What is Attitude या अभिवृत्ति क्या है, how it change our behaviour

मनोवृत्ति या Attitude :::

मनोवृति क्या होती है हिंदी में---

 What is Attitude या अभिवृत्ति क्या है, how it change our behaviour


What is Attitude या अभिवृत्ति क्या है, how it change our behaviour


 मनोवृत्ति या अभिवृत्ति या  दृष्टिकोण या एटिट्यूड शब्द का प्रयोग हम दिन प्रतिदिन सुनते हैं, कि फला व्यक्ति का किसी मामले में कैसा दृष्टिकोण है , मनोवृत्ति किसी व्यक्ति की किसी घटना ,समूह, व्यक्ति, वस्तु के प्रति सकारात्मक या नकारात्मक सोंच को प्रकट करती है, इस सोंच के कारण उस समूह , व्यक्ति, वस्तु के प्रति वही व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव लातें है ,जो उसके व्यवहार में साफ़ दिखाई देतें है , यदि किसी व्यक्ति का किसी संगठन के प्रति सकारात्मक view है तो वह  संगठन में अपनी ऊर्जा का महत्तम योगदान देता है, वहीं संगठन के प्रति नकारात्मक attitude होने पर वह संगठन के कार्यों में अरुचि रखेगा या संगठन छोड़ भी देगा। 
        मनोवृत्ति से  व्यक्ति एक खास दिशा में अपनी शक्ति को लगा देता है, जिसके कारण वह अन्य दिशाओं को छोड़कर एक निश्चित दिशा में व्यवहार करने लगता है। 
   'इग्ली और चायकेन् "के अनुसार--परिभाषा--
" Attitude एक मनोवैज्ञानिक झुकाव है जिससे किसी विशेष वस्तु के प्रति पक्ष या विपक्ष से मूल्यांकन द्वारा  अभिव्यक्त किया जाता है"
         
      हम सदैव हर वस्तु के बारे में निर्णय लेते हैं और निर्णय पसंद नापंसद पर निर्भर करता है ,जैसे  मुझे  शराब पीना पसंद नहीं है, मुझे चॉकलेट बहुत पसंद है, यही मूल्यांकन कि  उसके हिसाब से कोई वस्तु कैसी है, कोई कार्य करना कैसा लगता है , किसी संस्थान के अंदर जॉब करने में  कैसा रुझान है , यही व्यक्ति द्वारा किया गया मूल्यांकन मनोवृत्ति कहलाती है।
      जब हम स्वयं के प्रति अभिवृत्ति की बात कहेंगे तो वो आत्म सम्मान ( self esteem) कहलाता है , जब किसी समूह विशेष के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति " पूर्वाग्रह "कहलाता है , व्यक्ति विशेष के प्रति अभिव्यक्ति" अंतर्वैयक्तिक  आकर्षण " तथा खुद की नौकरी की अभिवृत्ति "रोजगार संतुष्टि "(job stisfaction) कहलाती है।

        अभिवृत्ति की विशेषताऐं--

अभिवृत्ति का सम्बन्ध हमेशा  विचार, घटना , विषय से होता है , यदि किसी घटना में विवाद है तो व्यक्ति जल्द ही उस घटना के बारे में अनुकूल और प्रतिकूल अभिव्यक्ति दे देगा।

     1-  अभिवृत्ति सीखी जाती है---- 
अभिवृत्ति जन्मजात नहीं होती, कोई भी व्यक्ति उसे जीवन भर सीखता रहता है, प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में विभिन्न  घटनाओं के प्रति अलग अलग राय; समय के साथ बना लेता है, तथा वह जीवन भर अनुकूल और प्रतिकूल अभिवृत्तियां  विकसित कर लेता है।

   2- अभिवृत्ति स्थाई होती है---
एकबार अभिवृत्ति विकसित हो जाने पर वह स्थायी  हो जाती है,  सामान्य दशा में वह नही बदलती , परंतु परिस्थिति में बदलाव होने पर कभी कभी अभिवृत्ति भी धीरे धीरे बदल जाती है।

   3 - अभिवृत्ति में तीव्रता का गुण होता है---
 जब एक व्यक्ति का दूसरे के साथ प्रतिकूल अभिवृत्ति होती है तो , वह प्रतिक्रिया स्वरुप व्यवहार में कुछ प्रकट करता है , जैसे वह  किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति खाना,पीना ,उठना बैठना बन्द कर सकता है , यदि किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति  कम प्रतिकूल अभिवृत्ति रखता है तो वह दूसरे व्यक्ति के साथ उठेगा बैठेगा ,पर भोजन नही करेगा।
  अभिवृत्ति में प्रेणनास्पद गुण होते हैं,उदाहरण के लिए उसके मातापिता , शिक्षक, मित्र , के प्रति अनुकूल अभिवृत्ति के कारण सौहार्द पूर्ण व्यवहार प्रकट होते हैं , वही चोर ,लुटेरे, जेबकतरे, किडनैपर, अपराधियों के प्रति प्रतिकूल अभिव्यक्ति हो जाती है।     

   अभिवृत्ति(Attitude)के  महत्वपूर्ण घटक--

  अभिवृत्ति के तीन  महत्वपूर्ण घटक(component)  होते हैं। जिन्हें संक्षेप में CAB कहते हैं।

संज्ञानात्मक घटक(cognitive component)
भावनात्मक घटक(Affective component)
व्यवहारात्मक घटक(Behavioural Component)

संज्ञानात्मक घटक--(cognitive component)


         जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु आदि के बारे में उपलब्ध सूचनाओं के द्वारा या फ़िर अपनी आंतरिक संचेतना में बचपन से बनाई गई सूचनाओ के द्वारा कोई मत सकारात्मक  या नकारात्मक बना लेते हैं वो संज्ञानात्मक घटक कहलाती है , संज्ञानात्मक संबंध सिर्फ भावना से  न होकर  ज्ञान  तत्व से भी होता है जैसे सांप जहरीले होते है , चॉकलेट खाने से दांत खराब हो जाते है , अत्यधिक शराब से लीवर ख़राब हो जाता है , तम्बाकू से कैसर होता है , मॉर्निंग वॉक सेहत के लिए फायदेमंद है।

  भावनात्मक घटक( Affective Component)

 भावनात्मक घटक से तात्पर्य किसी मनोवृति वस्तु के प्रति व्यक्ति के पसंदगी और नपसंदगी की अभिव्यक्ति है ,  जैसे सांप जहरीले होते है इसलिए उसे सांप से नफरत है, भावनात्मक घटक का मापन प्रत्यक्ष रूप से संभव है, किसी व्यक्ति विशेष ,वस्तु या घटना से सम्बन्ध होता है जिसमें भय सहानुभूति , घृणा ,पसंद ,संतुष्टि है।  विज्ञापनों में भावनात्मक अपील का सहारा लिया जाता है, स्वास्थ्य अभियान  में भावनात्मक अपील का सहारा लिया जाता है ,जैसे एक बून्द जिंदगी का , धूम्रपान  घातक है को बताने के लिए सिगरेट के पैकेट में बड़ा सा चित्र कैंसर से चुने हुए फेफड़े का बना होता है।
   

 व्यवहारात्मक घटक- (Behaviour component)

वस्तु के प्रति व्यवहार या  क्रिया करने की  तत्परता को व्यवहारात्मक संघटक कहते हैं , इसका अर्थ ये है कि व्यक्ति का किसी मनोवृति  के कारण कार्य के प्रति कैसा व्यवहार करता है जैसे काले सांप को देखने के बाद भाग सकता है ,  जैसे किसी को मालूम है कि शराब से लीवर ख़राब हो जाता है इसलिए वो शराब से दूर रहेगा,, जैसे किसी को मालूम है कि चाकलेट खाने से दांत ख़राब हो जाते है परंतु फिर भी वह चाकलेट खाता है , ये व्यवहार उसके संज्ञान के विपरीत है।
    मनोवृति के प्रकार--
1) प्रत्यक्ष मनोवृति(Explicit Attitude)
2)अप्रत्यक्ष मनोवृति(Implicit Attitude)

प्रत्यक्ष मनोवृति -(Explicit Attitude)


प्रत्यक्ष मनोवृति में व्यक्ति ऐसी मनोवृत्तियों के प्रति सचेत रहता है ,अर्थात ऐसी मनोवृत्तियां सोंचसमझकर बनाई जातीं है, व्यक्ति अपने आसपास की घटनाओं से अवगत रहता है, उन्ही से प्रभावित होकर वो एक खास दिशा में सोंचता है , इसमें व्यक्ति  वर्तमान समय में हुई किसी घटना  से प्रेरित होकर अपने व्यवहार को निर्देशित करता है ,और व्यवहार में उसकी मनोवृति दिखाई देती है।


  अंतर्निहित या अप्रत्यक्ष मनोवृति----(Implicit Attitude )

इस मनोवृत्ति (अभिवृत्ति,attitude) में  व्यक्ति के मानसपटल में भूतकाल की  घटनाएं यादों के रूप अचेतन मन में पैठ बना लेती है , अचेतन मन में बैठे पूर्व संचित अभिधारणा के कारण व्यक्ति अपने व्यवहार में विशेष तरीके से अभिव्यक्त करता है।अंतर्निहित अथवा अप्रत्यक्ष मनोवृत्तियों में हमारे सांस्कृतिक प्रतिरूपों का निश्चित प्रभाव पड़ता है, अन्तर्निहित मनोवृत्तियों में   ज्यादातर   संवेगात्मक घटकों का प्रभाव पड़ता है , इसके अन्तर्गत व्यक्ति के पसंदगी, नापसंदगी घृणा सहानुभूति जैसे विषय  आतें है।

  मनोवृत्ति के कार्य::


 मनोवैज्ञानिक, ' काज' ने बताया मनुष्य उन कार्यों को करने में ज्यादा तरज़ीह देता है , जिनसे उसे अपने लक्ष्य प्राप्ति में सहायता मिलती है।
मनोवृति के प्रमुख कार्य इस प्रकार हैं।
उपयोगिता वादी कार्य( utilitarian Function)
उपयोगिता वादी कार्य--
काज के अनुसार  जहां पुरुस्कार मिलने की सम्भावना होती है वहां पर मनोवृत्ति सकारात्मक होती है ,जहां दंड का भय होता है वहां पर मनोवृति नकारात्मक होती है ,अर्थात जहां किसी  व्यक्ति को  पुरुस्कार     मिलने की सम्भावना दिखती है वहां वह उस कार्य को बार बार करेगा और जहां दंड की स्थिति उत्पन्न होगी वहां वह  उससे दूर भागेगा , इस प्रकार जो कार्य व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति में सहायता करते है   व्यक्ति उन कार्यों को करने में सदैव रूचि रखेगा,  अधिकाधिक करेगा। इस प्रकार की  अभिवृत्ति  को  उपयोगितावादी अभिवृत्ति कहते हैं।

 ज्ञान कार्य :: 

 मनोवृति का ज्ञान प्राप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ,जब  हमारी  किसी कार्य में मनोवृति अनुकूल होती है तो हम उस घटना या उस वस्तु के बारे में जानने की भरपूर कोशिश करतें है ,उसके जड़ तक जाने का प्रयास करतें है , इस ज्ञान से व्यक्ति के अनुभव में बृद्धि होती है और वह दुनिया में सामंजस्य स्थापित करके अपना स्थान बना पाता है।

 रूढि बद्धता( Stereo typing) --

रूढि बद्धता ऐसा मानसिक ढांचा है जो किसी व्यक्ति की विशेषताओं के बारे में पूर्वानुमान की अनुमति प्रदान करता है, इसका मतलब ये है कि किसी व्यक्ति के मनोवृति में अपने आदर्श  व्यक्तियों की छाप पड़ती है और उस व्यक्ति के व्यवहार में उनके आदर्श ,उनकी शिक्षाओं का प्रभाव दिखाई देता है , नकारात्मक अभिवृतियां ऐसे  लोंगों से दूर रखेंगी।

 अहम् रक्षात्मक कार्य (ego  defensive  function)-------

 मनोवृति व्यक्ति को चिंता , निराशा , द्वंद्व के समय  निर्णय लेने में मदद करता है,  व्यक्ति कई बार अपनी अहम रक्षा के लिए अपनी मनोवृति को बदल लेता है और नई मनोवृति विकसित कर लेता है, उसमे कई कटु सत्यों को सुनने की क्षमता विकसित हो जाती है, इसे  युक्तयाभ्यास (rationalization) कहते है, यह हमें जीवन की कड़वी सच्चाइयों को स्वीकार करने में मदद करती है और जीवन के   भावनात्मक संघर्षों में व्यक्ति की रक्षा करती है , इसप्रकार इस मनोवृत्ति से जीवन में आत्मरक्षा में मदद करता है।

  मूल्य अभिव्यंजक कार्य----- (value expressive function)------


 मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कार्य ये भी है कि व्यक्ति इसके माध्यम से स्वयं को बेहतर तरीके से समझ पाता है, मनोवृति व्यक्ति को उसके मूल्य के अनुकूल कार्य करने को प्रेरित करता है व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मूल्य के अनुसार अपने मूल्य को भी समय समय पर बदल देता है और मूल्यों के अनुसार ख़ुद के मनोवृति को प्रदर्शित करता है।
 उदाहरण एक व्यक्ति चाहे कभी भी समलैंगिकों से नही मिला हो परंतु वह समलैंगिकों से सिर्फ इसलिए नफ़रत करता है क्योंकि उसके समाज में समलैंगिकों को घृणा की दृष्टि से देखा जाता है ।

  सामाजिक पहचान--

मनोवृत्ति से व्यक्ति को एक सामाजिक पहचान मिलती है , उसके मनोवृति के कारण विशेष कार्यों से समाज उस व्यक्ति को पहचानता है । जैसे यदि कोई व्यक्ति अपनी बाइक में तिरंगा झंडा लगाकर घूमता है तो उसे समाज उस विशेषता से पहचानने लगता है कि  फलां व्यक्ति के बाइक में तिरंगा लगाता है ,कोई व्यक्ति बड़ी बड़ी गलमुंछ रखता है तो भी उसकी पहचान समाज में उसी के द्वारा होने लगती है

  मनोवृति   या अभिवृत्ति  (Attitude) का निर्माण-

मनोवृति के निर्माण के कई सिद्धान्त प्रचलित हैं, मनोवृति का निर्माण मानव द्वारा बचपन से लेकर आयु बृद्धि होने के साथ नित नए अनुभवों के कारण व्यक्ति,वास्तु,स्थान, परिस्थिति के अनुसार अनुकूल और प्रतिकूल मनोवृति विकसित कर लेता है, मनोवृति एक समय के साथ अर्जित गुण है , हालाँकि मनोवृति के निर्माण में कुछ आनुवंशिक कारकों की भी भूमिका मानी गई है।
   इससे संबंधी  कुछ सिद्धान्त इस प्रकार हैं--

 पावलोव  का क्लासिकल अनुकूलन सिद्धान्त---

   इस सिद्धान्त में जब व्यक्ति समाज में रोज किसी वस्तु घटना के बारे में कुछ खास तरह विचार नकारात्मक या सकारात्मक  विचार  सुनता है या देखता है  तो व्यक्ति उसके प्रति अनुकूलित हो जाता है और उसमे इसी तरह की मनोवृति विकसित हो जाती है। क्लासिकल अनुकूलन के कारण व्यक्ति के व्यवहार में जबरदस्त परिवर्तन देखने को मिलता है व्यक्ति चाहे उस घटना से या उस वस्तु से कोसों दूर हो वह उस घटना के एक भी अंश की कोई जानकारी न हो परंतु अपने आसपास उसके बारे में लगातार सुनाई देने वाली बातों को अपने मस्तिष्क पटल में संजो लेता है , और एक मनोवृति विकसित कर लेता  है।NNJUS
       पावलोव  ने कुत्तों पर एक रिसर्च किया था वो कुत्तों को जब जब भोजन परोसा साथ में एक बजती हुई घण्टी भी रख दी , ऐसा  उन्होंने कई महीने किया , एक बार जब उन्होंने सिर्फ घण्टी कुत्तों के सामने रखी तब भी कुत्तों ने  वही   प्रतिक्रिया व्यक्त की जैसा भोजन परोसते समय होती है , इसमें घण्टी ने प्रेरक का काम करती है इस प्रकार क्लासिक अनुकूलन में उद्दीपकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

  साधनात्मक अनुकूलन---------( instrumental conditioning) --

इसमें व्यक्ति उस अभिवृत्ति को जल्दी स्वीकार कर लेता है जिसमे पुरुस्कार मिलने की सम्भावना होती है,  और उन अभिवृतियों को ग्रहण नही करता जिसमे डर की सम्भावना होती है  ,इसी तरह समाज में जिन मूल्यों को स्वीकार किया जाता है है वो जल्द अभिवृत्ति का हिस्सा बन जाते है ,जो  जिन मान्यताओं और मूल्यों की समाज में स्वीकार्यता नही होती वो अभिवृत्ति का हिस्सा नही बन पाते , इसी तरह वो बच्चे जिनके माता पिता बच्चे के किसी उपलब्धि पर पुरस्कार देते है वो बच्चे हर उपलब्धि को प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं ,पर जिन बच्चे के माता पिता उपलब्धियों पर कोई प्रतिक्रिया नही व्यक्त करते उन बच्चों में पढ़ाई के प्रति अरुचि पैदा होने लगती है।

    अवलोकन शिक्षण (ऑब्सर्वशनल  लर्निंग) (observational learning) ----------- 


अवलोकन द्वारा भी अभिवृत्ति निर्माण में सहायता मिलती है ,क्लास में जब कोई स्टूडेंट किसी दूसरे बच्चे के होमवर्क नही कर पाने के कारण दण्डित होते देखता है तो दूसरा छात्र भी भयवश अवलोकन द्वारा अभिवृत्ति विकसित कर लेता है कि उसके भी होमवर्क नही करने से दण्डित किया जायेगा। धर्म सम्बंधित ,रीति रिवाज संबधित विभिन्न कार्य भी अवलोकन द्वारा ही अभिवृत्ति का हिस्सा बन जाते हैं।
 आनुवंशिक कारक--- ----

अभिवृत्ति (attitude)निर्माण में कुछ आनुवंशिक कारक भी योगदान देते है ,व्यक्तियों का गंभीर होना या बातूनी होना , किसी विशेष चीज के प्रति लगाव होना , अत्यधिक सोशल  होना ये सभी बातें अनुवांशिक कारण से होतीं है।
       इसके अलावा कई ऐसी दशाएं होती है जिनसे मनोवृति का निर्माण होता है
 १-माता पिता द्वारा दिए गए सीधे  निर्देश विशेष प्रकार के अभिवृत्ति का निर्माण करते हैं,माता पिता अपने बच्चों को जब धूम्रपान, और शराब हानिकारक बतातें है तब   बच्चे  धूम्रपान के प्रति नकारात्मक अभिवृत्ति विकसित कर लेतें हैं।
२-कई धार्मिक अभिवृत्ति को हम समूह में रह कर सीख जातें हैं, जैसे मन्दिर में फूल फल, चढाने के व्यवहार को सीख लेतें हैं जब दुसरो को ऐसा करते देखते हैं
३-मीडिया, टी वी, फ़िल्में,पत्रिकाएं भी अभिवृत्ति  निर्माण में सहायता करतें हैं।
४-आज कल बहुत सी अभिवृत्तियों का निर्माण सूचनाओं के द्वारा हो जाता है इसमें सोशल मीडिया का अत्यधिक योगदान है ।

 अभिवृत्ति (attitude) में कब बदलाव होता है??
अभिवृत्ति के बदलने में तीन कारक महत्वपूर्ण हैं।
 स्रोत:: जब पहले से चली आ रही सुचना में बदलाव करना होगा तब लोंगों की अभिवृत्ति बदलने के लिए सुचना देने वाला ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसका देश और समाज में महत्वपूर्ण योगदान हो ,उस शक्शियत  के कहने पर लोग अपनी पूर्वधारणा में बदलाव कर देतें है।
सन्देश::
सन्देश की प्रकृति बहुत महत्वपूर्ण होती है, लोंगों को दिए गए सन्देश में ऐसा स्पष्ट सन्देश हो जिससे लोग आसानी से ग्रहण कर सकें, विभिन्न विज्ञापनों  में व्यक्तियों को पूर्व विज्ञापनों की धारणा बदलने के लिए कुछ इमोशनल, भय का सन्देश निहित होता है।
   व्यक्ति::
सामान्यता किसी व्यक्ति विशेष के प्रति बनी हुई अभिवृत्ति को बदलना ज्यादा कठिन है , परंतु किसी वस्तु के प्रति सोंच में शीघ्र बदलाव होता है।विज्ञापन एजेंसियों में अभिवृत्ति में बदलाव के लिए इन्ही तीन कारकों का इस्तेमाल किया जाता है।

  अभिवृत्ति  ( Attitude) परिवर्तन-- 

कुछ अभिवृत्तियां जो लंबे समय से बन रहीं थी उनमे परिवर्तन की कम सम्भावना होती है जो व्यक्ति के मूल्यों से जुड़ चुकी  होतीं है, जो अभिवृत्तियां अभी भी विकासमान है उनमे परिवर्तन की सम्भावना अधिक होती है।
  अभिवृति में परिवर्तन कैसे होता है इसके लिए कुछ सिद्धान्त हैं।

   अभिवृत्ति परिवर्तन का विसन्नादिता सिद्धांत---(cognitive dissonance)

   लियॉन फेस्टिंगर ने  1956 में  वेन प्रोफेसी  फिल्स नामक  पुस्तक में   संज्ञात्मक  विसंगति का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।
  संज्ञात्मक असंगति एक असहज अहसास है जो विरोधाभासी विचारों के  साथ साथ रहने के कारण होता है  , असंगति तब पैदा होती है  जब व्यक्ति कुछ वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक एक अप्रिय गतिविधि में सम्मिलित होता है , असंगति का महत्वपूर्ण कारण है एक विचार जो स्वधारणा के मौलिक तत्वों से संघर्ष करता है।हमारे मष्तिष्क  ने दो विरोधी विचारों के कारण उत्पन्न द्वन्द्व के कारण संघर्ष करना पड़ता है, इसे हमारे मस्तिष्क ने  संज्ञानात्मक  विसन्नादिता के प्रक्रिया द्वारा इन संघर्षों को हल करने का तरीका विकसित कर लिया है , इस सिद्धांत के अनुसार जब हमारे सामने दो विरोधी विचार हो तो आप वह करेंगे जो आपको कम नुक्सान पहुंचाए , उदाहरण के लिए जब हम जानवरों के वध करने के ख़िलाफ़ है और जानवरों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते है , दूसरी  ओर मांस खातें है या उनकी खाल से बने जैकेट या फ़र की टोपी लगातें है तो संज्ञानात्मक विसन्नादित्ता उत्पन्न होगी  जिसमे व्यक्ति को शर्म , क्रोध, तनाव का सामना करना पड़ेगा।
                            असंगति को सफाई देने , आरोप लगाने और इनकार करने से कम किया जा सकता है।
                       
 असंगति कम करने के लिए एक प्रेरक ऊर्जा होनी चाहिए  यानि एक ऐसी प्रेणना होनी चाहिए जो असंगति को कम कर सके।

        जब कभी व्यक्ति के विश्वास और व्यवहार में अंतर होता है तब असंगति उत्पन्न होती है , कभी कभी एक व्यक्ति को दूसरों की मर्जी का समर्थन किसी दबाव में करना पड़ता है जबकि वह व्यक्ति सामान्य दशा में उस मत सिद्धान्त या उसूल के ख़िलाफ़ रहता है , यही द्वंद्व की स्थिति  में विसन्नादिता (dissonance) की स्थिति उत्पन्न होती है और दो में से एक  सही विकल्प चयन नही कर पाने का दुःख बना रहता है , और बेमन स्वीकार किये गए विकल्प के साथ जीने के लिए वो व्यक्ति खुद के अभिवृत्ति में परिवर्तन लाता है।

उदाहरण के लिए एक व्यक्ति धूम्रपान के बारे में जानता है कि उसके एक दोस्त को फेफड़े का कैंसर धूम्रपान से हो चुका है पर वो धूम्रपान छोड़ने के प्रयास के बाद भी जब उसे छोड़ नही पाता तो वह कुछ धारणायें बना लेता है जैसे कि धूम्रपान से हर व्यक्ति को कैंसर नही होता।

  इसी तरह अंगूर खट्टे हैं की कहानी में लोमड़ी जब अंगूर नही खा पाती तो वह उनको खट्टा कहकर ख़ुद संतोष कर लेती है या ख़ुद की अभिवृत्ति बदलने की कोशिश करती है।
 विसन्नादिता को घटाने के लिए व्यक्ति कुछ नई सूचनाओं को संगृहीत करता है इन नवीन सूचनाओं द्वारा  प्राप्त जानकारी से व्यक्ति समझता है कि वास्तव में कोई असंगति नहीं है।

 सामंजस्य सिद्धान्त--- (congruity theory)

 इस सिद्धान्त में अभिवृत्ति में परिवर्तन तब होता है जब उसके मनोवृति के संज्ञानात्मक तत्वों में असंगति(inconsistency) पैदा होता है , इस द्वन्द की स्थिति में असंगति के कारण तनाव होता है , इस असंगति को कम करने के लिए जब दो मनोवृत्तियों में कमजोर मनोवृति में ज्यादा परिवर्तन होता है और जो मनोवृति ज़्यादा मजबूत है उसमे कम परिवर्तन होगा। इस प्रकार व्यक्ति के संज्ञानत्मक क्षेत्र में सामंजस्य स्थापित हो जायेगा।
केलमैन का त्रिप्रक्रिया सिद्धान्त- (kelman three process theory)- kelman ने अभिवृत्ति(attitude)परिवर्तन की व्याख्या तीन प्रक्रियाओं के आधार पर किया।

१-अनुपालन २- आत्मीकरण३- आंतरीकरण

 (1)अनुपालन(compliance):

 जब व्यक्ति किसी समूह और व्यक्ति के विचार से असहमत होने के बावजूद किसी पुरुस्कार के प्राप्त होने के लालच में या किसी दंड के भय से उस विचार को स्वीकार कर लेता है तो उसे अनुपालन (compliance) की संज्ञा दी जाती है, अनुपालन के कारण मनोवृति में परिवर्तन अस्थाई होता है , यानि व्यक्ति इस स्थिति में ऊपरी मन से उस विचार में सहमति देता दीखता है पर भय समाप्त हो जाने पर वह अपने अंदर के विचार के अनुसार व्यवहार करने लगता है।

(2) आत्मीकरण  (Identification):: ::

 आत्मीकरण के कारण एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति या समूह के विचार इसलिए नही स्वीकार करता क्योंकि  कोई भय या लालच होती है बल्कि वह उस समूह के सिद्धान्त इसलिए स्वीकार कर लेता है क्योंकि उसे ऐसा करने में उस समूह या व्यक्ति से एक संतोषजनक आत्मीय  सम्बन्ध स्वीकार करने में मदद मिलती है। जैसे रोगी डॉक्टर के निर्देशों का पालन करता है क्योंकि ऐसा करने से वो ठीक हो  सकता है। बच्चे अपने मातापिता की हूबहू नकल उतारने की कोशिश करतें हैं, एक आई ए एस अधिकारी या पुलिस अधिकारी प्रशिक्षण के दरमियान उन व्यवहारों को  आत्मसात कर लेता है ,जो  उस समुदाय द्वारा ट्रेनिंग के समय बताया जाता है।

 (3)आंतरीकरण---(Internalization) 

आंतरीकरण में व्यक्ति दूसरों के व्यवहारों को स्वेच्छा से इसलिए स्वीकार कर लेता है क्योंकि ये व्यवहार उसके ख़ुद के मूल्यों के अनुरूप  होते हैं, आंतरी करण में जब व्यक्ति के अभिवृत्ति में परिवर्तन होता है तो वो लंबे समय तक रहता है क्योंकि ये परिवर्तन उसके मूल्यतंत्र से समरूपता दिखलाते हैं।
   मनोवृति की विशेषतायें::
मनोवृति की विशेषताये तीन प्रकार की हैं।
【१】मनोवृति की तीव्रता----
मनोवृति की तीव्रता का  ज्ञान मनोवृति तन्त्र  के  केंद्र और परिधि से करतें है ,जिस मनोवृति को कोई  व्यक्ति ज़्यादा महत्व देता है ,तब  वो मनो वृति तंत्र  के केंद्र में होता है, जिस मनोवृति को ज़्यादा महत्व नही देता उसको तंत्र के परिधि में रखा जाता है।

【२】मनोवृति  तत्परता  (Attitude accessbility):

मनोवृति  एक अनुकूल और प्रतिकूल  प्रतिक्रिया करने मानसिक ततपरता है यदि कोई मनोवृति    व्यक्ति के अचेतन मन में तीव्रता से समाई होती है वह कितनी तेजी से क्रियात्मक रूप से बहार आती है, इस प्रकार की मनोवृतियां अपेक्षाकृत ज्यादा स्थाई होती हैं।
 【३】मनोवृति की द्वैधवृति  (attitude ambivalane) :
  ज्यादातर अभिवृत्ति (attitude)   सकारात्मक (positive) या नकारात्मक ( negative) होतीं है  परंतु व्यक्ति कभी  कभी व्यक्ति  उस घटना  के  अनुकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करता है कभी कभी प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त  करता है    कभी कभी व्यक्ति किसी व्यक्ति, स्थान , घटना का  मूल्यांकन सही नही कर पाने के कारण उसकी प्रतिक्रिया  मिस्रित होती है ।
     
   प्रत्यायन(Persuasion)
प्रत्यायन में दूसरों की मनोवृति को बदलने की कोशिश की जाती है, दूसरों को किसी विचार,मुद्दे , वस्तु पर सहमति बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है
,  प्रत्यायन (persuasion) पर सर्वप्रथम  sciencetific  reserch  येल   विश्वविद्यालय के शिक्षक  होवलैंड ने किया , उन्होंने  स्रोत, सन्देश, और श्रोता के आधार पर प्रत्यायन का विश्लेषण किया , प्रत्यायन तभी अधिक प्रभावकारी होता है जब  श्रोत से आई सूचना  विश्वसनीय हो  स्रोत या प्रत्यायक अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ हो  या श्रोत या प्रत्यायक का आकर्षक व्यक्तित्व हो  यानि persuate करने वाला व्यक्तित्व  प्रभावशाली ,  आकर्षक,चमत्कारी   होगा तो प्रभावशीलता ज्यादा होगी

 धारणा ( emotion) .........

धारणा एक शक्तिशाली बल है और समाज पर इसका एक गहरा प्रभाव है, राजनीतिक, विधिक निर्णय,मास मीडिया, समाचार व विज्ञापन धारणा की  शक्ति से प्रभावित है और बदले में हमे भी  प्रभावित करतें है, इसे positively देखेंगे तो जब हम प्लास्टिक के थैलों के बदले घर से जूट के बैग लेकर चलने की आदत को persute करें  या गुटखा न खाने ,धूम्रपान त्यागने के लिए सन्देश प्रसारण जिससे धारणा बदला जा सके, धारणा में सांकेतिक शब्दों का इस्तेमाल चित्र , आवाज़ आदि का प्रयोग होता है , यह दूसरों को प्रभावित करने का एक प्रयास है , इसमें लोग अपनी धारणा से वस्तु का चयन स्वेच्छा से करतें है,।
  इसमें एक प्रभावी द्विमार्गीय  संचार होता है  जिसमे प्रेषक और स्वीकारकर्ता(  receiver  )         गैरशाब्दिक( non vorbal), सांकेतिक रूप से जुड़े होते है , इसके द्वारा प्रेषक , रिसीवर को उसकी पूर्व धारणा औरअभिवृत्ति में परिवर्तन करतें हैं ।

 प्रत्यायन के प्रभाव से बचना(Resisting Persua sion)
 किसी प्रत्यायन के प्रभाव से बचकर ख़ुद की मनोवृति को नहीं बदलना प्रत्यायन का प्रतिरोध( (Resisting persuasion)  कहलाता है, persuasion से बचने के निम्न तरीके हैं

1:: प्रत्यायक विचारों से रक्षा(Attitude inoculation)- .....


इस स्थिति में व्यक्ति प्रत्यायक द्वारा दी गई सूचना द्वारा अपने तर्क से खण्डन करता है,और अपनी सुरक्षा करता है , उदाहरण कोई व्यक्ति यदि एक बार चिट फण्ड में पैसा लगाकर ठगा जाता है तो अगली मर्तबा किसी भी प्रकार के चिटफण्ड एजेंट के बहकावे में नहीं आता।

 अग्र चेतावनी(forewarned)---

 अग्र चेतावनी  का अर्थ है प्रत्यायक के उद्देश्यों का पूर्वज्ञान,
 जब व्यक्ति को इस बात का अहसास पहले से होता है कि प्रत्यायक किस उद्देश्य से उसकी पहले वाली मनोवृति को बदलने का प्रयास  कर रहा है, ऐसी स्थिति में व्यक्ति प्रत्यायन का विरोध करता है और यदि प्रत्यायक का उद्देश्य  व्यक्ति के पूर्व अभिवृत्ति या सोंच का उल्टा हो तो  व्यक्ति के मनोवृति में प्रत्यायक का उल्टा इफ़ेक्ट पड़ता है, जिसे बूमरैंग इफ़ेक्ट कहतें है।
 प्रत्याक्रमण प्रभाव (बूमरैंग इफ़ेक्ट)--

जब किसी व्यक्ति के मनोवृति को बदलने के प्रयास में उस व्यक्ति की  आज़ादी में रूकावट आती है तो प्रत्यायक का प्रभाव शून्य हो जाता है बल्कि व्यक्ति (receiver) प्रत्यायक के प्रति  घनघोर विरोधी हो जाता है , मार्केटिंग के क्षेत्र में किसी उत्पाद को जब बलपूर्वक बेचने की कोशिश होती है तो खरीददार वस्तु से नफ़रत करने लगता है ,जबकि इससे पूर्व वह कभी कभी उस उत्पाद को ख़रीद भी लेता था ,अब बिलकुल खरीदना बन्द कर देगा।

    मानसिक बुद्धिमान,क्षमतावान व्यक्ति  --          (Stokpile---)

 सबल,शिक्षित,सामाजिक व्यक्ति की मनोवृति में परिवर्तन लाना प्रत्यायक के लिए टेढ़ी खीर साबित होता है ।
 अपनी व्यक्तिगत स्वायत्तता की सुरक्षा(defence against influence)
 व्यक्ति यदि प्रत्यायक के मनोवृति में बदलाव लाने जाने वाले  हथ कण्डों को बारीकी से समझे
 और अपने विश्वाश और मनोवृति में दृढ रहे तो मनोवृति में परिवर्तन के प्रयास निर्रथक साबित होंगे।

 कृपया इस पोस्ट को भी पढ़ें--
भावनात्मक बुद्धि या emotional intelligence क्या है? iQ और EQ में क्या अंतर है?

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