Samsung M-12 phone review

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Vidhan sabha adhyaksh ka praavdhaan ,bharat ke rajyo mein

               मित्रों   आज  कर्नाटक के  कुमारस्वामी के  समर्थन में विधायक छिटक कर दूर भागे जा रहे  है , सरकार बचाने के लिए सभी हथकंडे अपनाये जा रहे , सुप्रीमकोर्ट भी गए विधानसभा अध्यक्ष के रवैय्ये को लेकर , इस  सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा की विधान सभा अध्यक्ष को निर्णय देने में समय से नही बंधा  जा सकता  ।
             इसलिए इस करंट issue में विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों को जानना आवश्यक हो गया है।

         

            ::    विधान सभा अध्यक्ष   ::

    भारत  की आजादी के बाद  संविधान निर्माताओं ने देश की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए केन्द्रीय स्तर पर जहाँ संसद की व्यवस्था की वहीं राज्यों के स्तर पर विधानसभा का गठन किया गया,इसके अतिरिक्त लोकसभा में कार्यवाही सञ्चालन के लिए और गरिमा बनाये रखने के लिए लोकसभा अध्यक्ष और विधानसभा अध्यक्ष का प्रावधान किया गया ,विधानसभा अध्यक्ष की विधानसभा की पूरी कार्यवाही जैसे प्रश्न काल , शून्यकाल , आदि के समय नियमानुसार सदस्यों को उनके तारांकित और अतारांकित  प्रश्नो के अनुसार प्रश्न पूंछने का निर्दिष्ट नियम देना , जवाब में मंत्री के लिए उत्तर देने को निर्धारित समय देना, विधान सभा में  अशिष्ट असंसदीय कामों में कार्यवाही करना ,कोरम पूरा होने के आभाव में कार्यवाही स्थगित करना,और उसकी गतिविधिओं की पूरी जिम्मेदारी होती है,विधानसभा अध्यक्ष का निर्विरोध होना ये दर्शाता है, कि समाज  कि कितना समाज जागरूक  है और यही लोकतंत्रीय  व्यवस्था की प्रमुख़ आधारशिला है।
         विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा और सचिवालय का प्रमुख होता है व विधानसभा परिसर में उसका प्राधिकार सर्वोच्च होता है,यह विधानसभा में सदस्यों से नियमों का पालन सुनिश्चित कराते हैं परंतु सभा के वाद विवाद में भाग नही लेते,वे विधानसभा की कार्यवाही के दौरान अपनी व्यवस्था संचालित करते है ।             
     अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष कार्यवाही का सञ्चालन करते है ,और अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों के अनुपस्थिति में सभापति तालिका का कोई एक सदस्य जिम्मेदारी निभाता है।
            हर राज्य के विधानमंडल राज्यपाल और राज्य के विधानमंडल से मिलकर बना होता है, कुछ राज्यों में दो सदन विधानसभा और विधानपरिषद है, कुछ राज्यों में सिर्फ एक ही सभा विधानसभा का प्रावधान है, राज्य चाहें तो विधान परिषद् का निर्माण कर सकतें है, विधानसभा अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष की तरह ही पद है।
          हमारे संविधान के 168 में राज्यों के विधानमंडल के गठन के बारे में जिक्र  है, संविधान में  राज्यों के विधान सभाओं के लिए एक अध्यक्ष के गठन की प्रक्रिया वर्णित  है,अनुच्छेद 178 में कहा गया है की प्रत्येक राज्य की विधान सभा यथा  शीघ्र  अपने दो  सदस्यों में से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करेगी,
और जब अध्यक्ष  पद रिक्त होता है तब विधानसभा किसी अन्य सदस्य को यथा स्थिति अध्यक्ष और उपाध्यक्ष  चुनेगा।
           अनुच्छेद 179 में अनुच्छेद को विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद खाली होने पर पद त्याग और पद से हटाये जाने का जिक्र है,विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद धारण करने वाला सदस्य यदि विधानसभा सदस्य नही रहता तो ऐसी स्थिति में वो अपने पद  का त्यागपत्र दे देता है और ये त्यागपत्र विधानसभा उपाध्यक्ष को संबोधित करके लिखा जाता है और स्वहस्ताक्षरित होता है और यदि उपाध्यक्ष को पद त्याग करना होता है तो वो अध्यक्ष को संबोधित और स्वहस्ताक्षरित त्यागपत्र सौंपता है।

         विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियां::::

 विधान सभा सदस्य को  सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से सञ्चालन के लिए अनेक शक्तियां प्रदान की गईं है----
              १)सदन को सुचारू  रूप से संचालन के लिए अनुशासन बनाये रखने की जम्मेदारी विधानसभा अध्यक्ष की है
             २)सदन के गणपूर्ति के आभाव में सदन की बैठक स्थगित  कर सकतें है
             ३) सदन की कार्यवाही संचालन के लिए नियम बना सकते है।
             ४)विधानसभा में जब किसी विषय में चर्चा के बाद  वोटिंग होती है तो तो वोट  सिर्फ मेम्बर दे सकता है    विधानसभा अध्यक्ष को  मत देने का अधिकार नही होता , इसी प्रकार जब पक्ष विपक्ष के मत दे चुके होतें है और गणना के बाद बराबर वोट मिलतें है तब विधान सभा अध्यक्ष को अपना मत देने का अधिकार है
             ५) विधानसभा अध्यक्ष किसी सदस्य के  अशिष्ट आचरण करने की स्थिति में सम्बंधित  सदस्य को सदन के बैठक  निलंबित कर सकता है।
              ६) उसे सदन के लिए किसी नए नियम बनाने के अधिकार है तो पुराने नियम को निलंबित करने का भी अधिकार है।
              ७)  किसी प्रश्न प्रस्ताव  या संकल्प को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार विधान सभा अध्यक्ष को प्राप्त है।
             ८) गणपूर्ति नही होने या कोरम पूरा नही होने पर विधानसभा की बैठक स्थगित करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को है।
             ९)किस दिन कौन सा काम होगा, ये निर्णय विधानसभा अध्यक्ष ही करता है।
            १०) कुछ कमेटियों का प्रधान विधानसभा अध्यक्ष ही है,कार्य मन्त्रणा समिति,संसदीय समिति,नियम समिति के सभापतियों को चुनने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को ही है।
             ११) कोई विधेयक धन विधेयक है या नही ये निर्णय करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष को ही है।
            १२) विधानसभा के अंदर किसी भी प्रकार से किसी सदस्य की गिरफ़्तारी संभव नही है। विधानसभा कार्यवाही के समय।
                 दल बदल के आरोपी विधायको पर कार्यवाही करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के ऊपर होता है कि उनको अयोग्य ठहराया जाय या नही क्योंकि इस तरह के निर्णय के समय विधानसभा अध्यक्ष एक ट्रिब्यूनल की तरह कार्य करता है इस निर्णय के बाद उसके निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में  रिव्यु पेटिशन दाखिल की जा सकती  है।
      सुप्रीम कोर्ट ने 17 जुलाई को कर्नाटक विधानसभा सम्बंधित निर्णय में कहा की विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय में कोई समयसीमा नही निर्धारित की जा सकती।
 कृपया अनुच्छेद 356 और राष्ट्रपति शासन का प्रावधानइस पोस्ट को भी पढ़ें-Article 356 और राष्ट्रपति शासन का प्रावधान:
       

                ::कर्नाटक संकट-karnatk crisis::

 कर्नाटक  संकट इस समय का सबसे बड़ा राजनितिक संकट लग रहा है ,
                 14 महीने पुरानी सरकार के अस्तित्व पर बादल  तब मंडराने लगे जब कांग्रेस और जेडीएस की सरकार में से काँग्रेस के 13 विधायक और जेडीएस के 3 विधायकों ने  विधानसभा अध्यक्ष को  स्तीफा सौंप दिया ,जिसके कारण मिली जुली सरकार ने  अल्पमत में आ गई।हालाँकि एक  बागी कांग्रेस    विधायक रामलिंगम  ने पार्टी के पक्ष में मतदान की घोसणा की, बाद में दो निर्दलीय विधायक आर शंकर और एच नागेश ने समर्थन वापस लेने का एलान कर दिया,।
           परंतु इन विधायको के स्तीफा स्वीकार करने में कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने देरी लगा दी,जिससे ये स्तीफा देने वाले विधायक सुप्रीम कोर्ट चले गए।
               सुप्रीम कोर्ट ने इस  सम्बन्ध में निर्णय दिया कि अध्यक्ष को समय सीमा के लिए कोई भी आर्डर नही दे सकता वो निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है कि कब स्तीफा स्वीकार किया जाये,साथ में विधयकों के पक्ष में निर्णय दिया की फ्लोर टेस्ट या बहुमत सिद्ध करने वाले दिन इन विधायको को सदन में उपस्थित के लिए बाध्य नही किया जा सकता,उनकी उपस्थिति  या अनुपस्थिति विधायको की इच्छा पर निर्भर है।
           
             आपको बतातें चले फ्लोर टेस्ट का नियम भी 1989 से 1991 के बीच रहे मुख्यमंत्री एस आर बोम्मई संकट से जुड़ा है ,   उस कर्नाटक संकट में बोम्मई सरकार को तत्कालीन केंद्र की सरकार ने अनुच्छेद 356 का प्रयोग करके इसलिए गिरा दिया था , क्योंकि केंद्र सरकार के अनुसार बोम्मई सरकार के पास बहुमत के विधायक नहीं है ,  और उस समय के कर्नाटक के राज्यपाल ने  बोम्मई  सरकार को सदन में floor test कराने से मना कर दिया और सरकार बर्खास्त कर दी थी, तब पहले  एस आर बोम्मई कर्नाटक हाईकोर्ट गए वहां उनकी याचिका  ख़ारिज हो गई बाद में ,वो  सुप्रीम कोर्ट गए वहां पर 9 जजों की बेंच ने  ने ये निर्णय दिया कि किसी भी अल्पमत सरकार को कोई भी राज्यपाल बिना सदन में  विश्वास प्रस्ताव को सिद्ध करने का अवसार दिए बिना अनुच्छेद 356 का प्रयोग करके बर्खास्त  नही कर सकता ये असंवैधानिक है।।

               अब आतें है आज की डेट में जब कर्नाटक की विधानसभा 224 सदस्यीय है  और सरकार बनाने के लिए आधे से एक अधिक  विधायकों  का समर्थन  जरूरी है,जो संख्या में 113 होता है।

                एच डी कुमारास्वामी सरकार के पास पहले 116  विधायकों का समर्थन था जिनमे कांग्रेस के 78 और JDS के 37  बी एस पी के   एक विधायक  का समर्थन था , अब  18 विधायक साथ छोड़ने या स्तीफे सौंपने के बाद 100 विधायक रह गएँ है , वहीं भाजपा के पास इस समय 105  ख़ुद की पार्टी के और दो निर्दलीय मिलाकर 107 का आंकड़ा है ,इस प्रकार इस समय सबसे बड़ी पार्टी BJP है ,इस लिए इस पार्टी ने  कुमारास्वामी सरकार को अल्पमत होकर सरकार चलाने का आरोप लगाया ,इस समय कुमारा स्वामी सरकार अपना विश्वास प्रस्ताव सदन में रखा है , सदन में बहुमत सिद्ध करने के लिए ,इसके साथ सदन में कई  मुद्दों पर चर्चा भी होती है ,मत विभाजन से पूर्व।

              आपको बताते  चलें  कि  की विश्वास प्रस्ताव सरकार द्वारा लाया जाता है वहीँ  अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष द्वारा सरकार पर लाया जाता है ,जब सरकार अल्पमत में होती है बहुत ही उठापठक  होती है सरकार में या  सरकार के पूर्ण बहुमत के बावजूद किसी बहुत ही ज्वलंत मुद्दे को देश के सामने लाने के लिए अबिश्वास प्रस्ताव सरकार पर लाती है भले ही  विपक्ष को मालूम होता है की सदन में सरकार अपना बहुमत सिद्ध ही  कर देगी।

             इसी तरह के संकट कई प्रदेश में आये कुछ दिन पूर्व गोवा और मणिपुर में भी अविश्वाश प्रस्ताव का सामना करना पड़ा,इसी तरह का बड़ा मुद्दा 1993 की मायावती मुलायम की गठजोड़ वाली सरकार का है ,जब फ्लोर टेस्ट में मायावती ने मुलायम से समर्थन वापस ले लिया ,और सदन में मुलायम अपना बहुमत सिद्ध नही कर पाएं और सरकार गिर गई थी बाद में  मायावती ने भाजपा की सहायता से सरकार बनाई थी।

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