Sindhu ghati sabhyata utpatti aur vistaar,सिंधु घाटी सभ्यता :उत्पत्ति और विस्तार



Sindhu ghati sabhyata utpatti aur vistaar,सिंधु घाटी सभ्यता :उत्पत्ति और विस्तार
:सिन्धु घाटी से प्राप्त मुहर:


   सिन्धु घाटी सभ्यता :उत्पत्ति और विस्तार


विश्व की प्राचीन सभ्यताएं नदी घाटियों में विकसित हुईं, मिस्र की सभ्यता  जो नील नदी के किनारे थी ,मेसोपोटामिया की सभ्यता जो दजला फ़रात नदियों के संगम में थी,भारत मे विकसित नदी घाटी सभ्यता जो क़रीब ईशा पूर्व 3 हजार साल पहले पूर्णतया विकसित हुई थी , हालांकि   विद्वानों में  इसके समय काल के लेकर अलग अलग राय है  और रेडियो कार्बन  विधि द्वारा  इसकी  समय सीमा 2300-1750 ईसा पूर्व निर्धारित की गई है ,ये सभ्यता सिन्धु नदी के किनारे पल्लवित हुई सभ्यता पूर्णतयः मिट्टी में दबी थी , आम लोगों के प्रकाश में तब आई जब चार्ल्स मेस्सन ने 1826 इस ऊंचे टीले को का उल्लेख किया, इसी प्रकार रेल पथ निर्माण के समय जब इस जगह से कुछ प्राचीन सामाग्रियां मिलीं  , तब अलेक्जेंडर  कनिंघम जो पुरातत्व वेत्ता थे ,उनको 1875  में एक  लिपिबद्ध मुहर भी प्राप्त हुई  , इसके बाद भी ये क्षेत्र कई साल उपेक्षित रहा। 1921 में सर जान मार्शल जब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक थे , राय बहादुर दयाराम साहनी ने इस स्थल का पुनः 1923-24 और 1924-25 के दौरान उत्खनन कार्य करवाया।

   मोहनजोदड़ो जिसका सिंधी भाषा मे अर्थ मृतकों का टीला है , की खोज राखाल दास बनर्जी ने की ,एन जी मजूमदार ने 1931 में मोहनजोदड़ो नामक स्थान से 128 किलोमीटर  दक्षिण पूर्व में चन्हूदड़ो नामक स्थान उत्खनन कार्य किया,इसके अलावा इस क्षेत्र के आसपास कई जगह में  पुरातात्विक खुदाइयों से सामग्रियां प्राप्त हुईं , बलूचिस्तान, सिंध, पंजाब,दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश का दोआब ,जम्मू,गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र  में कई जगह पुरातात्विक सामग्री प्राप्त हुई है दक्षिणी बलूचिस्तान में सुतकागेंडोर, सोत्काकोह तथा बालाकोट प्रसिद्ध पुरास्थल है, सिंध प्रांत में मोहनजोदाड़ो,चन्हूदड़ो,कोटदीजी, आमरी के पुरास्थल हैं,पंजाब में हड़प्पा के अतिरिक्त डेरा इस्माइल खान ,सरायखोला स्थल है यदि भारतीय हिस्से के पंजाब की बात करें तो पंजाब में रोपड़,कोटला निहंग खान, रोपड़, संघोल जैसे स्थल हैं हरियाणा में  ,राखीगढ़ी,बनावली,मित्ताथल,उत्तर प्रदेश में आलमगीरपुर ,हुलास(सहारनपुर जिले) स्थल,राजस्थान में कालीबंगन,गुजरात मे रंगपुर,लोथल,रोजदी,सुरकोतड़ा,भोगत्रार, जम्मू कश्मीर में  माण्डा। इस प्रकार इस सभ्यता के  एक हजार स्थलों की खोज हो चुकी है , इस  सभ्यता के हर  स्थल में नगरीय नियोजन की समानता , मुहरों में समानता, मृण्मूर्तियों की समानता , बांट माप में समानता दिखती है ,इसी समानता के के कारण ये "नगरीय और कांस्ययुगीन सभ्यता "कहलाती है।
         हड़पा  सभ्यता का वीकास नव पाषाण काल के बाद धीरे धीरे हुआ , इस सभ्यता युग को धातु प्रस्तर युग (chalcolithic Age) भी कह सकतें हैं ,क्योंकि इस काल मे कांस्ययुगीन उपजरण के साथ साथ कुछ घरेलू सामान पत्थर के भी प्रयोग में लाये जाते थे । इस सभ्यता के सभी स्थल नगर नही थे बल्कि अनेक ग्राम या कस्बे थे जो मुख्यता कृषि कार्यों से हटकर व्यापार पर निर्भर थे , सिन्धु सभ्यता में सिर्फ बड़े नगर ही नही थे बल्कि छोटे कस्बे  भी थे ,जो बड़े नगरों मोहनजोदड़ों जैसे बड़े मंडियों को समान  लाते और भेजते  होंगे। इस सभ्यता में व्यक्ति गणित और लिपि,विज्ञान ,तकनीकी ज्ञान से  सुनियोजित भवन निर्माण योजना और नगर निर्माण योजना  की तरफ़  ध्यान दिया और उसको धरातल में उतारने में सफल हुए, जिससे उस समय चौड़ी समानांतर सड़को बाले नगर विकसित हो सके।

       विस्तार------

यह क्षेत्र त्रिभुजाकार है उत्तर में जम्मू से दक्षिण में नर्मदा तक पश्चिम में बलूचिस्तान से मकरान तट तक है, इस सभ्यता का विस्तार उत्तर दक्षिण 1100 किलोमीटर था।
इस  सभ्यता के फैलाव में देखे तो पूर्व में आलमगीरपुर  से पश्चिम में सुतकागेंडोर है दोनों स्थलों के बीच की दूरी करीब 1600 किलोमीटर है, सम्पूर्ण सैंधव स्थल का क्षेत्रफल बारह लाख पंद्रह हजार वर्ग किलोमीटर है, उस समय विश्व मे अन्य सभ्यताएं जैसे मेसोपोटामिया की सभ्यता, मिस्र की  सभ्यता, चीन की सभ्यता भी थी ,परंतु किसी भी सभ्यता का इतने अधिक क्षेत्रफल में विस्तार नहीं था , सैंधव सभ्यता  तत्कालीन मेसोपोटामिया की सभ्यता , मिस्र की  सभ्यता से  भी ज्यादा विस्तृत थी मिस्र और मेसोपोटामिया के लगभग दुगुने क्षेत्र  में हड़प्पा संस्कृति फैली थी , सम्पूर्ण सैंधव सभ्यता बारह लाख पंद्रह हजार वर्ग  किलोमीटर था। हडप्पा संस्कृति प्रारम्भ में  सिन्धु नदी के तट पर ही बसी पर धीरे धीरे सिंधु वासी कृषि , उद्योग, और व्यापार के उद्देश्य से सिन्धु से बाहर भी बस्तियों का विकास किया।

 सिन्धु सभ्यता का उद्भव----

 हड़प्पा संस्कृति के इतने विस्तृत क्षेत्र में फैलाव होने के बावजूद  इस संस्कृति के उद्भव के संबंध में विद्वानों के अलग अलग मत हैं , हड़प्पा सभ्यता के उद्भव और पतन के संदर्भ में आरंभ से विवाद बना रहा , और इसका कारण था इस काल की आवश्यक अध्ययन सामग्रियों की कमी थी इस काल के साहित्यिक साक्ष्य तो हैं ही नही पुरातात्विक साक्ष्य भी हैं वो अपर्याप्त हैं,इस लिए शुरुआत में इसकी उत्पत्ति में मेसोपोटामिया सभ्यता के  सम्पर्क से उद्भव की अवधारणा का विकास हुआ  यानी इस सभ्यता का उद्भव अचानक हुआ , किंतु आधुनिक शोधों से इस अवधारणा को अस्वीकार कर दिया गया है।

  मेसोपोटामिया सभ्यता के सम्पर्क से प्रभाव---


डी डी कौशाम्बी, गार्डन चाइल्ड, मार्टिमर व्हीलर,मैके , क्रेमर जैसे विद्वानों के अनुसार सिंधु सभ्यता का विकास मेसोपोटामिया सभ्यता से हुआ है।
       व्हीलर नामक विद्वान के अनुसार  'भारत ने  शहर निर्माण का  आईडिया मेसोपोटामिया से सीखी, व्हीलर ने ये नही कहा कि जनसंख्या मेसोपोटामिया से आकर हड़प्पाई क्षेत्र में बसी, बल्कि  नगरीय निर्माण  के विचारों का प्रवाह पश्चिम मेसोपोटामिया से पूरब की संस्कृति हड़प्पा की तरफ हुआ।
  गार्डन नामक विद्वान के अनुसार , हड़प्पा के शहर के विकास के लिए  मेसोपोटामिया  से आये विदेशी  लोगों  की  भूमिका है , जो समुद्र के रास्ते आये उन्होंने बलूच ग्राम  संस्कृतियों में मेसोपोटामिया के समान उन्नत संस्कृति और मजबूत आर्थिक ढांचे को तैयार करके उन गांवों को उन्नत करके कस्बे के रूप में तब्दील किया ।
   डी डी कौशाम्बी का मानना है कि मिस्र, मेसोपोटामिया और हड़प्पा संस्कृति के एक ही निर्माता थे।
      मेसोपोटामियाई उत्पति की अवधारणा को सही सिद्ध करने के लिए उन्होंने तर्क दिए हैं उनके अनुसार  मोहनजोदाड़ो के  अन्नगारों के निर्माण में गढ़ी और बुर्ज के निर्माण में लकड़ी के शहतीर का प्रयोग किया गया जो मेसोपोटामिया क्षेत्र की विशेषता थी , इसी प्रकार सिन्धु क्षेत्र में कई जगह कच्ची ईटों का प्रयोग भी हुआ जो बहुतायत में मेसोपोटामिया में होता था।
 इसी प्रकार व्हीलर एक  और तर्क प्रस्तुत करतें हैं  कि बलूचिस्तान के कुछ जगहों में   कृत्रिम चबूतरें पाए गए हैं, व्हीलर के अनुसार  ये मेसोपोटामिया के जिगुरेत के अवशेष हैं ।
     इस मेसोपोटामिया से उद्भव  के तर्क को खंडित करने के लिए कई  अन्य तर्क दिए गए  हैं ।                1-  हड़प्पा के नगर सुनियोजित बसाए गए वहीं मेसोपोटामिया के नगर बेतरतीब बसे थे।
 2-सिन्धु सभ्यता में मुख्यता पकाई  गईं ईटों का प्रयोग हुआ वहीं मेसोपोटामिया में कच्ची ईटों का प्रयोग हुआ।
 3-मेसोपोटामिया की लिपि और सिन्धु लिपि  बिल्कुल भिन्न थीं ,जहाँ मेसोपोटामिया कील नुमा लिपि थी वहीं सिन्धु लिपि सांकेतिक लिपि थी।
 4- हडप्पा लिपि में जहां 400 चिन्ह हैं वहीं मेसोपोटामिया की लिपि में 900 चिन्ह हैं
 5-सिन्धु में मंदिरों और पुरोहितों का महत्वपूर्ण योगदान था जबकि सिन्धु क्षेत्र में मंदिरों का अस्तित्व संदेहास्पद है।
 6- दोनों सभ्यताओं के मृदभांडों ,मूर्तियों,और मुहरों में अंतर है जहाँ हड़प्पाई मुहर वर्गाकार और  आयताकार हैं ,वहीं मेसोपोटामिया की मुहरें बेलनाकार हैं।

     वैदिक आर्यों ने इस सभ्यता का निर्माण किया---???-------- 

टी एन रामचन्द्रन,के एन शास्त्री, पुसलकर, एस आर  राव आदि विद्वान वैदिक आर्यों को ही  सैंधब सभ्यता का निर्माता मानते हैं,परन्तु  अनेक विद्वानों ने इस अवधारणा  को  दोनों  संस्कृतियों में  पर्याप्त अंतर होने के कारण स्वीकार नही । सिंधु सभ्यता के अधिकतर स्थल सिन्धु नदी के किनारे हैं वहीं  आर्यों का प्रसार सिंधु नदी के आसपास हुआ ,वेदों में बिपाशा यानी ब्यास नदी ,  शतुद्री यानी सतलज का उल्लेख मिलने से दोनों सभ्यतयों में स्थान साम्यता दिखती है अंतर इस प्रकार दिखता है।
 1) वैदिक आर्यों की सभ्यता  ग्रामीण एवं कृषि प्रधान थी ,जबकि सैंधव सभ्यता नगरीय एवं व्यापार व्यवसाय प्रधान थी,आर्यों के मकान  घासफूस  तथा बांस की सहायता से बनते थे ,किंतु सैंधव लोग इसके लिए पक्की  ईंटों का प्रयोग करते थे।
2)जहां सैंधव सभ्यता के निर्माता पाषाण और कांसे के उपकरणों का प्रयोग करते थे और लोहे से परिचित नही थे, जबकि  वैदिक आर्य लोहे से परिचित थे और लोहे का  प्रयोग भी करते थे।
3)वैदिक आर्य इंद्र वरुण आदि   देवताओं की उपासना करते थे, आर्य यज्ञ द्वारा देवताओं का आव्हान करते थे ,आर्य  लोग मूर्तिपूजा नहीं करते थे,जबकि सैंधव लोग मातृ देवी और शिव के उपासक थे,और मूर्तिपूजा के समर्थक थे।
4)  जहां आर्य  लोग अश्व पालते थे , अश्व का प्रयोग युद्धों में करते थे, वहीं सिन्धु के लोग अश्व से परिचित नहीं थे , सिन्धु सभ्यता  से प्राप्त मुहरों में बाघ और हांथी का अंकन से प्रतीत होता है कि सैंधव  वासी इन दो जानवरों से परिचित थे, जबकि वैदिक आर्यों को  बाघ और हांथी का  ज्ञान नही था ।
5) सैंधव वासी  बृषभ को पवित्र मानते थे वहीं आर्य लोग गाय को पवित्र मानते थे।
6) सैंधव निवासियों के प्रति अपनी एक लिपि थी ,जबकि आर्य लिपि से परिचित नहीं थे,

  द्रविण संस्कृति से उद्भव की अवधारणा--

अनेक विद्वान सिन्धु घाटी सभ्यता के लोंगों  के अस्थिपंजरों की संरचना  को देखने पर भूमध्यकालीन प्रजाति से सम्बद्ध माना है, और द्रविण  संस्कृति भी भूमध्यसागरीय  प्रजाति से जुड़ी है , प्रमाणों के आधार पर  द्रविणों को सिन्धु सभ्यता का संस्थापक माना ,वो मानते हैं कि द्रविणों का पहले सिंधु क्षेत्र के निवास था,जो बाद को उस स्थान को त्याग दिया।
     द्रविण उत्पत्ति का सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी ये है कि सिन्धु सभ्यता जहां नगरीय सभ्यता थी वही द्रविण सभ्यता पूर्णतया ग्रामीण सभ्यता थी।इसलिए सिन्धु सभ्यता को  द्रविण सभ्यता मानना उचित नहीं है।
 

 बलूचिस्तान की ग्राम संस्कृतियों से सिन्धु सभ्यता का उद्भव-------------

     बलूचिस्तान में कई स्थलों की ख़ुदाई के बाद उनमे अलग अलग समय की बस्तियां मिलीं  , जिनके आधार पर कुछ विद्वानों ने ये निष्कर्ष निकाला कि सिन्धु सभ्यता का विकास समय के साथ धीरे धीरे हुआ,इनमे पहले सीमित कृषि  फिर उन्नत कृषि फिर स्थाई ग्राम्य संस्कृति फिर आगे इस ग्राम्य संस्कृति का नगरीकरण में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देता है।
    फेयर सर्विस और रोमिला थापर जैसे विद्वानों की मान्यता है कि किली गुल मुहम्मद, राणा घुण्डाई ,चन्हूदड़ो ,हडप्पा,आमरी,कोटदीजी, आदि अन्य स्थलों के उत्खनन से इस बात के प्रमाण  मिले हैं कि हडप्पा संस्कृति के  विकास से पूर्व ही इनमे सभ्यता का विकास हो चुका था , फेयर सर्विस का मानना है कि ईरानी बलूची ग्राम्य संस्कृतियों का योगदान था इन बस्तियों के क्रमिक विकास में।
  फेयर सर्विस ने पांच चरण बताए कि कैसे हड़प्पा बस्तियों के क्रमिक विकास हुआ।
  पहले चरण में वो वो क्वेटा, बलूचिस्तान मुण्डीगाक आदि स्थलो के उत्खनन से प्राप्त सामग्रियों से  3300  ईशा पूर्व वैसे लोगो का निवास पाते है जो सिर्फ पशुपालन करते थे और कच्ची बस्तियों में रहते थे, ये प्रवास भी अस्थाई होते थे।
 दूसरे चरण में पेरियानो घुण्डाई,किली गुल मुहम्मद नाल मुण्डीगक स्थलों से  उत्खनन से प्राप्त होता है कि  बड़े भवन बनने लगे  और उसमें  कच्ची ईंटों  के साथ ,पत्थरों का प्रयोग होने लगा,मिट्टी के बर्तन चाक के बजाए हाँथ से निर्मित होने लगे   बर्तनों में ज्यामिति चित्र बनाये जाने लगे ,  शवों  को कब्र में दफनाया जाने लगा,
 तृतीय चरण  से सम्बंधित प्रमुख स्थल, मुंडिगक ,डम्बसदात, पेरियानो घुण्डई ,कुल्ली नाल,सिंध में एमए मोहनजोदाड़ो कोटदीजी  और राजस्थान में सोथी और कालीबंगा। कृषि योग्य भूमि का अधिक से अधिक उपयोग किया गया, बलूचिस्तान और सिंध में पत्थर के बाँध बनाये जाने के तकनीकी का विकास हुआ जिससे लोग जलोढ़ मैदानों में लोग आकर बसने लगे ,कोटदीजी में इस चरण में बस्तियों के घिरे होने के प्रमाण मिलते हैं, पत्थर के अतिरिक्त तांम्बे और कांसे का व्यवहार भी हुआ ।
   चतुर्थ काल यानी 
-नगरीकरण का काल

 यह काल पिछले चरण में थोड़ी थोड़ी विकास क्रम की अवस्था से पूर्ण विकसित अवस्था है ,इस चरण में नगर की सुनियोजित व्यवस्था, जल निकासी की व्यवस्था, आभूषण ,एक लिपि के विकास के प्रमाण मिलतें हैं।
      अमलानन्द घोष नामक विद्वान के अनुसार भारत मे रहने वाले लोंगों ने अपने तर्क ज्ञान के आधार पर क्रमिक रूप से सुधार करते करते विकसित हड़प्पीय संस्कृति का विकास किया। घोष का मानना है भारत के लोंगों ने मेसोपोटामिया की विशेषताओ को यहां पर आप के तर्क ज्ञान द्वारा  सुमेर से उन्नत नगरों का निर्माण किया।

 निष्कर्ष--- 

निष्कर्ष स्वरूप हम ये कह सकतें हैं कि सिन्धु सभ्यता का विकास आर्य  सभ्यता या द्रविण सभ्यता हुआ  इस प्रश्न   हम कह सकते हैं कि दोनों सभ्यता  में सिंधु सभ्यता  से  बहुत ज्यादा अंतर होने के कारण  इन     सभ्यता से नही जोड़ सकते , मेसोपोटामिया से लोग आकर बसे  तो भी ग़लत कहना होगा क्योंकि मेसोपोटामिया और हडप्पा सभ्यता में दो तीन समानताओं के साथ असमानता अधिक दिखती है , यदि ईरानी बलूची ग्राम्य संस्कृति के क्रमिक विकास को देखतें है तो ये पातें है कि सैंधव सभ्यता इसी से ग्राम विकास के फलस्वरूप  विकसित हुई। क्योंकि ईरानी बलूची बस्तियों में सिन्धु सभ्यता में पाई जाने वाले मुहरों की संरचना ,मकानों  की संरचना आदि जगह में बहुत कुछ क्रमिक विकास दिखाई देता है।

इस पोस्ट को भी पढ़ें:-सैंधव सभ्यता का आर्थिक जीवन

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