पुनुरुत्थान कालीन (Renaissance) फ्लोरेन्स के चित्रकार ,मासाच्चीयो,फ्रा एंजेलिको, बोत्तीचेल्ली

 पुनरुत्थान  कालीन  (Renaissance)  में फ्लोरेन्स के कलाकार मासच्चिओ, फ्रा एंजेलिको, पाउलो उच्चेलो।

पंद्रहवीं शती की फ्लोरेंस की कला प्राकृतिकता वाद की ओर अग्रसर हो गई  ,इसका सूत्रपात जियोत्तो द्वारा किया गया , आगे  यह विचारधारा दो भागों में बट गई एक मनोवैज्ञानिक दूसरी भौतिकी ,द्वितीय भाग की कला में तीन बातों पर बल दिया गया ,1-परिप्रेक्ष्य का अध्ययन2- शरीर का स्थिर व गतिपूर्ण  स्थितियोंइ अध्ययन 3-जड़ और चेतन वस्तुओं के तथ्यों की विवरणात्मकता।  पुनरुथान शैली की चित्रकला का आरम्भकर्ता मासाच्चीयो था 


मासाच्चिओ--- (Masaccio 1401-28)
मासाच्चीयो का जन्म 1401 में हुआ था इसकी प्रारंभिक शिक्षा कहाँ हुई ये ज्ञात नहीं है, मासाच्चीयो ने  ज्योत्तियो की कला प्रवृत्तियों में ज्योत्तो के कला कृतियों की तरह    की तरह है उसकी कलाकृतियों में जो  गढ़नशीलता और गठन  दिखाई देता है वो किसी समकालीन अन्य कलाकारों में नहीं है , मासाच्चीयो की विशाल भित्तिचित्र रचना ' द ट्रिनिटी'(The Trinity)  जो सांता मारिया नोवेल्ला के गिरिजाघर में  सुरक्षित है ,इसी भित्ति चित्र से ये जानकारी मिलती है कि इसमें शास्त्रीय स्थापत्य का विस्तृत  अध्ययन मिलता है क्योंकि इस चित्र में कुछ ग्रीक प्रकार के मेहराबों का अंकन  मिलता है साथ में इस चित्र में ऐसे प्रभाव उत्पन्न किये गए है जिससे पूरा चित्र सजीव लगने लगा है।
            मासाच्चीयो के दो अन्य चित्र विशेष प्रसिद्ध हैं उनमें से एक है उपासना गृह के वेदी का बहुफलक (multi  dimensional) चित्र। जो 1426 में पीसा के चर्च के लिए बनाया गया।
 , इस चित्र में फरिश्तों से घिरे हुए कुमारी व शिशु ईशा हैं यह चित्र लन्दन संग्रहालय में है इसमें शिशु ईशा का आभामण्डल गोल बृत्त के रूप में दिखाया गया है, साथ में फ़रिश्ते हाँथ में वीणा लिए खड़े हैं,  इसके    साथ ही मासाच्चीयो  के द्वारा एक विशाल भित्ति चित्र जो कार्माइन के चर्च में  चित्रित है इसमें नाटकीय मुद्राओं का आभाव है इसमें ज्योत्तो   के चित्रों की की तरह गढ़नशीलता मिलती है।
इस कलाकार ने अपने चित्रों में रेखा को पूरी तरह समाप्त कर कर केवल छाया प्रकाश के अनुसार रंगों का प्रयोग किया । मासाच्चीयो ने केवल सत्ताईस वर्ष की आयु में ही ख्याति प्राप्त कर ली थी ,उस समय 1422 में वह कलाकारों के संघ में सम्मिलित कर लिया गया था मासाच्चीयो की कला में स्थान,आकृति,घनत्व और परिप्रेक्ष्य ज्योत्तो की कला से मिलते थे ।मासाच्चीयो को आधुनिक कला के जन्मदाता के रूप में माना जाता है,मासाच्चीयो की शैली पूर्णतया यथार्थवादी थी उसने परिप्रेक्ष्य के जो नियम विकसित किये उसने चार सौ वर्ष तक कला को प्रभावित किया, उसने परिप्रेक्ष्य के अंतर्गत दूर की आकृतियों को केवल छोटा ही नहीं दिखाया बल्कि उनको धुंधला भी कर दिया। उस समय मासाच्चीयो की तुलना तत्कालीन मूर्तिकार दोनातेल्लो तथा उस समय के वास्तुकार ब्रुनालेशी से की जा सकती है।
1428 में मात्र 28 वर्ष की उम्र में इस चित्रकार की मृत्यु हो गई थी।

फ्रा एंजेलिको--

फ्रा एंजेलिको का प्रारंभिक चालीस वर्ष के जीवन के बारे में जानकारी का अभाव है,आरम्भ में उसकी कला में जियोत्तो और मासाच्चीयो की कला का प्रभाव मिलता है,उसने आकृतियों को बड़े आकार में चित्रित किया ,इसकी कला में जियोत्तो और मासाच्चीयो का प्रभाव पड़ा उसने चित्रों को बड़े आकार में चित्रित किया परंतु इसके चित्रों में परिप्रेक्ष्य में कुछ कमियां भी दिखती हैं ,इसने प्रकृति को कोमल रूप में चित्रित किया है इन्होंने खिलते रंग बिरंगे पुष्प, पर्वतों के ढलान, आदि को अंकित किया है इसकी आकृतियां ,रंग संयोजन इतने सरल है की कोई भी व्यक्ति आसानी से इन्हें समझ सकता है और आनंद ले सकता है।
  फ्रा एंजेलिको के कुछ अच्छे चित्रों में एक है मेडोन्ना का चित्र जो फ्लोरेंस में है,इन्होंने अपनी प्रसिद्धि पायी  1437 में  सेंट मार्को के कान्वेंट भवन में पचास के लगभग भित्ति चित्र अंकित  अंकित किये और  उपासना गृह में देवदूतों से घिरी मेडोन्ना को चित्रित किया , इसके कुछ प्रसिद्ध चित्र हैं 1- मिस्र को पलायन 2 - कुमारी का अभिषेक 3 - भविष्यवाणी 4 -देवदूत संगीतज्ञ 5 -अंतिम न्याय ।

 पाओलो उच्चेलो--- 

पाओलो उच्चेलो को प्राचीन ग्रंथों में  परिप्रेक्ष्य का आविष्कर्ता भी कह दिया गया,1425 में ,स्थितिजन लघुता में  उसके प्रयोग वाली दो पेंटिंग है इनमे पहली भित्तिचित्र  एक अश्वारोही का भित्ति चित्र दूसरी पेंटिंग का नाम है चार धर्मदूत है,1445 में उसने अपना एक प्रसिद्ध चित्र प्रलय बनाया । उच्चेलो को अपने युग का वैज्ञानिक भावना का प्रतिनिधि चित्रकार कहा जाता है।
 फ्रा फिल्लिपो लिप्पी---  
फ्रा फिलिप्पो लिप्पी एक अनाथ  बालक था ,इसके चित्रों में   1430 ईस्वी  तक  तो मासाच्चीयो का प्रभाव रहा,फ्रा फिलिप्पो लिप्पी  के चित्रों में यद्यपि, पृष्टभूमि,अग्रभूमि  बहुत स्पष्ट रहती है ,तथापि वह पूरे चित्र में अलंकारिक प्रभाव को सर्वोपरि रखता था,लिप्पी ने अपने चित्रों में धार्मिक वेशभूषा को  चित्रित किया, लिप्पी ने धर्म के आधार पर ही चित्र बनाये  उसने बौद्धिकता से बचने का प्रयास किया, लिली और डेजी के पुष्प को सबसे  अच्छे ढंग से इसी ने चित्रित किया। लिप्पी ने धार्मिक चित्रों के पात्रों के चित्रण के लिए अपने पड़ोसियों को चित्रित किया, लिप्पी के चित्रों ने पचास वर्ष तक न सिर्फ चित्रकारों को प्रभावित किया बल्कि मूर्तिकारों को भी प्रभावित किया। कुमारी की वेशभूषा इस प्रकार का एक चित्र है जो पचास वर्ष तक चित्रकारों के लिए प्रेणना स्रोत था।
आंद्रिया देल कस्तानो---(1423-1457)
फ्लोरेंस के कलाकारों में  प्रतिभाशाली चित्रकार ने  ,अपने चित्रों में दोनातल्लो के मूर्तिकला के प्रभाव को चित्रित किया ,  वास्तव में कस्तानो ने दोनातेललो के मूर्तिशिल्प शैली को मूर्ति शिल्प  शैली को  चित्रकला में प्रयुक्त किया।ग्रुप व्यक्ति चित्रों के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ ,इसने जो व्यक्ति चित्र बनाये उनमें प्रसिद्ध  व्यक्तियों के व्यक्ति चित्र बनाये कैसे दांते का व्यक्ति चित्र ,पेट्रार्क का व्यक्ति चित्र ,दाऊद तथा अंतिम भोजन को उसने चित्रित किया
पियरो देला फ्रांसेस्का (Piero Della Francesca 1410 -92)
 इनका जन्म 1439 में  टस्कनी के छोटे से गांव में हुई थी,  इसकी आकृतियों में गंतीय पूर्णतः थी जो निकट और दूर की आकृतियों में अनुपात एवं रिक्त स्थानों का उत्तम प्रभाव प्रस्तुत किया ,रेखांकन ,परिप्रेक्ष्य ,वातावरण तथा छाया प्रकाश  का उसे अच्छा ज्ञान था  । इनके द्वारा निर्मित चित्र संत जेरोम का है जो 1450 में बना और इस समय बर्लिन संग्रहालय में है,उसने ईसा का पुनः जीवित होना ,उर्बिनो ड्यूक ,डचेस एवं मित्रमंडली का एक द्विफलक चित्र अंकित किया ,उसने उर्बिनो के ड्यूक और  मेडोन्ना का है दूसरा चित्र ईसा के जन्म का है,उसने दो पुस्तक  परिप्रेक्ष्य की समस्या एवं चार नियमित  शरीर नमक दो पुस्तकें लिखी ,अंत में वह अंधा हो गया "कला के विज्ञान का सम्राट" कहकर उसकी प्रशंसा की गई।
सांद्रो बोत्तीचेल्ली ( Sandro Botticelli 1445 -1510)
यह फिलप्पो लिप्पी का शिष्य था , इस कलाकार का वास्तविक नाम अलेसेन्द्रो फिलिपेपी था यह फिलिप्पो लिप्पी का शिष्य था और पंद्रहवीं सती  के अंत में  फ्लोरेन्स में कार्य करने वाला अकेला ही,यह कलाकार घिरलैंडयो के समकालीन  था ,  मार्स  और वीनस  , प्राइमावेरा, वीनस का जन्म उसकी ऐसी कलाकृतियां हैं ।
       प्राइमावेरा चित्र में प्रेम की देवी वीनस बसंत का स्वागत करते  प्रतीक्षा कर रही है,उसके ऊपर आकाश में कामदेव हैं जो दाहिनी और खड़ी तीन सुंदरियों के ऊपर शर-संधान कर रहा है ,निकट ही  देवताओं के सन्देश वाहक बुद्ध खड़े हैं,  चित्र के दाहिनी ओर तेज वर्ण वाले वाले जेफ़र आगे बढ़ा रहे हैं, इस प्रकार प्राचीन यूनानी विषयों के प्रति झुकाव भी इस चित्र से प्रकट होता है ।


 'वीनस का जन्म' शीर्षक के चित्र के मध्य में कोमलांगी कामिनी के रूप में प्रेम की देवी वीनस को  समुद्र से प्रकट होते दिखाया गया है,देवगण उसके निकट है कोई उसके प्राण फूंक रहा है कोई उसे वस्त्र दे रहा है।
1481-82  में बोत्ति चेल्ली रोम गया और घिरलैंडयो के साथ वेटिकन के के  सिस्टाइन चैपिल में भी भित्ति चित्र अंकित किये।
वेरोच्चियो (1435 -1488) --

     चित्रकार के साथ यह मूर्तिकार और स्वर्णकार भी था,        उसका एक मात्र चित्र ईशा का  बपतिस्मा         उसके ऊपर लियोनार्डो ,पेरुजिनो तथा घरलैंडयो का प्रभाव बढ़ा । वेरोच्चियो की कला में गहरी खींची गई  रेखा का गुण है ।
 पेरुजिनो(1455-1523) 
पेरुजिनो  राफेल का गुरु था और फ्रांसेस्का का शिष्य था यह इटली का सर्वोच्च कलाकार था, उसकी महान  कृतियाँ थी ,संत माइकल तथा पवित्र परिवार।
लूका सिंगनोरेल्ली ----
सिग्नरेल्ली का प्रसिद्ध चित्र" संसार का अंत ' जिसने नग्न  स्थूल मानव आकृतियों को  अनेक शक्तिशाली  एवं भयानक मुद्राओं में अंकन किया,उसने एक चित्र जिसका नाम Entombment रखा इसमें उसने अपने मृत पुत्र की तश्वीर को जोड़ दिया यह चित्र इस समय  कार्टोना में है।
 दोमनिको घिरलैंडयो(1449-1494) 
 फ्लोरेन्स में इसने एक ऐसा हार बनाया था जिसकी मांग हर महिलाओं में थी , इसलिए इसको उसके नाम दोमनिको की जगह हारवाला पुकारा गया , बाद में उसने चित्रकला की शुरुआत की उसके प्रसिद्ध चित्र
बालक और बृद्ध , कुमारी का जन्म
लेओनार्दो द विंची----
ये सिर्फ कलाकर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व मे महान विभूति थे,उन्होंने उस समय अपने कल्पना से कई रेखा चित्र बनाये जो उस समय खोजे भी नही गए थे , जैसे रक्त परिभ्रमण,युद्ध मे काम आने वाली सशस्त्र गाड़ी,अनेक प्रकार के वायुयान पनडुब्बियों की कल्पना करके रेखाचित्र बनाये,किंतु वह किसी भी खोज को पूरी तरह धरातल में नहीं ला पाए,यह धीरे धीरे काम करने वाले कल्पनाशील कलाकार थे,वह चित्रों का वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद में बनाते थे,वह किसी भी प्रकार से धर्म से दूर रहते थे पर धार्मिक चित्र बनाये,उन्होंने दृश्य चित्र, वस्त्रों की सलवटों को नवीन ढंग से प्रस्तुत करने,तैल चित्रण संबंधी अनेक प्रयोग किये।

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