Raja Ram mohan ray :first indian social reformer, founder of bramh samaj

 राजा राम मोहन राय-- Raja Ram Mohan Ray


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            मैं आज आपको राजा राम मोहन राय के बारे में बताता हूँ ----/--/----
                राजा राम मोहन राय (raja ram mohan Ray ) की कहानी ब्रिटिश काल की है , जब देश मे मुग़ल काल की संस्कृति ,भाषा,और कुछ प्रशासन भी चल रहा था, परंतु ब्रिटिश का बंगाल में आधिपत्य के बाद ,उन्होंने भारत के संस्कृति में अधिक हस्तक्षेप के बिना व्यापार करने में ही ध्यान लगाया । परंतु अंग्रेजों के आगमन से भारत के लोंगों के बीच आधुनिक उदारवादी विचारों का प्रसार हुआ ,भारत के लोंगों को अपने धर्म की कई बुराइयां दिखाई दीं जो समाज मे जनसामान्य में व्याप्त थी , जैसे स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब थी , विधवा महिलाओं की स्थिति नारकीय थी।

                   इसी समय राजा राम मोहन राय का जन्म 1774 में बंगाल के हुगली जिले के राधानगर कस्बे में   कुलीन ब्राम्हण  परिवार में  हुआ  था , बंगाल के नवाबों ने इनके परिवार की सेवा के कारण इनके पूर्वजों को रामराय की उपाधि दी जो बाद में संक्षिप्त रूप से राय उपनाम से चलता रहा ।                 

ये बचपन से ही तीक्ष्ण दिमाग़ के और स्वभाव से विद्रोही थे। अपने विचारों के कारण उनके रूढ़िवादी परिवार ने उन्हें बाहर निकाल दिया वो इधर उधर भटकते रहे ,कुछ दिन नेपाल में रहे ,इस दौरान इन्होंनेअंग्रेजी,फ्रेंच,ग्रीक,जर्मन,हिब्रू,अंग्रेजी ,उर्दू ,फ़ारसी जैसी भाषाएं सीख डालीं।

भारत की सीखी हुई भाषाओं से भारत के धर्म ग्रन्थ पढ़ डाले वहीं विदेशी भाषा ज्ञान से इस्लाम ,ईसाई,विश्व की अन्य धर्मों का अध्ययन किया,जिससे वो विश्व की सभ्यता संस्कृतियों और यूरोप की संस्कृति को जान पाए ।
                           राजा राम मोहन राय को अपने देश से बहुत ही प्यार था,वो अपने देश के समाज की बुराइयों को खोज निकाला ,और अन्य धर्मों के पाश्चात्य ज्ञान का भी तार्किक चिंतन से उनकी कुछ कमियां और अच्छाइयों को जाना, परंतु वो जानते थे कि भारत के समाज के रूढ़िवादी बुराइयों को खत्म करने के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जर्रूरत है,वो चाहते थे कि भारत के लोग पश्चिम के तार्किक सोंच,वैज्ञानिक दृष्टिकोण,मानव गरिमा सामाजिक एकता के सिधान को अपनाएं।
                    राजाराम मोहन राय ने 1814 में कलकत्ता में आत्मीय सभा नामक संगठन को बनाया,राजाराम मोहन राय ने हिन्दू धर्म के आडंबरों का विरोध किया ,उन्होंने मूर्तिपूजा की आलोचना की और प्रमाण दिया कि हिंदुवो के प्राचीन ग्रन्थों में एक ब्रम्ह की उपासना की बात लिखित है,इस बात के प्रमाण के लिए उन्होंने वेदों ,उपनिषदों को संस्कृत से बंगला में अनुवाद करवाया ,उन्होंने पंडितों द्वारा कराए जाने वाले निर्रथक धार्मिक अनुष्ठानों को गलत बताया।
               उनके अनुसार यदि कोई भी दर्शन परंपरा तर्क के कसौटी पर खरा न उतरे तो मनुष्य को त्यागने में संकोच नही करना चाहिए ,उन्होंने कहा पाश्चात्य हो या वेदांत दर्शन मानव विवेक पर तर्कशक्ति पर आधारित हैं,उन्होंने यदि हिन्दू धर्म की बुराइयों को खोज निकाला तो ईसाइयों के  न्यू टेस्टामेंट में ईशा    मशीह के संदेश तथा उनकी कहानियों को अलग अलग बताया और सिर्फ़ सन्देश  ही सही बताए,  इसके लिए
उन्होंने 1820 में  प्रिसेप्ट्स ऑफ़ जीसस नामक पुस्तक प्रकाशित की  वो चाहते थे कि ईशा  मसीह के नैतिक संदेश हिन्दू धर्म मे समाहित कर लिए जाएं, कुछ इस्लाम के संदेशों को भी हिन्दू धर्म मे मिलाने की बात की, राजा राममोहन राय संसार के सभी धर्मों के मौलिक एकता में विश्वाश करते थे। वो इस्लाम की अच्छाइयों ,ईसाई की अच्छाईयों को हिन्दू धर्म में सम्मिलित कर पूरब और पश्चिम की के  श्रेष्ठ तत्वों को सम्मिलित कर एक महान संश्लेषण प्रस्तुत करना चाहते थे।
                     राजा राम मोहन राय ने जहां हिन्दू धर्म के अंदर व्याप्त बुराइयों को बाहर लाये वहीं हिन्दू धर्म को ईसाइयों के मिशनरी धर्मांतरण से बचाया ।

                   इन्होंने 1829 में 'ब्रम्ह सभा' बनाया जिसे बाद में "ब्रम्ह समाज "कहा गया इसका उद्देश्य हिन्दू धर्म मे सुधार लाना था,इस समाज ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और एक ब्रम्ह की पूजा के लिए कहा ,
उन्होंने बताया कि ब्रम्ह समाज के सिद्धान्त  मुख्य आधार मानव विवेक,वेद ,उपनिषद हैं। उन्होंने एकेश्वरवाद का समर्थन किया,उन्होंने कहा किसी बनाई गई वस्तु को ईश्वर मानकर नही पूजना चाहिए  न  ही किसी पुरुष और पुस्तक को  मोक्ष का साधन मान लेना चाहिए।

                  राजा राम मोहन राय प्रारंभिक शिक्षा के प्रारंभिक समर्थक एवं प्रचारक थे , वो अंग्रेजी  शिक्षा के प्रबल पक्षधर  वो कहते थे कि भारत की शिक्षा के लिए अंग्रेजी शिक्षा बहुत ही जरूरी है , इन्होंने कलकत्ता में डेविड हेयर की सहायता से 1822-23 में हिन्दू कॉलेज की स्थापना की । राजा राम मोहन राय शिक्षा के आधुनिकीकरण के प्रबल  समर्थक थे, शिक्षा के क्षेत्र में गणित ,रसायनशास्त्र ,भौतिक विज्ञान , प्राणीशास्त्र आदि विषयों का वैज्ञानिक अध्ययन चाहते थे ।

बंगला भाषा के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान है ,उन्होंने बंगला व्याकरण का संकलन किया , उन्होंने बंगाली पत्रिका  "संवाद कौमुदी" का प्रकाशन किया ,
उन्होंने 1833 में समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन चलाया  ताकि समाचार पत्रों में स्वतंत्रता पूर्वक  अपने विचारों की  अभिव्यक्ति किया जा सके, इसके कारण 1835 में कुछ स्वतंत्रता समाचार पत्रों को मिली। वो स्त्रियों के अधिकारों के समर्थक थे। वो चाहते थे कि स्त्रियां अपनी सामाजिक मर्यादाओं  के अंतर्गत अपने अधिकारों का प्रयोग करें।

                   राजनीतिक क्षेत्र में उन्होंने प्रशासन में सुधार की बात कही, उन्होंने देश के युवाओं में राजनीतिक जागरण पैदा करने का प्रयास किया ,बंगाली जमींदारों द्वारा कृषकों के शोषण की आलोचना की । उन्होंने कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक करने की मांग की ,भारतीयों और यूरोपियों के बीच न्यायिक समानता की बात की।

                    राजा राम मोहन राय अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में गहरी दिलचस्पी ली 1823 में स्पेनिश अमेरिका में क्रांति सफल होने पर भोज तक करवाया,उन्होंने स्वतन्त्रता, जनतंत्र का समर्थन किया,
 यही स्वतंत्रता की विचारधारा देश की आजादी के समय काम आई।

          1830 में  उस समय के दिल्ली के नाममात्र के पेंशनभोगी मुगल बादशाह अकबर द्वितीय थे , इन्होंने
राजा की उपाधि से विभूषित करके राममोहन राय को अपने पेंशन के कार्य हेतु अपना प्रतिनिधि बनाकर लंदन भेजा ,तत्कालीन  ब्रिटिश सम्राट ने राजा राम मोहन राय को समुचित सम्मान दिया।

      27 सितंबर  1833 में राजा राम मोहन राय की मृत्यु इंग्लैंड   के ही ब्रिस्टल नामक  नगर में केवल नौ दिन की बीमारी के बाद निधन हो गया ।

            उनके क्रांतिकारी विचारों के कारण ही भारत मे बुद्धिजीवियों में स्वतंत्रता,समानता की विचारधारा का प्रस्फुटन हुआ ,इसी कारण इनको भारत की स्वतंत्रता का अग्रदूत कहा गया । भोर का तारा जैसे संज्ञा से उद्भूत किया गया।
                     
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