Aneesh kapoor आर्टिस्ट की जीवनी

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  अनीश कपूर का जन्म 12 मार्च 1954 को मुम्बई में हुआ था ,उनके पिता एक  इण्डियन पंजाबी हिन्दू थे ,उनकी माता यहूदी परिवार से थे ,अनीश कपूर के नाना पुणे के यहूदी मंदिर जिसे सिनेगॉग कहते है के एक कैंटर थे।  (अनीश कपूर)         इनके पिता भारतीय नौ सेना (NEVY)मैं जल वैज्ञानिक (Hydrographer) थे,अनीश कपूर के एक भाई टोरंटो कनाडा के यार्क विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं।   अनीश कपूर की शिक्षा-- अनीश कपूर की प्रारंभिक शिक्षा दून स्कूल देहरादून में हुई,प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद सन 1971 में अनीश कपूर  इजराइल चले गए ,वहां पर उन्होंने इलेक्ट्रिकल  इंजीनियरिंग के लिए इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया ,परंतु उनकी गणित में अरुचि होने के कारण छै महीने बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दिया,तब उन्होंने एक आर्टिस्ट बनने का निश्चय किया।वह इंग्लैंड गए यहां पर होर्नसे कॉलेज ऑफ आर्ट में एडमिशन लिया और चेल्सिया स्कूल ऑफ आर्ट एंड डिज़ाइन में कला का अध्ययन किया। अनीश कपूर की  महत्वपूर्ण संरचनाये और स्कल्पचर- - अनीश कपूर ने  1979-1980 में 1000 Names नामक  इंस्टालेशन बनाये आपने ये स्कल्पचर और संरचनाओं  में अमूर्

हड़प्पा या सैन्धव संस्कृति: सम्पूर्ण तथ्य में

हड़प्पा सभ्यता या सैन्धव के सम्पूर्ण तथ्य -----

आज हम पूरी हड़प्पा सभ्यता  को बिंदुवार, तथ्यों से समझने की कोशिश करतें हैं।
हड़प्पा संस्कृति का नामकरण हड़प्पा स्थल के कारण हुआ है क्योंकि इस जगह से अत्यधिक पुरातत्व सामग्री प्राप्त हुई है
  • हड़प्पा युगीन कांस्य युगीन सभ्यता है।
  • हड़प्पा सभ्यता का पूरा क्षेत्र फल 1,22,99,600 वर्ग किलोमीटर है।
  • हड़प्पा सभ्यता त्रिभुज के आकार की है।
  • हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत पंजाब सिंधु ,बलूचिस्तान,अफगानिस्तान,कश्मीर,राजस्थान ,गुजरात ,हरियाणा और पश्चिम उत्तरप्रदेश के भाग आते हैं।
  • रेडियो कार्बन विधि से हड़प्पा सभ्यता की तिथि2300-1750 ईसा पूर्व माना जाता है।
  • इस सभ्यता का विकसित काल 2500 से 2200 ईसा पूर्व माना जाता है।
  • सबसे पहले जान मार्शल महोदय ने हड़प्पा सभ्यता को सिंधु सभ्यता का नाम दिया । विद्वान के अनुसार इस सभ्यता के निर्माण में सुमेरियन सभ्यता के लोंगों ने योगदान दिया।
  • मार्टिमन व्हीलर के अनुसार हड़प्पा सभ्यता की प्रेरणा मेसोपोटामिया से प्राप्त हुई।
  • अमलानंद घोष के अनुसार हड़प्पा सभ्यता के विकास में स्थानीय सोथी संस्कृति का योगदान था।
  • राखाल दास बनर्जी के अनुसार इस सभ्यता के निर्माण में द्रविण लोगों ने अपना योगदान दीया और द्रविण ही इस सभ्यता के निर्माता थे।
  • हड़प्पा संस्कृति की जनसंख्या चार विभिन्न प्रजातीय समूहों प्रोटो-आस्ट्रेलाइड,भूमध्यसागरीय,अल्पाइन और मंगोलियन प्रजाति के थे।
■■■■■हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख स्थल व विशेषताएं
  • हड़प्पा पश्चिमी पंजाब प्रांत के मांट गोमरी जिले में रावी नदी के बाएं किनारे में स्थित है।
  • हड़प्पा के दुर्ग में में चबूतरे में दो लाइन में छै कोठार मिले हैं,प्रत्येक कोठार की लंबाई15.23 मीटर तथा चौड़ाई6.09 मीटर थी।
  • हड़प्पा में दो कमरे वाले बैरक भी मिले हैं
  • शायद मजदूरों के रहने के लिए थे।
  • यहां से एक अन्नागार मिला है जो गढ़ी के बाहर निचले शहर में स्थित था।
  • हड़प्पा स्थल के दक्षिण में एक कब्र मिली है जिसे पुरातत्वविदों  ने R-37 नाम दिया है।
  • ताबूत शवाधान के साक्ष्य यहां से मिले हैं।
  • हड़प्पा स्थल से एक महिलाओं के श्रृंगार का बक्सा  या वैनिटी बॉक्स मिला है।
  • कांसे का इक्का और बैलगाड़ी का साक्ष्य यहां से मिला है।
  • हड़प्पा से 14 ईंट के भट्टे मिले हैं।
  • एक पीतल की आकृति मिली है जिसमे एक हिरण को कुत्ता पीछा कर रहा है।
  • हड़प्पा स्थल से एक नृत्य करती स्त्री की मूर्ति मिली है
  • एक बर्तन के ऊपर बना हुआ मछुआरे का चित्र मिला है
  •  हड़प्पा स्थल से एक मिट्टी की मूर्ति मिली है इस मूर्ति में एक स्त्री के गर्भ से पीपल का पौधा निकलता दिखाया गया है।
  •  हड़प्पा स्थल से ही  अभिलेख युक्त सर्वाधिक मुहरें मिलीं हैं।
  •  हड़प्पा स्थल से सूरमा या काजल के साक्ष्य मिले हैं जो परिवर्ती काल का है।
■■■मोहन जोदड़ो स्थल के तथ्य--
  • मोहनजोदड़ो का अर्थ है मुर्दों का टीला।
  • मोहनजोदड़ो सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित है जो पाकिस्तान के सिंधु प्रान्त के लरकाना जिले में है।
  • मोहन जोदड़ो के टीले पर बौद्ध स्तूप बना है।
  • मोहन जोदड़ो के नगर निर्माण के नौ चरण मिले हैं।
  • मोहनजोदड़ो से एक विशाल स्नानागार मिला है ,जो 11.88 मीटर लंबा और 7.01 मीटर चौड़ा तथा2.43 मीटर गहरा है। इस विशाल स्नानागार में उत्तर और दक्षिण दिशा में उतरने के लिए सीढियां बनीं है ,स्नानागार के फर्श को पक्का बनाया गया है इसके दरार बिटुमिन ले लेप से भरे गए हैं।इस स्नानागार के आसपास कमरे बने हैं ,इस ग्रेट बाथ का प्रयोग सम्भवता धार्मिक कार्यों को पूरा करने में इस्तेमाल होता होगा।
  • स्नानागार के पास में एक लंबा भवन मिला है जो सम्भवता पुरोहित या किसी अधिकारी का निवास था।
  • यहां से कांसे की एक नृत्य करती हुई मूर्ति मिली है जिसको लॉक्स वैक्स पद्दति से बनाया गया है।
  • मोहन जोदड़ो स्थल से बुने हुए सूती कपड़े का एक टुकड़ा मिला है।
  • मोहन जोदड़ो से कई मानव कंकाल मीले है जो कई जगह बिखरी अवस्था मे मिले हैं
  • मोहनजोदड़ो से बाढ़ और उसके कारण हुए विनाश के साक्ष्य मिलते हैं।
  • मोहनजोदड़ो नामक स्थल से एक मुद्रा मिली है जिसमे योगी ध्यान लगाएं बैठा है जिसके चारों ओर एक हांथी एक बाघ और एक गैंडा मिला है आसन के नीचे एक भैंसा बना है। मार्शल महोदय ने इसे हिन्दू देवता पशुपति की संज्ञा दी है।
  • सेलखड़ी से बनी कुत्ते की मूर्ति यहां से मिली है।
  • मोहनजोदड़ो से तांबा गलाने के साक्ष्य मिले हैं।
  • मोहनजोदड़ो से बेलनाकार मुहरें मिली हैं
  • सीप से निर्मित स्केल के साक्ष्य मिले है।
  • पूरे हड़प्पा सभ्यता से एक मात्र खिड़की के साक्ष्य यहीं से मिले हैं।
  •  धातु से बनी सबसे अधिक मूर्तियां मोहनजोदड़ो से मिलीं हैं।
  • मोहनजोदड़ो से गहने का ढेर व चाँदी की थाली मिली है
  •  मोहनजोदड़ो से मिट्टी का तराजू मिला है।
  • बांट बटखरे का समान इस स्थल से मिला है।

■■■■■लोथल स्थल के तथ्य-

  • लोथल गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा नदी के किनारे सरागवाला ग्राम के समीप स्थित है।
  • यहाँ की पूरी बस्ती एक दीवार से ही घिरी थी।
  • लोथल से एक कृत्रिम बंदरगाह मिला
  • लोथल सिंधु सभ्यता काल मे सामुद्रिक व्यापारिक केंद्र था।
  • इस स्थान से घोड़े एक लघु मृण्मूर्ति मिली है।
  • इस जगह से एक ऐसी मुहर मिली है जिसमें जहाज अंकित है।
  • हाथी दांत का एक स्केल इस जगह से मिला है
  • यहां से मनकों को बनाने वाला एक कारखाना मिला है।
  • यहां से एक युगल शवाधान का साक्ष्य मिलता है।
  • फारस प्रदेश या मेसोपोटामिया सभ्यता की एक मुहर यहां से मिली है।
  • यहां से 1800 ईसा पूर्व के चावल के साक्ष्य मिले हैं।
  • यहां से चित्रकारी के साक्ष्य मिले है एक मिट्टी के बर्तन में चालाक लोमड़ी के दृश्य अंकित मिले हैं।
  • यहां से कांसे की छड़ी ,तांबे का कुत्ता और तांबे की मुहर प्राप्त हुई है
  • लोथल से अनाज पीसने की एक चक्की मिली है।
  • लोथल के मकान में सामने से प्रवेशद्वार मिला है।
  • खोपड़ी की सर्ज़री के साक्ष्य इस स्थल से मिले हैं।
■■■■■कालीबंगा के तथ्य---
  • कालीबंगा का अर्थ है काले रंग की  की चूड़ियां
  •  ये 4500 वर्ष पुरानी सैन्धव सभ्यता थी ।
  • कालीबंगा राजस्थान के गंगानगर जिले में घग्घर नदी के किनारे है
  • यहां से लकड़ी के ,मिट्टी के खिलौने मिले हैं।
  • इस जगह  से जो खेत  मिले हैं  उनके जूते होने के साक्ष्य मिलते हैं।
  • मिश्रित खेती चना सरसों के प्रमाण मिलते हैं।
  • इस स्थल से लकड़ी के  पाइप के प्रयोग का प्रमाण मिलता है।
  • यहां पर मोहनजोदड़ो की तरह भवन निर्माण  में पक्की ईंटों का प्रयोग नहीं हुआ बल्कि कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है।
  • कालीबंगा से अलंकृत फर्श के प्रमाण मिलते हैं
  • कालीबंगा स अग्निकुंड के साक्ष्य मिलते हैं।
  • दो फसलों को उगाने के साक्ष्य यहां से मिलते हैं।
  • यहां से ठोस पहिये के अवशेष मिले हैं।
  • इस स्थल से उस्तरे में लिपटा हुआ कपास का अवशेष मिला है।
  • कालीबंगा से प्राप्त बेलनाकार मुहर मेसोपोटामिया मुहरों के समान थी।
  • बैल और बारहसिंघे की अस्थियां यहां पर मिलतीं हैं।
■■■■■चन्हूदड़ो स्थल के तथ्य --
  • ये एक मात्र स्थल है जो दुर्गीकृत नहीं है
  • यहां से हड़प्पा पूर्व की झुकर और झाँकर संस्कृति के अवशेष मिले हैं।
  • यहां से कांसे की इक्का गाड़ी तथा और कांसे की बैलगाड़ी के साक्ष्य मिले हैं।
  • चन्हूदड़ो से मनका बनाने का कारखाना मिला है।
  • चन्हूदड़ो से भी बाढ़ के विनाश के साक्ष्य मिले हैं।
  • वर्गाकार मुहर के सक्ष्य यहां से मिला है।
  • चार पहियों के मिट्टी की बनी एक खिलौनागाड़ी के साक्ष्य यहां से मिले हैं।
  • इस स्थल से स्याही वाली दवात के साक्ष्य मिले हैं।
  • चन्हूदड़ो से लिपिस्टिक के साक्ष्य मिले हैं।
■■■■■बनवाली--
  •  यह हरियाणा के हिसार जिले में स्थित एक हड़प्पाकालीन स्थल है।
  • बनवाली  से हड़प्पा पूर्व ,हड़प्पा कालीन तथा उत्तर हड़प्पा कालीन संस्कृतियों का पता चलता है।
  • बनवाली  से बैलगाड़ी के पहिये के साक्ष्य भी मिले हैं।
  •  बनवाली  से हल की आकृति के खिलौने मिले हैं।
  •  बनवाली से आयताकार राजमहल जैसे विशाल भवन के साक्ष्य मिले हैं।
  • बनवाली की नगर योजना शतरंज की बिसात या जाल के आकार की बनाई गई है।

■■■■■रंगपुर -हड़प्पा स्थल के तथ्य--
  • रंगपुर स्थल गुजरात के काठियावाड़ के मादर नदी के किनारे स्थित है।
  • यहां का दुर्ग कच्ची ईंटों का बना था।
  • इस स्थल से  पूर्व हड़प्पा संस्कृति और उत्तर हड़प्पा संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं
  • रंगपुर से उत्खनन होने पर किसी भी प्रकार की मुद्रा नहीं मिली न ही मातृ देवी की मूर्ति मिली है।
  • रंगपुर स्थल से चावल की भूसी के ढेर मिले हैं।
  • पत्थर के नुकीले फलक यहां से मिले हैं।

सुरकोटडा------

  • गुजरात राज्य के  कच्छ क्षेत्र में में ये स्थल स्थित है।
  • इस स्थल की खोज 1964 में गणपति जोशी ने की थी।
  • यहां हड़प्पा सभ्यता के पतन के अवशेष दिखाई देते हैं।
  •  सुरकोतड़ा से घोड़े के अस्थियों के अवशेष मिले हैं।
  • यह स्थान हड़प्पा के विदेश व्यापार का केंद्र था।
  • कलश शवाधान के साक्ष्य यहाँ से मिले हैं।
  • यह स्थल पत्थर के टुकड़ों की दीवार से घिरा हुआ था।
  • ऊपर से कब्र को ढकने का साक्ष्य यहां से मिला है।
  • तराजू का पलड़ा यहाँ से मिला है।

आलमगीरपुर----

  • यह स्थल उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले में हिंडन नदी के किनारे है।
  • यह स्थल हड़प्पा सभ्यता के पतन का संकेत देता है।
  • यह हड़प्पा सभ्यता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पुरास्थल है
  • यहां से एक मातृदेवी की मूर्ति और एक मुद्रा प्राप्त हुई हैं
  • रोपड़----
  • यहां हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृतियों के अवशेष मिले है।
  • यहां के मकान पत्थर और मिट्टी के बनाये गए हैं।
  • यहां पर शवों के साथ एक कुत्ते को दफानन के प्रमाण मिले हैं।

कोटदीजी------

  • यह स्थल हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा कालीन दोनो समय अस्तित्व में था।
  • यहाँ पर मकान ज्यादातर कच्ची ईंटों के बने थे परंतु मकान के नींव में पत्थर का प्रयोग हुआ था।
  • किलेबंदी के  साक्ष्य मिले हैं दाश्क नदी के किनारे स्थित है।

सुतकांगेन्डोर------

  • पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में  दाशक नदी के किनारे स्थित है।
  • परिपक्व हड़प्पा  संस्कृति के अवशेष यहां से मिले हैं।
  • तांबे के कुल्हाड़ी के साक्ष्य यहां से मिले हैं।
  • सुतकांगेन्डोर का मेसोपोटामियाई नगर के बेबीलोन से व्यापारिक संबंध थे।

राखीगढ़ी----

  • यह स्थल हरियाणा राज्य के जींद में स्थित है

  • इस स्थल की खोज सूरजभान और भगवान देव ने किया।
  • यहां से सिंधु पूर्व सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
  • यहां से तांबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं।
  • यहां से एक मुद्रा मिली है जिस पर हड़प्पा लिपि का एक लेख है।

हड़प्पा संस्कृति की नगर योजना------

  •   हड़प्पा  संस्कृति एक नगरीय संस्कृति थी,इस संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी,इस सभ्यता के नगर विश्व के प्राचीनतम सुनियोजित नगरों में थे।
  • सामान्यता इस सभ्यता के नगर दो भागों में बटें थे,ऊंचे टीले पर स्थिति प्रचीर युक्त बस्ती नगर दुर्ग और पश्चिमी क्षेत्र में आवासीय क्षेत्र निचला नगर था।
  • दुर्ग में शासक वर्ग के लोग रहते थे और निचली बस्ती में सामान्य जन के लोग रहते थे।
  • भवन  निर्माण में पक्की और कच्ची दोनो ईंटों का प्रयोग हुआ है। भवनों में सजावट आदि कम ही होती थी  ,यानी हड़प्पा सभ्यता के लोग उपयोगिता वादी थे।
  • ईंट को निश्चित अनुपात 4:2:1में बनाया जाता था।
  • सभी मकानों में स्नानागार की सुविधा थी,कुएं में गन्दे जल के निकासी के लिए नालियों के प्रबंध था।
  • सड़के कच्ची थीं प्रायः एक दूसरे को समकोण पर काटतीं थीं। और इसके कारण नगर आयताकार खंडों में विभाजित रहता था।
  • मकानों के दरवाजे आज के समय की तरह मध्य में नही खुलते थे बल्कि दरवाजे एक किनारे बनाये जाते थे।
  • हड़प्पा संस्कृति में जल निकास प्रणाली अद्वितीय थी,जल निकासी के लिए घर की सभी नालियों को एक चैंबर में खोला जाता था, बाहर गलियों में नालियों को सड़क के बीचोबीच बनाया जाता था , और नालियों को ईंट से ढक दिया जाता था, समकालीन दूसरी सभ्यता  जैसे मेसोपोटामिया में  स्वास्थ्य और सफाई पर इतना ध्यान नहीं दिया गया।
  • हड़प्पाई मकान निर्माण में आज की तरह सीमेंट का प्रयोग नहीं होता था बल्कि उस समय मकान बनाने में ईंटों को जोड़ने में जिप्सम का प्रयोग होता था ,साथ मे मिट्टी के गारे से  भी ईंटों की चुनाई होती थी ।
  • मकान में खिड़कियां आज की तरह नहीं होतीं थी।
  • मकान का प्रवेश द्वार मुख्य रास्ते से न होकर गली की तरफ होता था।
  • मकान दो मंजिला भी होते थे ,ऊपर चढ़ने के लिए सीढ़ी भी बनाई जाती थी।

  • हड़प्पा काल में व्यापार---

  • हड़प्पा सभ्यता के लोंगो के समय व्यापार बाहरी देशों से और आंतरिक भागों से होता था।
  • हड़प्पा वासी राजस्थान,सौराष्ट्र, महाराष्ट्र,दक्षिण भारत और बिहार से व्यापार करते थे।
  • बाहरी व्यापार में  सैंधव वासी  मेसोपोटामिया ,सुमेर सभ्यता  और बहरीन देश से समुद्री और स्थल मार्ग से लेन देन करते थे क्योंकि , बाह्य व्यपार  के प्रमाण में लोथल से बेलनाकार लिपि मुद्रा मिली है जिसका प्रयोग मेसोपोटामिया के लोग करते थे।
  • मेसोपोटामिया में सैंधव सभ्यता को मेलुहा नाम से जाना जाता था,मेसोपोटामिया के अभिलेखों में मेलुहा के साथ व्यापार के सम्बंध के उल्लेख मिलते हैं।
  • हड़प्पा वासी अपने सैन्धव काल की अन्य बस्तियों के साथ व्यापार करते थे, वे आंतरिक व्यापार के लिए भी बैलगाड़ियों से समान एक जगह से दूसरी  जगह ले जाते थे।
  • हड़प्पा सभ्यता में व्यापार विनिमय के माध्यम से होता था।

 हड़प्पा सभ्यता में कृषि कार्य  ------

  • हड़प्पा सभ्यता के लोग अक्टूबर नवंबर महीने में फसल बोते थे और मार्च अप्रैल में काट लेते थे।
  • कालीबंगा में हड़प्पा पूर्व काल के कुंड तथा जूते हुए खेत के साक्ष्य मिलते हैं,जिससे पता चलता है जिससे पता लगता है कि उस समय हल की सहायता से खेती की जाती थी।
  • हड़प्पा  संस्कृति में मुख्य फ़सल गेंहू और जौ थी,इसके अलावा वो राई ,मटर तिल,चना , कपास ,खरबूज और तरबूज की खेती करते थे। सबसे पहले कपास पैदा करने का श्रेय हड़प्पा वासियों को ही जाता है।
  • यदि चावल की बात करेंगे तो इसका प्रमाण भी मिलता है लोथल और रंगपुर से।
  • सिचाई  के लिए नहर ,कुआं आदि किसी भी प्रकार के साधन के प्रमाण नहीं मिले हैं।
  • किसानों से सम्भवता कर के रूप में अनाज लिया जाता रहा होगा ,क्योंकि कृषक अपनी आवश्यकता से कहीं अधिक अन्न की पैदावार करते थे।
  • अनाज रखने के लिए कई जगह जैसे लोथल,हड़प्पा,मोहनजोदड़ो,कालीबंगा में विशाल अन्न भंडारण केंद्र मिले हैं।
  • लोथल में आटा पीसने के चक्की के दो पाट मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता में पशुपालन व्यवसाय-----

  • हड़प्पा सभ्यता में मुख्य पाले जाने वाले पशु थे ,बैल ,भेंड़  ,बकरी,सुअर कुत्ते,गधे।
  • हड़प्पा वासियों को कूबड़ वाला सांड विशेष प्रिय था।
  • ऊँट ,गैंडा ,मछली का चित्रण हड़प्पा सभ्यताओं की मुहरों में हुआ है।
  • हड़प्पा संस्कृति में घोड़े के अस्तित्व में  ही विवाद है, कि वो जीव उस समय था या नहीं।
  • राना घुण्डई से घोड़े के दांत,सुरकोतड़ा से घोड़े के अस्थि तथा लोथल से घोड़े की मृण्मूर्ति मिली है।

हड़प्पा  सभ्यता में शिल्प और उद्योग-----

  • हड़प्पा सभ्यता में कांसे धातु का प्रयोग हुआ है धातुकर्मी ताम्बे के साथ टिन मिलाकर कांसा तैयार करते थे।
  • हड़प्पा सभ्यता में कटाई बुनाई का व्यवसाय प्रमुख व्यवसाय था।
  • मोहनजोदड़ो से एक सूती कपड़े का एक टुकड़ा मिला है  तथा मिट्टी के बर्तन में एक सूती कपड़े की छाप मिली है,जो ये प्रदर्शित करता है कि ,सूती कपड़े का व्यवसाय उन्नत था और बुनकर लोग सूती कपड़े को करघे से बुनने में दक्ष होंगे।
  • आप पूरे हड़प्पा संस्कृति में दुर्ग की दीवार उसके नीचे सुनियोनित पक्के मकानों की श्रृंखला देखते है , निश्चित रूप से ये प्रदर्शित करती है कि उस समय आज की तरह ज्यामितीय माप से नाप जोख और सिविल इंजीनियरिंग विद्या में पारंगत लोग थे। साथ मे मकान बनाने में कुशल कारीगर थे। इसके साथ ये इस बात का द्योतक है कि मिट्टी गूंथ कर उनको सांचे में ढालकर आग  में पकाया जाता था ,इसके लिए आज की तरह उस समय भी भट्ठा व्यवसाय में मजदूर लगते होंगे।
  • अब आते हैं लकड़ी के कार्य मे क्या उस समय हमें इसका प्रमाण बनवाली से मिट्टी के बने हल की मृण्मूर्ति से मिलता है , इसी प्रकार  नाव की आकृति के खिलौने भी मिले हैं,कि लोहार उस समय लकड़ी के कार्यों में  विशेषज्ञ थे,और बड़ी बड़ी नाव बनतीं थी जो व्यापारिक कार्य मे मदद करतीं थीं।
  • इस समय पत्थर उद्योग, मूर्ति उद्योग,चूना पत्थर,सेलखड़ी,बलुआ पत्थर,सलेटी पत्थर से मूर्तियाँ बनाईं जाती थीं।
  • कांसे की मूर्तियों का निर्माण द्रवी मोम विधि द्वारा होता था।
  •  कालीबंगन और चन्हूदड़ो  से चूड़ी उद्योग के  साक्ष्य मिले हैं।
  • मनका उद्योग का केंद्र लोथल और चन्हूदड़ो था ,आप सब ने देखा होगा कि उत्खनन में विभिन्न बेशकीमती पत्थरों से कई हार मिले है बनाये जाते थे। इस समय सोने के आभूषण मिले है , सोने का हार  इन हार के बीच बीच मे विभिन्न पत्थरों के नग में गूंथे होते थे, सोने के हैंड बैंड  मिले है ,इसके अलावा ताम्र के बने आभूषण भी मिले है। इन आभूषणों को मेसोपोटामिया, बहरीन तक निर्यात किया जाता था,सोना दक्षिण भारत से या फिर अफगानिस्तान से मंगाया जाता था।
  • हांथी दांत से मिले स्केल और हाँथी दांत से  बनी कई मूर्तियाँ  ये सिद्ध करते हैं कि हाँथी दांत में दक्ष शिल्पी थे।
  • उस समय लोहे के उपकरण नहीं मिलते क्योंकि इस धातु से बनी कोई भी चीज उत्खनन से नहीं मिली।
  • हड़प्पा मोहनजोदड़ो और और लोथल में धातु गलाने वाली भट्ठियों के प्रमाण से सिद्ध होता है कि इन नगरों में धातु उद्योग उन्नत था , धातु को  अयस्क से  कैसे  निकाला जाता था इस रसायन  विद्या से सैन्धव सभ्यता के लोग परिचित थे।

मुहर एवं लिपि----

  • मोहनजोदड़ो में सर्वाधिक संख्या में मुहरें प्राप्त हुई हैं।
  • ज्यादातर मुहरें सेलखड़ी में बनी हुईं थीं।
  • इन मुहरों में हांथी,बाघ,कूबड़ वाला बैल,एकश्रृंगी पशु पशु,गैंडा एवं भैंस की आकृति मुहरों पर अंकित है।
  • मुहरों पर एकश्रृंगी पशु की सर्वाधिक आकृति मिली है
  • हड़प्पा लिपि चित्रात्मक है।

  • हड़प्पा या सैन्धव संस्कृति: सम्पूर्ण तथ्य में

  • हड़प्पा लिपि में करीब 250 से लेकर 400 तक लिपि चिन्ह थे।
  • इस लिपि को सामान्यता बाएं से दाएं लिखा जाता था।
  • हड़प्पाई लिपि को पढ़ने के लिए प्रयास जारी है पर सफलता नहीं मिली।

मृदभांड-----

  • हड़प्पा सभ्यता में बर्तन चाक से बनाये जाते थे।
  • गाढ़ी लाल चिकनी मिट्टी में ले रंग की ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती थीं।
  • बर्तनों पर वनस्पति कई बृक्ष के जैसे पीपल की पत्तियों ,नीम की पत्तियों, केला के चित्र  अंकित है।इसमें जानवरों के चित्र जैसे मछली,बकरा,हिरण,मुर्गा आदि के चित्र है।

धार्मिक सामाजिक स्थिति--

  • नारी की मृण्मूर्तियां अधिक मिली हैं यानी नारी की  सामाजिक स्थिति बहुत ही मजबूत थी।
  • इस सभ्यता के लोग गेहूं,जौ,खजूर का मांस खाते थे।
  • आभूषणों में गले का हार, हाँथ में बांधने वाला कड़ा, भुजबन्द, कान के कुंडल या कर्णफूल , पैर में बांधने वाला पाजेब।
  • मनोरंजन के साधनों में सैन्धव वासी पाँसा खेलते थे ,चौपड़ का खेल खेलते थे।
  • हड़प्पा वासियों में एक वर्ग शासन चलाता था। जो समाज मे उच्च स्थान में रहता था।।
  • धार्मिक दृष्टिकोण से सैन्धव सभ्यता के लोग मातृ देवी की उपासना करते थे।

  • हड़प्पा या सैन्धव संस्कृति: सम्पूर्ण तथ्य में

  • इस हड़प्पा सभ्यता की ध्यान लगाए पशुपति की मुहर मिली है।
  • लिंग पूजा के पर्याप्त प्रमाण है,जिन्हें बाद में शिव के साथ जोड़ा गया,कुछ गोल अंगूठी जैसी आकृतियां मिलीं है जो सम्भवता योनि की प्रतीक हो सकतीं हैं।
  • इस सभ्यता के लोग पशु पूजा भी करते थे पूजा वाला सांड विशेष रूप से पूजनीय है।
  • बृक्ष पूजा में पीपल के बृक्ष की पूजा की जाती थी।
  • हड़प्पावासी सर्प पूजा भी करते थे ,तालाबों और नदियों की पूजा भी करते थे।
  • इस समय अग्निवेदिकाएँ भी मिली है जो सिद्ध करतीं है कि इस सभ्यता में अग्नि पूजा भी होती थीं।
MCQ::::::::
■हड़प्पा सभ्यता की मुहरें किसकी बनीं थीं?
१-सोना
२-चांदी
३-तांबा
४-सेलखड़ी
■हड़प्पा सभ्यता में चावल के प्रमाण किस स्थल से मिले हैं?
१-लोथल और रंगपुर
२-कालीबंगां
३-मोहन जोदड़ो
४-हड़प्पा
■मोहनजोदड़ो में सबसे बड़ी आकार की इमारत कौन सी है।
१-सभागार
२-अन्नागार
३-स्नानागार
४-इनमे से कोई नहीं

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