Rabindranath tagore , poet and painter

                                      

               : रवींद्र नाथ टैगोर: 

 रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा है  कि
"महीने के बजाए हम पल पल की गिनती करें ,तभी कुछ करने के लिए हमारे पास समय होगा।"



रवींद्र नाथ टैगोर का जन्म कलकत्ता नगर में 7 मई1861 को देवेंद्र नाथ टैगोर के घर मे हुआ, देवेंद्र नाथ टैगोर देश के एक माननीय धार्मिक ,सामाजिक नेता थे, उनके सभी भाई ऊंचे पदों में पदासीन थे, रवींद्र नाथ टैगोर की परवरिश में माता पिता अधिक ध्यान नहीं दे पाए क्योंकि माता हमेशा बीमार रहतीं थीं और पिता उनकी देखभाल के लिए इलाज के लिए बाहर रहते थे ,रवींद्र नाथ का बचपन का अधिकतर समय नौकरों के बीच बीता ,जो रवींद्र को घर मे बन्द कर बाजार चले जाते थे ,  ये अपनी माता पिता की चौदहवीं संतान थे और भाइयों में सबसे छोटे ,छोटे होने के कारण उनको दब कर रहना पड़ता था , इनकी माता का  नाम सारदा देवी था। 1875 में जब टैगोर मात्र 14 वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहांत हो गया। इन्ही परिस्थितियों के बीच उनका स्वभाव अंतर्मुख होने लगा और कल्पनाओं में विचरित होने लगा ,उनके 14 वर्ष की आयु में  स्वदेश प्रेम पर लिखी गई  सुन्दर कविता को अमृत बाजार पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
रवींद्र नाथ टैगोर बचपन से ही तीक्ष्ण मेधा के धनी थे, उन्होंने 8 वर्ष की छोटी सी उम्र में ही कवितायेँ लिखना प्रारम्भ  कर दिया ,  रवि बाबू के घर मे प्रायः   श्रेष्ठ  लेखकों और कवियों का आना जाना लगा रहता है, और  उनके प्रतिभा  निरंतर  विकसित  होती रहती थी ,इससे उनकी जन्मजात प्रतिभा निरंतर विकसित होती रही,1873 में 12 वर्ष की उम्र में जब उनका उपनयन संस्कार (जनेऊ)        हुआ तब उन्हें पिता के साथ हिमालय में घूमने का अवसर मिला,वहां पर वह पर्वत,कल कल बहती नदियों, झरनों,  बृक्षावलियों,फलों,फूलों से भरे मैदानों में घूमते हुए उनके आनंदित मन से कविताएं फूट पड़तीं थीं।

रविन्द्र नाथ टैगोर की  विलायत यात्रा--


रवींद्र नाथ टैगोर ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाने का निश्चय किया, वहां पर उन्होंने केवल कॉलेज के भीतर ही समय नहीं गुज़ारा अपितु उन्होंने वहां के सामाजिक ,सार्वजनिक जीवन को बारीकी से समझा और जाना कि भारत की संस्कृति और इंग्लैंड की संस्कृति में क्या अंतर है,वहां पर जाना कि वहां की संस्कृति में आरामतलबी का जीवन का महत्व कम है ,बल्कि हर व्यक्ति हर समय का सदुपयोग करना चाहता है,उन्होंने फ्रांस की भी यात्रा की और जाना कि यूरोप वासियों की उद्यमशीलता  निसंदेह अनुकरणीय है,इसी से वो संसार मे अपनी प्रधानता सिद्ध करने में सफल हुए,भारत वासियों में इस गुण की कमी को देखा की उदारचित्तवृति और संतोषी होने के कारण शिथिलता का जीवन  जीने के कारण भारत वासी यूरोप से पिछड़ गए और भारतीयों को यूरोप वासियों के इस गुण को ग्रहण करना चाहिये । उन्होंने जाना कि भारत मे ग़रीबी के जड़ों में प्रहार करना जरूरी है, उन्होंने जाना कि भारत के एक ही शहर में भूखे ,नंगे की टोलियां दिख जातीं है,जो इतने दुबले मैले कुचैले कपड़े पहने रहते हैं कि उनको पौष्टिक खाना तो छोड़िए सादा भोजन दो दिनों तक नसीब नहीं होता,वो  अश्वास्थ्यकर मलिन बस्तियों ,तंग गलियों में रहते है और उन्ही जुग्गी झोपड़ियों के बगल में ऊंची  ऊंची अट्टालिकाएं , बड़े बंगले तैयार हो जातें है ये अपने जीवन को  ऐश्वर्यपूर्ण ढंग से जीतें है,शादी विवाह समारोह में लाखों रुपये दिखावे में खर्च कर दिए जाते हैं।

  रविन्द्र नाथ टैगोर का भारत भ्रमण--

रवींद्र नाथ टैगोर ने विलायत से लौटने के बाद भारत भ्रमण किया ,गांव गांव को जानने के लिए ,ग्रामवासियों के निकट आने के लिए उन्हें जानने के लिए उन्होंने बैलगाड़ी को अपनाया देश घूमने के लिए जबकि उस समय रेल भी भारत मे चलने लगीं थी।
   देश भ्रमण के दरमियान उन्होंने देखा कि देश के किसान कितने फटेहाल है , कैसे देश के किसान बिना हवा वाले कोठरियों में पशुओं के साथ जीवन व्यतीत करते है ,गांव में छोटे बच्चों को पेट पालने के लिए छोटी अवस्था मे ही मजदूरी करना पड़ता है, गरीबी के कारण लोग शिक्षा भी नही ले पाते , गांव में अकाल,महामारी ,सूखा से बचने के लिए और सुरक्षा के कोई उपाय नहीं है गांव के लोंगों को बीमारियों का सामना तो करना ही पड़ता है साथ मे चोर डकैतों से भी ख़ुद को बचाना पड़ता है, उन्होंने गांव की दशा सुधारने के लिए पंचायत जैसी संस्था के प्रबंध का सुझाव दिया ताकि वह उचित प्रबंध कर सके,इस प्रकार  के देश के गऱीबी के चित्रण को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी रचनाओं में किया,उनकी रचनाओ के बाद ही दुनिया को भारत के गांव के दुर्दशा की जानकारी मिली कि कैसे अंग्रेजों ने 200 साल में भारत को लूटा जिससे लोग कंगाल हो गए।

           रवीन्द्र नाथ टैगोर ने न  केवल  2230 से अधिक गीत लिखे, एक हजार से अधिक कविताएं ,इनके उपन्यास ,नाटक विभिन्न विषयों पर निबंध लिखे गए, यात्रा संस्मरण लिखे गए,  उनके गीत से जिस संगीत की रचना अलग अलग रागों में हुई उसे रवीन्द्र  संगीत कहा जाता है     ।     रवीन्द्र बाबू की साहित्यिक कृतियाँ इसीलिए लिखी गईं है कि व्यक्ति का मानसिक स्तर उच्च हो और निम्न प्रवृत्तियों को त्यागकर  समाज का उपयोगी सदस्य बन सके उनके द्वारा लिखी" जनगणमन अधिनायक" कविता जो राष्ट्रप्रेम और  सच्ची अनुभूति का भंडार होने के कारण राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार कर ली गई है।

उनकी  कविता कहानियों में  व्यक्तियों के जीवन शैली में  नैतिक भावना ,मानसिक भावना को अच्छे से उद्घाटित किया गया है , उन्होंने अपने लेखन से व्यक्तियों के बीच शांति ,भाईचारा,  सौहार्द बनाये रखने के बेहतर प्रयास किये । रवींद्र बाबू की समस्त रचनाओं  से समाज या व्यक्तियों को उच्च प्रेणना मिलती है  उनका साहित्य सामाजिक जागृति और सुधार का बहुत बड़ा माध्यम है ,रवींद्र बाबू मानते थे कि साहित्य का पहला लक्षण लोक कल्याण है  जिस साहित्य  से प्रेणना पाकर   व्यक्ति अभावग्रस्त व्यक्तियों की सेवा में जुट जाएं  ,वही सच्चा साहित्य है,         इन्होंने गीतांजलि का अंग्रेजी में अनुवाद इंग्लैंड की समुद्री यात्रा के दौरान किया जब वो विधि की पढाई के लिए वहां जा रहे थे। 1913 में  तत्कालीन अंग्रेजी भाषा के कवि यीट्स के आग्रह पर " इंडिया सोसाइटी " ने उनके गीतों की पुस्तिका गीतांजलि  का अंग्रेजी  में अनुवाद हुआ  और इस अंग्रेजी संस्करण को  साहित्य के नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत  किया   यह  नोबल पुरूस्कार किसी भी विधा में किसी एशियाई को  पहली बार मिला था ,  गीतांजलि के सारांश एक लेखक ने इस प्रकार दिया है-
गीतांजलि में वैष्णव कवियों की प्रेम भावना का अनुपम परिचय दिया  गया है,साथ मे उपनिषद के दर्शन का मार्मिकता से समावेश किया गया है,कवि का  अनूठा ग्रंथ आध्यात्मिक  गगन पर ज्ञान सूर्य बनकर उदित हुआ है,जिसका प्रकाश पूरे विश्व में फैल रहा है , कवि कहता है कि ईश्वर को निकटता पाने के लिए जप तप योग , वैराग्य की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ईश्वर तो हृदय में हमेशा से विराजमान रहता है और उसके स्पर्श का प्रत्येक क्षण अनुभव करते हैं , कवि ईश्वर को हर जगह पाता है और उसके हर क्षण समीपता के कारण वह सभी पापों कुकर्मो से ख़ुद को दूर रखना चाहता है,कवि मृत्यु को भी एक मित्र की तरह देखता है,मृत्यु दयामय जननी है , जिस प्रकार माता बच्चे के मुंह से अपना स्तन छुड़ा लेती है तो शिशु दूसरा स्तन पाने के विश्वाश में आश्वस्त रहता हूं,इसी प्रकार मृत्य भी एक मानव रूपी शिशु को एक रिक्त जीवन से हटाकर दूसरे परिपूर्ण जीवन मे प्रविष्ट कराती है।


1912 में" जनगणमन अधिनायक " लिखा जो हमारा राष्ट्रीय गीत है , बंगला देश का राष्ट्र गान आमार सोनार बंगला"  भी  रविन्द्र नाथ टैगोर ने ही लिखा  भारत के राष्ट्र गान' जन गण मन 'जिसका मुख्य उद्देश्य ये बताना है कि देश की संस्कृति में विविधता होने के बाद भी सभी एक ही संस्कृति के हिस्से है।

            1902 में उन्होंने   शांति निकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना की ,जहां से कला के क्षेत्र के महान चित्रकारों  विनोदबिहारी मुखर्जी, रामकिंकर बैज़, आदि चित्रकारों ने देश को सांस्कृतिक आधार दिया।

             13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में जलियाँ वाला बाग़ नरसंहार में जब हजारों निहत्थे ,निर्दोष लोंगों  को ब्रिटिश हुकूमत ने गोलियों से मारकर हत्या कर दिया तब दुःखी होकर विरोध स्वरुप गुरुदेव ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए नाइट हुड की उपाधि को लौटा दिया।

           टैगोर ने चित्रकारी 67 वर्ष की उम्र में सूरू की,वो अपनी उंगलियों को स्याही डुबोकर अतियथार्थवादी चित्रकारी, अभिव्यंजनावादी चित्रकारी करते थे वो बच्चों की तरह असामान्य चित्रकारी करते थे,
1915 में ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम ने उन्हें सर की उपाधि से विभूषित किया।
           रवींद्र नाथ टैगोर ने कई यूरोपीय देशों की कई बार यात्रा की कई बार अमेरिका गए,और वहां के साहित्यिक वर्ग से संपर्क में आये,वो चाहते थे कि भारत मे शिक्षा का माध्यम मातृ भाषा मे हो,उन्होंने भारतीयों के अंदर स्वावलंबी भावना जगाने के लिए स्वदेशी आंदोलन को लोकप्रिय बनाने में अत्यधिक कार्य किया,1901 में उन्हीने शांतिनिकेतन में एक विद्यालय का निर्माण किया जो बाद में 1918 में विश्वभारती नामक विश्विद्यालय में बदल गया।
            गांधी जी जहाँ राष्ट्र वाद को आगे रखते थे वहीं टैगोर अन्तर्राष्ट्रीयता और विश्व बंधुत्व और मानवतावाद के समर्थक थे । इनके प्रयास से ही पूरब और पश्चिम की संस्कृतियाँ पास पास आईं।इस तरह ये एक महान दार्शनिक थे ।
             ये भारत माता के महान सपूतों में एक है जिन्होंने भारत के सामाजिक, राजनीतिक ,आर्थिक, धार्मिक, शिक्षा के लिए बहुत काम किये।
 स्वामी विवेकानंद जी को जाने इस लिंक से-
स्वामी विवेकानन्द :आध्यत्मिक चिंतक व समाज सुधारक

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