Guru purnima:
गुरु पूर्णिमा: चेतना का प्रकाशोत्सव और महर्षि वेदव्यास की महिमा
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि वह तत्व है जो शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। जैसा कि सद्गुरु ने कहा है, "गुरु वह व्यक्ति नहीं है जो मशाल लेकर आपको रास्ता दिखाने के लिए खड़ा है, बल्कि गुरु स्वयं मशाल है।" गुरु का कार्य मात्र ग्रंथों या पुराणों की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि शिष्य को जीवन के एक सीमित आयाम से दूसरे अनंत आयाम तक ले जाना है।
पौराणिक काल से जुडी हुई बहुत सी कथाओं में ये जानकारी मिलती है कि हर प्रतापी राजा, या महान सन्त के पीछे उसका गुरु था ,जैसे अर्जुन के पीछे द्रोणाचार्य, राम के पीछे ऋषि विश्वामित्र कृष्ण के पीछे ऋषि संदीपनी आदि जिससे ये पता चलता है कि किसी के महान बनने के पीछे किसी गुरु का ही हाँथ है,इसी प्रकार महान गुरु थे महर्षि वेदव्यास जिन्होंने ,महाभारत लिखी, ब्रम्हसूत्र लिखा श्रीमद्भगवद् लिखी और अठारह पुराणों की रचना की,उन्होंने चारों वेदों का संकलन भी किया,शास्त्रों में आषाढ़ पूर्णिमा को वेदव्यास का जन्मदिन माना जाता है,इसीलिए आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है,और 29 जुलाई 2026 दिन बुधवार को मनाया जा रहा है।
अषाढ़ मास के पूर्णिमा को गुरु पूजा का विधान है, चूँकि आषाढ़ मास जुलाई के समय प्रारम्भ होता,और वर्षा काल भी चार महीने का होता है अतः इस समय परिव्राजक या भ्रमण शील साधु संत एक जगह ही रहकर ज्ञान को प्रसारित करते थे,ये चार महीने भ्रमण के लिए अनुपयुक्त होते थे इस समय जल भराव ,बाढ़ ,जैसी आपदाएं आती रहतीं है। मौसम में अधिक आर्द्रता होने से शिक्षा अर्जन के लिए भी उपयुक्त समय होता है,इस समय न अधिक गर्मी न अधिक ठंढी पड़ती है
गुरु की महिमा और आध्यात्मिक महत्व
शास्त्रों में गुरु को साक्षात् परब्रह्म के समान माना गया है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परम् ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त रूप हैं। गुरु वह शक्ति है जो शिष्य के अहंकार रूपी पर्दे को हटाकर उसे ईश्वर से मिलाती है। वास्तव में जीवन का अंतिम उद्देश्य मोक्ष है, और बिना अहंकार मिटाए ब्रह्म को जानना असंभव है। जब हम गुरु के चरणों में समर्पित होते हैं और 'गुरु दक्षिणा' अर्पित करते हैं, तो हम केवल धन नहीं बल्कि अपना अहंकार सौंपते हैं। गुरु अज्ञान और अंधकार को हरने वाले हैं, इसलिए गुरु पूर्णिमा वास्तव में हमारी चेतना का 'प्रकाशोत्सव' है।
शास्त्रों में गुरु को साक्षात् परब्रह्म के समान माना गया है:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परम् ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः॥
अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त रूप हैं। गुरु वह शक्ति है जो शिष्य के अहंकार रूपी पर्दे को हटाकर उसे ईश्वर से मिलाती है। वास्तव में जीवन का अंतिम उद्देश्य मोक्ष है, और बिना अहंकार मिटाए ब्रह्म को जानना असंभव है। जब हम गुरु के चरणों में समर्पित होते हैं और 'गुरु दक्षिणा' अर्पित करते हैं, तो हम केवल धन नहीं बल्कि अपना अहंकार सौंपते हैं। गुरु अज्ञान और अंधकार को हरने वाले हैं, इसलिए गुरु पूर्णिमा वास्तव में हमारी चेतना का 'प्रकाशोत्सव' है।
गुरु-शिष्य परंपरा का ऐतिहासिक संदर्भ
भारतीय इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्तित्व और प्रतापी राजा के पीछे एक समर्थ गुरु का हाथ रहा है।
- मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पीछे ऋषि विश्वामित्र और वशिष्ठ का मार्गदर्शन था।
- योगेश्वर कृष्ण ने ऋषि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की।
- वीर अर्जुन की महानता के पीछे आचार्य द्रोणाचार्य की शिक्षा थी।
इसी परंपरा में महर्षि वेदव्यास का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने ही वेदों का संकलन किया, महाभारत, ब्रह्मसूत्र और अठारह पुराणों की रचना की। वेदों की विशालता को देखते हुए उन्होंने ही इसे चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया, ताकि कलियुग का मनुष्य आसानी से ज्ञानार्जन कर सके।
भारतीय इतिहास गवाह है कि हर महान व्यक्तित्व और प्रतापी राजा के पीछे एक समर्थ गुरु का हाथ रहा है।
- मर्यादा पुरुषोत्तम राम के पीछे ऋषि विश्वामित्र और वशिष्ठ का मार्गदर्शन था।
- योगेश्वर कृष्ण ने ऋषि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की।
- वीर अर्जुन की महानता के पीछे आचार्य द्रोणाचार्य की शिक्षा थी।
इसी परंपरा में महर्षि वेदव्यास का स्थान अद्वितीय है। उन्होंने ही वेदों का संकलन किया, महाभारत, ब्रह्मसूत्र और अठारह पुराणों की रचना की। वेदों की विशालता को देखते हुए उन्होंने ही इसे चार भागों—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया, ताकि कलियुग का मनुष्य आसानी से ज्ञानार्जन कर सके।
गुरु पूर्णिमा और आषाढ़ मास का महत्व
हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, इसीलिए इस दिन को 'व्यास पूर्णिमा' या 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है।
- वर्षा ऋतु और चातुर्मास: आषाढ़ मास से वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है और अगले चार महीने भ्रमणशील साधु-संत एक ही स्थान पर रुककर ज्ञान का प्रसार करते हैं। जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियों के कारण यह समय यात्रा के लिए अनुपयुक्त होता है, किंतु अध्ययन और साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- अनुकूल वातावरण: इस समय न अधिक गर्मी होती है और न अधिक ठंड। मौसम की आर्द्रता एकाग्रता और शिक्षा अर्जन के लिए एक आदर्श स्थिति उत्पन्न करती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, इसीलिए इस दिन को 'व्यास पूर्णिमा' या 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है।
- वर्षा ऋतु और चातुर्मास: आषाढ़ मास से वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है और अगले चार महीने भ्रमणशील साधु-संत एक ही स्थान पर रुककर ज्ञान का प्रसार करते हैं। जलभराव और बाढ़ जैसी स्थितियों के कारण यह समय यात्रा के लिए अनुपयुक्त होता है, किंतु अध्ययन और साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
- अनुकूल वातावरण: इस समय न अधिक गर्मी होती है और न अधिक ठंड। मौसम की आर्द्रता एकाग्रता और शिक्षा अर्जन के लिए एक आदर्श स्थिति उत्पन्न करती है।
गुरु पूर्णिमा पूजन विधान
गुरु के साक्षात् उपस्थिति होने उनका पूजन उनकी चरण पादुकाओं का पूजन , पुष्प भेंट, वस्त्र भेंट ,किया जाता है।
पूजन मंत्र:
"ॐ वेदादि गुरुदेवाय विद्महे परमगुरुवे धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्"
गुरु की उपस्थिति में उनकी चरण पादुकाओं का पूजन, पुष्प अर्पण और वस्त्र भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह दिन ऋग्वेद की उस ऋचा को आत्मसात करने का है जो कहती है कि हमारे शुभ कार्य चारों तरफ से हमारे पास आएं और देवता सदैव हमारी सुरक्षा और संवर्धन करें।
पूजन मंत्र:
"ॐ वेदादि गुरुदेवाय विद्महे परमगुरुवे धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात्"
गुरु की उपस्थिति में उनकी चरण पादुकाओं का पूजन, पुष्प अर्पण और वस्त्र भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह दिन ऋग्वेद की उस ऋचा को आत्मसात करने का है जो कहती है कि हमारे शुभ कार्य चारों तरफ से हमारे पास आएं और देवता सदैव हमारी सुरक्षा और संवर्धन करें।
महर्षि वेदव्यास: परिचय और शिक्षाएं
भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले महर्षि वेदव्यास का पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन था। वे ऋषि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे। उनके प्रमुख शिष्यों में पैल, जैमिनी, वैशम्पायन, सुमंतमुनि और रोम हर्षण जैसे विद्वान थे।
महर्षि वेदव्यास त्रिकालदर्शी थे उन्होंने जान लिया था की कलियुग में व्यक्ति ईश्वर की तऱफ से ध्यान हटाकर भौतिकता पर अधिक सत्य मानेगा ,उनके अनुसार एक विशाल वेद को आसानी से पठन में लाने के लिए चार भागों ऋग्वेद , यजुर्वेद ,सामवेद, अथर्वेद चार भागों में बाँट दिया ।
एक अन्य कहानी में गंधारी के सौ पुत्रों का जन्म महर्षि वेदव्यास के प्रताप से हुआ, कहानी यूँ है की एक बार गंधारी के सेवा सुश्रुषा से खुश होकर महर्षि वेदव्यास ने सौ पुत्र के जन्म का आशीर्वाद दिया, कुछ दिन बाद जब गंधारी गर्भवती हुईं तब उन्होंने मांस के एक लोथड़े को जन्म दिया ,महर्षि वेदव्यास ने इस मांस के लोथड़े के सौ टुकड़े करके घी से भरे सौ कुण्ड बनवाकर उसमे डाल दिया ,और मंत्रोचारण के कुछ दिनों बाद सौ पुत्रों का जन्म हुआ ,वही कौरव कहलाये ।
व्यास जी की अमर शिक्षाएं:
- क्रोध का त्याग: किसी के प्रति क्रोध पालने से अच्छा है उसे तत्काल प्रकट कर देना, ताकि मन मैला न हो।
- सज्जनता: जो व्यक्ति सज्जनता का अतिक्रमण करता है, उसकी आयु, संपत्ति और धर्म सब नष्ट हो जाते हैं।
- कर्म का सिद्धांत: मनुष्य जैसा शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसे उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है।
- सेवा और दया: दयाभाव से की गई सेवा हमेशा सुख प्रदान करती है।
- परोपकार: दूसरों के लिए वही चाहो जो तुम स्वयं के लिए चाहते हो।
- इंद्रिय निग्रह: जिसकी बुद्धि इंद्रियों के वश में है, वही वास्तव में स्थिर प्रज्ञ है।
भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले महर्षि वेदव्यास का पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन था। वे ऋषि पराशर और माता सत्यवती के पुत्र थे। उनके प्रमुख शिष्यों में पैल, जैमिनी, वैशम्पायन, सुमंतमुनि और रोम हर्षण जैसे विद्वान थे।
महर्षि वेदव्यास त्रिकालदर्शी थे उन्होंने जान लिया था की कलियुग में व्यक्ति ईश्वर की तऱफ से ध्यान हटाकर भौतिकता पर अधिक सत्य मानेगा ,उनके अनुसार एक विशाल वेद को आसानी से पठन में लाने के लिए चार भागों ऋग्वेद , यजुर्वेद ,सामवेद, अथर्वेद चार भागों में बाँट दिया ।
एक अन्य कहानी में गंधारी के सौ पुत्रों का जन्म महर्षि वेदव्यास के प्रताप से हुआ, कहानी यूँ है की एक बार गंधारी के सेवा सुश्रुषा से खुश होकर महर्षि वेदव्यास ने सौ पुत्र के जन्म का आशीर्वाद दिया, कुछ दिन बाद जब गंधारी गर्भवती हुईं तब उन्होंने मांस के एक लोथड़े को जन्म दिया ,महर्षि वेदव्यास ने इस मांस के लोथड़े के सौ टुकड़े करके घी से भरे सौ कुण्ड बनवाकर उसमे डाल दिया ,और मंत्रोचारण के कुछ दिनों बाद सौ पुत्रों का जन्म हुआ ,वही कौरव कहलाये ।
व्यास जी की अमर शिक्षाएं:
- क्रोध का त्याग: किसी के प्रति क्रोध पालने से अच्छा है उसे तत्काल प्रकट कर देना, ताकि मन मैला न हो।
- सज्जनता: जो व्यक्ति सज्जनता का अतिक्रमण करता है, उसकी आयु, संपत्ति और धर्म सब नष्ट हो जाते हैं।
- कर्म का सिद्धांत: मनुष्य जैसा शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसे उसका फल अवश्य भोगना पड़ता है।
- सेवा और दया: दयाभाव से की गई सेवा हमेशा सुख प्रदान करती है।
- परोपकार: दूसरों के लिए वही चाहो जो तुम स्वयं के लिए चाहते हो।
- इंद्रिय निग्रह: जिसकी बुद्धि इंद्रियों के वश में है, वही वास्तव में स्थिर प्रज्ञ है।
महर्षि वेदव्यास और लेखन की अद्भुत शर्त
महर्षि वेदव्यास ने जब महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना का विचार किया, तो उन्हें एक ऐसे लेखक की आवश्यकता थी जो उनके विचारों की गति के साथ तालमेल बैठा सके। इसके लिए उन्होंने भगवान श्रीगणेश का आह्वान किया।
- गणेश जी की शर्त: "मैं लिखूँगा तो सही, लेकिन मेरी कलम रुकनी नहीं चाहिए। यदि आप रुक गए, तो मैं लिखना छोड़ दूँगा।"
- व्यास जी की चतुर युक्ति: व्यास जी ने शर्त स्वीकार की, लेकिन बदले में एक शर्त रखी— "आप जो भी लिखेंगे, उसे पहले पूरी तरह समझकर ही लिखेंगे।"
- परिणाम: व्यास जी बीच-बीच में अत्यंत कठिन श्लोक (जिन्हें 'व्यास कूट' कहा जाता है) बोलते थे। जब तक गणेश जी उनका अर्थ समझते, तब तक व्यास जी अगले कई श्लोकों की रचना कर लेते थे। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि ज्ञान केवल ग्रहण करना पर्याप्त नहीं है, उसे आत्मसात करना और समझना अनिवार्य है।
महर्षि वेदव्यास और वेदों का विभाजन
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के ही कलावतार माने जाते हैं। उनका जन्म आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हुआ था। उन्हें 'वेदादि गुरु' इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ही बिखरे हुए वेदों का संकलन किया और उन्हें चार भागों में विभाजित किया: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
कथा का सार: ज्ञान का प्रसार
महर्षि व्यास जानते थे कि आने वाले समय (कलियुग) में मनुष्य की बुद्धि और आयु कम हो जाएगी, इसलिए एक विशाल वेद को समझना सबके लिए कठिन होगा। उन्होंने अपने चार शिष्यों को चुना और उन्हें अलग-अलग वेदों का ज्ञान दिया:
- पैल ऋषि को ऋग्वेद सिखाया।
- वैशम्पायन को यजुर्वेद।
- जैमिनी को सामवेद।
- सुमन्तु को अथर्ववेद।
गुरु पूर्णिमा से जुड़ाव
कहा जाता है कि जब महर्षि व्यास ने वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे महान ग्रंथों की रचना पूर्ण कर ली, तब उनके शिष्यों ने इसी पूर्णिमा के दिन उनकी विशेष पूजा की और उनसे आशीर्वाद लिया। तब से यह परंपरा 'व्यास पूर्णिमा' या 'गुरु पूर्णिमा' के रूप में प्रचलित हुई।
आधुनिक युग में गुरु-शिष्य परंपरा का स्वरूप
आज के डिजिटल युग में, जहाँ सूचनाओं की बाढ़ है, गुरु की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
- सूचना बनाम ज्ञान: इंटरनेट हमें सूचना (Information) दे सकता है, लेकिन उस सूचना को विवेक (Wisdom) में बदलने का कार्य केवल गुरु ही कर सकते हैं।
- मानसिक संबल: आज के प्रतिस्पर्धी समय में गुरु केवल शिक्षक नहीं, बल्कि एक 'मेंटर' और मार्गदर्शक की भूमिका में हैं, जो शिष्य के मानसिक द्वंद्वों को शांत कर उसे सही दिशा दिखाते हैं।
विभिन्न परंपराओं में गुरु पूर्णिमा
यह पर्व केवल सनातन धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति के अन्य अंगों में भी इसका गहरा महत्व है:
- बौद्ध धर्म: माना जाता है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपना प्रथम उपदेश दिया था, जिसे 'धम्मचक्कप्पवत्तन' कहा जाता है।
- जैन धर्म: जैन परंपरा के अनुसार, २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने इसी दिन अपने प्रथम शिष्य 'इंद्रभूति गौतम' को दीक्षित किया था, जिससे वे गुरु बने।
- सिख धर्म: सिख समुदाय में गुरु की सेवा और उनके वचनों पर चलने को ही सर्वोपरि माना गया है, जो इसी परंपरा का विस्तार है।
महर्षि व्यास के कृतित्व का वैश्विक प्रभाव
व्यास जी द्वारा रचित 'श्रीमद्भागवत पुराण' आज भी विश्वभर में भक्ति मार्ग का सबसे बड़ा ग्रंथ माना जाता है। उनके द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत' के सिद्धांत (ब्रह्मसूत्र के माध्यम से) आधुनिक विज्ञान और क्वांटम फिजिक्स के कई सिद्धांतों के करीब पाए जाते हैं। उन्होंने सिखाया कि "परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्"— अर्थात दूसरों का उपकार करना ही पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना ही पाप है।
- आधुनिक संदर्भ: आज के डिजिटल युग में गुरु की परिभाषा कैसे बदली है (क्या केवल व्यक्ति गुरु है या अनुभव और पुस्तकें भी?)।
- महर्षि वेदव्यास का योगदान: चूँकि गुरु पूर्णिमा व्यास जयंती के रूप में मनाई जाती है, उनके द्वारा वेदों के वर्गीकरण और महाभारत की रचना का संक्षिप्त उल्लेख।
- कृतज्ञता का महत्व: यह दिन केवल ज्ञान लेने का नहीं, बल्कि अपने गुरुओं के प्रति आभार व्यक्त करने का भी है।
निष्कर्ष:
गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि हम सदैव श्रेष्ठ कर्मों की ओर अग्रसर रहें और अपने अहंकार को त्यागकर गुरु के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करें। गुरु ही वह सेतु है जो हमें मनुष्य से परमात्मा की ओर ले जाता है।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस विषय पर आधारित कोई विशेष पूजा विधि या महर्षि वेदव्यास की किसी अन्य कथा का विस्तार करूँ?

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