भी घटनाएं हुई जिसमें गांव के लोंगो ने मेडिकल टीम को घुसने से रोका और गाली गलौज किया।

उत्तर प्रदेश के कुछ गांव मीडिया के सुर्खियों में अचानक तब आ गए जब वहां सिर्फ 20 दिन में 50 लोग कोविड से मरे हालांकि मरने वाले किसी भी व्यक्ति ने कोविड एंटीजन या  RTPCR टेस्ट नही करवाया जिससे मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं है पर कहा ये गया कि गांव के 90 प्रतिशत व्यक्ति खांसी जुकाम बुख़ार सिरदर्द से पीड़ित थे। 

इनमे से  उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों  के गांव जैसे कानपुर के घाटमपुर तहसील का दस हज़ार आबादी का गाँव "परास" का नाम है। यहां सिर्फ 20 दिन में 50 लोग स्वर्ग सिधार गए सारे मृतकों के कोविड जैसे लक्षण थे पर किसी ने कोई जांच नहीं करवाया था, हालांकि उत्तर प्रदेश में कई जिलों में इसी तरह अन्य गाँव भी है जहाँ 20 से 30 लोग परलोक सिधार गए सिर्फ एक पखवाड़े में , इन गांव में लखनऊ  जिले के  मोहनलाल गंज तहसील में   "जबरौली  गांव" , हापुड़ जिले में "बक्सर" गांव जहां पर 35 लोग मरे ,दादरी के "जैतवारपुर " गांव जहां 3000 आबादी है यहाँ पर 25 लोग मरे, दादरी में ही 7000 आबादी वाले व्यावली गांव में 35 से ज्यादा लोग मरे, परिवार की ये दास्तान रही कि कमाने वाले हर सदस्यों की मौत हो गई और सिर्फ बृद्ध 90 साल के ससुर  सास और बहुएं और नाती बचे , कमाने वाले सभी सदस्य परलोक सिधार गए। परंतु आपको बतातें चले इतना सब होने के बाद कई गांव पंचायत के लोंगों ने मुस्तैदी से कोविड नियम का पालन किया अपने घर के सामने ख़ुद साफ सफाई करते रहे मास्क लगाते रहे ,इनमे से दादरी के के पांच गांव हैं जिनमें किसी मे कोई कोरोना संक्रमित नहीं मिला।

ये हालात केवल उत्तरप्रदेश की ही नहीं बल्कि पंजाब ,राजस्थान ,हरियाणा , गुजरात ,मध्यप्रदेश के गांव की भी थी जहां व्यक्तियों ने कोविड एंटीजन टेस्ट कराने से मना कर दिया बाद में गांव से 5 से 10 लोग तक एक पखवाड़े में मरने की सूचना मीडिया को हुई।

 यदि क्यों फैला गांव गांव शहर  शहर कोरोना तो आप ये समझिए कि पहले लहर के बाद जनवरी 2021 में कोविड के संक्रमित मरीज़ मिलना बंद हो गए ,सरकार ने भी समझ लिया कि वो कोरोना से जीत चुके ,सारे अस्पताल में जहां कोरोना सेंटर बनाये गए थे उनमें 50 प्रतिशत बेड कम कर दिए गए ,रेमदेसिवर दवा के निर्माण को कम करा दिया गया क्योंकि कोरोना के केस कम मिलने पर उसकी जरूरत भी दवा कंपनियों को नही रही। उत्तरप्रदेश में तो पंचायतों के चुनाव में शहरी आयातित प्रचारक नेताओं ने अपनी शान के लिए गांव में ही अड्डा जमा लिया ,इस अड्डे में रणनीति कौन किसको वोट दे रहा ,घर घर जाकर समीकरण तैयार किये गए उम्मीदवारों ने घर घर जाकर मुख्यता बुजुर्गों के चरण पकड़े वोट लेने के लिए ,इनमे कई प्रत्याशी या तो संक्रमित थे या सिमटोमैटिक थे यानी कोरोना से पीड़ित थे पर लक्षण उभरे नहीं थे इन लोगों ने गांव गांव में बुजुर्गों को अत्यधिक बीमार कर दिया जिनके लिए न कोई जांच की सुविधा गांव में थी नही कोई दवा अब वो भगवान भरोसे थे क्योंकि उनके लड़के और नाती भी राजनीति के दंगल में दर्शक और समर्थक बनकर घूम रहे थे,उनके पास इतना वक्त नहीं था कि कोविड जांच सेंटर या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए अपने ब्लॉक तक उन्हें गाड़ी में बैठाकर अस्पताल तक ले जाते और शुरुआती लक्षणों के आधार पर अस्पताल से मिलने वाली कोविड संक्रमित मरीजों वाले दवा की किट ही ले लेते।

 दूसरा संक्रमण फैलने का कारण की इस बार का वायरस म्युटेंट था ,जिसमे उसके गले मे सीधे पहुंचकर गले और फेफड़े की कोशिकाओं को जकड़ लेते थे ।जब तक शरीर के एंटीबाडी खुद को तैयार करते थे तब तक रोगी की हालत खराब हो जाती थी।

 इसके अलावा आप सब ने देखा होगा कि ज्यादातर लोग मास्क लगाना भूल गए थे सिर्फ कोर्ट या किसी ऑफिस में ही मास्क लगाकर जाते थे नहीं तो हर जगह हवाहवाई था , भारत मे हुए एक सर्वे के मुताबिक कोविड प्रोटोकाल में इस समय  लोगों में सिर्फ 50 प्रतिशत लोग ही मास्क लगाते थे। जो 50 प्रतिशत मास्क लगाते थे उसमे भी 64 प्रतिशत लोग नाक के नीचे मास्क रखते हैं , 20 प्रतिशत ठोढ़ी के नीचे रखते हैं ।2 प्रतिशत गले मे लटकाकर रखते हैं 14 प्रतिशत व्यक्ति ही नाक और मुंह पूरी तरह ढके पाए गए। अब आप समझो कि जब वायरस धूल के कणों में मिलकर तैर रहा है तब कब आपका मुंह खुला और आपके फेफड़े में घुसा आप जान भी नही सकते क्योंकि पहले की तरह नहीं है कि दो गज की दूरी से बच जाओगे। यानी आप समझो कि आम व्यक्ति ने पहली लहर में जिस वायरस का मजाक उड़ाया की वायरस आदि कुछ नहीं सिर्फ मेडिकल विभाग के लूट के लिए बनाया गया है मोदी की जेब भरने को  बनाया गया एक धोखा है ,इस बार वायरस ने जब विकराल रूप धारण किया तो अपनी उपस्थित का मजाक न बनाने के लिए भी चेतावनी दे गया।

कोरोना दूसरी लहर :एक आर्टिकल

    कोरोना लोगों को समझने का वक्त नही दे रहा ये बदल हुआ कोरोना वैरिएंट जो डबल म्यूटेंट का है जिसमें ब्रिटेन  वायरस और कैलिफोर्निया वायरस के लक्षण एक साथ है ,इसके स्पाइक प्रोटीन ज्यादा तेजी से शरीर मे प्रवेश करके फेफड़ों को संक्रमित कर देते हैं जिससे फेफड़े की कुपिकाएँ ऑक्सीजन को सही से पम्पिंग नही कर पाती फेफड़ों में कफ या बलग़म जमा होने लगता है ,जिसके कारण व्यक्ति को पूरी ऑक्सीजन नहीं मिल पाती  और ऑक्सीजन लेबल तेजी से घटने लगता है। 90 से कम होने पर मरीज को अस्पताल में भर्ती होने पड़ रहा है। 70 से कम होने पर मरीज को वेंटिलेटर में रखना पड़ रहा है।

     गांव में तो समझ मे नही आ रहा किसी को बात करते करते खाते पीते खत्म हो रहे लोग,उनको ऑक्सीजन सिलिंडर की जरूरत ही नही पड़ती,गांव के गरीब बन्दे इतना सपोर्ट भी नहीं कर पाते उनको तो गांव के झोला छाप ने जो दे दिया वही पर्याप्त है नहीं तो रामभरोसे हैं वैसे गांव के छोलाछाप ने बहुतों की जान भी बचाई है बेसिक उपचार के लिए सारी दवाएं वो शहर के नर्सिंग होम के डॉक्टर्स से पूँछकर करते रहते हैं ,जब बड़े अस्पताल में कोई उपचार नहीं कोरोना का तो फिर भला बेचारे झोला छाप भी कितना ठीक करेंगे पर चूंकि 24 घण्टे गांव वालों के संपर्क में रहते हैं इसलिए गांव गांव के संक्रमितों का इलाज़ घर जाकर पूँछकर कर रहे हैं परंतु दूसरी तरफ इन्हीं झोला छाप के कारण गांव गांव लोग मर रहे हैं क्योंकि बहुत से झोला छाप जिनको कोई भी ज्ञान नहीं है कोरोना के प्रारंभिक लक्षण और फ्लू के बारे में कोई जानकारी नहीं है वो मरीजों को ड्रिप   चढ़ा कर  कुछ दवाएं देकर इतिश्री करतें है इधर मरीज़ की हालत दो दिन में बिलकुल ख़राब हो जाती है  अगले दिन तक उसके गले मे दर्द सीने में दर्द शुरू होने की शिकायत होती है  और तीसरे चौथे दिन अचानक मरीज़ की हालत इतनी ख़राब हो जाती है कि उसे ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ने लगती है और गांव में ऑक्सीजन की अनुपलब्धता में लोग मरने लगते है।

    गांव गांव में  मरीज़ पीड़ित है किसी किसी घर मे सभी संक्रमित है सभी को ज़ुकाम बुखार है पर कोई जांच कराने नही जा रहा । गांव गांव सरकार द्वारा कैम्प लगाए गए पर कैम्प में भी कोई आने को तैयार नहीं हो रहा दिन भर में एक दो मरीज़ आतें हैं। संक्रमण इस कदर है कि गांव के एक एक गली में दस दस लोग संक्रमित है और हर दिन तीन चार लोगों की जान जा रही है।  

    देश के दस प्रदेश पूरी तरह संक्रमित थे,इन प्रदेश के हर गांव में संक्रमण तेजी से प्रवेश किया,शुरुआती 15 दिन तक तो शहर में हाहाकार रहा क्योंकि लोग किसी तरह अस्पताल पहुंच गये , उस चीख पुकार और ऑक्सीजन प्राप्त करने की लाइन को मीडिया में अच्छा कवरेज मिला,उनका TRP भी बढ़ा लाशों को दिखाने में वो मीडिया संस्थानों को विदेशों से दवा कंपनियों से भारत की इस आपदा की तस्वीर लोगों के चीत्कार वाले वीडियो और फ़ोटो दिखाने के लिए रुपये की गड्डियां भी मिली। पर गांव की सुध लेने वाला कोई नहीं था,एक दो दिन मेडिकल स्टोर से एक दो टेबलेट लेने के बाद ठीक हुए तो ठीक नहीं तो उनका जै सियाराम हो गया,जो बन्दा गांव में मरा उसको शहर तक या क़स्बे के छोटे नर्सिंग होम तक लाये पर जब मरीज़ की हालत चिंताजनक होती थी तब वो भर्ती करने से इनकार कर देते थे क्योंकि उनके पास  सिरियस मरीजों के लिए पर्याप्त सुविधाएं और संसाधन नहीं थे। अब तो उनको भगवान के पास ही जाना था ,थक हार कर वो अपने प्रियजन दादा दादी ताऊ ताई आदि को वापस गांव में लाते थे वो वहीं प्राण त्याग देते थे ,कई परिवार में तो सभी सदस्य कोरोना से ग्रसित होने और लक्षण दिखने के बाद भी न कोई जांच करवाया न ही कोई दवा ली यही उनके लिए जानलेवा शामिल हुआ कई परिवार में सिर्फ एक दो सदस्य छोड़कर सभी मारे गए आप TV के विभिन्न चैनल सफेद कपड़े से लिपटी लाशें देखेंगे जलती हुई चिताएं दिखेंगी।

     अस्पतालों ने ऑक्सीजन लेते मरीज़ दिखेंगे और विभिन्न डॉक्टर के डिबेट में कोरोना उपचार पर चर्चा दिखती है।कई घरों में लड़कों ने अपने माता या पिता या किसी प्रियजन की लाश लेने से मना कर दिया तब कुछ साहसी युवकों ने उनके परिजनों की लाशें दो तीन दिन बाद मर्चरी से निकाल कर उनको श्मशान गृह में जलाया,लोग अस्पताल के बाहर जमीन पर लेटे हैं कि ऑक्सीजन मिल जाएगी पर ऑक्सीजन पर्याप्त नहीं थीं लोगों ने ऑक्सीजन के आभाव में दम तोड़ दिया। आपको आकाश का सीना चीरती आवाजें सुनाई देतीं हैं अस्पताल में तो      श्मशान गृह में लकड़ी की चीट चीट करतीं आवाज़ें जो आपको शांत और स्तब्ध कर देती हैं कि मैं गवाह बना इस महामारी का जो सौ साल बाद फिर आई भारत में। चिता में जलाने के लिए लकड़ियां समाप्त हो गईं ,तब गांव के लोग नदियों के किनारे बालू में गड्ढे खोदकर लाशों को दफना देते थे जबकि लाशों को दाह संस्कार करने की प्रथा हिन्दुवों  में मिलती है पर इस आपात काल मे जब गांव में हर दिन कोई न कोई मरने लगा और कोरोना इन्फेक्शन के डर का माहौल रहा ,घाट में पहले से चिताएं लगी थीं उस समय लोगों ने कई मृतजनों को दफनाकर और कई ने सीधे जलप्रवाह कर दिया ये जलप्रवाह की हुई लाशें कई बार किनारे में एक जगह एकत्र हो गई अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसको कवरेज करने में बहुत दिलचस्पी दिखाई और भारत की छवि की नकारात्मक छवि को विदेशों में दिखाया कि भारत कितना कमज़ोर हो चुका है।

  हालातों का जिक्र शहरों का करें तो पाते है कि इस आपदा में भी कालाबाज़ारी करने वाले खरपतवार की तरह उग आए है , जो गिद्ध बन गए है ,मरीज़ों को दस गुना कीमत में दवाएं ,इंजेक्शन और ऑक्सीजन बेंच रहे  हैं। इनमे रेमडेसिवर नामक इंजेक्शन की सामान्य बाज़ार कीमत सिर्फ तीन हजार थी वह ब्लैक मार्केट में 50 हज़ार तक बिकी। ऑक्सीजन के सिलिंडर के लिए लाइन में लगे लोग नहीं तो इमरजेंसी में 20 हजार रुपये में  सिलिंडर ख़रीदे। नकली रेमडेसिवर के इंजेक्शन बिके जिसके अंदर दवाएं कोई और थीं रैपर रेमडेसिवर का लगाया था।

  20 मई से कोरोना के केस ऊपर वाले प्रदेशो में कम होने लगी , अब इसका प्रसार तमिलनाडु केरल पंजाब पूर्वोत्तर के प्रदेश में होने लगा। इस कोविड लहर की विशेषता ये थी कि हर राज्य में फैलने की तारीख में थोड़ा अंतर रहा हर राज्य में पीक टाइम की डेट अलग अलग थी जिससे एक राज्य जब उभरा तो दूसरे राज्य में फैलना शुरू हुआ।

इस बीच एक समस्या और आ खड़ी हुई ब्लैक फंगस ये रोग उन राज्यों में विस्तार ले लिया जहां पहले कोविड का फैलाव हो चुका है ,जिन मरीजों को डाएबटीज रही है उनको वेंटिलेटर में रखा गया था सात आठ दिनों तक स्ट्रॉइड दिया गया है ।इन मरीजों के कवक द्वारा फैलने वाला जानलेवा रोग संक्रमित कर रहा है ब्लैक फंगस को राजस्थान ने महामारी घोषित कर दिया है करीब 50 मरीज मारे गए  इससे ,मरीज़ को इस रोग में शुरुआत में नाक और आँख में दर्द होता है आंखों में सूजन आ जाती है ,कभी कभी कवक मस्तिष्क में पहुंच जाता है उस स्थित में मरीज मर जाता है ,इस रोग में मृत्युदर आधी है यानी जितने संक्रमित हुए उसके आधे मर सकते है ,कई मरीजों की सर्जरी करना पड़ता है कई मरीजों के आंख का ऑपरेशन करना पड़ता है। डॉक्टर  नेजल एंडोस्कोपी से इस कवक के बारे में पता लगाते है।ये रोग से मृत्यु तब होती है जब कवक मस्तिष्क तक फैल जाता है।

 कोरोना महामारी के दूसरी लहर में आज भी गांव के लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे क्योंकि अफवाह इतनी फैली की  वैक्सीन लगवाने से ही लोग मर रहे हैं।कोरोना संक्रमण डर जबकि गांव में अधिक है।कस्बों कर CHC सेंटर में दूर दूर दूसरे शहरों से लोग टीका लगवाने आ रहे हैं पर अभी भी गांव वाले टीका के प्रति ग़लत धारणा रखते हैं ये दुर्भाग्यपूर्ण है। 

 भारत मे कोरोना संक्रमण  की रफ्तार  धीरे धीरे कम हो  रही है शायद आखिरी जुलाई तक पूरे मामले खत्म भी हो जाये,पर तीसरी लहर के आने का खौफ़ जनता के बीच बना हुआ है ,बच्चों के प्रति, नौनिहालों के प्रति तीसरी लहर खतरनाक साबित हो सकती है ,माता पिता ज़्यादा डरे  हैं ,प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण  है,तीसरी लहर से निपटना ,क्योंकि हर जिले में अपनी समस्याएं है कैसे सीमित संसाधनों में कोविड महामारी से निपटने के लिए ,अस्पताल का प्रॉपर प्रबंध न केवल बड़े शहरों में बल्कि सुदूर तहसील और ब्लॉक में स्थित CHC में इमरजेंसी मरीजों के उपचार की व्यवस्था हो ऑक्सीजन का पूरा इंतिजाम हो , दवा और इंजेक्शन का सही भंडारण हो , हालांकि भारत मे बच्चो के तीसरे लहर में संक्रमण की आशंका व्यक्त की जा रही है पर ज्यादातर बच्चो में ये अस्यमटोमैटिक ही होगा ,बच्चे ज़्यादातर अपने आप ठीक हो जाएंगे, हालांकि भारत मे बच्चों के लिए वैक्सीन निर्माण के तीसरे परीक्षण में है ,दिसंबर 2021 तक बच्चों के लिए भी वैक्सीन उपलब्ध हो सकती है। 

 अभी  भी जरूरत है सभी नागरिकों को  वैक्सीन लगवाने की जब  तक देश के सत्तर प्रतिशत व्यक्ति वैक्सीन  नहीं लगवाएंगे  तब तक देश मे हर्ड इम्युनिटी नहीं बन पाएगी ,गाँव के हर व्यक्ति को भ्रांति और अफवाह से निकालने के लिए हर उस व्यक्ति को गांव गांव जाना चाहिए जो वैक्सीन की दोनो डोज़ लगवा चुके है उनको हर गांव के व्यक्ति समझाना और जागरूक करना चाहिए ,उनको भय और अफ़वाह के जाल से बाहर निकालने में सहायता करना चाहिए ,जिससे जल्द कोविड के जाल से भारत बाहर निकल सके। 


    

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