Subhas Chandra Bose and Indian national army


Subhas Chandra Bose and Indian national army
(सुभाष चन्द्र बोस , आर्मी के साथ)

सुभाष चंद्र बोस (1897 -  1945)
      भारत के इतिहास में कुछ क्रांतिकारी नेताओं में यदि यदि भगत सिंह , चंद्र शेखर आज़ाद को याद करते ही सिहरन हो जाती है , उसी तरह सुभाष  चंद्र बोस के नाम सुनते ही उनके तश्वीर को देखते ही अपने आप हाँथ माथे में पहुंचकर  सैल्यूट कर देता है हर भारत के बन्दे को सुभाष चंद्र बोस के लिए अंतरात्मा से सम्मान है  ,देश उन्हें "नेता जी "के नाम से जानता है।                                                  Subhas Chandra Bose and Indian national army
          कुछ समय पूर्व गुमनामी बाबा के मृत्यु के बाद उनके पास सुभाष बाबू के चश्मे ,कुछ दस्ताबेज ,और परिवार के साथ मिली तश्वीर से लगता है कि वो सुभाष बाबू ही थे ,  जो  फैजाबाद में ' भगवानजी'    गुमनामी बाबा के नाम से जाने गए, पूरे जीवनकाल किसी से आमने सामने नही मिले,परंतु कुछ उनके परिचित गुप्त रूप से उनसे मिलने का दावा करते रहे,वो भी रहस्य था, ये रहस्य बना ही रहा ,सरकार के द्वारा बनाये गए कई आयोग में  भी कोई स्पष्ट जानकारी नही दे सके , कभी देश मे ये सूचना उपलब्ध कराई गई की सरकार द्वारा यदि कुछ गुप्त आंकड़े दिए गए तो अन्य देशों से रिश्ते खराब हो जाएंगे ,क्या ये रिश्ते रूस से खराब होने का डर है , क्योंकि मलेशिया ने किसी जहाज के दुर्घटना ग्रस्त होने की बात नही मॉनी जिस दिन नेता जी के प्लेन क्रेश की तिथि बताई जाती है ।तो रहस्य क्या है आख़िर इसी रहस्य से नेहरू हमेशा डरे रहे कि कहीं यदि सुभाष चंद्र बोस की जिंदा रहने की ख़बर जनता को मिली तो उनका तख्त जर्रूर लड़खड़ा जाएगा।क्योंकि सुभाष चंद्र बोस ने एक जर्मन महिला एमिली सेंक से विवाह भी किया था ,जब वो आजादी के बाद भारत मे रहने के लिए आईं तो सरकार ने बिल्कुल साथ नही दिया ,सुभाष चन्द्र बोस जी की एक लड़की भी है ये गर्व की बात है,क्या सरकार उनकी पुत्री को भारत बुलाकर कोई सम्मान देगी।
             सरकार ने कई आयोग गठित किये  नेता जी के  इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए ,परंतु आज तक ये पूर्णतया नही सिद्ध हो पाया कि नेता जी हवाई दुर्घटना में मारे गए थे या बच निकले थे या यही गुमनामी बाबा ने अंतिम सांस भारत की मिट्टी में लिया ,वही नेता जी थे।
                सुभाष चंद्र बोस यानी नेताजी के जन्म 23 जनवरी 1897 को अच्छे मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था,1919 वो कलकत्ता विश्विद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की,और ब्रिटिश भारत की सर्वश्रेष्ठ और अति कठिन परीक्षा आई .सी. एस .में 1920 में उत्तीर्ण

 सन्1920 में सुभाष चन्द्र बोस कलकत्ता में


हो गए ,उन्हें ब्रिटिश सरकार में काम करने का अनुभव मिला ,परंतु  यह    नौकरी उन्हें घुटन भरे ग़ुलामी की नौकरी लगी नेता जी को और एक साल के भीतर आई. सी .एस. की परीक्षा से त्यागपत्र देकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बन गए,एक दिसंबर 1921 को  छः महीने के कारावास की सजा मिली,और अन्य कई अवसर पर जेल गए।
      1923 -24 में वो बाबू चितरंजन दास के संपर्क में आये और उनके साथ स्वराज दल के गठन में भूमिका निभाई ,वो भी चाहते थे कि अंग्रेजी नीतियों का विरोध विधान परिषद में भारतीय के पहुंचने के बाद संभव है,और विधान परिषद के चुने जाने के लिए भारतीयों को चुनाव लड़ना चाहिए।

1924 में नेता जी कलकत्ता नगर निगम के चीफ एग्जीक्यूटिव अफसर चुने गए,ब्रिटिश सरकार ने अक्टूबर 1924 में मांडले जेल  ,उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण भेज दिया गया।
                 सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के उदार वादी याचना  शैली का विरोध किया,उन्होंने 1928 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में प्रस्तुत नेहरू रिपोर्ट में वर्णित प्रादेशिक स्वायत्तता(Dominion state) के मांग का सख्त विरोध किया और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की,फरवरी 1938 के हरिपुर अधिवेशन में सुभाष  चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए,और  दूसरे वर्ष , जनवरी 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में  महात्मा गांधी के विरोध के बावजूद अध्यक्ष चुने गए ,                 


महात्मा गांधी  के समर्थकों का कांग्रेस कार्यकारिणी में बहुमत जरूर था परंतु सुभाष की जीत से महात्मा गांधी की हार थी ,इसी संघर्ष में सुभाष चंद्र बोस ने अप्रैल 1939 में इस्तीफा दे दिया कांग्रेस अध्यक्ष पद से। उन्होंने अपना संगठन 'फॉरवर्ड ब्लाक' बनाया।

                   सितंबर 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया,सुभाष चंद्र बोस ने इसी अवसर को स्वर्णिम अवसर समझा विदेशियों के सहायता से भारत के ब्रिटश हुक़ूमत में हमला करके आज़ाद कराने का, पुलिस को उनके क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण अपने ही घर मे नजरबंद कर लिया ,उन्होंने घर मे ही उपवास शुरू किया और बाहरी व्यक्तियों से मिलना बंद कर दिया ,1941 जनवरी महीने में वो अपने घर से चुपके से पुलिस के घेरा रहने के बावजूद निकल भागे पुलिस भांप भी नही पाई,उन्होंने पंजाब पेशावर तक कई बार भेष बदला , वो जियाउद्दीन के अफगानी वेष में अफ़ग़ानितान में  एक  पठान मित्र के यहां रुके ,पेशावर मार्ग से कम्युनिस्ट देश रूस पहुंचे,वहां से वो मार्च 1941 में बर्लिन,जर्मनी पहुंच गए,बर्लिन रेडियो से उन्होंने भारत को दासता से छुड़ाने के लिए और अंग्रेजी सत्ता को नष्ट करने की बात दोहराई,उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजी गुलामी से आज़ाद होने के लिए विद्रोह का सुझाव बर्लिन रेडियो से दिया, इससे पहले रास बिहारी बोस ने प्रवासी भारतीयों को एकत्र करके भारतीय राष्ट्रीय सेना( Indian National Army )तैयार कर दी थी, इस सेना में वो भारतीय सैनिक भी सम्मिलित किये गए ,जो ब्रिटिश सेना के सिपाही थे परंतु जब जापान ने  मलेशिया और सिंगापुर में कब्जा कर लिया तो इन भारतीय सैनिकों को युद्ध बंदी बना लिया था , इन सैनिकों की संख्या करीब चालीस हजार थी, 1943 में सुभाष चंद्र बोस के मलेशिया पहुंचने पर इसी आर्मी का चीफ बनाया गया ,मलेशिया में रहने वाले भारतीयों ने आर्थिक समर्थन दिया साथ मे जापान सरकार ने भी  भारत  की आजादी के लिए सैनिक सहायता का वचन दिया ।
Subhas Chandra Bose and Indian national army
           21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोष सिंगापुर में भारत की अस्थाई  ""आज़ाद हिंद सरकार ""चुने जाने की घोषणा कर दी ,और इस सरकार के प्रधानमंत्री और सेनापति के रूप में शपथ ली कि भारत के 48 कारोङ  भारत वासियों के आज़ाद देश के लिए अंतिम सांस  तक युद्ध करेंगे,  और  इसी आजाद हिंद सरकार  के  नेता जी ने अपने साथियों को 'जय हिंद' का नारा दिया,भर्ती हुए सैनिको से कहा "तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा" उनका जय घोष था' दिल्ली चलो'। ,इटली,जापान ने तुरंत इस सरकार को मान्यता दे दी और जापान ने 1943  अंडमान द्वीप समूह जो जापान ने विजित किये थे  इसी अस्थाई सरकार को सौंप दिया गया  । 6 जुलाई 1944 को सुभाष बाबू ने ने आज़ाद हिंद रेडियो  सिंगापुर  से गांधी के नाम एक अपील की कि" हे राष्ट्रपिता,भारत की स्वतंत्रता का अंतिम संग्राम आरंभ हो चुका है,भारत के इस स्वतंत्रता के संग्राम में हम आपके आशीर्वाद की आकांक्षा रखते हैं।
                भारतीय राष्ट्रीय सेना इंडियन नेशनल आर्मी(INDIAN national ARMY) या INA को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दिल्ली चलो का नारा दिया,जापानी कमांडरों की सहायता से ये इंडियन नेशनल आर्मी मार्च 1944 में भारत पर आक्रमण किया और 2 महीने बाद मई 1944 में भारत के   मेडॉक पर जो चटगांव (अब बांग्लादेश में)  में आक्रमण कर जीत लिया, शाहनवाज  खान  के अधीन एक अन्य बटालियन  ने जापानी सेना के साथ मिलकर नागा लैंड के  कोहिमा में तिरंगा फहरा दिया,परंतु इसी बीच विश्व युद्ध मे  जापान की पराजय की खबर मिली ,INA आसाम के आगे नही बढ़ पाई,  आई इन ए  की वापसी 1944 के मध्य में प्रारंभ हो  गई , मई 1945  तक पूरी वापसी हो गई ,जिसमे INA  को अंग्रेजों के आगे हथियार डालने पड़े ,    उधर सुभाष बाबू सिंगापुर से जापान की ओर भागे ,जिस जहाज में वो सवार थे वो दुर्घटनाग्रस्त हो गया अपुष्ट ख़बर से ये मालूम हुआ कि सभी यात्री मारे गए उसमे सुभाष चंद्र बोस भी थे। ये दुर्भाग्य पूर्ण तारीख़ थी 18 अगस्त 1945।
                यदि विश्व युद्ध 6 महीने  और घसीट जाता ,जापान की युद्ध मे हार न  हुई होती ,तो पूरे भारत मे आजाद हिंद फौज की सेना अंग्रेजी सेना की हर देती ,भारतीय सैनिक ख़ुद म ख़ुद अपने हथियार सुभाष चंद्र बोस को सौंप देते , तब भारत का नक्शा कुछ और होता  ,   न जिन्ना अलग देश की मांग कर पाता न ही पाकिस्तान होता   न ही बांग्लादेश , पूरे भारत मे एक साथ जीत में माउंटबेटेन का इतिहास में कहीं नाम न होता, क्योंकि हम तीन साल पहले ही आजाद मुल्क बन चुके होते , और प्राइम मिनिस्टर पहले जवाहर लाल नही होते बल्कि सुभाष चंद्र बोस होते  ।
              यद्यपि INA अपने प्रयत्न में असफल रही,परंतु इस सेना से राजनीतिक तथा मानसिक रूप  से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में बहुत योगदान मिला,INA के तीनो ऑफिसर जिनमे एक हिन्दू थे,एक मुसलमान थे एक सिख थे ,तीनो पर देश द्रोह का अभियोग  लगाया गया,इनकी सुनवाई दिल्ली के लाल किले में सैनिक न्यायालय में की गई,परंतु भारत इन तीनों को अपराधी नही बल्कि राष्ट्रीय वीर मानता था,लगभग सभी राजनीतिक दलों ने  मुस्लिम लीग भी ने इस अभियोग की निंदा की,भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने INA रक्षा समिति भी बनाई जिसमे तेज बहादुर सप्रू, भूला भाई देसाई ,पंडित जवाहर लाल नेहरू ,बचाव पक्ष के वकील नियुक्त किये गए।
        देश भर में इन वीरों के सम्मान में चारो तरफ हिंसक प्रदर्शन के बीच लालकिले में सुनवाई चल रही थी, यद्यपि सैनिक न्यायालय ने इनको अभियुक्त ठहराया,परंतु ब्रिटिश हुक़ूमत को जनांदोलन को देखते हुए इनको छोड़ना पड़ा।  इसी समय  ब्रिटिश  हुकूमत को  लगा कि अब  जनता के साथ  सेना भी      राष्ट्र वाद  के ख़ेमे में चली गई है  ।                   मनोवैज्ञानिक रूप से
        इन वीरों ने साहस के उदाहरण ने भारत की आज़ादी का मार्ग प्रशस्त कर दिया।      :::::::;;
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सर सैय्यद अहमद खान : मुस्लिम समाज सुधारक

Comments

  1. Subhash Chandra Bose, those revolutionaries who did not run the Satyagraha nonviolent movement like Gandhiji for the expulsion of the British from India, did not like the revolutionaries killed the terrorists, British officers, but they chose a different path, those countries in the World War Has achieved its military support and prepared its own army and invaded India directly to the British to disperse it from India. He was partially successful in the Ran, when he expelled the British from Assam to Kohima, Japan did not lose a few days in war, the story of the country was somewhat different, Subhash Chandra Bose captured his army INA from all over India and earlier in India Becomes the Prime Minister. The mood of the country was different, whether it was Jinnah or Pakistan.

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