CRPF का full form क्या है ,CRPF क्या है

CRPF का full form
Centre reserve police force सी आर पी एफ सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है यह 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेन्टेटिव पुलिस के रूप में अस्तित्व में आया था , परंतु भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल बना और तब से इस बल की क्षमताओं और ताकत में बहुत ज़्यादा बृद्धि हुई है। इस समय इस फ़ोर्स में 195 एक्सक्यूटिव बटालियन,02 आपदा प्रबंधन  बटालियन, 3 महिला बटालियन,10 आर ए एफ  बटालियन,05  सिंगनल बटालियन,10 कोबरा बटालियन,1 स्पेशल ड्यूटी ग्रुप,1 पार्लियामेंट ड्यूटी ग्रुप,40 ग्रुप सेण्टर,15 प्रशिक्षण संस्थान सहित कुल 226 बटालियन हैं, यह गृह मंत्रालय के अंतर्गत आदेशित होता है।
      सी आर पी एफ की प्राथमिक भूमिका, कानून व्यवस्था बनाये रखने में राज्यों की पुलिस कार्यवाही में सहायता करना,नक्सल पभावित राज्यों में नक्सल विरोधी कार्यवाही और विद्रोह के रोकथाम में राज्य की सहायता करना। निष्पक्ष चुनाव करवाने में सी आर पी ऍफ़ की तैनाती होती है, संसद भवन की रक्षा के लिए 2001 में इसकी तैनाती हुई। इसके अलावा वैष्णो मन्दिर की सुरक्षा  के लिए भी तथा कई अन्य महत्वपूर्ण प…

Gupt kaleen sanskrit ,sahity, art -गुप्त काल की संस्कृति 300 ईस्वी से 600 ईस्वी तक

      

        *** गुप्त कालीन संस्कृति***



गुप्त काल का समय  300 ईस्वी से 600 ईस्वी तक रहा है ,इस समय हिन्दू धर्म ग्रन्थो में ,ज्ञान विज्ञान ,कला साहित्य में अत्यधिक उन्नति हुई इसीलिए गुप्तकाल को स्वर्णयुग कहा जाता है।

        गुप्त कालीन धर्म........

 गुप्त काल में धार्मिक दृष्टीकोण से पुनुरुत्थान हुआ  ,इस समय मन्दिरों और मूर्तियॉ बनी, इसी समय पौराणिक धर्म  हिंदू धर्म की स्थापना हुई,इस समय वैष्णव धर्म प्रधान धर्म बन गया ,अधिकांश गुप्त सम्राटों ने इसी धर्म को अपनाया और स्वयं  स्वयं परम भागवत की उपाधि धारण की तथा अपने सिक्कों पर शंख ,चक्र ,गदा ,पद्म की आकृतियां बनवाईं,    गुप्त शासकों  के संरक्षण  के कारण ही  वैष्णव धर्म   न  केवल भारत तक रहा बल्कि ये पूरे दक्षिण पूर्व एशिया , कंबोडिया ,इंडोनेशिया तक फ़ैल गया। विष्णु की अनेक मूर्तियां बनीं अनेक मन्दिर बनें , विष्णु को अनेक अवतारों के रूप में चित्रित किया , विष्णु के 24 अवतारों की मूर्तियां मन्दिरों में उकेरी गईं।
              इस काल में वैष्णव मत के आलावा शैव मतावलंबी हुवे शैव सम्प्रदाय का विकास हुआ , कालिदास की रचनाओं में काशी के विश्वनाथ ,उज्जैन के महाकाल के ज्योतिर्लिंग का  उल्लेख    मिलता है  ,  वायु पुराण में शिव की महिमा का वर्णन मिलता है ,  वामन पुराण में कापालिक , पाशुपत, वीरशैव संप्रदाय का उल्लेख मिलता है   , गुप्त काल के  सामंतों और पदाधिकारियों नें  इस मत को संरक्षित किया ,शिव की विष्णु के एक साथ पूजा के लिए हरिहर के मूर्ति निर्माण का वर्णन  मिलता है ,वहीँ अर्धनारीश्वर की पूजा का उल्लेख मिलता है।
        शिव भक्ति के अलावा सूर्य पूजा ,  शक्ति पूजा ,नागपूजा का  उल्लेख मिलता है।
         इस समय पूजा पद्धतियों में तीर्थयात्रा ,यज्ञ पूजा, ब्रत, दान ,और विभिन्न अनुष्ठान का वर्णन मिलता है।
              ब्राम्हण धर्म के अलावा जैन और बौद्ध धर्म भी इस काल में विकसित हुए  ,   इस समय बौद्ध धर्म का केंद्र मथुरा कौशाम्बी और  सारनाथ में था ,महायान शाखा का प्रचार अधिक हो रहा था ,कश्मीर में बौद्ध धर्म अधिक पैर जमाये था  ,  बौद्ध धर्म को व्यापारियों ,  शिल्पियों ने ने कई चैत्य और विहार बनवाये और बौद्ध मूर्तियों को बनवाया साँची लेख से जानकारी मिलती है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के मंत्री आम्रकादव नामक बौद्ध भिक्षु को प्रशासन में जगह दी ,और साँची के बौद्ध विहार के लिए दान दिया।
          इस समय जैन धर्म छोटे से क्षेत्र में फैला हुआ था ,मथुरा और वल्लभी श्वेताम्बर   जैन  मत का केंद्र  था  और  पुण्ड्रवर्धन दिगंबर सम्प्रदाय का केंद्र था ,  व्यापारियों  द्वारा   इस धर्म को संरक्षित किया जाता था।

        गुप्तकालीन कला.....

गुप्त काल में स्थापत्य ,मूर्तिकला , एवं चित्रकला एवं अन्य विविध कलाओं का उत्थान हुआ  इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता   भव्य  मन्दिर निर्माण   ,धर्म का गहरा सम्बन्ध स्थापत्य और मूर्तिकला से था भक्ति के सिद्धान्त  के कारण भगवान् की मूर्तियों को एक गर्भगृह में मन्दिर में स्थापित किया गया,गुप्त काल के अनेक मन्दिर आज भी देश के भिन्न भिन्न भागों में आपको दिख जायेंगे इनमे एक देवगढ़  (झाँसी  ,ललित पुर) का दशावतार मन्दिर   जो एक विष्णु मन्दिर है,  तिगावा ,भुमरा, लाड़ खान  ,साँची के मन्दिर ,भीतरगाँव का मन्दिर ,ये मन्दिर ईंटो और पत्थरो के बने हुए है इनमे साँची के चैत्य के बाईं तरफ बना मन्दिर सबसे पुराना गुप्त मन्दिर है , इन मन्दिर के चारो कोनो पर चार और  अकार में मुख्य मन्दिर से छोटे मन्दिर बनते थे जो पंचायतन शैली कहलाती है इस शैली का प्रारंभिक मन्दिर दशावतार का विष्णु मंदिर , देवगढ़



ये मन्दिर अधिकांश विष्णु मन्दिर हैं ,जैसे भीतरगाँव का  लक्ष्मण मन्दिर ,  भीतरगाँव का ये मन्दिर  पूरी तरह पकाई गई ईंटों से बना है , इसमें एक शिखर है , मन्दिर के प्रवेश द्वार में मेहराब ( arch)  का प्रयोग हुआ है ,जो विश्व में  पहली बार इस मेहराब प्रणाली से बनी संरचना है , इस मन्दिर के आसपास विष्णु, राम, कृष्ण की आकृतियां ,देव ,गन्धर्व की आकृतियां  टेराकोटा विधि से बनी हुई  हैं
:भीतरगाँव का ईंट का मन्दिर:


         , देवगढ़ का   दसावतार मन्दिर, तिगवां का विष्णु मन्दिर ,  सिरपुर का लक्ष्मण मन्दिर ,एरण का वराह मन्दिर आदि,   इनमें  देवगढ़ का दसावतार मन्दिर श्रेष्ठ  है, यह मन्दिर पंचायतन श्रेणी का है इसमें  12 मीटर  ऊँचा शिखर था ,इस मन्दिर में चार मण्डप भी हैं , इसके स्तम्भ में कृष्ण और राम के अवतार सुसज्जित हैं,
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       इस काल में स्तूप , चैत्य और विहार का भी निर्माण हुआ, सारनाथ का धमेख स्तूप ( उत्तर प्रदेश के  वाराणसी में) ,रत्नागिरी (उड़ीसा में ) और मीरपुर खान (सिंध) में पाये गए है     गुफाओं के निर्माण में पुरानी परंपरा जारी रही शिलाखंड गुफाओं में अजंता और एलोरा ( महाराष्ट्र),बाघ (मध्य प्रदेश) तथा उदयगिरि (उड़ीसा) हैं  , मन्दिरो के निर्माण में कई विशेषतायें थीं जैसे चपटी छत का वर्गाकार मन्दिर ,आयताकार मन्दिर, बृत्ताकार मन्दिर ,वक्ररेखीय शिखर युक्त  वर्गाकार मन्दिर   । 
                       
         इस काल में विष्णु की शेषशैय्या मूर्ति,शिव की विभिन्न रूपों में मुर्तिया ,इस काल में बुद्ध की मूर्तियां भी लुभावनी है  जिसमें सारनाथ की बुद्ध की मूर्ति जो खड़ी मुद्रा में है ,ब्राम्हण धर्म की मूर्तियों में सबसे अच्छी मूर्ति उदयगिरि गुफ़ा के द्वार में बनी बारह की मूर्ति । यदि बात धातु मूर्तियों की करें तो गुप्त कालीन मूर्तिकारों ने सिरे (cire) प्रक्रिया द्वारा धातु मूर्तियों को ढालने की विधि जान ली थी , गुप्त कालीन बुद्ध की अठारह फिट ऊँची ताम्र प्रतिमा व  सुलतान गंज की साढ़े सात फिट ऊँची प्रतिमा गुप्तकालीन कला के साथ धातु विज्ञान की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं
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:गुप्त कालीन सिक्के:

सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्बे की बौद्ध प्रतिमा हो   या बुद्ध मूर्तियों की  विशेषता  घुंघराले बाल ,  अलंकृत प्रभामण्डल उल्लेखनीय है , गुप्तकाल की एक घोड़े की मूर्ति  उत्तरप्रदेश   खैरीगढ़ मिली है जिस मूर्ति का वास्तविक घोड़े  से  बड़े आकार  की है ।

इस काल में चित्रकला  में विशेष प्रगति हुई रेखाओं रंग भावों के चित्रण में  कुशलता अर्जित कर  ली गई थी अजंता और बाघ की गुफ़ा में सर्वोत्कृष्ट चित्र मिलतें  हैं। अजंता की चित्रकला   भित्ति चित्र नहीं  है  क्योंकि अजंता में चित्र को  को सूखी दीवारों पर बनाया गया है जबकि भित्ति चित्र गीली दीवार पर बनाया जाता है।  ,बाघ की गुफ़ा संख्या चार  व  अजंता की  सोलह, सत्रह,उन्नीस ,एक ,दो में और बादामी की गुफ़ा संख्या तीन में गुप्तकालीन चित्र देखे जा सकते हैं
अजंता की गुफ़ा संख्या सत्रह में उत्तम कलाकृतियां मिलतीं हैं

     टेराकोटा की मूर्तियां भी धार्मिक कार्यों में प्रयोग की जाती थीं विष्णु , कार्तिकेय, सूर्य , दुर्गा कुबेर नाग आदि देवताओं की मूर्तियां मिलती हैं , अहिछत्र , राज गढ़ ,  पहाड़पुर  , भीटा  , बसाढ़ , कौसंबी  प्राप्त लाल  मृदभांड के अवशेषों से गुप्तकालीन मृदभांड का पता चलता है। इन मूर्तियो में गंगा जमुना की मुर्तिया है कुछ मूर्तियां कार्तिकेय  तथा अन्य देवी देवताओं की हैं , जटाजूट धारी शिव की भी मृण्मूर्तियां मिलीं हैं।

            गुप्तकाल में  साहित्यिक विकास.......

गुप्तकाल  शिक्षा साहित्य का काल था   समुद्रगुप्त स्वयं  एक कविराज के रूप में प्रसिद्ध था   उसके दरबार का मुख्य कवी हरिसेन था।
 समय कई संस्कृत में ग्रन्थ लिखे गए , गुप्त काल में पाणिनि की अष्टाध्यायी तथा पतंजलि के महाभाष्य  पर आधारित  संस्कृत  व्याकरण  का विकास हुआ,अमरकोष   की रचना  अमरसिंह ने किया है, बंगाल के एक विद्वान  चन्द्रगोमिन ने चन्द्र व्याकरण की रचना की ।               
कई शिक्षा के केंद्र थे नालंदा महाविहार था ,काशी, मथुरा, वल्लभी,  उज्जैनी प्रमुख़  केंद्र था ,  महाभारत और रामायण अंतिम रूप से इसी समय लिखी गई, महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्शीयम ,मालविकाग्निमित्रम्   मेघदूत ,कुमार सम्भव ,रघुवंश, शूद्रक की मृक्षकटिकम, विशाखदत्त की मुद्रा राक्षस और देवीचंद्र गुप्तम, वात्सायन का कामसूत्र ,भास की स्वप्न वासव दत्ता, अमरसिंह की अमरकोष, विष्णुशर्मा की पंचतंत्र, आर्यभट्ट की आर्यभट्टीय, बराहमिहिर बृहत्संहिता आदि ग्रन्थों ने गुप्तकालीन साहित्य को समृद्ध किया, इसी काल में विभिन्न पुराणों  स्मृतियों की रचना की इस काल में हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की तो बासुल ने मन्दसौर प्रशस्ति की रचना की । इस प्रकार गुप्तकाल धार्मिक दृष्टि से ही नही बल्कि लौकिक दृष्टि से भी  परिपक्व था।     
गुप्त काल में षडदर्शन का विकास हुआ , इसी समय सांख्य, न्याय ,वार्तिक, जैमिनीय सूत्र की रचना हुई , इस समय महायान बौद्ध धर्म के अंतर्गत   भी विभिन्न दार्शनिक विचारधारा  पनपीं  और नवीन धार्मिक सम्प्रदायों का विकास हुआ।न्याय तर्क और प्रमाणवादी धारा का चिंतन था ,जो मुख्य रूप से अक्षपाद गौतम के  सूत्रों पर आधारित था,अक्षपाद गौतम का जीवन काल शायद ईस्वी सन् के प्रारंभिक काल में पड़ता है,इसके मुख्य प्रतिपादक पक्षिल स्वामी वात्सायन का जीवन काल चौथी सदी ईस्वी में माना जाता है,वैशेषिक न्याय का अनुपूरक था लेकिन इससे पुराना यह एक प्रकार भौतिकवादी दर्शन था ,   इस दर्शन  के प्रतिपादक उलूक कणाद थे। सांख्य दर्शन में पचीस मुख्य सिद्धान्त थे सांख्य दर्शन प्रकृति और पुरुष के सिद्धान्त पर आधारित था ,इस से जुड़ा एक ग्रन्थ इश्वर कृष्ण द्वारा लिखा सांख्यकारिका था । इसी तरह योग दर्शन  दूसरी सदी ईशा पूर्व  के महर्षि पतंजलि ने की थी लेकिन योग सूत्रों को संसोधित  और परिवर्धित  किया ब्यास ने ये महर्षि  के सात सदी बाद जन्मे ,इसी तरह मीमांसा दर्शन वेदों की व्यख्या पर आधारित था इस दर्शन के प्रारंभिक कृति जैमिनी ( छठी सदी ईशा पूर्व) माने जाते हैं लेकिन मीमांसा दर्शन के सबसे बड़े विचारक शबरस्वामी थे जो छठी सदी के आसपास थे। वेदांत या उत्तरमीमांसा जो वेदों के मुख्य सिद्धान्त थे इनके विचारक बादनारायन थे और एक अन्य चिंतक वेदांत दर्शन के अन्य एक और चिंतक जो छठी सदी में थे वो थे गौडपाद।

 जैसे नाटकों की रचना की  शूद्रक ने मृक्षकटिकम एवं विशाखदत्त  एवं मुद्रा राक्षस नामक ग्रन्थ लिखा------,कामसूत्र  वात्सायन ने लिखा, पंचतंत्र विष्णु शर्मा ने लिखा आर्यभट्टीय आर्यभट्ट ने लिखा। पुराण को अंतिम रूप से गुप्त काल में ही पूरा किया , इनकी रचना मूलतः  चारणों ने गायन विधि में किया पर बाद में पुराणों का पुनर्लेखन संस्कृति में किया , इनका लेखन भविष्य वाणी के रूप में हुआ।
बौद्ध साहित्य -
प्रारंभिक बौद्ध ग्रन्थ पाली में लिखे गए जो बाद में संस्कृत भाषा में भी लिखे गए , गुप्त काल के मुख्य लेखक आर्यदेव थे , दिग्नाथ भी ने भी कई ग्रन्थ लिखे । जैन धर्म की पुस्तकें लिखी गईं जो प्रारम्भ में प्राकृत भाषा में लिखीं गईं जो बाद में इसका माध्यम संस्कृत  हो गया ।



     गुप्त कालीन  विज्ञान एवं तकनीक------

गुप्त काल में विज्ञान तकनीक का भी विकास हुआ सबसे अधिक प्रगति  गणित और  ज्योतिष क्षेत्र में हुई ,पृथ्वी गोल है और अपने धुरी में घूमती है इस सिद्धान्त की खोज आर्यभट्ट ने    उस  समय  कर दी थी ,बारहमिहिर ने ज्योतिष के महत्वपूर्ण सिद्धान्त बनाये , ज्योतिष विज्ञान सम्बंधी पुस्तके जैसे  पञ्च सिद्धान्तिका, बृहद् जातक ,लघुजातक लिखे , फलित ज्योतिष पर कल्याण वर्मन ने सारावली नामक ग्रन्थ लिखा।

,नागार्जुन ने विभिन्न धातुओं के बारे में जानकारी दी धातुओं  के प्रयोग से   चिकित्सा के उपाय बताये, आयुर्वेदः की चिकित्सा शास्त्र  के विद्वान धन्वन्तरि थे इस काल में।  धातु विज्ञान या धातुवों के मिक्सिंग जिसे मेटलरजी  भी कहते हैं।
       
       इस प्रकार ये मालूम होता है कि गुप्तकाल में साहित्यिक , वैज्ञानिक, वास्तुकला , गणित आदि क्षेत्रों में बेहद प्रगति हुई।

गुप्त काल की अर्थव्यवस्था के बारे में जाने इस पोस्ट से----गुप्त काल की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कैसी थी?
   इस पोस्ट को देखें-

H I V/एड्स क्या है ,क्या लक्षण है?

पोस्ट:-ताम्र पाषाण काल की सभ्यता

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